मधुर कहानियाँ
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खेत का रखवाला


तुकाराम मस्तमौला संत थे। भक्ति और जाप उनका जीवन था, जो उनके हर साँस में भरा था।

एक बार वे मस्ती में अनाज के खेत की डौल पर बैठ गये। खेत का स्वामी रोज़ उन्हें जाप करते देखता। था तो इंसान ही। एक दिन उसको बहुत तरस आया और संत तुकाराम जी से कहने लगा - ‘‘आप यहाँ बैठे तो रहते ही हैं। आप जाप-भजन के साथ-साथ मेरे खेतों की रखवाली भी कर सकते हैं। मैं आपको यहाँ बैठे ही खाने को पहुँचा दिया करूँगा।’’

संत तुकाराम सहज-स्वभाव मान गये। सोचा, ‘‘इसमें मेरा तो कुछ बिगड़ता नहीं।’’

खेतवाले ने पक्षी उड़ाने के लिए गुलेल और आवाज़ करने वाला साँटा दे दिया। रोज़ छाछ व चटनी के साथ खाना भी पहुँचाने लगा।

दूसरे दिन प्रातः पक्षियों के डौर के डौर आने लगे और अनाज की बालों पर बैठकर दाना चुगने लगे। संत तुकाराम को गुलेल और साँटे पर हाथ डालने से पहले ही विचार आया कि ये पक्षी भी तो भगवान् की सृष्टि की रचना ही हैं। इनको भी तो अपना पेट भरने का अधिकार है। ये अनाज को उठाकर कहीं ले तो जाते नहीं और न ही ये इकट्ठा ( करते हैं। पिछले दो तीन वर्षों में अकाल पड़ा। बेचारों को पेट भर खाना भी नहीं मिला होगा। भगवान् की कृपा से इस साल अच्छी खेती हुई है तो चलो ये भी जी भरकर खा लें। मैं कौन होता हूँ इनके खाने के रास्ते में बाधा डालने वाला? प्रतिदिन साँझ के समय उनसे प्यार से कह देते कि ‘‘इस समय अपने घर जाओ। प्रातः फिर आ जाना।’’ ऐसे ही प्रतिदिन उन्हें बुला लेते। पक्षी बड़े खुश। झुंड के झुंड रोज़ आ जाते। दूर-दूर के मित्रों को भी न्यौता दे आते और उनको बतलाते कि ‘एक ऐसा खेत भी है जिसका स्वामी बहुत दयालु है। गुलेल नहीं चलाता, मार-पिटाई नहीं करता और पक्षी जाति को आनन्द से अनाज खाने देता है।’

‘इसी तरह आनन्द से दिन व महीने गुजर गये। खेत का मालिक बहुत खुश था कि इस वर्ष मेरे खेत की बहुत अच्छी रखवाली हुई है, सो खूब अनाज मिलेगा।’

खेत काटने का समय आ गया। खेतवाला अपने सब परिवार को लेकर कटाई के लिए आया। आकर देखा कि सारा खेत उजड़ा पड़ा है और किसी बाल में एक भी दाना नहीं है!

सर पीटने लगा और संत तुकाराम से कहने लगा - ‘‘तुमने मुझे उजाड़ दिया और मेरा बेड़ा ग़र्क कर दिया है।’’

संत तुकाराम को पकड़कर पंचायत के सामने ले गया और अपनी दुःखभरी कथा कह सुनायी।

पंचों ने पूछा - ‘तुम्हारा कितना नुक़सान हुआ?

खेत के मालिक ने कहा - ‘दो मन अनाज का।’

पंचों ने संत तुकाराम से पूछा कि उनका इस दोष के लिए क्या जवाब है। संत तुकाराम ने कहा - ‘‘हुज़ूर! मैंने तो कुछ खाया नहीं परन्तु चिड़ियों और पक्षियों को खाने से कैसे रोक सकता था?’’ खेत वाले ने सटपटा कर कहा - ‘‘हुज़ूर मैंने तो गुलेल और साँटे का सब साधन जोड़ कर दिया था।’’ संत तुकाराम शान्त भाव में कहते रहे - ‘‘मनुष्य तो पशु-पक्षियों का केवल आहार ही नहीं, उनको भी खा जाता है। यहाँ तक कि समुद्र के गहरे जल में रहने वाली मछलियाँ को भी नहीं छोड़ता। उसको तो कोई नहीं रोकता फिर मैं पक्षियों को उनका पेट भरने और भूख मिटाने से कैसे रोक सकता था। फिर भी यदि पंच गण (ज्यूरी) मेरा दोष मानते हैं तो खेतवाले के नुक़सान को जाँच लिया जाये और जितना नुक़सान आप निश्चय करें उतना मेरे परिवार के अनाज से वसूल करके इसको भर दिया जाये।’’

पंचायत ने हुक्म दिया कि खेत का मुआयना-जाँच की जाये और उसी हिसाब से तुकाराम को अनाज का हरजाना भरने का आदेश दिया जाये।

जब पंचायत के सदस्य खेत पर पहुँचे तो खेत हरा-भरा लहलहा रहा था। एक दाना भी गया नहीं था।

पंचों ने खेत की कटाई करने और अनाज निकालने का हुक़्म दिया तो सत्रह मन अनाज निकला।

पंचायत ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया कि दो मन अनाज खेत वाले को दे दिया जाये और पंद्रह मन संत तुकाराम को। पर संत तुकाराम ने एक दाना भी लेने से इन्कार कर दिया और कहा कि ‘‘इसमें मेरा कोई हक़ नहीं है,

और आजकल . . . .?