चीथड़े
आचरण : योग-साधना
शायद अभी चौदह-पन्द्रह वर्ष की आयु होगी। बाप तो बचपन में ही मर चुका था। न बाप ने बच्चे की शक़्ल देखी न बच्चे ने बाप की।
माँ ने दुविधा से मेहनत-मज़दूरी करके बच्चे को पाला। और स्कूल पढ़ने के लिए भेजा। बेचारी कुछ ही वर्षों में पति के वियोग में रो-रोकर अंधी हो गई। और खाने-पीने के लिए और भी मुसीबत हो गई।
चक्की पीसकर कुछ कमा लेती थी, अब उसमें भी घाटा पड़ने लगा। कमाई की बजाय बेइज़्ज़ती और गालियाँ पड़ने लगीं।
झोंपड़ी में अकेली रहती थी। बच्चा तो स्कूल पढ़ने चला जाता था। जब लोगों का आटा पीसती तो उधर कुत्ते बैठ-बैठकर खाते रहते और अंधेपन की वजह से उसको कुछ पता न लगता। जब लोगों को पूरा आटा न मिलता तो वे बेइज़्ज़ती करते और गालियाँ देते। फिर किसी पड़ोसी ने बताया और सहारा दिया। तब से वह अन्दर से दरवाजा बन्द करके आटा पीसने लगी और अपने बच्चे और अपने लिए दो रोटी कमाने लगी।
पंजाबी की मसल है:
अंधी पीसे कुत्ता चट्टे
आटा घट्टे के न घट्टे।।
(अंधी पीसे कुत्ता खाये! आटा क्यूँ न घटता जाये।।)
यह तो मैं बतलाना भूल ही गया कि यह किस्सा मुलतान के पास के एक गाँव का है और न मालूम भगवान् ने मुलतान के क्षेत्र का जलवायु कैसा बनाया है कि वहाँ के लोग स्वभावतः बहुत मेधावी व बुद्धिमान होते हैं। यह लड़का अब नवीं जमात में पहुँच गया था और पढ़ाई में बहुत तेज़ था। अब उसकी माँ भी मर गई। यह बालक एकदम बेसहारा हो गया। वह इस धक्के को बरदाश्त नहीं कर सका। अब खाना कहाँ से और कैसे खाये।
परेशान होकर उसने अपना झोंपड़ा फूँक दिया और लाहौर की तरफ़ चल पड़ा, इस आशा में कि वहाँ कहीं नौकरी मिल जायेगी। रास्ते में उसको ख्याल हुआ कि नाम तो मेरा ‘खोताराम’ है। खोता गधे को कहते हैं। यह नाम मैं कैसे बतलाऊँगा! तो उसने मन में धारणा की और अपना नाम बदलकर सेवकराम रख लिया।
अब लाहौर पहुँचकर गली-गली और बाज़ार-बाज़ार नौकरी के लिए धक्के खाने लगा और खुशामदें शुरू कीं। कपड़े मैले और फटे-चीथड़े, पाँव का जूता टुकड़े-टुकड़े हुआ और रस्सियों से बँधा। ऐसी दशा में बात तो करना दरकिनार रहा कोई नज़दीक तक न आने दे।
अनारकली बाजार में एक बहुत बड़ी दुकान जनरल स्टोर के बाहर खड़ा था। तो स्टोर के मालिक ने धक्का दिया कि ‘‘यहाँ सामने क्यों खड़े हो?’’ वह बेचारा गिर पड़ा और और उठकर रोते हुए कहने लगा- ‘‘मैं भूखा हूँ परन्तु भिखारी नहीं हूँ। मैं मेहनत व काम करके खाना चाहता हूँ।’’ मालिक के मन में कुछ दया और करुणा का भाव उठा और उसको अहसास भी हुआ कि एक ग़रीब को धक्का देकर गिराने में मैंने ग़लती की है।
उसने पूछा-‘‘तुम क्या काम कर सकते हो?’’ लड़के ने जवाब दिया-कि ‘जो काम भी देंगे मैं उसको दिलोजान से करूँगा।’
मालिक ने पूछा- ‘‘क्या तुम सारे स्टोर को झाड़-पोंछकर साफ़ रख सकते हो? और रात को स्टोर की एक कोठड़ी में रहकर उसकी देखभाल रख सकते हो?’’
लड़के ने कहा- ‘‘मैं ज़रूर करूँगा और आपको खुश कर दूँगा।’’
मालिक को ज़रूरत भी थी, तो उसको काम पर लगा लिया।
स्वभावतः इस लड़के ने इतना अच्छी तरह काम किया कि स्टोर में कभी कहीं कोई कूड़ा-करकट या दाग-धब्बा नहीं रहता था। स्टोर का मालिक देख-देखकर चकित रह जाता था कि भगवान् की उस पर कैसी कृपा हुई कि उसने ऐसा आदमी भेज दिया जो स्टोर को ऐसा साफ-सुथरा रखता है जैसा आज तक कभी किसी ने नहीं रखा। और लो! उसकी स्टोर की रखवाली की चिन्ता भी मिट गई।
एक दिन ऐसा हुआ कि लड़का एक कोने में मेज़-कुर्सी पर बैठा एक कॉपी में कुछ लिख रहा था। मालिक ने देखा और हैरान हुआ। पूछा- ‘‘तुम यह क्या कर रहे हो? क्या तुम्हें लिखना-पढ़ना भी आता है? कौनसी कक्षा तक पढ़े हो?’’
लड़के ने जवाब दिया- ‘‘हुज़ूर मुझे कुछ-कुछ लिखना-पढ़ना भी आता है और मैं नवीं कक्षा तक पढ़ा हूँ। मुझे जब भी समय मिलता है मैं कुछ कहानी लिखता रहता हूँ और कुछ बचपन की यादें भी। ताकि लिखने-पढ़ने का अभ्यास रहे और कहीं मैं भूल न जाऊँ।’’
मालिक ने कॉपी उठाकर देखी तो बहुत सुन्दर लिखावट थी और भाव भी बहुत अच्छे थे।
मालिक ने एक दिन कहा कि ‘‘जब तुम्हें झाड़-पोंछ से फुरसत मिले तो तुम स्टोर का लिखने-पढ़ने का काम भी किया करो।’’
लड़के ने तुरन्त जवाब दिया, ‘‘बहुत अच्छा हज़ूर! मैं तो हर समय तैयार हूँ। और मुझे अच्छा भी लगता है।’’
मालिक ने धीरे-धीरे स्टोर का सारा पत्र-व्यवहार भी उसको संभलवा दिया। और समय पाकर जितना काम पाँच-छः कर्मचारी नहीं कर पाते थे उतना इस लड़के ने करना शुरू किया और वह भी अच्छी तरह से। मालिक दिनों-दिन उसका काम देखकर बहुत खुश होता और उसको अधिक से अधिक ज़िम्मेदारियाँ देता जाता था और लड़का उन सबको बड़ी खुशी व क्षमता से संभालता जाता था।
कुछ समय पाकर ऐसा हुआ कि किसी कारणवश हिसाब-किताब रखनेवाले कर्मचारी नहीं आ रहे थे। और हिसाब-किताब का लिखना-पढ़ना पिछड़ता जा रहा था।
मालिक को चिन्तित देखकर इस लड़के ने कहा,- ‘‘आप चिन्ता में क्यों हैं? मैं तो प्रतिदिन ही देखता रहता हूँ कि ये लोग हिसाब-किताब कैसे लिखते हैं। और यह सब तो मैं भी लिख दूंगा।’’
मालिक सुनकर हैरान हुआ और कहने लगा- ‘‘हिसाब-किताब का लिखना तो बड़ा कठिन और जानकारी का काम है। तुमने तो कभी सीखा नहीं और कभी कहीं किया भी तो नहीं।’’
लड़के ने कहा:
‘‘आप चिन्ता न कीजिए और मुझे लिखने दीजिए। आप प्रसन्न हो जायेंगे।’’
ऐसा ही हुआ कि इस लड़के ने सारा हिसाब-किताब बहुत क्षमतापूर्वक रखा और अब तो इस विभाग में कई आदमियों की आवश्यकता ही नहीं रही।
धीरे-धीरे स्टोर के बहुत से लोगों को निकाल दिया गया क्योंकि बहुत सा काम इस लड़के ने अकेले ही सम्भाल लिया था। इससे मालिक की बहुत बचत हो गई। अब इस लड़के को भी धीरे-धीरे बहुत अच्छा वेतन मिलने लगा। और इस लड़के का व्यक्तित्व भी अच्छे कपड़े पहनकर लाहौर के अन्य लोगों की तरह साफ़-सुथरा और बहुत अच्छा भी लगने लगा।
धीरे-धीरे सारी बड़ी जिम्मेदारियाँ उसी के हाथ में जाने लगीं और वही हजारों-लाखों का सामान भी स्टोर के लिए ख़रीदकर लाता। अब तो सारे कर्मचारियों में हलचल मच गई और अब वहाँ लोग उसको द्वेष और घृणा की दृष्टि से देखने लगे। आपस में मनसूबे बनाने लगे कि किस तरह से इस लड़के को बदनाम किया जाये और नीचा दिखाया जाये। दिन-रात मालिक के पास उस लड़के की चुगलियाँ करने लगे और चोरी के संशय बतलाने लगे। मालिक को भी धीरे-धीरे अब शक़ होने लगा।
कर्मचारियों ने यह बतलाया कि जिस कमरे में यह रहता है उस कमरे के अन्दर एक छोटी-सी कोठरी और है। उस कोठरी में चोरी किया हुआ सामान और रुपया-पैसा रखता है। और कोठरी पर बहुत बड़ा ताला लगाकर रखता है। कई बार दो-दो घण्टे अन्दर से कुंडी लगाकर उसी कोठरी में घुसा रहता है।
ये सब बातें रोज सुन-सुनकर मालिक चौकन्ना हो गया। और देखभाल रखने लगा। एक दिन उसको खबर मिली कि वह उस समय कोठड़ी के अन्दर है। मालिक कई बार पहले ही स्वयँ देख चुका था अब तो उसको निश्चय हो गया कि दाल में कुछ काला है और यह लड़का ज़रूर अपराधी है।
स्टोर के सब लोग मिलकर मालिक के साथ गये और कोठरी का दरवाज़ा ज़ोर-ज़ोर से खटखटाया। वह अन्दर से झिझक के मारे खोलता ही नहीं था परन्तु देर में खोलना ही पड़ा। जब उससे पूछा तो लड़का कहने लगा कि ‘जब कभी मुझे समय मिलता है मैं अन्दर बैठकर पूजा-पाठ करता हूँ। और भगवान् का ध्यान करता हूँ।’
उन्होंने पूछा कि:
‘‘अन्दर इतना बड़ा जो ट्रंक रक्खा हुआ है और उसके ऊपर इतना बड़ा ताला लगाया हुआ है इसमें क्या है?’’
अब लड़का बड़ा घबराया और मुँह से बात न निकले। क्षमा माँगे कि ‘‘यह मेरा निजी-प्राइवेट ट्रंक है। आप इसको न खुलवाइये। मुझे बहुत शर्मिन्दा होना पड़ेगा।’’
उन सब लोगों ने एक ज़बान होकर कहा- ‘‘यही तो हम देखना चाहते हैं कि इसमें क्या रहस्य है।’’
मजबूर होकर लड़के को ट्रंक का ताला खोलना पड़ा तो उसमें उसके वही तीन कपड़े थे। मैले-कुचैले व फटे-पुराने चीथड़े और फटा-पुराना जूता। सब लोग देखकर दंग रह गये और लज्जित हो गये।
लड़के ने कहा कि ‘‘मैं प्रतिदिन अपने इन कपड़ों को देखकर भगवान् की आराधना और पूजा करता हूँ और भगवान् का अनुग्रहीत होता हूँ जिसने मुझे ऐसी दशा में से निकालकर ऐसे सुन्दर-सुन्दर कपड़े और खाना-पीना दिया और मेरा मान-आदर बढाया। मैं अपनी अंतिम साँस तक भगवान् की अनुकम्पा और करुणा को नहीं भूल सकता।’’
अब तक स्टोर का सारा काम-काज तो उसने सम्भाल ही लिया था। लड़के का यह आचरण और दृश्य देखकर मालिक उसको अपना बेटा और उत्तराधिकारी समझने लगा और उसका बड़ा आदर और मान करने लगा।
इस लखपति व करोड़पति के केवल एक लड़की ही थी जो अब तक जवान हो चुकी थी। मालिक ने उस लड़की का विवाह भी उस लड़के सेवकराम के साथ ही कर दिया और अब वही सब व्यापार व धन-दौलत का स्वामी बन गया।
यदि गंभीरता से देखा जाये तो यह कहानी बड़ी योग-परीक्षा की कहानी है और प्रत्येक व्यक्ति इसमें से प्रेरणा लेकर अपना आचरण बना सकता है।
आचरण को ही योग-साधना कहते हैं।
यह कहानी लिखने के बाद मुझे याद आया कि मेरी भी ऐसी ही तो कहानी है - शायद इससे भी बद्तर और भयानक। मेरी आयु भी सोलह-सत्रह वर्ष की थी जब मैं दिल्ली में आया। परन्तु मैंने शरण ‘आर्य कुमार सभा’ ‘आर्य समाज’ फिर काँग्रेस और अन्त में ‘श्रीअरविन्द आश्रम’ की ली और मुझे कोई धन-जायदाद कहीं से नहीं मिली। भगवान् ने ही सब कुछ दिया और अब सब उसी के अर्पण कर दिया- और उसी को अर्पण हो गया।