मधुर कहानियाँ
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अशर्फियों का घड़ा


भारतवर्ष में पाँच नदियों का एक प्रांत होता था। सतलज, व्यास, रावी, चिनाब, जेहलम। इस प्रांत का नाम था पंजाब। ईश्वर-इच्छा, अब यह प्रांत छिन्न-भिन्न हो गया है।

उस प्रांत में एक गांव था जिसका नाम था चोहा-सैदन-शाह।

सैदन-शाह एक फ़क़ीर-औलिया का नाम था और चोहा कहते हैं उस जगह को जहाँ पानी अपने-आप धरती से फूटता रहे - उमड़ता रहे। और साथ में ही आधे मील के फ़ासले पर एक तीर्थ-स्थान था जो भारतवर्ष के प्रमुख पाँच ‘राज’ तीर्थ-स्थानों में से एक था। इसका नाम था ‘कटासराज’। यहाँ पहाड़ों और जंगलों में एक बहुत बड़ा कुण्ड था। इस स्थान पर अपने बनवास-काल में भगवान् रामचन्द्र भी यहाँ आये थे और स्नान भी किया था।

इस सारे क्षेत्र में कुदरती गुलाब इतना विस्तार में और खुद-रो (अपने-आप उगनेवाला) था कि जिसकी कोई हद नहीं। सुना है ऐसा खुशबूदार गुलाब धरती पर कहीं नहीं होता। पुराने ज़माने में दूर-दूर के देशों में राजा-महाराजाओं और नवाब-बादशाहों को यह बतौर तोहफ़ा भेजा जाता था और गुलकन्द बनाने के लिए ख़ासतौर पर ईरान तक जाता था। यहाँ अंगूर, लौकाठ और दूसरे कई फलों के बाग़ सदियों से लहराते रहते थे। ऐसे सुगन्धित, स्वच्छ और शीतल जलवायु के स्थान में सरल और पवित्र भावना के लोग रहते थे।

भगवान् की इच्छा, पता नहीं किन कारणों पर आधारित होती है कि ऐसे पवित्र और कोमल स्थान पर भी एक बार भीषण और भयंकर अकाल पड़ गया। लोग चिन्तित और दुखी हो गये। अकाल से पीड़ित लोगों की कहानियाँ भी कितनी भयंकर और दर्दनाक होती हैं। परन्तु इनमें एक कहानी बहुत ही आश्चर्यजनक है।

ज़ाकिर हुसैन के पास थोड़ी-सी खेती थी। वह इतने परिश्रमी और संयमी थे कि अपनी खेती की उपज से ही सदा सन्तुष्ट रहते थे और आनन्द से जीवन व्यतीत करते थे। किसी का न लेना न देना। उनका एक जवान बेटा था। वह मदरसा तो अवश्य जाता था फिर भी अपने बाप के साथ खेती में खूब हाथ बँटाता था। उस ज़माने की स्त्रियाँ तो खेती में बराबर अपने पुरुषों के कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करती ही थीं। तभी तो खेती का पूरा संचालन होता था और आनन्द भी।

ये सज्जन ज़ाकिर हुसैन भी अकाल के चक्कर में आ गये और बावजूद सब कोशिशों के हताश हो गये। जब कोई चारा न रहा तो छोटी-सी खेती की ज़मीन बेंचकर किसी दूसरे स्थान पर जाने का निश्चय किया जहाँ अकाल न हो और किसी संबंधी का सहारा मिल जाये।

जैसा कि भाग्य में लिखा था, मूलराज, जो उसी स्थान पर मामूली दूकानदार थे और जिनके पास ज़ाकिर हुसैन अक्सर उठा-बैठा करते थे और छोटा-मोटा सौदा भी लिया करते थे, उनके हाथ उन्होंने अपनी जमीन बेच दी, 13 बीघा 13 सौ रुपये में। मूलराज लेने पर बहुत खुश तो न थे परन्तु ज़ाकिर हुसैन की दशा देखकर मजबूर हो गये और ज़मीन खरीद ली।

ज़ाकिर हुसैन ने गाँव छोड़ते समय आँखों में आँसू-भरकर मूलराज से विदा मांगी। ज़ाकिर हुसैन की बीबी के लड़के की आँखों में भी आँसू आ गये। यह देखकर मूलराज की पत्नी और उसकी एकलौती जवान बेटी भी रो पड़ीं।

जाना तो था ही। स्नेहवश मूलराज ने ज़ाकिर हुसैन से उनके जाने के स्थान का पूरा पता लेकर अपनी बही में लिख लिया। यह स्थान वहाँ से 13 मील की दूरी पर था और उन्हीं ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों में। वहाँ न यह गुलाब था और न पानी के सोते। परन्तु क्षेत्र अकालरहित था और ज़ाकिर हुसैन का सहारा था उनका मामू।

कस्बे का नाम डन्डोत था और चोहा-सैदन-शाह से काफी बड़ा था। वहाँ कोयले की कुछ छोटी-मोटी खानें थी। ज़ाकिर हुसैन के मामू अच्छे मान्य व्यक्ति थे। उनकी सब लोग इज़्ज़त करते थे। उन्होंने अपने प्रभाव से ज़ाकिर हुसैन को एक अच्छी कोयले की खान 1300 रुपये में खरीद दी। ज़ाकिर हुसैन मेहनती तो थे ही, उन्होंने अपना व्यवसाय अच्छा जमा लिया और चैन से जीवन व्यतीत करने लगे।

एक ओर तो मूलराज ज़ाकिर हुसैन की दशा पर दुखी थे पर दूसरी ओर उन्हें प्रसन्नता भी थी कि उनके हाथ ज़मीन आ गयी है और वे ज़मींदार हो गये हैं और अब उनकी इज़्ज़त बढ़ जायेगी।

मूलराज किस्मत के बली थे। पहले ही साल ख़ूब वर्षा हुई और ख़ूब अनाज हुआ। परन्तु मूलराज को बार-बार ज़ाकिर हुसैन की चिन्ता होती कि उस बेचारे का क्या हाल हो रहा होगा। अनाज छड़ते ही एक गठरी अनाज सिर पर रखा और डन्डोत की ओर चल पड़ा कि इस भाग्यवान खेत से अनाज का कुछ हिस्सा ज़ाकिर हुसैन को भेंट दे आऊँ।

डन्डोत पहुँचकर ज़ाकिर हुसैन के मामा का पता पूछकर उसके घर पहुँचा और गले मिलकर उसको अनाज भेंट किया। परन्तु ज़ाकिर हुसैन के उठने-बैठने में यह देखकर उसे और भी खुशी हुई कि वह पहले से बहुत अच्छी अवस्था में हैं। अच्छा खाना पीना, अच्छा पहनना और गांव के मकान की अपेक्षा उनका मकान भी बहुत अच्छा था और वह हर प्रकार से चिंतारहित और ख़ुश थे। उनका लड़का भी अब युवावस्था में बहुत शान से रहता और उस कोयले की खान (Colliery) की मैनेजरी करता तथा काम को सुचारु रूप से सँभाले हुए था। ज़ाकिर हुसैन ने मूलराज का अच्छा स्वागत किया और प्रेम से वापस भेजा और उसकी लड़की तथा पत्नी के लिए कुछ सौग़ात व मिठाई भी भेजी।

अब मूलराज ज़ाकिर हुसैन के प्रति बेफ़िक्र हो गया और आनन्द और विश्वास से अपनी खेती करने लगा। कुछ वर्षों बाद मूलराज का हल, चलाते समय खटक से अटक गया और बैलों से खिंचा ही नहीं। मूलराज ने बैलों को अलग कर दिया और हारकर बैठ गया। इतने में क्या देखता है कि जहाँ हल की चोट लगी थी वहाँ कोई बर्तन चमक रहा है। खोदने पर एक ताँबे का कलश निकला जिसका मुँह हल से टूट गया था। कलश को जब घर में लाकर देखा तो वह अशर्फियों से भरा था। मूलराज देखकर चिंता में डूब गया और कलश को एक कपड़े में बाँधकर और सिर पर रखकर डन्डोत की तरफ भागा। सीधा ज़ाकिर हुसैन के मकान पर पहुँचा और हाँफते हुए कलश खोल कर ज़ाकिर हुसैन के हवाले कर दिया कि, ‘‘अपनी अमानत सँभालें। मैंने किसी अशर्फी को हाथ से भी नहीं छुआ। यह कलश आप अपने खेत में दबाकर भूल आए थे।’’

ज़ाकिर हुसैन कलश को देख कर जोश में आ गये और गुस्से में लाल-पीले होकर कहने लगे - ‘‘मैं तो तुम्हें मित्र समझता था और तुम मेरा ईमान बिगाड़ना चाहते हो। जब मैंने खेत बेंच दिया तो उसमें रोड़ा-पत्थर जो कुछ भी था उसके साथ बेच दिया और यह सब तुम्हारा है।’’ मूलराज को भी तेज़ी आ गयी और झुंझलाकर ज़ाकिर हुसैन को ऊँची-नीची बात कहने लगा - ‘‘तुमने मुझे इतना नीच और कमीना समझा है कि मैं तुम्हारा धन ले लूँ और नरक में जाऊँ? मैंने तुम्हारी ज़मीन अनाज बोने के लिए ली थी न कि उसमें जो तुम्हारी अशर्फियाँ या धन-दौलत थी वह ली थी। अगर मैं इस धन को रखूँ तो न मैं इस जन्म में सुख पा सकता हूँ और न किसी अगले जन्म में।’’ इस पर ज़ाकिर हुसैन को और भी तैश आया और कहने लगा कि, ‘‘तुम मेरा दीन-और-ईमान बिगाड़ना चाहते हो कि तुम्हारी दौलत मैं ले लूँ। क्या अकाल से निकालकर ख़ुदा ने मुझे खाने-पीने को नहीं दिया कि मैं ख़ुदा को भूल जाऊँ और गुनाहगार बनूँ।’’

बात कहीं खतम नहीं हो रही थी और दोनों तरफ से तेजी और झगड़ा बढ़ता चला जा रहा था। यहाँ तक कि नौबत धक्के-मुक्के तक आ पहुँची। मूलराज कलश को छोड़ कर जाना चाहता था और ज़ाकिर हुसैन उसे रखने को तैयार नहीं थे।

इस तेज़ी को सुनकर आस-पास के लोग भी इकट्ठे हो गये किन्तु किसी को इनकी बात समझ में नहीं आती थी कि झगड़ा क्या है और दोष किसका है; और दोनों ज़िद भी नहीं छोड़ते थे। आख़िर पुलिस को बुलाना पड़ा और दोनों को कलश समेत पुलिस के हवाले कर दिया गया।

पुलिस भी नयी किस्म का झगड़ा देखकर परेशान थी और मजबूर होकर दोनों को काज़ी के पास ले गयी। काज़ी भी जब कुछ समझ न सका तो उसने कहा कि, ‘‘यह कलश चूँकि चोहा-सैदन-शाह की ज़मीन से निकला है इसलिए इसका मुकदमा वहीं पेश होगा और फैसला भी वहीं होगा।’’ दोनों अपराधियों को कलश समेत जेल की कोठरी में बन्द कर दिया गया और कुछ दिनों बाद झगड़ा करने के अपराध में हथकड़ियाँ लगाकर चोहा-सैदन-शाह की कचहरी में पेश किया गया। यह झगड़ा यहाँ के काज़ी साहेब की भी समझ में नहीं आया कि इसका क्या फैसला किया जाये। उन्होंने दूसरी तारीख़ डाली जिसमें डण्डोत के काज़ी को भी बुलाया और एक और ऊँची श्रेणी के प्रसिद्ध और अनुभवी काज़ी को पिण्ड दादन ख़ान से बुलाया। तीनों काज़ियों ने दोनों अपराधियों का झगड़ा पूरी तरह से सुना जो एक-दूसरे पर बे-ईमान करने का इल्ज़ाम लगा रहे थे और साथ में दोनों की आँखों में लगातार आँसू भी टपक रहे थे।

अनुभवी काज़ी को इल्हाम (प्रेरणा) हुआ और उसने दोनों से पूछा कि, ‘आप दोनों की कोई सन्तान है?’ ज़ाकिर हुसैन ने झट कहा - ‘जनाब, मेरा एक बेटा है।’ मूलराज ने भी तुरन्त जवाब दिया - ‘जनाब, मेरी एक लड़की है।’ तीनों काज़ियों ने आपस में चे-मे-गाई की और मुस्कुराने लगे और कहा - ‘हम फैसला देते हैं कि लड़के और लड़की की फौरन शादी कर दी जाये और यह कलश उन दोनों की सम्पत्ति हो जाये।’

दोनों हक्के-बक्के रह गये। एक हिन्दू एक मुसलमान। शादी तो हो ही नहीं सकती।

काज़ी ने मस्जिद के मुल्ला और कटास-राज के पण्डित को बुलाया और उनके सामने यह समस्या रखी। मौलवी और पंडित जी ने समय लेकर और आपस में सोच-विचारकर कहा कि हमारे धर्म और शरीयत तो कोई रास्ता बताते नहीं परन्तु उनसे ऊपर ‘भागवत-इच्छा’ तो हो ही सकती है और ऐसे करिश्मे संसार में होते भी आये हैं। हम दोनों विशेष स्थिति में इसकी इजाज़त देते हैं ताकि दोनों व्यक्ति गुनाह से बच जायें।

शादी हो गयी और मिठाई तो पहले ही भेजी जा चुकी थी।

यह थी पहले ज़माने की सभ्यता किन्तु आजकल....................!