मधुर कहानियाँ
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फ़क़ीरी


भारतवर्ष के इतिहास में कभी ऐसा भी ज़माना था कि राजे-महाराजे बादशाह शाहंशाह बहुत भले और नेकदिल हुआ करते थे। बाहर चाहे उनको कुछ भी मिला हुआ हो अन्दर से वे फ़क़ीर-दिल हुआ करते थे।

फ़क़ीरी चाहिये इन्सान की फ़ितरत में पोशीदा

कोई हो भेस, लेकिन शाने-सुलतानी नहीं जाती।’

‘फ़क़ीरी यानि बादशाहत तो मनुष्य के स्वभाव में छिपी होनी चाहिये, ऊपर से कोई भी भेस हो लेकिन बादशाहत की शान....यानि असलियत तो कभी छुप ही नहीं सकती।

यह कहानी एक ऐसे राजा की है जो हर समय परेशान रहता था कि मेरे राज्य में कोई भूखा-नंगा या आसरे-बसेरे के बग़ैर न हो। वह बार-बार अपने अफ़सरों को हुकुम देता कि ‘जाओ और ढूँढों कि कहीं कोई भूखा-नंगा या आश्रय के बग़ैर तो नहीं है?’ फिर उसने अपनी हुकूमत में एक महक़मा ही ऐसा बना दिया जिसका काम केवल यही हो।

ढूँढ़ते-ढूँढ़ते- खोज करते-करते राजा को ख़बर मिली कि एक व्यक्ति खेतों और जंगलों में घूमता-फिरता है। उसके शरीर पर केवल लंगोटी है। पेड़ों के नीचे और पेड़ों की छालें ओढ़कर रहता है और खेतां और जंगलों में से जहाँ से भी कोई अनाज का गिरा-पड़ा दाना मिल जाये या जंगल में से कन्द-मूल मिल जाये तो चुगकर खा लेता है।

राजा को यह खबर सुनकर बहुत चिन्ता हुई और दुःख हुआ कि मेरे राज्य में ऐसा क्यों हो? राजा ने अपने महक़मे के अफ़सरों को भेजा कि, ‘कारण पूछो और उस फ़क़ीर को दरबार में बुला लाओ।’

बड़े-बड़े अफ़सर घबराये हुए फ़क़ीर के पास पहुँचे। उनको देखकर फ़क़ीर मुस्कुराने लगा और उनसे राजा की चिन्ता का कारण पूछा। अफ़सरों ने बहुत पूछताछ (Interrogation) करने की कोशिश की कि ‘क्या आपके पास कपड़े पहनने का कोई इन्तज़ाम नहीं है? रहने का कोई घर नहीं है? खाने-पीने के लिए कुछ भी नहीं है?’

फ़क़ीर यह सब सुनकर बहुत हँसा और कहा कि ‘मेरे पास तो सब कुछ है। और किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है और किसी चीज़ की आवश्यकता ही नहीं है।’

अफ़सर बहुत हैरान-परेशान हुए और उन्होंने पूछा कि ‘शरीर पर कपड़े क्यों नहीं हैं?’ फ़क़ीर ने कहा- ‘मुझे तो भगवान् ने ऐसे ही भेजा था। मुझे तो कपड़े पहनने की कभी भी ज़रूरत महसूस नहीं हुई। अगर कपड़े पहनने की ज़रूरत होती तो भगवान् पहले ही पहनाकर भेज देता और यह शरीर क्या मुकम्मिल-पूरा कवच (Protection) नहीं है? इसके ऊपर और खोल चढ़ाने की क्या जरूरत है?’

अफ़सरों ने फिर फ़क़ीर के घर के बारे में पूछा तो फ़क़ीर ने जवाब दिया- ‘सारी धरती ही मेरा घर है। जिसके ऊपर आकाश का साया है उसे और कौन से घर की ज़रूरत है? भगवान् ने तो सब कुछ बनाकर ही भेजा है। नहीं तो वह एक-एक घर भी साथ ही भेज देता।’

फिर अफ़सरों ने खाने-पीने के सम्बन्ध में पूछा तो फ़क़ीर ने जवाब दिया, ‘सारी धरती ही खाने-पीने से भरी पड़ी है। खेतों में चारों तरफ अनाज के दाने बिखरे पड़े हैं। मैं तो चुन-चुनकर, खा-खाकर थक जाता हूँ। मुझसे तो खत्म ही नहीं होते। जंगल कंदमूलों और पेड़ फलों से लदे पड़े हैं। कोई कहाँ तक खा सकता है।’

अफ़सर यह सब सुनकर बहुत चकराये और अपने महक़मे में जाकर लम्बी-चौड़ी रिपोर्ट लिखी।

जब यह फ़ाइल राजा के पास पहुँची तो राजा को अफ़सरों की अयोग्यता और नालायक़ी पर बहुत गुस्सा आया कि एक व्यक्ति ऐसा है जिसके पास न खाने को है- न पहनने को है और न कोई विश्राम का स्थान। बेचारा नंगा खेतों में से दाने चुग-चुगकर खाता है। तो उसकी दशा पर मेरे महक़मा के अफ़सरों को कोई चिन्ता या तरस नहीं हुआ कि उसका प्रबन्ध करते। क्या मैंने लम्बी-चौड़ी रिपोर्ट लिखने और फ़ाइल बनाने के लिए ही भेजा था।

राजा ने अफ़सरों को दरबार में पेश होने के लिए हुकुम भेजा और जब वे पेश हुये तो उनको बहुत लताड़ा। हुकुम दिया कि, ‘फ़ौरन से पेशतर जाओ और फ़क़ीर को आदर-सत्कार के साथ मेरे दरबार में लाओ।’

अफ़सर इकट्ठे होकर फ़क़ीर के पास पहुँचे और दरबार की चिन्ता फ़क़ीर को बताई और कहा- ‘महाराजा साहब ने आपको दरबार में बुलाया है।’ फ़क़ीर फिर बहुत हँसा और कहा कि ‘मैंने तो कोई अपराध नहीं किया कि मैं राजा के दरबार में पेश होऊँ। आप लोग जाकर राजा से कहें कि मैं तो बहुत आनन्द में हूँ। मेरी किसी प्रकार की चिन्ता न करें। हाँ उनके दरबार में अगर कोई जरूरतमन्द हो तो उसकी चिन्ता करें। मेरी तो कोई ज़रूरत ही नहीं है। मेरा पालक-पोषक और परवर-दिगार तो भगवान् ही है।’

जब यह सारी रिपोर्ट राजा के पास पहुँची तो राजा को और भी क्रोध हुआ कि मेरे अफ़सर कितने नालायक़ (inefficient) हैं कि एक साधारण फ़क़ीर की ज़रूरत को भी ये लोग न समझ सके। तो राजा ने अपने दूसरे महक़मेवालों को हुकुम दिया कि वे लोग खाने-पीने का सब सामान लेकर जायें, पहनने-ओढ़ने के सब वस्त्र लेकर जायें और खिला-पिलाकर और पूरे वस्त्र पहनाकर फ़क़ीर को मेरे पास लेकर आयें।

इस महक़मावाले अफ़सरों की भी वैसी ही दुर्दशा हुई। फ़क़ीर बहुत हँसा-और उनसे बोला कि ‘राजा से जाकर कहें कि यह सब सामान किसी ज़रूरतमन्द को दे दें। मेरा पेट भरा हुआ है। मैं कुछ और खा नहीं सकता और वस्त्र पहनने की मेरी आवश्यकता ही नहीं है।’ जब राजा के पास यह रिपोर्ट पहुँची तो राजा बहुत दुःखी हुए और समझ गये कि यह फ़क़ीर मेरे राज्य में बहुत नाराज़ है। अन्दर से बहुत दुःखी और क्रोधित है। राजा अपने महल में जाकर निराशा में गिर गये।

रानी को जब ख़बर मिली तो वह भागती हुई आई और राजा से उनकी निराशा और चिन्ता का कारण पूछने लगी। राजा ने बहुत दुःखी और चिन्तित हृदय से रानी को सारी कहानी कह सुनाई।

रानी बहुत बुद्धिमती व गम्भीर थी और वह समझ गई कि यह कोई साधारण पुरुष नहीं है और राजा की चिन्ता व्यर्थ है। रानी ने राजा को समझाया कि, ‘हम दोनों को उस फ़क़ीर के पास चलना चाहिये। स्वयँ खाने-पीने और पहनने-ओढ़ने का सब सामान साथ लेकर जाना चाहिए।’

रानी के सुझाव के अनुसार दरबार में सारा प्रबन्ध किया गया और राजा पूरे साज़ों-सामान के साथ अफ़सरों, घोड़ां और फ़ौज की टुकड़ी के साथ फ़क़ीर के पास पहुँचे। राजा उस पूरे जलूस के आगे हाथी पर सवार थे। पहुँचकर राजा और रानी ने फ़क़ीर को प्रणाम किया और अपनी भेंट फ़क़ीर के सामने रखी।

फ़क़ीर यह सब तमाशा देखकर बहुत हँसा। और राजा से पूछाः

‘चिन्ता में मैं हूँ या आप?’

‘दुःखी आप हैं या मैं?’

‘प्रसन्नचित्त आप हैं या मैं?’

‘मुसीबतें आपको पड़ी हैं या मुझे?’

‘शरीर आपका दुर्बल है या मेरा?’

‘दिल की हरक़त नापी जाये (Heart का cardiogram) तो आपका स्वस्थ ठीक है या मेरा?’

‘ब्लड-प्रैशर (Blood pressure) आपका ठीक है या मेरा?’

‘भगवान् जो मुझे खाने को देता है और जो आपको खाने को देता है उससे तन्दुरुस्ती मेरी अच्छी है या आपकी?’

‘आप मेरे शरीर की मांस-पेशियों (Muscles) और अपने शरीर की मांस-पेशियों से मुकाबला करें।’

‘मेरी आँखों का नूर देखें और उससे अपने चश्में (Spectacles) का नम्बर मिलायें।’

राजा और रानी और साथ के बड़े-बड़े अफ़सर फ़क़ीर की यह बातें सुनकर चकित रह गये।

तब रानी ने कहा- ‘मैंने आपको यही कहा था कि नहीं? - कि यह व्यक्ति साधरण साधु नहीं है। यह तो कोई पहुँचे हुए सिद्ध पीर-फ़क़ीर हैं।’

राजा और रानी ने उन्हें प्रणाम किया और सब सरो-सामान लेकर वापस दरबार में पहुँचे। वहाँ पहुँचते ही दोनों को ऐसा वैराग्य हुआ कि राज्य और महल छोड़कर उस फ़क़ीर के साथ हो लिए। सब चिन्ताओं से मुक्त हो गये। केवल भगवान् की भक्ति में लग गये।