प्यासा राजा
क्या ज़माना आ गया है, पढ़ाई-लिखाई से कुछ सुधार होता; उल्टा सब कुछ उलझ गया है। पुराने मूल्य-Values-ख़त्म हो गये हैं और नया रास्ता कोई मिलता नहीं।
जब हम बच्चे थे, तो उस ज़माने में हमारे पिताजी, बल्कि सब बच्चों के पिताजी सुबह-सवेरे उठते थे और अपने बच्चों को नियम से सवेरे उठाते थे और पूरे आचरण से सब कुछ सिखाते थे और कराते थे।
हमारे पिताजी आर्यसमाज के प्रभाव में आ गये थे। प्रातः चार बजे उठकर आर्यसमाज के भजन गाना शुरू कर देते-ज़ोर-ज़ोर से। ताकि बच्चों को भी सुनाई पड़े अैर हम भी उठें। फिर उठाकर लम्बी सैर के लिए ले जाया करते और रास्ते में अच्छी-अच्छी धार्मिक बातें बताया करते थे। अब यह सब कहाँ? अब तो किसी को फ़ुरसत ही नहीं है - और उनके अपने अन्दर ही कोई आचरण अथवा डिस्सिप्लिन नहीं है। बच्चां को क्या सिखायेंगे? अब तो दर्शन, तर्क और बौद्धिक -Philosophy, Argu- ments, Reasons - रूप से सब कुछ समझाना चाहते हैं। Arguments- दलीलों में क्या कोई हल हुआ करता है? पहले तो सरलता और समता थी। अब माँ-बाप कहते हैं, ‘हम बच्चों को सत्संग या धार्मिक जगह में क्यों ले जायें, जब उनकी इच्छा नहीं है! हमें क्या हक़ है कि हम बच्चों को सत्संग के लिये धार्मिक जगह में क्यों ले जायें, जब उनकी इच्छा ही नहीं है? हमें क्या हक़ है कि हम बच्चों पर ज़बरदस्ती करें? बच्चे भी ऐसी ही दलीलें देते हैं - ‘माँ-बाप को क्या हक़ है कि हम पर हुकूमत करें? हम जैसा चाहेंगे और जैसा हमें अच्छा लगेगा वैसा ही हम करेंगे।’
कुसंग में जाने से तो कोई रोकता नहीं पर सत्संग जैसी बातों में न माँ-बाप को रस है, न ही उनको इसकी ज़रूरत। वे कभी सोचते ही नहीं कि उनके बच्चे कुछ अच्छी बातें भी सीखें। इस सबमें भगवान् का क्या बिगड़ता है?
हमारे पिताजी का प्रातः एक गाना यह भी हुआ करता था जिसकी मुझे केवल एक पंक्ति याद है (जिसे चाचाजी अपने पिताजी वाली धुन में गा कर सुनाया करते थे!):
‘जहाँ धरम की बात हो-मन मेरा कतराये
बुरे करम में पापी मन-दौड़ा-दौड़ा जाये
अक़ल गयी मेरी बहुत मारी....
मैं हमेशा से स्वप्न देखा करता था कि कोई समय आये कि मनुष्य जाति का राज्य महात्मा, धर्मात्मा और योगियों के हाथ में हो। इनको सिवाय भगवान् के काम से काम! और क्या? और कुछ, लेना देना नहीं। पुराने ज़माने में राजे-महाराजे ऐसे ही हुआ करते थे। वे प्रजा के देवता और गुरु हुआ करते थे। सो प्रजा उनको पूजती थी। धीरे-धीरे राजे-महाराजे बिगड़ गये और बिगड़ते ही गये। और उसका क्या असर हुआ, यह सबके सामने है। उनका नाश हो गया। वे धरती से मिट गये और अब आगे तो उनका बीज भी बाकी नहीं रहेगा।
कोई भी हुकूमत आयेगी, उसका भी यही हश्र होगा, जबतक कि हाक़िम लोग महात्मा, धर्मात्मा नहीं होंगे और वे भगवान् के आदेश के अनुसार प्रजा की सेवा नहीं करेंगे। मैंने तो एक बार डॉ0 राजेन्द्रप्रसाद जी1 से कहा था कि, ‘अगर आपको भी वाइसरॉय और गवर्नर जनरल की तरह राष्ट्रपति-भवन में रहना था, और राष्ट्रपति-भवन की रूपरेखा, अन्दर-बाहर वैसी ही रहनी थी, तो इस स्वराज्य का क्या फ़ायदा हुआ? आप तो देवता हैं, योगी हैं, महान् पुरुष हैं। आपको तो यह सब बदल देना चाहिये था और झोंपड़ी में रहकर दिखाना चाहिये था।’ उनकी आँखों में आँसू भर आये और उन्होंने केवल इतना ही कहा कि, ‘मैं मजबूर हूँ।’
आठ-दस साल हुए मैंने इंदिरा जी2 को भी ऐसी ही चिट्ठी लिखी थी कि, ‘आप तो देवी हैं, भगवान् का रूप हैं, आपको तो माला पहनकर और सन्यास-रूप धारण कर भारतवर्ष का राज्य चलाना चाहिये और गवर्नमेंट के ख़जानें से कुछ नहीं लेना चाहिये। वही असली राज होगा, और वही भारतवर्ष की परम्परा और संस्कृति के अनुरूप होगा। खाना-पीना, पैसा, इज्ज़त तो आपके पीछे-पीछे भागेगी और द्वन्द्व भी मिट जायेंगे।’
परन्तु नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़ कौन सुनता है। फिर भी मेरा प्रबल विश्वास है, कि जो कुछ भी हो रहा है, जो भी क्रांति हो रही है, वह नया जीवन और नया रूप लाने के लिए हो रही है, और यह भगवान् खुद करवा रहे हैं।
अब मैं आपको एक राजा की कहानी सुनाता हूँ। हमारे चाचा-ताऊ और खानदान के दूसरे लोग कश्मीर राज्य में नौकरी करते थे। मेरे पिताजी के चचाज़ाद भाई सरदार करतारसिंह पुंछ रियासत के वज़ीर थे। मेरे ताऊ जम्मू और कश्मीर में नीचे से बढ़ते-बढ़ते कलेक्टर हो गये और मेरे चाचा मामूली क्लर्क थे और बाद में जेल सुपरिन्टेडेन्ट हो गये।
मेरे ताऊ बहुत अच्छी डोगरी बोला करते थे और हिमाचल-प्रदेश के राजाओं की बहुत कहानियाँ सुनाया करते थे। हिमाचल प्रदेश में बहुत छोटे-छोटे राजा हुआ करते थे। कइयों की तो रियासत मील-दो-मील की ही हुआ करती थी। लेकिन इन सब रियासतों की हुकूमत अंगरेज़ी गवर्नमेंट की थी। अंगरेज़ी सरकार के पोलिटिकल-एजेन्ट (Political Agent) उन सब रियासतां पर हुकूमत करते थे और नियंत्रण - Control - भी वही करते थे। जब ख़बर मिलती कि पोलिटिकल-एजेन्ट आ रहे हैं तो राजा, जंगल में लकड़ी काटते-काटते या खेत में से गाजर-मूली निकालते-निकालते छोड़ देते और जल्दी से मुँह-हाथ धोकर, अच्छे-अच्छे राजा वाले कपड़े पहन लेते और वज़ीर से भी कहते कि, ‘तुम भी जल्दी से कपड़े पहनकर तैयार हो जाओ।’
जब पोलिटिकल-एजेन्ट आता तो राजा उनसे हाथ मिलाते और वज़ीर भी हाथ मिलाते - और राजा अपने वज़ीर का परिचय कराता कि ‘इनका नाम साधूराम है, ये मेरे वज़ीर हैं मेरे मामा भी होते हैं और मेरा खाना इत्यादि भी बना लेते हैं और जंगल से लकड़ियाँ काटकर भी ले आते हैं और साहबों से हाथ भी मिला लेते हैं।’
यह तो हुआ मज़ाक़। चाहे बात सच्ची ही है।
परन्तु जिस राजा की मैं कहानी सुनाने जा रहा हूँ, वह भद्रपुरुष, महात्मा और देवता थे। भगवान् ने शायद अपने कारख़ाने में से ही उन्हें ऐसा चिज़ेल (Chisel) करके -तराश कर- भेजा था।
इस ज़िन्दगी में मेरी अपनी भी ऐसी हालत थी। न जाने उस राजा ने मेरी नक़ल की, या मैंने उस राजा की नक़ल की। लेकिन सत्य तो यह है कि उस भगवान् की तदबीर और इच्छा है, जिसने हमलोगों को घड़कर-तराशकर इस धरती पर भेजा।
उस भगवान् का कितना बड़ा कारख़ाना होगा, और उसमें कितने घड़ने-तराशने के औज़ार होंगे, जिसने इस सृष्टि को बनाया है! किसी भी फैक्टरी या स्कूटर बनाने के कारख़ाने से तो बहुत अधिक औज़ार होंगे। शायद मोटर बनाने के कारख़ाने, रेलवे इंजिन और हवाई जहाज़ बनाने के कारख़ाने से भी बहुत अधिक कारीगर और औज़ार वहाँ होंगे।
क्या कमाल है! करोड़ों-अरबों इंसान बनाये, पर एक की शक़्ल, एक का रूप दूसरे से नहीं मिलता। कारीगर तो एक ही है। शायद औज़ार और रंग अलग-अलग होंगे।
मनुष्य जाति ही नहीं, पशु-पक्षी, समुद्र में मछली की अलग दुनियाँ, वनस्पति, पेड़-फल सबमें अलग-अलग कारीगरी है।
तो यह राजा महल में नहीं रहते थे। एक झोंपड़ी में रहते थे। परन्तु राजा प्रजा के हित और सेवा में और राज्य चलाने में बड़े निपुण और तेज़ थे। उनका यह निश्चय और विश्वास था कि मुझे अपने खाने-पीने के लिए खुद मेहनत करके कमाना चाहिये। राज्य के खजाने में से मेरा क्या हक़ है कि मैं एक पैसा भी लूँ? राज्य के ख़जाने में जो धन करों - Taxes - द्वारा आता है, वह प्रजा के काम और कल्याण के लिए है, न कि मेरे इस्तेमाल के लिए।
तो यह राजा नज़दीक की मण्डी में से सन ख़रीद कर लाते थे और घण्टा दो घण्टा मेहनत करके मोटी-पतली रस्सियाँ बँह लेते थे। और उनकी बिक्री से जो कुछ मिलता था, उसमें अपना, खाने-पीने का गुज़ारा करते थे।
ख़ज़ाने का काम तो राज्य के ख़ज़ांची और वित्तमंत्री आदि देखते थे और ख़जाने पर पुलिस का पहरा रहता था। यह नहीं कि राजा को सब बातों का ज्ञान नहीं था, परन्तु वह धन-दौलत गिनने-रखने में अपनी माथापच्ची नहीं करते थे, जब उसमें से उनका कुछ लेना-देना ही नहीं था।
यही हालत मेरी थी। बहुत बड़ा व्यापार, बीसियों दफ़्तर और शाख़ायें, हर जगह मैनेजर, Accountant- लेखापाल-ख़ज़ान्ची; वे लोग ही लेन-देन करते थे; और हिसाब रखते थे, और जब यह सब नौकर-चाकर मेरे काम के लिए उपलब्ध थे, तो फिर मुझे माथापच्ची करने की क्या जरूरत थी? मैंने तो न कभी धन देखा, न छुआ, न इस्तेमाल किया। वही लोग सब कुछ करते थे और चैक्स “Cheques” वग़ैरा में भी वही लोग दस्तख़त करते थे। मुझे कभी यह तकलीफ़ उठाने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
उस ज़माने में मुझे तो केवल दस रुपये मासिक की आवश्यकता होती थी, जो मैं ख़ज़ांची से Voucher- पर हस्ताक्षर करके ले लेता था। यह एक लम्बी और आनन्ददायक कहानी है।
मुझ से कोई पूछता कि क्या एक घड़ी भी लेकर हाथ में नहीं लगा सकते। इसका भी मैं यही जवाब दिया करता था कि जब मेरे सब नौकरों-चाकरों के पास घड़ियाँ हैं, जम़ादार ने भी घड़ी पहन रखी है, खाना बनानेवाले ने भी, ड्राइवर ने भी, और राज-मज़दूर ने भी, जो लोग चारों तरफ मेरे साथ काम के लिए आते हैं, उन सबने घड़ी पहनी हुई है, और वैसे भी इस ज़माने में चारों तरफ घड़ियाँ लगी ही रहती हैं; तो मुझे यह मुसीबत मोल लेने की क्या ज़रूरत है कि मैं एक कैदी की तरह, ज़ंजीर के साथ उसको हाथ में बाँधू; फिर उसका ध्यान रखूँ; नहाते वक्त उतारूँ; सोते वक्त उतारूँ; यही ख़्याल रहे कि कोई उठा न ले जाये। फिर कभी कुछ टाइम देती है, और कभी कुछ। उसको इधर-उधर मिलाता फिरूँ और दिन में पचास-सौ बार तो टाइम ही देखता रहूँ। जितना समय टाइम देखने में खोऊँ, उतना समय काम में क्यों न लगाऊँ। और फिर जब हर समय काम ही करना है, तो समय देखने की कहाँ फ़ुरसत मिलती है? मैं तो खुद घड़ी बन गया हूँ। किसी समय भी कोई मुझसे टाइम पूछ ले!
ऐसे बहुत लोग संसार में हुए हैं, जिनके आचरण के मुताबिक़ लोग घड़ियाँ मिलाया करते थे। मेरे पिताजी ने भी घड़ी नहीं रखी थी। और अगर उनको आधी रात जगाकर कोई टाइम पूछता, तो वे आसमान की तरफ सितारों को देखकर समय बतला दिया करते थे।
इस फैशन के ज़माने में तो हम घड़ियों के गुलाम हो गये हैं। और हमारे अन्दर जो टाइम की सूझ-बूझ स्वाभाविक होनी चाहिये थी वह भी जाती रही है। जिस राजा की कहानी कह रहा हूँ, मुझे यह मालूम नहीं कि वे भी घड़ी पहनते थे कि नहीं।
केवल हमारे भारतवर्ष में हज़ारों नहीं लाखों ऐसे महात्मा हुए हैं, जिनको धन-दौलत की लालसा ने कभी छुआ भी नहीं। श्रीअरविन्द की धर्मपत्नी ने लिखा कि ‘मुझे दस रुपया मासिक कम पड़ते हैं, बीस रुपया भेजें।’ तो श्रीअरविन्द ने जवाब दिया कि ‘यदि मैं दस रुपये अधिक भेजूँगा, तो वह मैं चोरी करके भेजूँगा। यह सब धन मेरा नहीं, देश का है। मुझे तो केवल अपने निर्वाह मात्र के लिए लेना चाहिये।’
महात्मा गाँधी, सारी ज़िन्दगी, झोली फैलाकर भीख माँगते रहे। कहते थे, ‘‘मैं तो बनियाँ हूँ। मुझे तो पैसा चाहिये।’’ क्या वे अपने लिए माँगते थे? या यह अपने ऊपर ख़र्च करते थे? यह थी इंसानियत और यह थी हमारे देश की परम्परा। हमारे देश की परम्परा में भिक्षा का सबसे ऊँचा स्थान था। ब्राह्मण लोग भिक्षा माँगकर ही खाया करते थे-यह बहुत ऊँची तपस्या की परम्परा थी।
अब उस राजा की कहानी सुनिये। उसकी हो गयी शादी। उस ज़माने में छोटी उम्र में ही शादी हो जाया करती थी। रानी जो आयी, निर्मल, सरल, राजा के साथ रम-रस गयी। खाना इत्यादि बनाती, घर का सब काम-काज करती। दही-दूध बिलोती। राजा की खूब सेवा करती। प्रेम से दोनां वक़्त कुएँ से ताज़ा पानी भी भरकर लाती और आनन्द से रहती।
कुछ समय बीतने के बाद नीचे देश में से रानी की बहुत-सी सहेलियाँ, सहपाठिनियाँ आ गयीं। वे दो-तीन वर्ष से मनसूबे बाँध रही थीं कि हमारी एक सहेली रानी होकर गयी है। गर्मी की छुट्टियाँ उसके पास ठाट से बितायें और राजमहल का ऐश लूटकर आयें और अपनी सहेली का रंग-रूप देखकर आयें।
जब सहेलियाँ इकट्ठी आ पहुँचीं, तो रानी उनको देखकर गद्गद् हो गयी। और हर एक से प्रेम से गले मिली, जैसे कि स्वर्ग मिल गया हो। उनकी बहुत आवभगत की। सारा दिन अपने हाथ से अच्छे-अच्छे भोजन बनाकर उनको खिलाती और जितना भी उनका स्वागत-सत्कार कर सकती, दिन रात करती ही रहती।
परन्तु वे सहेलियाँ देखकर हैरान रह गयीं कि यह रानी कैसे है? यह तो झोंपड़ी में रहती है। न कोई नौकर, न कोई चाकर और किसी प्रकार भी तो रानी का रंग-ढंग नहीं। शरीर पर साधारण कपड़े। कोई रानियों के आभूषण नहीं। खुद खाना बनाती है और खुद ही कुएँ से पानी भरकर लाती है। क्या हम सब सपना देख रही हैं?
हम तो राजमहल में रहने के लिए आयी थीं। राजमहल के ठाट-बाट, शानो-शौकत देखने के लिए आयी थीं, ऐश लूटने के लिए आयी थीं। ऐसे खाने और इससे अच्छे रहने-सहने के मकान तो हमारे सबके घर में भी हैं। यह क्या हुआ। हमारी इस सहेली की क़िस्मत में यह क्या पत्थर पड़ गये। यह तो रानी बनकर आयी थी। पर यहाँ तो रानी का कोई रंग-ढंग ही नहीं है।
वे आपस में कानाफूसी करती रहतीं। ‘‘यह कैसी है रानी’’ फिर एक के बाद एक उनके ताने शुरू हो गये।
‘तुम रानी हो या नौकरानी?’
‘तुम्हारा क्या यह रानी का रूप है?’
‘तुम्हारा एक भी नौकर नहीं? कोई पानी तक लाने वाला नहीं।’
‘मैं चपरासी की स्त्री हूँ, पर तेरे से तो मेरा घर ही अच्छा है।’
‘तुम्हारा यह राजा कैसा-रस्सियाँ बाँटता है।’
‘हमने सोचा था, हमारी सहेली रानी है। उसके पचास-सौ तो नौकर ही होंगे, ज़ेवर से लदी होगी - हीरे-जवाहरात होंगे, बड़ा भारी महल होगा, पर यहाँ तो अजीब तमाशा है।’
‘इससे तो अच्छा था कि गाँव के किसी गँवार से शादी कर लेती।’
ताने दे-देकर सहेलियों ने उसकी जान ले ली। रानी के पास उनका कोई जवाब नहीं था। सहेलियाँ दस-पन्द्रह दिन वहाँ रही। इन दिनों में उन्होंने उसका ‘Brain washing’ बुद्धि-भ्रंश कर दिया।
दस-पंद्रह दिन सहेलियाँ रहीं और उनकी सहेली रानी जो इतनी सरल थी उसको असरल बना गयीं-और उसके अन्दर ज़हर भर गयीं। विष घोल गईं।
सहेलियों के चले जाने के बाद रानी का रंग-रूप ही बदल गया। हर समय सोच-विचार में पड़ी रहे। और उसके रोम-रोम में उदासी भर गयी। वह सोचने लगी, मेरी सहेलियाँ सच ही तो कहती हैं। मैं रानी क्या हूँ-और कैसी हूँ?
घर का चैन, घर का आनन्द उड़ गया। राजा को प्रेम से खाना मिलना भी बन्द हो गया। कभी समय पर खाना बना ही नहीं। हर समय रानी टूटी खाट पर पड़ी दिखाई दे।
राजा ने कारण पूछा। बात तो साफ़ ही थी। राजा भी देखता था कि सहेलियाँ आकर उसमें ज़हर भर गयी हैं। और उसके सरलता के सहज रूप को बिगाड़ गयी हैं। राजा ने बहुत समझाने की कोशिश की। कोई समझाने की तदबीर नहीं छोड़ी कि हमारी वही सादा ज़िन्दगी, आनन्द की ज़िदगी थी। और किसी प्रकार की ज़िन्दगी में कुछ रखा नहीं है। परन्तु रानी के कुछ समझ नहीं आता।
राजा मजबूर होकर, दरबार के कुछ काम को कम करके, और छोड़कर दो घण्टा अधिक रस्सियाँ बँटने लगा, ताकि कुछ अधिक कमाई हो और वह रानी को खुश कर सके।
कुछ ही दिनों में जो अधिक पैसे इकट्ठे हुए उनसे सोना खरीदकर रानी के लिए दो अंगूठियाँ बनवाकर लाया कि उसको खुश कर दे। किन्तु रानी ने अंगूठियाँ फेंक दी और कहा कि, ‘ऐसी अंगूठियाँ तो मेरे बाप के गाँव में मामूली स्त्रियाँ भी पहनती हैं।’
फिर राजा पागलों की तरह दो चार अच्छी-अच्छी साड़ियाँ खरीदकर लाया रानी को खुश करने के लिए और वे भी उसने फेंक दीं और कहा कि, ‘देखा नहीं था कि मेरी सहेलियों ने कैसी-कैसी सुन्दर साड़ियाँ पहनी हुई थीं। मुझे रानी बनाकर क्यों लाये? मैं तो अपने घर वापिस चली जाऊँगी। वहाँ इससे अच्छी तरह रहूँगी। मुझे रानी बनकर क्या करना है। जब रानी का कोई रंग-ढंग ही नहीं है।’
अब राजा बहुत निराश होने लगा। उसे कोई रास्ता न सूझे, कि रानी को कैसे समझाया जाये। राज-काज के काम में पिछड़ने लगा और पागल होने की नौबत आने लगी।
एक दिन आधी रात राज्य के ख़ज़ाने में गया। ख़ज़ाने के अफ़सर से ख़जाने की चाबी माँगी, और ख़जाना खोलकर उसमें से एक थैली निकाल लाया। पहरेदार भी हैरान थे और ख़जाने का अफ़सर भी, कि राजा तो आज तक कभी ख़जाने में नहीं आया था! यह क्या बात है? परन्तु राजा था, उसको कोई रोक कैसे सकता था और इन्कार कैसे कर सकता था?
थैली लाकर रानी के हाथ में दी। रानी ने उसे खोलकर देखा तो हीरे-जवाहरात और हर प्रकार के आभूषण। रानी खुश हो गयी और उसकी सब उदासी मिट गयी।
दूसरे दिन से अपने-आपको आभूषणों से लाद लिया और बार-बार शीशे में अपना रूप देखती और खुश होती।
परन्तु राजा की हालत इससे उल्टी हो गयी। वह दुःख और निराशा से भर गया कि सारी आयु की तपस्या के बाद, उसने यह क्या घोर पाप किया। और सारी आयु की तपस्या एक मिनट में ख़त्म हो गयी। उसे प्राण छोड़ने के बग़ैर और कुछ सूझता ही नहीं था।
उसको बहुत प्यास लगी, उसने रानी को आवाज़ दी कि ‘मुझे पानी पिलाओ।’ रानी घड़े में से पानी लेकर आयी। परन्तु पानी गंदा और पानी का रंग काला।
राजा ने कहा - ‘साफ़ पानी क्यों नहीं लाती?’
उसने दूसरे घड़े में से, तीसरे में से, कलसे में से, और जहाँ-जहाँ भी घर में पानी था, उसमें से पानी लेने की कोशिश की। परन्तु हर बर्तन में पानी गन्दा और काला।
राजा ने गुस्से में कहा, ‘मुझे बहुत प्यास लगी है। जल्दी जाकर कुएँ पर से ताज़ा पानी भरकर लाओ’। रानी भागती कुएँ पर गयी। और जब बाल्टी कुएँ से लटकायी, और कुएँ में झाँका, तो कुएँ का पानी भी काला और गँदला हो गया और रानी को देखते ही नीचे चला गया और कुआँ सूख गया।
रानी दूसरे कुएँ पर गयी। फिर तीसरे पर, फिर चौथे पर, सब कुओं पर यही हाल हुआ और निराश होकर वह वापिस आ गयी।
आकर क्या देखती है कि राजा मूर्च्छित पड़े हैं और शायद आत्मा राजा के शरीर को छोड़ रही है।
रानी ने उसी समय फटाफट सारे आभूषण उतारे और हीरे जवाहरात समेत थैली में भरे, और थैली को उसी तरह बाँधा जैसी वह आयी थी और भागती हुई ख़जाने के अफ़सर के घर पहुँची। उसके पाँव पड़ी और ख़जाने की चाबियाँ माँगी, और ख़जाना खोकलर, थैली अन्दर रखकर, ख़जाना बन्द करके, ख़जाने के अफ़सर को चाबियाँ वापस कर दीं।
चौकीदार, पहरेदार, ख़ज़ाने के अफ़सर, सब हैरान रह गये कि यह क्या किस्सा है।
इतनी देर में राजा शरीर छोड़ चुके थे। रानी नहीं मानी। जैसे पागल हो गयी हो। और राजा को झकझोरने लगी झुँझलाने लगी कि, ‘देखिये न मैं आ गयी हूँ। थैली वापिस रख आयी हूँ। मैं अब उसी तरह रहूँगी जैसा आप चाहते थे। आप उठिये।’
रानी की सच्ची पुकार भगवान् ने सुन ली और राजा की आत्मा को वापिस भेज दिया और वे उठ खड़े हुए।
उठते ही राजा ने चिल्लाकर कहा कि, ‘मुझे बहुत प्यास लगी है।’
रानी भागती हुई कुएँ पर गयी और इस बात को भूल ही गयी कि कुएँ तो सूख चुके हैं। परन्तु जब सरलता में कुएँ पर पहुँची और पानी के लिए कुएँ के अन्दर झाँका तो पानी खुशी से उछलता हुआ ऊपर आ गया और उसको बाल्टी नीचे लटकाकर पानी खींचना भी नहीं पड़ा। ऊपर से ही उसने कलसा भर लिया। भागती हुई घर आयी और राजा को पेटभर पानी पिलाया। तब राजा को पूरा होश आया और राजा की पानी की प्यास बुझी और आत्मा की प्यास भी बुझी।
अब हुआ क्या कि धीमे-धीमे राजा और रानी की सात्विकता, विराग, दोनों की प्रजा के प्रति निष्काम सेवावृत्ति और प्रजा का उद्धार करने के प्रबल उद्योग की कीर्ति फैलने लगी। प्रजा भी उत्सुकता से, प्रेम और भक्तिभाव से राजा और रानी की सेवा के लिए तत्पर हो उठी। प्रजा उनकी पूजा करने लगी और उन्हें भेंट और उपहार देने लगी जिससे अब राजा को रस्सियाँ बाँटकर अपने निर्वाह के लिए कमाने की भी आवश्यकता न रही। शाम तक जितना भेंट-उपहार आता, उसमें जो कुछ खाने-पहनने के लिए न्यूनतम आवश्यक होता, ले लेते और बाकी सब तुरन्त ग़रीबों को बाँट देते।