मधुर कहानियाँ
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सैन व बैन


अमृत - सन्त - वाणी

जो कोउ समुझै सैन में, ता सौं कहिये बैन।

सैन बैन समुझै नहीं, ता सौं कछु न कहैन।।

सयाना तो इशारे में समझ लेता है और जो अयाना यानी लट्ठ-गँवार है उसको बहुतेरा समझाओ तो भी नहीं समझता। ऐसे मूर्खों के साथ मौन रहना बेहतर है।

एक बार की बात है एक राजा था। उसके द्वार पर दरबान दिन-रात पहरा दिया करता था। अपने महल के वातायन से रानी उसको जब तब देखा करती थी कि किस मुस्तैदी से वह दिन-रात चौकसी रखता है। आखिर उससे रहा न गया। एक दिन जब राजा भोजन करके पान ले रहे थे तो उसने कहा -

‘‘महाराज, देखिये न यह भी क्या अन्धेर है कि एक आपका दरबान है आँधी-पानी, सर्दी-गर्मी - कुछ भी हो दिन-रात पहरा देता है पर इसको वेतन मिलता है कुल पाँच रुपये प्रतिमास। उधर आपके मन्त्री जी हैं, बुरा न मानें तो एक बात कहूँ। कई बार मैंने देखा है कि बस एक-आध घण्टा इधर-उधर थोड़ा-सा काम किया और चले गये। इसी के उन्हें दो हजार रुपये महीना मिल जाते हैं। यह तो अन्याय है। अन्धेर कैसे कहूँ? बताइये न क्या कारण है इसका?’’

राजा ने कहा, ‘‘रानी, हम तुमको एक नाटक दिखाते हैं।’’

हुक़्म हुआ कि ‘‘दरबान को बुलाओ।’’

उसी समय दरबान हाज़िर हो गया। राजा ने कहा, ‘‘हमने सुना है कि महल के द्वार पर जो कुतिया बैठी रहती है उसने बच्चे दिये हैं। जाओ देख आओ।’’

दरबान राज-द्वार पर गया और आकर बोला, ‘‘जी हाँ महाराज कुतिया ने बच्चे दिये हैं।’’

राजा ने पूछा, ‘‘ठीक, कितने बच्चे हुए हैं?’’

दरबान ने कहा, ‘‘कह नहीं सकता।’’

राजा ने कहा, ‘‘अच्छा जाओ फिर देख आओ।’’

दरबान राज-द्वार पर गया और आकर बोला, ‘‘महाराजा कुतिया ने चार बच्चे दिये हैं।’’

राजा ने कहा, ‘‘अच्छा, यह तो बताओ कितने नर हैं और कितने मादा?’’

दरबान ने कहा, ‘‘महाराज यह तो मैंने नहीं देखा।’’

राजा ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं जाओ देख आओ फिर बताओ।’’

दरबान राज-द्वार पर गया और आकर बोला, ‘‘महाराज, दो कुत्ते और दो कुतिया हैं।’’

राजा ने पूछा, ‘‘क्या रंग है उनका?’’

दरबान ने कहा, ‘‘यह तो नहीं देखा।’’

फिर भेजा गया।

आकर कहा, ‘‘जी सफेद और काले हैं।’’

राजा ने पूछा, ‘‘कितने सफ़ेद और कितने काले हैं?’’

दरबान ने कहा, ‘‘महाराज यह नहीं गिना।’’

फिर भेजा गया।

आकर कहा, ‘‘जी दो सफ़ेद और दो काले हैं।’’

राजा ने पूछा, ‘‘कुत्ते सफ़ेद हैं या काले हैं?’’

दरबान ने कहा, ‘‘यह नहीं देखा।’’

तात्पर्य यह है कि कई बार वह भेजा गया।

अब राजा ने मन्त्री को बुलवाया और कहा, ‘‘सुना है राज-द्वार पर रहने वाली कुतिया ने बच्चे दिये हैं। जाकर देख आओ।’’

मन्त्री गया और आकर अर्ज़ किया, ‘‘महाराज चार बच्चे हुए हैं। दो कुत्ते और दो कुतिया। कुत्ते काले और कुतिया सफेद हैं और उनके पालन-पोषण का प्रबन्ध कर दिया गया है।’’

मन्त्री के चले जाने पर राजा ने रानी से कहा, ‘‘कहो, देखा अंतर?’’

रानी चकित रह गई।

राजा ने कहा, ‘‘था न वह बैल के मुआफ़िक? जैसा ठेल दिया वैसा चल दिया और दूसरा भी था कि बिना कहे पूरी जानकारी स्वयँ ली और सब सवालों के जवाब भी तरीके से दे दिये। इतना ही नहीं बिना कहे-पूछे आगे का प्रबन्ध भी स्वयँ ही कर दिया।’’

रानी बोली, ‘‘बेशक़। सैन (इशारे) और बैन (कहने) समझने का कितना बड़ा अन्तर है। सच ही सयाने के लिए तो सैन भी काफ़ी है पर अयाने के लिए बैन भी बेफ़ायदा है।’’

वास्तव में इस संसार में भगवान् सैन द्वारा सृष्टि का व्यवहार कर रहे हैं। सन्त-सद्गुरु उसको पकड़ लेते हैं और उसके द्वारा सच्चे साधकों को सैन व बैन दोनों ही द्वारा उनके स्रोत तक पहुँचाने की व्यवस्था साधना-पद्धति द्वारा करते हैं। किन्तु, कितने लोग हैं जो अपने अन्दर के प्रकाश-स्रोत तक पहुँच पाते हैं?