मधुर कहानियाँ
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चरनदास चोर


चरनदास - गुरुजी! प्रणाम! आप तो सर्वज्ञ और त्रिकालदर्शी हैं। आपने अपने सैकड़ों भक्तों और शिष्यों का उद्धार किया है। कृपया मुझे भी आप अपना शिष्य बना लें, आपकी इस कृपा के लिए मैं आपका बहुत कृतज्ञ होऊँगा।

गुरुजी - तुम कौन हो! कहाँ से आये हो और तुम्हारा नाम क्या है?

चरनदास - गुरुजी, मेरा नाम चरनदास चोर है। मेरा कोई घर और स्थान नहीं, और इस दुनियाँ में मेरा कोई नहीं है; मैं बिल्कुल अकेला हूँ इसीलिए आपकी शरण में आया हूँ। गुरुजी, आप हमें अपना बना लीजिये।

गुरुजी - मैं इस तरह हर एक को अपना शिष्य भला कैसे बना सकता हूँ? जब तक मुझे तुम्हारा अता-पता न लगे और मैं यह न समझ लूं कि तुम्हें मैं रख सकता हूँ अथवा नहीं, तुममें चेला बनने की योग्यता है अथवा नहीं तब तक मैं कुछ नहीं कह सकता।

पहले से ही मेरे पास सैकड़ों लोग आये हुए हैं जिनके बीच मैं फँसा हूँ और उनसे तंग आ गया हूँ। अभी तक मैं न उन्हें कुछ बना पाया और न उनसे मेरा पीछा ही छूटता है। न मालूम आज सवेरे-सवेरे तुम कहाँ से आ गये। हाँ, तो मैं सबसे पहले यह जानना चाहता हूँ कि तुम्हारा नाम चोर क्यों है?

चरनदास - इसलिए कि मैं चोर हूँ। गुरुजी मेरा काम और पेशा केवल चोरी करना है।

गुरुजी - अरे! यदि तू चोर है तो फिर यहां क्यों आ गया? क्या मुझे भी पकड़वायेगा और मुझे भी चोरी के इलज़ाम में फँसायेगा?

चरनदास - नहीं, गुरुजी! माफ़ करें! मैं जो कुछ चोरी करके लाया करूँगा वह सब आपके श्री चरणों में रख दिया करूँगा।

गुरुजी - हे भगवान्! आज सुबह ही सुबह क्या आफ़त और बला मेरे सिर पर आ गई है। तो क्या मैं तुम्हारा चोरी का माल लेकर खाया करूँगा और उसे अपने शिष्यों में बाँटा करूँगा। इस तरह तो तुम पहले ही दिन मुझे जेल भिजवा दोगे।

चरनदास - नहीं गुरुजी। मैं अपने काम में बहुत होशियार हूँ। बचपन से ही मैं चोरी का काम करता आया हूँ और कभी पकड़ा नहीं गया तथा किसी पर कभी कोई आँच नहीं आने दी।

गुरुजी - अरे बेहूदे! यह सब क्या बकवास कर रहे हो? यह आध्यात्मिक स्थान है, पूजा की जगह है, तुम यहाँ पहुँचे कैसे गये? जो आदमी चोरी करता है उसमें तो चोरी के साथ-साथ और सैकड़ों दोष और ऐब आ जाते हैं। वे सब भी तुममें होंगे ही।

चरनदास - नहीं गुरुजी! मैं केवल बीड़ी-सिगरेट पीता हूँ, कभी-कभी जुआ खेलता हूँ और जब कभी मौक़ा मिल जाय तो अपने यार-दोस्तों के साथ बोतल-दो बोतल शराब पी लेता हूँ और तो वैसे मुझमें कोई ऐब व अवगुण नहीं है। मैं तो बहुत ही शरीफ़ आदमी हूँ। आपके अखाड़े की इज्ज़त व आपके नाम को ऊँचा ही ऊँचा ले जाऊँगा।

गुरुजी - (अपना डण्डा उठाते हुए) बदचलन कहीं का! सारे अवगुण तो हैं, बोल, अब बाकी ही कौन-सा रह गया है। तू यहाँ मेरे पास क्या लेने आया है? मैं ऐसे बदचलन आदमी को अपने आश्रम में कभी नहीं रख सकता। तुम तो और दूसरे शिष्यों का, जो कुछ अभी तक भी थोड़ा-बहुत सीख पाये हैं, उनका भी सत्यानाश कर दोगे।

चरनदास - गुरुजी! आप क्रोध न करें। मैं आपका सबसे अच्छा चेला बनूँगा। आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करूँगा और आपकी आज्ञा का सब प्रकार से पालन करूँगा।

गुरुजी - अरे मूर्ख! तू यह सब क्या बातें कर रहा है? क्या तू बीड़ी-सिगरेट पीना छोड़ देगा?

चरनदास - (जेब में से सिगरेट-बीड़ी निकालकर गुरुजी के चरणों पर रखते हुए) लीजिए गुरुजी, अभी से छोड़ दिया।

गुरुजी - लेकिन जुआ खेलने तो तू जायेगा ही?

चरनदास - कभी नहीं जाऊँगा। मैं हमेशा आपके आदेश का पालन करूँगा।

गुरुजी - और शराब?

चरनदास - दो बोतलें शराब मेरे थैले में रखी हैं उन्हें मैं निकालकर अभी आपके सामने फोड़े देता हूँ और फिर कभी उनको हाथ नहीं लगाऊँगा। (शराब की बोतलें हाथ में लेते हुए) लीजिए गुरुजी, आज से शराब भी ख़त्म।

(यह कहते ही ज़ोर से दोनों बोतलें ज़मीन में दे मारीं और उन्हें फोड़ दिया)

गुरुजी - तुम तो बहुत बहादुर आदमी मालूम होते हो, मिनटों में सब कुछ छोड़ दिया, लोगों को यह करने में तो बरसों लग जाते हैं। तो अब तुम चोरी तो नहीं करोगे? यदि तुम ऐसा कर सको तो मैं तुम्हें अपना चेला बना लूँगा।

चरनदास - गुरुजी! माफ़ करें, चोरी तो मैं नहीं छोड़ सकता। चोरी तो मेरे ख़ून के रग-रग में बसी हुई है, इसके बग़ैर तो मैं ज़िन्दा भी नहीं रह सकता। इसीलिए तो मैंने अपने नाम के साथ ‘चोर’ शब्द भी जोड़ रखा है।

गुरुजी - लो! तुमने सब कुछ किया कराया चौपट कर दिया। भला एक चोर को मैं अपने आश्रम में कैसे रख सकता हूँ। जिससे हर वक्त ख़तरा बना रहे और पुलिस दरवाज़े पर हमेशा खड़ी रहे।

चरनदास - गुरुजी, आपके कहने पर मैंने अपने सब ऐब छोड़ दिये हैं, और भी आप जो कुछ कहेंगे मैं अवश्य करूँगा परन्तु सिर्फ़ एक बात आप भी मेरी मान लें कि मुझे चोरी छोड़ने को न कहें।

गुरुजी - तो इसका मतलब यह हुआ कि मैं तुम्हें चोरी की इजाज़त दे दूँ। गुरु-ग्रन्थों ने हमें जो कुछ बताया है उसे ताक़ में रख दूँ और ऐसी इजाज़त देकर मैं अपने-आपको भी चोर बनाऊँ! तुम भला ऐसी बातें कैसे कर रहे हो, जो कभी मंज़ूर ही नहीं की जा सकतीं।

चरनदास - गुरुजी! आप मुझ पर विश्वास करें, मैं आपके ऊपर कोई आँच नहीं आने दूँगा। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं आज से कभी झूठ नहीं बोलूँगा। न आपके सामने, न पुलिस के और न कहीं अन्य जगह। चाहे जिस तरह बने मुझे अपना चेला बना लीजिये और अपने चरणों के पास से मत हटाइये।

कहते-कहते उसने गुरुजी के चरण पकड़ लिए।

गुरुजी - आज न मालूम, सुबह-सुबह किसका मुँह देखा है। मैं तुम्हें चोरी की इजाज़त दे दूँ और चोरी का माल भी तो यहीं आयेगा। यह तुम किस तरह की बातें कर रहे हो? तुम अभी यहाँ से चले जाओ वरना मैं पीट-पीटकर मैं तुम्हारी चमड़ी उधेड़ दूँगा, अभी पुलिस के हवाले कर दूँगा और उन्हें बताऊँगा कि तुम चोर हो।

चरनदास - गुरु जी! आप जो चाहें कर लीजिए। परन्तु मैं आपका चेला जरूर बनूँगा। मैं आपके सम्मुख तीन प्रतिज्ञायें और करता हूँ। अगर आज यहाँ कोई फूलों से सजे हुए हाथी पर बिठाकर और मेरे गले में फूलों का माला पहनाकर सारे राज्य में मेरा जुलूस निकालने को भी कहें तो मैं कभी नहीं मानूँगा।

गुरुजी - हाँ-हाँ! लोग तैयार बैठे हैं और तुम्हारा जुलूस निकालने के लिए वे बड़े उत्सुक हैं। तुम्हीं तो एक ऐसी हस्ती इस राज्य में रह गये हो कि जिसका जुलूस निकाला जायेगा।

चरनदास - अच्छा गुरुजी! मेरी दूसरी प्रतिज्ञा यह है कि यदि यहाँ का राजा मेरी ख़ुशामद करे और मुझे राजगद्दी पर बैठने के लिए कहे तो मैं कभी राजगद्दी पर नहीं बैठूँगा।

गुरुजी - वाह देखो तो। राजगद्दी तुम्हारे लिए ज़रूर खाली की जायगी। क्यों नहीं? तुम्हीं को तो अब यहां का राजा बनाया जायगा। तुम्हें राजगद्दी पर बैठाने के लिए प्रजा तैयार बैठी है। अरे मूर्ख! क्या बक़वास कर रहा है? कहीं तेरा दिमाग़ ख़राब तो नहीं हो गया?

चरनदास - गुरुजी! अब मेरा तीसरा प्रण भी सुन लीजिये। यदि कोई राजकुमारी मेरे साथ शादी करने के लिए कहे तो वह भी मैं इन्कार कर दूँगा अैर राजकुमारी के साथ शादी कभी नहीं करूँगा।

गुरुजी - हाँ, हाँ, राजकुमारी तो चोर के साथ शादी करने के लिए तैयार बैठी है!

चरनदास - गुरुजी! मैं चलता हूँ। मैं आपका चेला तो बन ही गया हूँ, आपको कभी छोडूँगा नहीं। अब शाम होने वाली है और रात को कहीं चोरी करने के लिए मुझे उसकी तैयारी भी करनी है।

यह कहकर चरनदास चोर चला गया। गुरुजी हैरान व परेशान हो गये। उन्हें कुछ होश ही नहीं रहा। यह आज क्या क़िस्सा हुआ! रात को उन्होंने खाना भी नहीं खाया और नींद भी नहीं आई।

उधर चरनदास चोर आधी रात को राजा के ख़ज़ाने पर जा पहुँचा। चाबियों का बड़ा गुच्छा उसके हाथ में था।

पहरेदारों ने पूछा - तुम कौन हो? तुम्हारा क्या नाम है और तुम कहाँ जा रहे हो?

चरनदास ने कहा कि, ‘मेरा नाम चरनदास चोर है, मैं चोर हूँ और मैं यहाँ ख़ज़ाने में चोरी करने आया हूँ।’

पहरेदारों ने इसे मज़ाक समझा और उसे अन्दर जाने दिया।

सवेरे 10 बजे जब हरिदास दीवान अपने ख़जाने पर आये तो देखा कि तिजोरी का ताला खुला पड़ा है। उन्होंने पहरेदारों को बुलवाया और उनसे पूछ-ताछ की।

पहरेदारों ने बताया कि रात को आपने ही तो चाभी देकर किसी को ख़ज़ाने में से माल निकालने के लिए भेजा था।

दीवान साहब यह सुनकर हैरान हो गये और ख़ज़ाने का निरीक्षण करने पर देखा कि वहाँ से सबसे कीमती सोलह लालों में से आठ लाल ग़ायब हैं। वे बहुत उलझन में पड़ गये। और जब ख़ज़ाने के स्टॉक में रिपोर्ट लिखने लगे तो उनके मन में लालच आ गया। उन्होंने सोचा कि आठ ‘लाल’ तो चोरी चले ही गये हैं मैं अपनी रिपोर्ट में सोलह ‘लालों’ की चोरी क्यों न लिख दूँ, और राजा को सूचना दे दूँ कि सभी सोलह ‘लाल’ चोरी हो गये हैं। अन्ततः दीवान साहब ने ऐसा ही किया और रिपोर्ट लिखकर भेज दी।

अब पुलिस की भाग-दौड़ चारों ओर चरनदास चोर को पकड़ने के लिए शुरू हो गई। पता लगा कि चरनदास चोर तो नीलाम्बर गुरु के आश्रम में रहते हैं।

पुलिस नीलाम्बर गुरु के आश्रम में पहुँची और चरनदास चोर का पता पूछने लगी। चरनदास चोर तुरन्त निकलकर बाहर आ गया और बताया कि मैं चरनदास चोर हूँ। जब उससे पूछा गया कि क्या रात को उसने सरकारी ख़ज़ाने में चोरी की है तो उसने क़बूल किया कि, ‘हाँ, मैंने चोरी की है।’

तब पुलिस चरनदास चोर और गुरुजी को पकड़कर ले गयी और उन्हें दूसरे दिन कचहरी में पेश किया।

न्यायाधीश ने पूछा कि, ‘रात को ख़ज़ाने में चोरी तुमने की थी?’

चरनदास ने कहा - हाँ, हुज़ूर।

न्यायाधीश ने पूछा - वे सोलह लाल कहाँ हैं?

चरनदास ने चट उत्तर दिया - हुज़ूर मैं तो केवल आठ ‘लाल’ लाया था जो मेरे पास रखे हुए हैं, बाकी आठ को तो मैं ख़ज़ाने में ही छोड़ आया था। कहकर उसने अपनी धोती के खूँट से आठों लाल निकालकर न्यायाधीश के सामने रख दिये।

अब न्यायाधीश ने तुरन्त उस दीवान के नाम वारण्ट निकाल दिया और उसके घर की तलाशी का आदेश दिया।

चूँकि ताज़ा-ताज़ा मामला था, आठ ‘लाल’ वज़ीर के घर से बरामद हो गये और वज़ीर को दस साल के लिए जेल भेज दिया गया।

बेचारे गुरुजी खड़े-खड़े काँप रहे थे। परन्तु उन्होंने जज का दूसरा हुक़्म सुना कि चरनदास चोर को छोड़ दिया जाय और उसके गुरुजी को सच बोलना सिखाने के लिए पुरस्कार दिया जाय।

न्यायाधीश का फैसला सुनते ही चारों ओर लोगों में तहलक़ा मच गया। सबने सचाई के लिए गुरु और चेला दोनों की वाह-वाह की। उन्हें देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। उनमें से सरगना लोगों ने आपस में यह तय किया कि ऐसे सत्यवादी लोगों को तो हाथी पर बैठाकर उनका सुन्दर जुलूस निकाला जाना चाहिये ताकि सभी लोग उनसे सच बोलने का ऐसा सबक़ सीख सकें।

लेकिन तभी चरनदास ने सबको मना कर दिया और कहा कि चोरी करने वाला आदमी इस सम्मान के क़ाबिल नहीं है।

आश्रम में पहुँचते ही नीलाम्बर गुरु ने चरनदास को अपनी छाती से लगा लिया और कहा कि - ‘बेटा मैं तुम्हारी सत्यवादिता से बहुत प्रसन्न हूँ। इतने बड़े सम्मान को तुमने सहज ही ठुकरा दिया। लोभ-लालच भी तुममें नहीं है। बुरे व्यसन तो तुमने छोड़ ही दिये हैं। यदि इस चोरी के काम को भी छोड़ दो तो तुम बहुत अच्छे आदमी बन जाओगे।’

चरनदास ने गुरुजी के चरणों में अपने घुटने टेक दिये और उस दिन से वह सचमुच में सद्गुणों की चोरी करने लगा। जहाँ कोई अच्छाई वह देखता उसे वह अपनाने की कोशिश करता और अपने दुर्गुणों तथा ख़राबियों को छोड़ने का प्रयास करता। धीरे-धीरे उसकी प्रकृति निर्मल होती गई और उसकी यशकीर्ति चारों और फैलने लगी।

उस राज्य के राजा के यहाँ एक लड़की के सिवाय कोई सन्तान नहीं थी। राजा को अपनी बेटी के लिए एक सुयोग्य वर की ख़ोज थी। उन्होंने जब चरनदास की कीर्ति को सुना तो उसे देखने वे स्वयँ नीलाम्बर गुरु के आश्रम पहुँचे। चरनदास को देखकर वे बहुत ही प्रसन्न हुए और अपनी लड़की के विवाह का प्रस्ताव चरनदास के समक्ष प्रस्तुत किया।

चरनदास ने तत्काल उस पर अपनी असहमति प्रकट करते हुये कहा कि, ‘राजन् मुझे क्षमा करें, मैं तो सारा जीवन अविवाहित रहकर बिताना चाहता हूँ और यहाँ रहकर गुरुजी के चरणों की सेवा ही करना चाहता हूँ।’

अन्त में राजा गुरुजी की शरण में गये और बहुत अनुनयविनय सुनने के पश्चात् गुरुजी ने चरनदास को बुलाया और राजा की प्रार्थना का उल्लेख किया जिस पर चरनदास तुरन्त गुरु के पैर पकड़कर बोला - ‘गुरुदेव, मुझे क्षमा करें, मैं तो अब आपकी शरण में रहकर परमार्थ के मार्ग पर चलना चाहता हूँ। राजाजी से मेरी ओर से क्षमा आप दिलवाएँ। मैं तो पहले ही उनसे कह चुका हूँ।’

राजा यह सुनकर बड़े हैरान हुए कि कितना महान व विचित्र यह व्यक्ति है, कोई प्रलोभन ही इसे छू नहीं सकता। तब वे सोचने लगे कि यह तो गुरु का प्रभाव व प्रताप होगा जिससे कि एक चोर व्यक्ति जिसमें कितने ही ऐब व अवगुण होते हैं इतना ऊँचा उठ सकता है। ऐसे ही तो गुरु होते हैं जिनसे पूरा समाज ऊँचा उठ सकता है। वे सबकी चेतना में परिवर्तन कर सकते हैं, इसलिए हमको इनके कार्य में पूरा सहयोग करना चाहिये। इस प्रकार वह जितना ही इस घटना पर विचार करता, गहराई में पहुँचता जाता। परिणामस्वरूप उसकी चेतना व जीवन-धारा में महान परिवर्तन आया जो उसकी कार्यप्रणाली व राज्य में भी स्पष्ट लक्षित होने लगा। सारे राज्य में सचाई, पवित्रता, साधना का वातावरण बनने लगा जिससे सभी की प्रगति हुई व आनन्द प्राप्त हुआ।