मधुर कहानियाँ
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कूकर


हिमालय पर्वत के आँचल में एक सुन्दर और पुरातन मन्दिर था जिसकी बहुत प्रतिष्ठा थी। दूर-दूर से लोग भगवान् से अपनी इच्छापूर्ण करवाने के लिए इस मन्दिर में आया करते थे।

पंडित रामरतन अपने दादा-परदादा की पीढ़ी से इसके पुजारी थे। अच्छे-भले पुरुष, तपस्वी और ज्ञानी। मन्दिर की शोभा और मान्यता को भरपूर कर रक्खा था।

एक दिन राजस्थान से कुछ लोग आये अपनी मनौती पूर्ण करवाने के लिए और बहुत सा राजस्थानी परम्परा का चढ़ावा चढ़ा गये। दो-तीन दिन वे लोग वहाँ रहे और पूजा-पाठ होता रहा।

जब वे लोग चले गये तो अब पुजारी जी का कर्मकाण्ड आया। उन्हें भगवान् को भोग लगाकर और अपनी तृप्ति करके शेष मिठाई प्रसाद के रूप में सबको बाँटनी थी। जब भोर समय उन्होंने मन्दिर खोला तो मिठाई के ऊपर एक बहुत मोटा लड्डू चढ़ा हुआ था। एक किलो से कम न होगा। ऐसे लड्डू बनाने की प्रथा राजस्थान में ही है।

पंडित जी से रुका न गया। मन्दिर के द्वार अच्छी तरह से खोले भी नहीं, सफाई भी नहीं की, दीया-धूप भी नहीं जलाया और उस लड्डू को लेकर चम्पत हुए। अपने रहने की कोठरी में जाकर पहले उस लड्डू से कलेवा किया तब मन्दिर में वापस आये। इतनी देर में सूर्य भगवान् का प्रकाश मन्दिर के अन्दर आ चुका था, और भगवान् वहाँ स्वयँ खड़े थे।

भगवान् ने कहा, ‘‘मैंने तुम्हारे सारे लच्छन देख लिये हैं। तुमने मन्दिर भी अच्छी तरह से नहीं खोला, दीया-धूप भी नहीं जलाया, नहा-धोकर भगवान् को भोग भी नहीं लगाया और पहले अपने आपको भोग लगाया और एक किलो का लड्डू चट कर गये। तुम्हें शाप दिया जाता है और कूकर की योनि में भेजा जाता है।’’ भगवान् ने पुजारी की कोई क्षमा-प्रार्थना नहीं सुनी और न कोई युक्ति। पंडित रामरतन को कूकर का रूप देकर ग़ायब हो गये। पंडित रामरतन पहले की भाँति मंदिर की मूर्त्ति के सामने पुजारी के रूप में बैठ गये और सोच-विचार में पड़ गये।

इतनी देर में जब लोग मंदिर में पूजा करने आने शुरू हुए तो उन्होंने पंडितजी को कहीं न पाया और वहाँ एक कुत्ते को बैठा देखकर हैरान हो गये। सब लोगों ने दुतकार कर कुत्ते को बाहर निकाल दिया।

यह कुत्ता था तो तपस्वी और ज्ञानी। बजाए इसके कि किसी शहर में नीचे की तरफ दौड़ता और अपने खाने-पीने के लिए टुकड़ों का इंतज़ार करता या किसी मिठाई की दुकान के समीप बैठा रहता, वह बिना सोचे-समझे ऊपर हिमालय पर्वत की ओर दौड़ा।

कई सौ मील का सफ़र और परिश्रम करने के बाद उसने एक ख़ाली गुफ़ा देखी जिसको अपनी घ्राणशक्ति से पहचान लिया कि इसका वातावरण शुद्ध है और इसमें अवश्य किसी महात्मा का निवास है और बिना सोचे-समझे और बग़ैर आज्ञा लिए सीधा गुफ़ा में घुस गया और अन्दर बिल्कुल पीछे की तरफ जाकर बैठ गया।

यह गुफ़ा एक तपस्वी महात्मा की थी जो बहुत वर्षों से इसी में अवस्थित थे। वे इस समय साथ के गाँव में भिक्षा के लिए गये हुए थे। थोड़ी ही देर में वह अपनी गुफ़ा में लौट आये और पाठ-पूजा करके तथा भगवान् को भोग लगाकर भोजन करने लगे। यह उनका दैनिक नियम था। भिक्षा काफ़ी मिल जाती थी। इसलिए उसमें से कुछ वे गुफ़ा में पीछे की तरफ डाल दिया करते थे उन जीव-जन्तुओं के लिए जो गुफ़ा में रहते थे और कुछ आगे की तरफ पक्षियों आदि के लिए।

कूकर को महात्मा जी से यह बचा-खुचा भोजन पाकर प्रसन्नता, शांति और तृप्ति हो जाती। जब महात्मा भिक्षा के लिए जाया करते थे तो यह कूकर भी बाहर अच्छी तरह से घूमघाम आता था और महात्मा जी के आने से पहले ही गुफ़ा में बैठ जाया करता था। इसी तरह प्रायश्चित और तपस्या करते-करते कूकर के बीसों बरस गुजर गये।

एक दिन महात्माजी के मित्र आये और उनको शिवरात्रि की पूजा के लिए पर्वत की दूसरी ओर दूसरे पर्वत पर ले गये जहाँ उनका छोटा-सा मन्दिर और स्थान था। शिवरात्रि के उत्सव के पश्चात् महात्माजी अपने स्थान पर लौट आये। वे मन्दिर से खाने-पीने का काफ़ी भोजन, मिठाई भी साथ लेकर आये थे। उनके पहुँचते ही कूकर ने पूछा - ‘‘महाराज! आप कहाँ चले गये थे? मैं तीन दिन से भूखा हूँ।’’

महात्माजी इस आवाज को सुनकर आश्चर्य चकित हो गए और पूछने लगे कि ‘‘तुम कौन हो? - और कब और कहाँ से आये?’’

कूकर ने कहा, ‘‘महाराज मैं तो बीसों वर्षों से आपके पीछे आपके चरणों में ही रहता हूँ। तपस्या और प्रायश्चित के लिए। आप जो कुछ भोजन के टुकड़े पीछे की तरफ डालते हैं वह मैं ही खाता हूँ। तीन दिन से आप चले गये तो मुझे भोजन नहीं मिला और मैं भूखा रह गया।’’

महात्माजी को अत्यन्त विस्मय व खेद हुआ और उसकी सारी कहानी पूछी। तब कूकर ने अपनी सारी कहानी सरलतापूर्वक बता दी और कहा कि, ‘‘मैं धन्य हूँ जो मैं आपके चरणों में आ गया अन्यथा गली-गली जूठे टुकड़े खाता रहता।’’

महात्मा भावाविष्ट हो गये - और आनन्द में भरकर कहने लगे कि, ‘‘अरे, तुम तो योगी-महात्मा हो - कि जिसने भगवान् के दर्शन तो किये चाहे किसी अपराध के कारण ही। मैं तो वर्षों से तपस्या कर रहा हूँ भगवान् के दर्शनों की अभीप्सा लिये।’’

कूकर कहने लगे, ‘‘महाराज आप तो सिद्ध हैं। स्वयँ भगवान् आपको प्रतिदिन भिक्षा देते हैं और आप उस भिक्षा को भी वापिस भगवान् को अर्पित कर देते हैं। इनसे बड़ा और भगवान् का क्या दर्शन हो सकता है।’’

महात्माजी सुनकर प्रसन्न हो गये और सोचने लगे - यह कूकर कितना ज्ञानी है। आह! इसका प्रायश्चित कब तक रहेगा!

यह सोचा ही था कि भगवान् प्रकट हो गये और दोनों को मुक्त कर दिया।

कूकर को मनुष्य रूप मिल गया और वह वापिस जाकर फिर उसी मंदिर में पुजारी हो गया। - और महात्मा संसार के कोने-कोने में भ्रमण करने लगे और भगवान् का कार्य करने लगे।