मधुर कहानियाँ
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लगन की लौ


कंजूस और ज़िद्दी

तमिलनाडु प्रान्त के एक गाँव में दो व्यक्ति रहते थे जिनको सब गाँव वाले जानते थे।

एक था बड़ा कंजूस कि कभी कुछ अपने पास से ख़र्च न करे और दूसरा था बड़ा ज़िद्दी ब्राह्मण कि जो एक बार मन में ठान ले तो पूरा करके ही छोड़े।

कंजूस गाँव के नज़दीक के एक बड़े शहर में चला जाता था और बारी-बारी से एक-एक मोहल्ले में घर-घर जाकर कहता कि, ‘‘मुझे ब्राह्मण जिमाने हैं। मुझे ब्राह्मणों को खाना देना है।’’ - और चावल माँग लाता था।

हरेक घर से उसे थोड़े-थोड़े चावल मिल जाते थे अैर इस प्रकार एक मोहल्ले से बीच-पच्चीस सेर चावल इकट्ठा हो जाते थे जिनसे वह हफ़्ता-दस दिन का अपने घर का खाने का गुज़ारा चला लेता था। अपने पास से ख़र्च करके वह कभी चावल नहीं लाता था और न ही कभी वह ब्राह्मणों को जिमाता था। अगले सप्ताह वह शहर के दूसरे मोहल्ले में चला जाता था अैर ऐसे ही चक्कर चलाता रहता था। और इस प्रकार पहले मोहल्ले की बारी फिर कहीं साल भर में जाकर आती थी।

एक दिन ज़िद्दी ब्राह्मण को ज़िद हो गई कि मैं तो कंजूस के घर खाना खाऊँगा। जब वह उसके घर पहुँच गया तो कंजूस बोला, ‘‘आज और कल के लिए तो मैं दूसरे ब्राह्मणों को न्यौता दे चुका हूँ। आप परसों आइये।’’

इधर अब बेचारा कंजूस सोच में पड़ गया कि परसों जब वह आयेगा तो मैं क्या बहाना बनाऊँगा।

सो उस दिन वह सवेरे ही कहीं दूसरे गाँव चला गया और अपनी पत्नी से कह गया कि जब वह आये तो कह देना, ‘‘हमारी लड़की बीमार थी, ख़बर आई थी। इसलिए वह लड़की को देखने दूसरे गाँव चले गये हैं।’’

अचानक सात दिन बाद ज़िद्दी फिर कंजूस के घर पहुँचा तो जवाब मिला, ‘‘मैं तो आज ही लड़की के गाँव से आया हूँ आप परसों आ जाइये।’’

ज़िद्दी तो ज़िद्दी था ही, वह परसों फिर आ पहुँचा। तो उसे देखते ही कंजूस ने अपनी पत्नी को आवाज़ देकर पूछा, ‘‘क्यों जी, ब्राह्मण जिमाने के लिए केले के पत्ते भी हैं कि नहीं?’’ देवीजी बोलीं, ‘‘जी एक ही पत्तल है सो आपके लिए!’’ तो कंजूस ने मजबूर बनकर कहा, ‘‘अच्छा तो आप कल आइये और अपने खाने के लिए केले की पत्तल भी लेते आयें।’’

इस बार तय हुआ कि जब वह बाहर से आवाज़ लगाये तो तुम रोने-कराहने लगना कि, ‘‘हाय मैं क्या करूँ मेरा तो सिर फटा जा रहा है। मुझसे तो उठा नहीं जाता।’’

जब मेहमान पत्तल लेकर अन्दर आ गया तो कंजूस महाराज कहने लगे, ‘‘भई मैं आज मजबूर हूँ मेरी धर्मपत्नी बीमार है उसके सिर में बहुत दर्द है। वह आज खाना नहीं बना सकी है और अब तो देर भी बहुत हो गई है।’’

तो मेहमान कहने लगा, ‘‘कोई बात नहीं। खाना तो मैं अच्छा बनाना जानता हूँ। आप मेरा पत्ता रख लीजिए मैं कल आऊँगा। मैं और आप दोनों मिलकर खाना बना लेंगे और खा लेंगे। आपकी धर्मपत्नी को तकलीफ़ देने की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी।’’

अगले दिन जब ज़िद्दी ब्राह्मण ने दरवाज़ा खटखटाया तो कंजूस और उसकी पत्नी ने जो नई योजना बनाई थी उसके अनुसार कंजूस ने दीवार को धमाधम पीटना शुरू कर दिया और उसकी पत्नी चिल्ला-चिल्लाकर रोने-पीटने लगी। घर में मार-पीट और रोने-चिल्लाने की आवाज़ें सुनकर ज़िद्दी द्वार पर सिर पकड़कर बैठ गया और सोचने लगा कि अब क्या किया जाये! इतने में उसे ऊँघ आ गई। वह कुछ सो गया।

जब काफी देर हो गई और सन्नाटा छा गया तो कंजूस की धर्मपत्नी कहने लगी, ‘‘पतिदेव! अब तो वह चला गया प्रतीत होता है। खाने का समय भी बीता जा रहा है। दो पत्तलें तो हैं ही मैं भोजन परोसती हूँ आप और मैं बैठकर खा लें।’’

चौका धोकर दो पत्तलें लगा दी गईं और कंजूस की पत्नी ने प्रेम से भात-भोजन परोसना शुरू किया। इतने में ज़िद्दी चुपके से दाँव लगाकर अन्दर आ गया और परोसी हुई पत्तल पर बैठ गया। ‘‘ नमो शिवाय’’ मन्त्र पढ़कर खाना शुरू कर दिया। बड़े शान्त भाव से कहने लगा, ‘‘खाना तो बहुत अच्छा बना है।’’

अब हो ही क्या सकता था कंजूस की पत्नी परोसती गई और ज़िद्दी खूब खाता गया।. . . .

शायद इसी ज़िद को जब भागवत चेतना ने स्पर्श किया तो वही लगन की लौ बन उठी।