मधुर कहानियाँ
12

पाणिनि ऋषि


पाणिनि ऋषि को

मेरा ख़्याल है

पढ़े-लिखे तो जरूर ही जानते होंगे।

परन्तु कौन पढ़े-लिखे हैं,

यह कहना कठिन है। पाणिनि जब छात्र थे तो उन्होंने अपने गुरु के आश्रम में अनेक छात्रों के साथ व्याकरण की गहरी शिक्षा प्राप्त की।

उनके गुरु पाणिनि के ज्ञान की प्रतिभा से अत्यन्त प्रसन्न थे।

और यह आशा करते थे कि

पाणिनि संसार के हित के लिए कोई बड़ा काम करें। इसलिए

वे पाणिनि को बहुत प्यार करते थे।

पाणिनि जब पूर्ण शिक्षा प्राप्त कर चुके ही थे तो उनके घर से सन्देश आया कि अब घर लौटें।

पाणिनि ने पत्र दिखाकर गुरुजी से विदा माँगी।

गुरुजी ने आशीर्वाद देकर विदा कर दिया।

पाणिनि जब घर पहुँचे तो तुरन्त ही उनके विवाह का सुन्दर आयोजन किया गया।

उधर लड़कीवाले भी सुन्दर तैयारियाँ कर रहे थे।

लड़की का नाम था उर्वशी।

बहुत ही सुन्दरी और ज्ञानवती।

संयोग बहुत ही उत्तम था, परन्तु इसमें प्रभु इच्छा कुछ और ही निहित थी।

जब विवाह की तैयारियाँ ज़ोरों से चल रही थीं तो पाणिनि के गुरु सैकड़ों मील दूर अपने आश्रम में बैठे यह सब रचना देख रहे थे और उनको यकायक ऐसा लगा कि यह तो घोर अनर्थ हो रहा है।

छटपटाकर आँखें खोलीं और अपने शिष्य रामदेव को ज़ोर से पुकारा और कहा - ‘तुरन्त भागो और पाणिनि को बुलाकर लाओ। कहो कि तुम्हारे गुरु ने तुम्हें फ़ौरन बुलाया है।’’

दोनों ओर के माता-पिता और आयोजन करनेवाले सम्बन्धी देखते के देखते रह गये और पाणिनि रामदेव के साथ अपने गुरु के आश्रम में आ पहुँचे।

गुरुजी को प्रणाम करके पूछा - ‘‘गुरुजी! क्या आदेश है?’’ गुरुजी ने सरलता से कहा कि ‘‘तुम्हारा धर्म यह है कि तुम देश-देशान्तर हिमालय से कन्याकुमारी अन्तरीप तक और बंग देश से कच्छ प्रान्त तक जाओ और स्थान-स्थान की, प्रान्त-प्रान्त की भाषा सीखो। पढ़ो, समझो, स्वाद चखो और अनन्त भाषाओं का विस्तृत ज्ञान प्राप्त करो।

विवाह उधर धरा का धरा रह गया।

न हील न हुज्ज़त।

पाणिनि अपने गुरु की आज्ञा और अपने धर्मपालन के लिए चल पड़े, हवाई जहाज़ में नहीं, पैदल। पाँवों में जूते भी नहीं। पहाड़, जंगल, नदी, नाले, झाड़-झंकर रौंदते, भूखे-प्यासे, एक स्थान से दूसरे स्थान। जहाँ-कहीं प्रभु खाना दे दे। ध्येय यह था कि हर स्थान की भाषा को सुनना, समझना, सीखना और उसका व्याकरण, उस भाषा की खोज, कहाँ से आयी, कैसे बनी, कैसे आगे-आगे प्रान्त से प्रान्त तक उसका प्रवाह चला। यह सब कष्ट से नहीं हो रहा था, गुरु की आज्ञा और आनन्द से हो रहा था। जितना एक स्थान से सीखते, वहाँ की भाषा का ज्ञान प्राप्त करते, उतना आगे से आगे स्थान-स्थान पर ठहरकर पीछे का प्राप्त किया हुआ ज्ञान बाँटते जाते। लोगों को नयी से नयी भाषाएँ और नया से नया ज्ञान देते जाते और आगे चलते जाते। बढ़ते जाते। कोई सीमा नहीं।

किशोरावस्था में चले थे, जवान हुए, बड़े होते गये और अन्त अवस्था में वृद्ध हो गये। दाढ़ी बढ़ते-बढ़ते काली से सफेद हो गयी। बालों का भी यही हश्र हुआ। लम्बी यात्रा की तपस्या में स्थान-स्थान के गुरु बने और महाऋषि बन गये। भौतिक शरीर तो छोड़ दिया परन्तु जब तक भाषाओं में गंगा-यमुना का हिमालयी प्रवाह है, पाणिनि ऋषि अमर हैं।

एक दूसरे की भाषा को आजकल घृणा से देखा जाता है, इस पर तूफ़ान बरपाया जा रहा है। गोलियाँ चल रही हैं। लाशें बिछायी जा रही हैं। हरेक अपने अहंकार, अपनी विद्वता और अपने स्वार्थ के लिए भाषाओं को मोड़-तोड़ रहा है। हिन्दी की ख़ासी गत बन चुकी है। हर स्थान और हर प्रान्त में यही हाल। एक भाषा बोलने वाले को दूसरी भाषा बोलने वाले के स्थान से उखाड़कर फेंका जा रहा है। तीन या चार भाषाएँ ज़बरदस्ती पढ़ने के नियम, फ़ॉर्मूले बनाये जा रहे हैं। एक-दूसरे के ऊपर भाषाएँ थोपी जा रही हैं। पर भाषाएँ तो सब मीठी और सुन्दर फूलों के बाग़ की तरह से रंग-बिरंगी फुलवाड़ियाँ हैं।

लेकिन,

पढ़े-लिखों की बुद्धि पर परदा पड़ गया है। हाँ अब यह खोज करनी है कि

क्या ये लोग सचमुच पढ़े-लिखे हैं भी?