मधुर कहानियाँ
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धरासुन्दरी


क्या ही मनोरम और सुहावना दृश्य था। सारे वन-प्रान्तर में जहाँ तक दृष्टि जाती, चारों और हरियाली फैली थी। पहाड़ों के अंचलों में चारों ओर रंग-बिरंगे फूल उस स्थान की छटा में चार चाँद लगा रहे थे। सारा पर्यावरण सुगन्ध से महक रहा था। छोटी बड़ी शिलाओं से घिरी तलैया में कमलिनी मुस्कुरा रही थी। कठोर चट्टानों के हृदय से फूटते झरने कल-कल करते और छोटे छोटे शिलाखण्डों से खेलते हुये नीचे उतरकर नदी का रूप ग्रहण कर रहे थे। नदी की चंचल लहरें ऐसी स्वरधारा में बह रही थीं मानो संगीत के सारे वाद्य यंत्र - वीणा-सितार-दिलरुआ, इसराज, सुरमण्डल, तबला, पखावज और मृदंग आदि एक साथ समवेत स्वर में लयबद्ध बज रहे हों। भाँति-भाँति के पक्षियों के गीत स्वर भी उसी भव्य संगीत में मानों लीन हो रहे थे। बीच-बीच में अन्य वनचरों की स्वर लहरियाँ भी झाँझ-करताल के समान उस संगीत को और भी समृद्ध कर रही थीं।

प्राकृतिक सौन्दर्य से लिपटे हुये उस शान्त पर्यावरण में एक पहाड़ी पर ऋषि द्रोण का आश्रम स्थित था। उस स्थान की नैसर्गिक सुन्दरता और पवित्रता को देखकर ऐसा लगता था मानों उस वन प्रदेश के समस्त प्राणी - क्या पशु-पक्षी, रेंगने वाले जीव तथा मछलियाँ आदि सभी उसी आश्रम के वासी हों।

उस आश्रम की कुटिया में सुन्दर-सुन्दर पत्तों के बने आसन बिछे थे और इधर-उधर दो चार मिट्टी के पात्र रखे थे। पवित्र कदली के द्वार स्तम्भों के साथ स्वस्तिक कलश सत्यं शिवं सुन्दरम् का मंगल उद्घोष कर रहे थे।

ऋषि द्रोण और उनकी पत्नी धरासुन्दरी के वेश और वस्त्र वनवृक्ष के छालों और भाँति-भाँति के पत्तों और पुष्पों से इतने आकर्षक और सुन्दर बने हुये थे कि आधुनिक काल (Modern Times) का बड़े से बड़ा वस्त्र-शिल्पी (Tailor Master) या Dress-Designer भी क्या वैसी आकल्पना (Design) बना सकेगा। धरासुन्दरी को विधाता से अपूर्व सौन्दर्य का वरदान तो मिला ही था - किन्तु उस पर भी वनैले पत्तों के वस्त्रों की आकृति तथा ललाट और देह पर चित्रित की हुई विभूति तथा मस्तक पर बालों का गठबन्धन और जटा-जूट इन सबसे ऋषि और ऋषि-पत्नी ऐसे लगते थे जैसे ये स्वर्ग से उतरे देव-देवी हों।

ये ऋषि द्रोण और धरासुन्दरी आतिथ्य सत्कार के लिये दूर-दूर तक विख्यात थे। उस मार्ग से जाने वाले पथिकों को जब तक आचार्य द्रोण अपने आश्रम में भोजन और विश्राम न करा लेते आगे नहीं जाने देते। उस आश्रम में पथिकों को न केवल भोजन और वस्त्र व शारीरिक विश्राम मिलता वरन् उस तपोभूमि के शान्त वातावरण से उन्हें आत्मिक शान्ति और प्रेरणा भी मिलती।

ऋषि नित्य प्रातः दैनिक क्रिया तथा ध्यान, पूजन, हवनादि से निवृत्त होकर याचना के लिये नगर की ओर चल पड़ते और जो कुछ मिलता - वही सब लेकर आश्रम ले आते।

एक दिन जब ऋषि द्रोण भिक्षा के लिये गये हुये थे एक श्यामवर्ण, विशाल-स्कन्ध युवा ब्रह्मचारी अपने वृद्ध माता-पिता के साथ आश्रम में पहुँचा और तत्काल कहा - ‘‘हम लोग आज यहाँ विश्राम करेंगे। मेरे माता-पिता बहुत वृद्ध हैं और इस समय बहुत थके हुये हैं और उन्हें बहुत भूख लगी हुई है। पहले इनको भोजन कराइये अन्यथा भूख-प्यास के मारे इनके तो प्राण छूटे जा रहे हैं।’’

धरासुन्दरी उस तपस्वी युवक के प्रभाव और तेज को देखती रह गयी और ‘बहुत अच्छा’ कहकर इधर-उधर भागने लगी।

थोड़ी ही देर के बाद युवक ने कहा - ‘‘अभी तक भोजन क्यों नहीं आया।’’ धरासुन्दरी से कोई जवाब नहीं बना। इस पर युवक और ऊँचे स्वर से पूछने लगा कि, ‘‘भोजन कब आयेगा और कितनी देर में आयेगा।’’

धरासुन्दरी घबराई और पागलों की तरह अन्दर बाहर जाने लगी। इतनी देर में युवक ने क्रोध में फिर पूछा कि, ‘‘मेरे माँ-बाप को खाना मिलेगा कि नहीं? क्या खाना तब आयेगा जब वे मर जायेंगे। चारों तरफ वातावरण में यह फैला रखा है कि द्रोण ऋषि के आश्रम में अतिथि-सत्कार बहुत होता है और यहाँ घण्टों हो गये दो वृद्ध जीवों के लिये भोजन नहीं मिला।’’

युवक क्रोध में भरा हुआ था और चिल्लाते हुए कुटिया में घुस गया कि वहाँ से कुछ भोजन उठाकर लाये। अन्दर सिवा पत्तों और दो-चार मिट्टी के पात्रों के और कुछ भी नहीं था।

तपस्वी युवक आग-बबूला हो गया और कहने लगा कि, ‘‘यहाँ सब कुछ झूठ और फ़रेब बना रखा है। आश्रम में अनाज का एक दाना भी नहीं है और खाने की कोई वस्तु नहीं है और कहते हैं कि अतिथि-सेवा करते है।’’ धरासुन्दरी की ओर देखकर कहने लगे कि, ‘‘यह क्या पाखण्ड रचा है?’’

इस पर धरासुन्दरी बहुत घबरा गई और साहस करके नम्रतापूर्वक कहने लगी कि, ‘‘मेरे पति भिक्षा के लिये गये हैं। वे अभी आते ही होंगे। महाराज, थोड़ा धैर्य रखिये। उनके भिक्षा लाते ही मैं आपकी सेवा करूँगी और आपको भोजन कराऊँगी।’’

इस पर तपस्वी युवक और भी क्रोधित हो गये और लाल-पीले होकर कहने लगे कि, ‘‘तब तक तो मेरे माता-पिता के प्राण छूट जायेंगे, फिर किसको भोजन देंगे और किसकी सेवा करेंगे। मुझे ऐसा पाखण्ड और धोखे की आशा नहीं थी। वह आश्रम ही क्या हुआ जिसमें खाने के लिये कुछ है ही नहीं।’’

इस पर धरासुन्दरी परेशान हो गयी और शहर की तरफ भागी कि वह स्वयं जाकर भोजन का सामान लाये।

भागती दौड़ती थकी मांदी परेशान, पसीने छूटे हुये, एक पंसारी की दूकान पर पहुँची जहाँ भीड़ और ग्राहकों की लम्बी क़तार लगी हुई थी।

धरासुन्दरी घुस घुसाकर लोगों की भीड़ को काटती हुई दुकान के सामने ऐसे स्थान पर पहुँची जहाँ कि दुकानदार उसको देख सके और थोड़ी ऐसी आवाज़ भी निकली जिससे दुकानदार का ध्यान उसकी तरफ पड़े।

दुकानदार धरासुन्दरी की तरफ देखते ही व्याकुल हो गया और सब ग्राहकों और अपनी दुकानदारी को भूल गया। उसने धरासुन्दरी को आगे अन्दर की तरफ बुलाया और पूछा कि, ‘‘आप कौन हैं और आपको क्या चाहिये।’’ धरासुन्दरी ने बतलाने की कोशिश की कि, ‘‘मैं ऋषि द्रोण की पत्नी हूँ और ऋषि द्रोण प्रातः से भिक्षा लेने गये हैं जो वापिस नहीं आये। दो बूढ़े अतिथि भूख के मारे तड़प रहे हैं। आप मुझे भोजन का सामान दें ताकि मैं तुरन्त वापस पहुँचकर उनको भोजन खिलाकर उनकी जान बचा सकूँ।’’ दुकानदार ने कहा कि, ‘‘पैसे निकालिये और बतलाइये कितना-कितना सामान चाहिये।’’ इस पर धरासुन्दरी चकित रह गई और कहा कि, ‘‘पैसा क्या होता है पैसा किसको कहते हैं? हमने तो कभी देखा नहीं और नाम भी नहीं सुना। मेरे पति द्रोण ऋषि नित्य भिक्षा ले आते हैं और हम लोग अतिथियों को खिलाकर भोजन कर लेते हैं।’’

इस पर दुकानदार ने डरा धमका कर कहा कि, ‘‘यह दुकान है और यहाँ सामान मुफ़्त नहीं दिया जाता है। यदि इस तरह मुफ़्त देने लगें तो कुछ दिनों में ही हमारा दिवाला निकल जायेगा।’’

धरासुन्दरी ने फिर नम्रता से और मिन्नत-समाजत से कहा कि, ‘‘स्थिति बहुत गम्भीर है। दो वृद्ध व्यक्तियों की जान संकट में है। आप कुछ दयाभाव से सोचें और मुझे जल्दी से सामान दे दें ताकि मैं वापस पहुँचकर उन प्राणियों के प्राण बचा सकूँ।’’

दुकानदार के मन में उस समय नीचता और दुष्टता के भाव चल रहे थे। उसने सब ग्राहकों को चला दिया कि, समय हो गया है और दुकान अन्दर से बन्द कर ली। वह धरासुन्दरी से दुष्ट भाव से कहने लगा कि ‘‘यदि तुम्हारे पास पैसे नहीं हैं तो तुम्हारे पास जो कुछ है वही दे दो।’’ धरासुन्दरी ने कहा कि, ‘‘मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। बेशक़ मेरी तलाशी ले लो।’’ दुकानदार ने फिर कहा कि, ‘‘तुम्हारे पास बहुत कुछ है। लेकिन पहले वचन दो कि जो कुछ तुम्हारे पास है वह दोगी। उस सूरत में जो कुछ खाने-पीने का सामान चाहिये मैं दूँगा।’’

धरासुन्दरी ने सरलता में वचन दे दिया। तब दुकानदार ने भरपूर खाने-पीने का सामान धरासुन्दरी के थैलों में भर दिया। अब दुष्ट दुकानदार धरासुन्दरी के पास-पास जाने लगा कि, ‘‘सुन्दरता है, तुम्हारे पास सुन्दर शरीर है, अब अपने वचन के अनुसार वह मुझे दो।’’

धरासुन्दरी चिल्ला पड़ी कि, ‘‘इस संसार में ऐसी दुष्टता भी है’’ इसका मुझे ज्ञान ही नहीं था। अब वह घोर दुविधा में पड़ गई कि एक ओर तो अतिथियों के प्राण बचाने हैं और दूसरी ओर अपनी पवित्रता की रक्षा करनी है। अब क्या करूँ? क्रोध में भरी हुई धरासुन्दरी ने अन्दर से एक छुरा लिया और क्षणभर में अपने वक्षस्थल काटकर दुष्ट दुकानदार के मुँह पर फेंक दिये और सामान के थैले लेकर अपने आश्रम की ओर भागी।

आश्रम में पहुँचकर तुरन्त खाने का सामान तपस्वी युवक के सामने रखा और खून की धारों के गिरते-गिरते कहा - ‘‘ओ तपस्वी युवक, अपने माता-पिता को खिलाओ और उनके प्राण बचाओ।’’ और अपनी दुर्दशा की कहानी का वर्णन करते-करते कहने लगी कि, ‘‘अब मैं अपने प्राण छोड़ती हूँ। मेरे पति ऋषि द्रोण को बता देना और मेरा प्रणाम देना और उनसे मेरी क्षमा माँगना।’’

तपस्वी युवक विष्णु भगवान् थे और उनके वृद्ध माता-पिता शिव और पार्वती थे। वे तीनों अतिथि का रूप धारण करके धरासुन्दरी की परीक्षा लेने आये थे परन्तु उनको इतना मालूम नहीं था कि परीक्षा इतनी दर्दनाक हो जायेगी। उन्होंने धरासुन्दरी को कहा कि, ‘‘तुम्हारी परीक्षा बड़ी कठोर और भयंकर हुई है। हम तुम्हें वर देते हैं कि मैं स्वयँ अगले जन्म में तुम्हारी गोद में कृष्ण के रूप में खेलूँगा और तुम्हारे ही दूध पर पलूँगा और तुम्हारे लिये अपनी लीला दिखाऊँगा।’’

ऋषि द्रोण आये और घोर दर्दनाक दृश्य देखा। तपस्वी युवक और उसके माता-पिता तो अन्तर्धान हो गये परन्तु ऋषि द्रोण की दशा के साथ सारे वन पर्वत के पशु-पक्षियों की दशा भी बड़ी करुण हो गई। वातावरण में महाशोक छा गया। ऐसा लगने लगा कि जैसे वायु, जल, आकाश - ये सब सहम गये हों।