जनरल मैनेजर
महाप्रबंधक
(General Manager)
मुझे पृथ्वी पर घिसटते सोलह वर्ष हो चुके थे। परन्तु मुझे अभी तक समझ में नहीं आया कि कौन कारीगर था और उसका मुझे बनाने में क्या अभिप्राय था।
संसार के सब जीव-जन्तुओं और वनस्पति-जगत की तरह मेरे माता-पिता ने मुझे जन्म दिया और मैं संसार के प्राणियों की तरह लुढ़कता तो रहा परन्तु यह नहीं पता लगा कि निर्माता की क्या मर्ज़ी थी और मुझे अपने जीवन को कैसे हाँकना है - कैसे चलाना है - कैसे भगाना है और दौड़ाना है। मैं इसी सोच-विचार और उधेड़-बुन में रहता था।
ऐसी दशा में एक दिन क्या हुआ कि जब हम लोग लाइन में बोर्डिंग-हाउस से स्कूल ले जाये जा रहे थे मैंने एक चमत्कारपूर्ण गाड़ी सड़क पर दौड़ती जाती देखी। मैं बड़ा हैरान हुआ और आश्चर्य में पड़ गया। उस वक्त मैं दसवीं श्रेणी में दयानन्द ऐंग्लो-वैदिक हाई स्कूल लाहौर में पढ़ता था। हमारा स्कूल बोर्डिंग-हाउस से लगभग एक मील की दूरी पर था और हम प्रतिदिन दो दो की लाइन में बोर्डिंग से स्कूल ले जाये जाते थे। दो होस्टल-सुपरिंटैंडैंट एक दायें और दूसरा बायें हाथों में बैंत लिए हमें नियंत्रण में रखने के लिए और हाँकने के लिए साथ रहा करते थे।
दूसरे दिन जब हम लोग स्कूल ले जाये जा रहे थे वह नये प्रकार का छकड़ा हमारे पास से भागता हुआ निकला। मैं अपने आपको काबू में न रख सका और उस छकड़े के पीछे लाइन छोड़कर तेज़ी से भागा। अगले चौराहे पर पहुँचकर मैंने उसको घेर लिया। वह खुला छकड़ा था। उसमें पाँच गोरे लोग बैठे हुए थे। मैंने उनसे पूछा, ‘‘यह क्या है?’’ उन्होंने जवाब दिया, ‘‘यह मोटर-कार है। और इसका नाम फ़ोर्ड है।’’
गाड़ी के पीछे भी अक्षरों में अंग्रेज़ी में लिखा था - ‘‘फोर्ड’’ “FORD”
यह मैंने सुन तो लिया और अपने स्कूल की तरफ़ चल पड़ा जो कि अब पास में ही था। परन्तु यह सोचता रहा कि यह ‘मोटर’ चलती और भागती कैसी थी। न कोई बैल और न कोई घोड़े जुते थे।
अब मैं स्कूल सबसे पहले पहुँच गया और डर यह था कि होस्टल-सुपरिंटैंडैंट आते ही बैंत चलायेंगे। परन्तु वह तो हँस दिये और खुश हुए शायद इसलिए कि ऐसी नई बात देखकर बच्चा कैसे रुक सकता है। बच्चों का तो यह धर्म ही है। मुझे भी खुशी हुई और चैन हुआ कि पिटने से बच गया।
परन्तु मेरा ध्यान तो उस छकड़े में ही लगा था। क्लास में जाते ही मैंने अपने अंग्रेज़ी के मास्टरजी से यह सारा क़िस्सा कह सुनाया। उनका नाम भी मुझे अभी तक याद है। मास्टर ताराचन्द जी। बहुत सुन्दर सफ़ेद पगड़ी बाँधा करते थे और पीठ पर शमला लटका रहता था।
मास्टरजी कहने लगे, ‘हाँ-हाँ मैंने भी सुना है। देखा तो नहीं। यह मोटर अमेरिका से बनकर आई है - और फ़ोर्ड साहब ने बनाई है। वह बहुत-सी ऐसी मोटरें रोज़ अपनी फैक्टरी में बनाते हैं और सारी दुनिया में भेजते हैं।’
यह सब सुनकर मैं तो और उलझन में पड़ गया। यह अमेरिका क्या होता है यह मालूम ही नहीं था। हमारे ज़माने में तो ‘सुन्दर लाहौर शहर’ के आगे दिल्ली और दिल्ली के आगे सारा मदरास और समुद्र पार सारा विलायत। इसके सिवा हमने कुछ और सुना ही नहीं था।
मास्टरजी ने बहुत प्यार से समझाने की कोशिश की और ग्लोब के नक़्शे पर ले जाकर समझाया कि अमेरिका एक बहुत बड़ा मुल्क है - और वह हमसे बिल्कुल उल्टी तरफ नीचे है। अब यह मैं कैसे समझ सकता था। उल्टी तरफ कोई चीज़ टिक कैसे सकती है। वहाँ मकान, पेड़ अगर उल्टे हों तो गिर जायेंगे। मनुष्य भी औंधे होकर गिर सकते हैं। मेरी तो इस मोटर-छकड़े ने मुसीबत कर दी है और मुझे भी औंधा करके रख दिया है - और जब तक मैं यह सब भेद जान न लूँ चैन कैसे ले सकता हूँ।
अब मैं इन्तज़ार कर रहा था कि कब मेरा पंजाब यूनिवर्सिटी का मैट्रिक का इम्तहान ख़त्म हो और कब मैं छुटकारा पाऊँ और अमेरिका ढूँढ़ने जाऊँ और वहाँ जाकर देखूँ कि फ़ोर्ड साहब कौन हैं और ये गाड़ियाँ कैसे बनाते हैं।
वह दिन आया जब यूनिवर्सिटी का इम्तहान भी ख़त्म हो गया और मैं अपने माता-पिता के पास चला गया। मेरे पिताजी उस समय जामपुर ज़िला डेरा ग़ाज़ीख़ान में जो बलूचिस्तान की सरहद पर था सरकारी नौकरी में महकमा-बन्दोबस्त में गिरदावर-कानूनगो थे। अच्छा-बड़ा परिवार था चार लड़के - दो लड़कियाँ। - और मैं सबमें बड़ा था। मुझे सिवाय इसके और कुछ नहीं सूझता था कि कैसे भागूँ और कैसे अमेरिका पहुँचू।
मेरे पिताजी बहुत तड़के उठकर लम्बी सैर को चले जाया करते थे। मैंने मौका पाकर उनके लटके हुए लम्बे कोट की जेब में हाथ डाला तो उनतीस रुपये तेरह आने मिले। मेरे पिताजी को तीस रुपये मासिक वेतन मिलता था। और पहली की शाम को वे वेतन लेकर आये थे। तीन आने किसी फण्ड के कट गये होंगे। सो वेतन के पूरे पैसे लेकर मैं वहाँ से चम्पत हो गया और लाहौर आ गया।
लाहौर से मैंने बम्बई के लिए रेल का टिकट लिया। जहाँ तक मुझे याद है टिकट पर लगभग सात रुपये लगे। गाड़ी में बैठने से पहले मैंने एक अच्छी और बुद्धिमत्ता की बात की। अपने पिताजी को एक पोस्ट-कार्ड लिख दिया कि ‘मैं कहीं जा रहा हूँ। कहाँ? - इसका मुझे पता नहीं। यदि भगवान् की कृपा हुई तो मैं वापस आपके पास आऊँगा।’
पोस्ट-कार्ड की क़ीमत उन दिनों एक पैसा थी। मेरे हाथ की पूँजी में से एक पैसा छीज जाने से कुछ बहुत फ़र्क नहीं पड़ा।
तीन दिन में मैं बम्बई पहुँच गया। स्टेशन पर उतरकर बाहर निकला। मेरा सिर चक्कर खा रहा था। होश ठिकाने नहीं थे। बहका-बहका मैं बन्दरगाह का रास्ता पूछने लगा, जहाँ से जहाज़ अमरीका को चलते हैं। लुढ़कता-पुढ़कता पूछता-पाछता थका-माँदा मैं शाम तक बन्दरगाह पर पहुँचा। - और बन्दरगाह के एक कोने में बेहोश होकर सो गया।
प्रातः जब नींद खुली तो सूर्य बहुत ऊपर आ चुका था। उठकर फिर पूछता-पाछता और भागता-दौड़ता उस गेट पर मैं पहुँचा जहाँ से सब लोग अमेरिका जाने वाले जहाज़ पर जा रहे थे।
एक-एक करके सैकड़ों मुसाफ़िर अन्दर जा रहे थे। मैं हरेक से हाथ जोड़कर कहता, ‘‘कोई मुझे अपने साथ अमेरिका जाने वाले जहाज़ पर ले जा सकते हैं?’’
सब लोग तेज़ी से निकल जाते और मेरी बात सुनना तो एक तरफ मेरी तरफ कोई देखता भी न था।
बहुत देर के बाद अब कुछ अफ़सर लोग आने शुरू हुए। बड़ी सुन्दर और तड़क-भड़क वर्दियों में। मैंने हरेक अफ़सर को रोककर और हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि मुझे भी जहाज़ में ले चलें। लेकिन किसी ने भी नहीं सुनी यह समझकर कि इस लड़के का दिमाग़ ख़राब हो गया है।
भगवान् की कृपा कि एक अफ़सर के मन में कुछ तरस आया और उसने मेरे विषय में पूरी तरह से पूछताछ की कि मैं कौन हूँ और कहाँ से आया हूँ। मैंने सरलता से और सच्चाई से अपना पूरा हाल बतला दिया। - और लगते हाथ यह भी कह दिया कि ‘‘मुझे जहाज़ पर जो भी काम दिया जायेगा मैं बड़ी खुशी से अच्छी तरह और मेहनत से करूँगा।
अफ़सर को मेरी सरलता, सच्चाई और हिम्मत अच्छी लगी। और उसने पूछा, ‘‘क्या तुम जहाज़ के इंजिन में कोयला झोंकने का काम कर लोगे?’’ मैंने तुरन्त जवाब दिया, ‘‘जी हाँ, अवश्य कर लूँगा। आप एक बार मुझे ले चलिये।’’
अफ़सर ने कहा, ‘‘अच्छा तो तुम मेरे पीछे-पीछे आ जाओ।’’
मैं इतना खुश हो गया कि मेरी सारी भूख और थकावट मिट गई। अन्दर जाकर अफ़सर ने मुझे जहाज़ के फायर-मैन के सुपुर्द कर दिया।
मेरा काम बन गया। मैंने इंजन में कोयले की खूब झोंकाई की। एक-दो दिन के अन्दर ही अपने काम (Duty) के बाद मैंने उन अफ़सर साहब के कैबिन में जाना शुरू किया - और उनका कामकाज भी करने लगा। उनकी कैबिन को झाड़ना-पोंछना, बिस्तर ठीक करना, उनके कपड़े आदि को ठिकाने से रखना और उनका बूट-पॉलिश करना इत्यादि।
अब मुझे पता लगा कि ये अफ़सर तो जहाज़ के कर्त्ता-धर्त्ता हैं। जहाज़ के कप्तान (Captain) हैं - और पीछे से हमारे जिला ज़ेहलम के ही रहने वाले हैं। क्योंकि मेरे साथ ठेठ पंजाबी में ही बात कर रहे थे।
अब तो मज़ा आ गया। जहाज़ तो चल ही पड़ा था। भारतवर्ष का किनारा पीछे छूट गया था। अब यह तो कोई शक़ ही नहीं रहा था कि जहाज़ वापस लौटाकर मुझे कोई जहाज़ से उतार भी सकता है।
अब धीरे-धीरे मैंने कैप्टेन साहब की खुशामद शुरू की कि ‘‘कोयला झोंकने में मेरे मुँह-हाथ काले हो जाते हैं। मेरे सब कपड़े भी काले हो जाते हैं। आपके कैबिन में भी मुझे झिझक होती है कि आपका सब सामान भी न काला हो जाये।’’
कैप्टेन साहब ने महसूस किया कि यह लड़का तो अच्छा है ठीक ही कहता है। तो उन्होंने मुझे बदलकर जहाज़ के किचन में लगा दिया। बैरा का काम करने के लिए। मैं बहुत खुश हो गया। मेरा मतलब भी पूरा हो गया।
अब तो मैं बड़े-बड़े लोगों के कैबिन (Cabins) में चाय व खाना आदि लेकर जाता - और कैप्टेन साहब (Captain) का खाना भी मैं खुद ही देकर आता। कैप्टेन साहब भी बहुत खुश होते - और उनसे पंजाबी में अपने ज़िले की बातें भी हो जातीं।
अब तो मेरे मज़े हो गये। दूध, मक्खन, बिस्कुट, फल आदि आदि जो बचते - ख़ूब खाने को मिलते।
सबसे बड़ा आनन्द और लाभ यह हुआ कि जहाज़ के यात्रियों में सैकड़ों बड़े-बड़े अफसर, राजदूत, उद्योगपति व बड़े-बड़े फौज़ी अफसर, पादरी आदि थे। उनकी संस्कृति, आचार-व्यवहार, उठना-बैठना, भाषा, बातचीत, तौर-तरीके, तहज़ीब सब अलग-अलग थे। इस सबसे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। - और यह भी पता लगा कि अमेरिका ही नहीं संसार में और भी बहुत से देश हैं और सब देशों में भाँति-भाँति के रंग-रूप, सभ्यताओं और भाषाओं के लोग रहते हैं। कभी-कभी कई लोगों से थोड़ी बहुत बात करने का अवसर मिल जाता था। कोई मुझसे भी पूछते कि मैं कौन हूँ और कौन से देश का रहने वाला हूँ और कोई-कोई तो मुझे कुछ पैसे भी दे देते।
और भी अचम्भे की और मज़े की यह बात थी कि जहाज़ बहुत बड़ा था जो कि मैं कभी ख़्वाब में भी नहीं सोच सकता था। मुसाफ़िरों के लिए अनगिनत कमरे, उनके बैठने-उठने के लिए बड़े-बड़े स्थान (Lounges), छते हुए और खुले। छते हुओं में बैठकर वे लोग ताश-शतरंज आदि खेलते थे और खुले में सैर करते और बैठकर दूर तक समुद्र और आकाश का नज़ारा देखते। यहाँ तक कि एक स्थान में टैनिस तक खेलने का प्रबन्ध था। यहाँ इर्द-गिर्द और ऊपर जाल बंधे हुए थे ताकि गेंद समुद्र में न जा गिरे। मुझे भी चारों ओर समुद्र और आसमान के रंग-बिरंगे नज़ारे देखकर आश्चर्य होता था। और आनन्द होता था कि मेरी किस्मत ने मुझे क्या-क्या दिखाया है।
जब घोर रात हो जाती तो सब मुसाफिर और दूसरे लोग सो जाते और जहाज़ में सन्नाटा छा जाता परन्तु बीसियों लोग जो जहाज़ चलाने वाले थे जिनकी अपनी-अपनी ड्यूटी थी वे अपने-अपने स्थान पर तटस्थ बैठे अपने ही काम में लीन रहते थे। कई इंजीनियर उस घुप अँधेरे में भी इतने विशाल समुद्र में लगातार सुइयों के ऊपर बैठे हुए जहाज़ को पूरे नियंत्रण में रखे होते कि वह ठीक दिशा में तो जा रहा है और कहीं रास्ते में से भटककर अमरीका की बजाए अफ़रीका के किनारे ही न जा लगे।
कहीं पर दूसरे इंजीनियर अपनी-अपनी ड्यूटी पर बैठे यही देख रहे होते कि सामने से कोई जहाज़ भागता न आ जाये और हमारे जहाज़ से टकरा जाए और सब विनाश हो जाए। यहाँ तक कि समुद्र की बड़ी-बड़ी मछलियों और व्हेल मछलियों से टकराने के ख़तरे से भी जहाज़ बचाकर रखना पड़ता था। जहाज़ के सामने बहुत तेज़ रोशनी लगी होती थी जिससे कि समुद्र में भी मीलों दूर तक दिखाई देता था।
इसी तरह से कई इंजीनियर यह ध्यान रखे हुए थे कि जहाज़ भगाने वाली मशीनें और इंजन के कल-पुर्जे ठीक चल रहे हैं कि नहीं, कोई ख़राबी न हो जाये इसलिए हर समय चौकसी रखे रहते थे।
मेरी तो रात में कोई ड्यूटी नहीं थी परन्तु फिर भी किचन के काम को सुचारु रूप से समेटने में कुछ देर हो ही जाया करता थी। जब मैं अपने सोने के स्थान पर जाने के लिए बाहर निकलता तो घुप अंधेरे में आसमान की तरफ देखकर डर लगने लगता। डैक पर खड़े होकर बाहर की तरफ़ देखता तो सिवाय समुद्र के डरावने रूप के कुछ दिखाई न देता। मैं हैरान होता देखकर कि जहाज़ तो फिर भी भागा ही जा रहा है। परन्तु जहाज़ के चलने की आवाज़ इतने ज़ोर की सुनाई देती कि दिल दहल जाता। दिन में काम-काज में तो कुछ पता न लगता था। अब जाकर सोने के सिवाय और कोई चारा नहीं होता। दिन भर के थके-माँदे और गहरी नींद। फिर वही तड़के-अँधेरे ही कोई आकर ठोकरें मारकर उठा देता क्योंकि उस समय सब मुसाफिरों को ‘‘बिस्तर की चाय’’ - बैड-टी - (Bed Tea) देनी होती थी। अब फिर शुरू हो जाता दिन भर के काम-काज का ढर्रा।
समुद्र का रास्ता इतना लम्बा था - तीन मास का। रास्ते में बीसियों जगह नये से नये मुल्क में और नये से नये बन्दरगाह पर जहाज़ ठहरता। मुझे तो इस सबका कुछ ज्ञान नहीं था। मैं तो यह देखता कि कितनी हलचल मच जाती। हज़ारों मन सामान उतर रहा है चढ़ रहा है मुसाफ़िर भी उतर रहे हैं और चढ़ रहे हैं रेलवे-स्टेशन की तरह। डाक के थैले उतर रहे हैं और चढ़ रहे हैं। हरेक बन्दरगाह पर क्या घमासान नज़ारा हो जाता था। जिसका बयान नहीं किया जा सकता। यहाँ तक कि जहाज़ में भी लोगों की डाक आती जाती थी। परन्तु कभी-कभी मैं यह सोचता था कि मेरी तो न कोई डाक आ सकती है और न ही जा सकती है। अब वह दिन भी आ गया कि जहाज़ अमेरिका के किनारे आ लगा। दस-बीस दिन में नहीं पूरे तीन महीने में।
जहाज़ किनारे पर लगते ही सारे जहाज़ में हलचल मच गई। सब काम बन्द हो गये। मुसाफिरों ने अपने बिस्तर और सामान तेज़ी से बाँधने शुरू किये। एक तरह से भगदड़ मच गई। सब लोग जहाज़ से निकलकर बाहर जाने लगे।
मैं हक्का-बक्का हो गया - और भीड़-भड़क्के में बाहर निकल गया। अपनी सब ज़िम्मेदारी और काम-काज को भूल गया कि कहीं कोई जहाज़ का अफ़सर या कप्तान साहब मुझे देखकर रोक न लें।
बाहर निकल कर अब मैं ताँगे से छुटे हुए घोड़े की तरह भागने लगा। जैसे कोई पागल हो गया हो। कभी इधर कभी उधर। यह तो अभी मुझको मालूम ही नहीं था कि जाना किधर है।
काफी दूर जाकर एक चौराहे पर एक बाग़ीचे में जाकर घास पर साँस ली और लेट गया। भूख-प्यास तो कुछ थी ही नहीं क्योंकि जहाज़ पर ख़ूब खाया हुआ था।
कुछ देर बाद जब कुछ होश आया तो उठकर चलते-फिरते लोगों से फ़ोर्ड साहब की फैक्ट्री का रास्ता पूछना शुरू किया। इतने में क्या देखा कि लोगों का एक झुण्ड जा रहा था। जिसमें स्त्रियाँ सलवारें पहने हुए और आदमी पगड़ियां बाँधे हुए और साथ में बच्चे रंग-बिरंगे कपड़े पहने जा रहे थे और आपस में खूब पंजाबी में बातें कर रहे हैं। यह देखकर तो मुझे फोर्ड मोटर के छकड़े की तरह एक नया ही अचम्भा दिखाई दिया। यहाँ जेहलम और लाहौर कहाँ से आ गया? मैं तेज़ी से चलकर उनके पास पहुँचा और उनसे पंजाबी में बातचीत करनी शुरू की। वे भी मुझे देखकर हैरान हो गये।
मुझसे पूछने लगे मैं कहाँ से और कैसे आया हूँ। मैंने कहा - ‘‘मैं तो फोर्ड साहब से मिलने आया हूँ जो मोटर-गाड़ियाँ बनाते हैं और उनकी फैक्टरी देखने आया हूँ। क्या आप मुझे उनकी फैक्टरी का रास्ता बतला सकते हैं?’’ उन्होंने सोचा कि यह तो कोई पागल हुआ लड़का है। और वे कहने लगे, ‘‘हमने तो कोई ऐसा नाम भी नहीं सुना।’’ मुझे निराशा हुई। परन्तु वे लोग तो मुझे अपने साथ ही ले गये। अपने घरों में। वहाँ तो पंजाबियों की पूरी कॉलोनी ही थी। अधिकतर उनमें सिख थे।
मैं यह सब देखकर चकित रह गया - और विश्वास ही नहीं होता था कि मैं अमेरिका पहुँचा हूँ। ऐसा लगता था कि किसी दैवी शक्ति ने जादू करके मुझे वापस लाहौर पहुँचा दिया है। घर-घर में तंदूर लगे हुए थे। बान की चारपाइयाँ उलटी खड़ी हुई थीं। चारों तरफ पंजाबी गानों की आवाज़े आ रही थीं और कई घरों से लड़कियों के घुँघरू बाँधकर नाचने की भी आवाज़ आ रही थी। सिख घरों में जपुजी साहब की गूँज आ रही थी। लाहौर में और उस स्थान में कोई अन्तर नहीं था।
अब उन्होंने मेरी खूब ख़ातिर करनी शुरू की। आलू के पराँठे बनाकर खिलाये। दही की लस्सी पिलाई और खूब मिठाई खिलाई।
अब दिलों की बातें शुरू हुई। उन्होंने मुझसे पूछा तो मैंने अपना सब कच्चा-चिट्ठा कह सुनाया। वे लोग हैरान हो गये। चकित रह गये।
अब मैंने उनसे पूछा कि वे लोग यहाँ क्यों आये हैं। उन्होंने कहा, ‘‘हमारे तो बाप-दादा यहाँ आये थे। हमनें तो अपना मुल्क पंजाब देखा भी नहीं। यहीं पैदा हुए और यहीं हमारे मकान और ज़मीन जायदादें हैं। यहीं हमारे बच्चे पढ़ते हैं और यहीं आपस में सबकी शादियाँ होती हैं और सब रिश्तेदारियाँ चलती हैं।’’
मैंने पूछा, ‘‘आप काम क्या करते हैं और आपके बाप-दादा यहाँ आये क्यों थे?’’ उन्होंने बतलाया कि, ‘‘हमारे बाप-दादा ने यहाँ आकर आलू की खेती शुरू की थी और वही काम हम सब करते हैं। और इतना काम फैल गया है कि हमारा अपना मुल्क ही बन गया है।’’
यह सुनकर तो मैं दंग रह गया कि यह भी क्या बात है कि आलू बीजने के लिए पंजाब में अपने मुल्क में कोई स्थान नहीं था! यह बात तो समझ में ही नहीं आती थी। परन्तु तक़दीर (Destiny) को कौन रोक सकता है। मुझे बार-बार ख्याल होता था कि यह किस्सा तो मोटर के छकड़े से भी ज़्यादा हैरानगी का हो गया।
रात को पंजाबी अमरीका में ही सोया। सोने से पहले कई घण्टे बातचीत होती रही। उन लोगों ने यह समझा कि मैं फोर्ड फैक्टरी में नौकरी की तलाश में आया हूँ। वह और कुछ समझ ही नहीं सकते थे।
अब उन्होंने मुझे लालच देना शुरू किया और मेरे ऊपर जाल फैलाने शुरू किये।
बहुत से स्त्री-पुरुष इकट्ठे हो गये और सबने अपने-अपने ढंग से कहना शुरू किया:
‘‘फोर्ड फैक्टरी में क्या रखा है। अगर तुम यहाँ हमारे पास रह जाओ तो बड़े-बड़े मकान-कोठियाँ सैकड़ों एकड़ ज़मीन तुम्हें दे दें। तुम्हें राजा बना दें। अच्छी से अच्छी पढ़ी-लिखी सुन्दर और ऊँचे घर की लड़की से शादी करवा दें। चारों ओर काम करने के लिए नौकर-चाकर फिरें। चार घोड़ों की सुन्दर विक्टोरिया और तरह-तरह की फिटन-बग्घियाँ ये सब तुम्हें भाग्य में मिल जायें। जैसे कि भारतवर्ष से यहाँ इसीलिए आये हो।’’
मैं यह सब सुनते-सुनते ऊब गया और थक गया। और न जाने कब सो गया।
प्रातः उठकर चलने लगा। तैयारी तो कुछ करनी ही नहीं थी, कंधे पर खेस रखा और इजाज़त माँगी। उन्होंने पूछा कि, ‘‘हमारी सब बातों का कोई असर हुआ है कि नहीं?’’ मैंने कहा, ‘‘मैं तो एक ही धुन लेकर आया हूँ फोर्ड साहब से मिलना और उनकी फैक्टरी में कारें बनाते देखना।’’
सब स्त्रियाँ कहने लगीं, ‘‘इस लड़के की क़िस्मत ख़राब है। अच्छा बेटा! थोड़ी देर तो बैठ जाओ। हम तुम्हें रास्ते के लिए जल्दी से खाना बना देते हैं।’’
मैं थोड़ी देर के लिए रुक गया। उन्होंने बहुत प्यार से आलू के पराँठे बनाये जो दो-तीन दिन के लिए काफी हों एक डिब्बे में रख दिये। उसमें अचार, चटनी और कुछ मिठाई भी रख दी। मैं यह डिब्बा लेकर उनको धन्यवाद देकर और प्रणाम करके वहाँ से चल पड़ा। बच्चों समेत उन लोगों की आँखों में प्यार के आँसू भर आये। मेरी आँखें भी भीग गईं। और मैं उनकी ओर देखता-देखता वहाँ से विदा हुआ।
अब किधर जाना है इसका तो कोई पता ही नहीं। परन्तु बचपन में एक कहावत सुनी हुई थी ‘पूछते-पूछते आदमी विलायत पहुँच जाता है।’ उसी के भरोसे मैंने हर सड़क के हर मोड़ पर पूछना शुरू किया कि ‘‘फ़ोर्ड साहब कहाँ रहते हैं और उनकी फैक्टरी कहाँ है?’’ पूछते-पूछते तीन दिन के बाद फैक्टरी के दरवाज़े पर पहुँचा। फैक्टरी शहर से कई मील दूर बाहर थी।
फैक्टरी क्या थी एक बहुत बड़ा किला था, जिधर को जाऊँ चारों ओर इतनी ऊँची दीवार। परन्तु भला हो भगवान् का फैक्टरी का दरवाज़ा था तो बहुत विशाल परन्तु खुला था। बहुत बड़े-बड़े दरबान वहाँ खड़े थे परन्तु मुझे किसी ने रोका नहीं।
अन्दर चला गया। कई दरवाज़ों में से निकला। आख़िर एक दरवाज़ा ऐसा आया जहाँ सबको रोका जाता था और पास देखकर ही उनको अन्दर जाने दिया जाता था।
यहाँ आई मुश्किल। बम्बई बन्दरगाह की तरह यहाँ भी मैं खड़ा हो गया और हरेक से प्रार्थना करने लगा कि ‘‘कोई मुझे भी अन्दर ले चले। मुझे फोर्ड साहब से मिलना है।’’ सब सुनकर हँस दें।
धड़ाधड़ इंजीनियर, कारीगर अपनी वर्दी पहने अन्दर जा रहे थे। अब एक अफसर जो शकल-सूरत से बहुत शानदार था मैं उसके पाँवों में गिर पड़ा कि ‘‘मुझे अन्दर ले चलो और मेरी बात सुनो।’’
वह मुझे अपने दफ़्तर में ले गया। - और वहाँ बिठाकर एक घण्टा मेरी सारी कहानी सुनी - और वह बहुत खुश हो गया कि एक नौजवान लड़के के अन्दर इतनी आग और इतना जोश और इतनी उत्सुकता व जिज्ञासा (Curiosity) है। उसने मुझे बहुत प्यार से विश्वास दिलाया कि, ‘‘तुम्हें मोटर-गाड़ी बनती हुई सारी फैक्टरी दिखायेंगे - और फ़ोर्ड साहब से भी मिलायेंगे।’’ मैं तो खुश हो गया।
इतनी देर में इन अफ़सर साहब ने घंटी की और स्वागत अधिकारी (Reception Officer) को बुलाया। तुरन्त ही ज़र्क-बर्क पोशाक (Dress) पहने एक महिला (Lady) आई। उनको हुकुम दिया गया कि मुझे हर प्रकार के आराम से अतिथिशाला (Guest House) में ठहरा दिया जाये और मेरे खाने-पीने, कपड़े और गुसल का पूरा प्रबन्ध किया जाये।
मुझे यह महिला आदर के साथ ले गई और एक शानदार कमरे में ठहरा दिया। मेरे पहनने के लिए वहाँ नए कपड़े रखवा दिये - और मेरे खाने के लिए कुछ हुकुम दे दिया। उसी समय एक ट्रे में लगे कुछ फल, चाय, बिस्कुट और मक्खन डबल-रोटी आ गये। मुझे कुछ भूख तो थी नहीं क्योंकि आलू के पराँठे खूब खाये हुए थे। परन्तु थकावट के कारण नींद बहुत आ रही थी। मैंने जल्दी से कुछ खाया और सोने के लिए दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लिया कि जल्दी से पलंग पर लेटूँ और सो जाऊँ।
मैं छोटा था और पलंग कुछ ऊँचा था। मैं थोड़ा उछलकर जब पलंग पर बैठने लगा तो पलंग का मोटा गद्दा एकदम उछला और मैं नीचे आ पड़ा। मैं चकराया कि यह क्या मुसीबत है। हम घर में तो बान की खाट पर आराम से बैठ जाते थे। मैंने फिर दो-तीन बार पलंग पर चढ़ने की कोशिश की और गद्दे को पकड़कर उससे लिपटकर उसके ऊपर चढ़ गया। फिर तो पलंग का गद्दा शांत हो गया और मैं मिनटों-सेकंडों में सो गया।
सवेरे किसी ने घंटी की और मैं चौंककर उठा। दरवाज़ा खोला तो बैरा सवेरे की चाय लेकर आया था। मैंने ट्रे (Tray) लेकर रख ली। और आराम से दो बिस्कुट खाये। एक केला खाया और चाय पी। और फिर सो गया क्योंकि थकावट की नींद अभी पूरी नहीं हुई थी।
घंटा दो घंटा के बाद मैं उठा। नहाया-धोया और नये कपड़े पहनकर तैयार हो गया। इतनी देर में एक अफसर शानदार वर्दी पहने हुए आये और कहने लगे, ‘‘मैं आपको फैक्ट्री में ले चलने के लिए आया हूँ।’’ मैं तैयार तो था ही उनके साथ चल पड़ा।
अब फैक्टरी के पहले विभाग (Department) ने मेरा स्वागत किया और अच्छी तरह से और पूरे विभाग का काम दिखाया। इतनी देर में दोपहर के भोजन (Lunch) का समय हो गया। वह अफसर मुझे डायनिंग-हॉल (Dinning Hall) में ले आया। डाइनिंग-हॉल में सैकड़ों लोग खाने के लिए बैठे थे।
एक महिला (Hostess) ने मुझे एक खाने की मेज़ पर बिठाया और मुझे बहुत आदर व प्रेम से सिखलाने लगीं कि खाना किस तरह से खाया जाता है। रोटी को छुरी से काट लिया जाता है और दूसरे हाथ में काँटा (Fork) रहता है। काँटे से डबल-रोटी का टुकड़ा छुरी की मदद से मुँह में डाला जाता है और इसी तरह सब्जी और सलाद आदि चम्मच और काँटे की मदद से खाये जाते हैं।
उस बेचारी ने समझाया तो अच्छी तरह। परन्तु इसमें तो अभ्यास चाहिए। मैं छुरी पकडूँ तो काँटा गिर जाये काँटा पकडूँ तो चम्मच गिर जाये! मैं तो इन औज़ारों से खा ही न सकूँ। एक समस्या बन गई।
मैं भूखा तो नहीं रह सकता था। जब कोई मेरी तरफ न देख रहा होता मैं एकदम जैसे-तैसे अपना मुँह खाने से भर लेता था। आखिर पंजाबी था। डटकर खाकर ही उठता था। प्रतिदिन यह ही हालत रहती थी। कभी दिखावे के लिये छुरी-काँटे को पकड़ लेता कभी छोड़कर यूँ ही हड़प कर लेता।
खाने के बाद निश्चित समय पर प्रतिदिन कारखाना दिखाने वाला अफसर आकर मुझे ले जाता और आगे से आगे मोटर बनाने के नये विभाग मुझे दिखाये जाते। इतवार को छुट्टी रहती। तो उस दिन मैं कहीं और इधर-उधर रमणीक स्थानों में घूमने चला जाता। अब तो मुझे कुछ चैन, विश्वास व अनुभव हो गया था।
काफी दिन निकल गये। एक दिन मैंने अपने गाइड (Guide) से पूछा कि, ‘‘अभी कितने दिन और लगेंगे?’’ उसने कहा, ‘‘अभी आपने देखा ही क्या है? छोटे-बड़े सैकड़ों विभाग अभी बाकी हैं। पूरा कारखाना देखने में जहाँ तक मोटर तैयार होकर निकलती है, अभी बहुत दिन लगेंगे। धैर्य रखिये।’’
हफ़्तों बीत गये थे। मैं दिन-ब-दिन बेचैन हो रहा था कि कहाँ फँस गया। परन्तु धैर्य के सिवा और चारा भी क्या था। अब तो दो माह से भी अधिक समय हो गया था। दिन-ब-दिन मेरी बेचैनी बढ़ने लगी। किसी दिन तो नये से नया विभाग (Department) देखने में अच्छा लगता था और किसी दिन फ़जूल की बात और निराशा महसूस होती थी और घर की भी याद सताने लगती थी।
समय तो रुकता नहीं। अब मैं लगभग आखिरी विभागों में पहुँच गया था। जहाँ मोटर बनकर उसमें गद्दे लगाये जाते थे और कच्चे रंग (Under-coating) से सारी कार का लोहा ढक दिया जाता था और नीचे पहिये और टायर लगा दिये जाते थे।
अब आखिरी विभाग (Department) में रंग-बिरंगे चमकीले रंग लगाकर मोटर को तैयार किया जाता था। अब तो मोटर बहुत सुन्दर लगने लगती थी जैसे कि नई दुल्हन को सजाया जाता है।
अब आख़िरी दिन आया जिस दिन एक चुस्त (Smart) ड्राइवर बहुत बढ़िया वर्दी पहने हुए और टाई व हैट लगाये हुए मोटर के चक्कर पर बैठ गया और ‘शूँ. . .’ करके मोटर बाहर निकाली और सड़क पर दौड़ाई। यह आज़माने (Test) के लिए कि मोटर ठीक चलती है कि नहीं और उसमें कोई नुक़्स तो नहीं है। मुझे भी उसमें बिठाकर एक लम्बा चक्कर लगवाया। मेरी तबियत खुश हो गई। अब रात को मैं चैन से सोया और सवेरे वही अफसर फिर आये और हँसते-हँसते कहने लगे, ‘‘मुबारक हो। (Congratulations) अब आपका काम पूरा हो गया।’’ मैंने छूटते ही कहा, ‘‘पूरा कैसे हो गया? फोर्ड साहब तो अभी मुझे मिले ही नहीं!’’ वह कहने लगे, ‘‘चिन्ता न करिये। जरूर मिलेंगे। चलिये अब बड़े अफसर के पास ले चलता हूँ जहाँ से आपने यात्रा शुरू की थी।’’
बड़े अफसर के कमरे में पहुँचे तो वह बहुत खुशी के भाव से मुझको मिले और कहने लगे, ‘‘अब आपको फ़ोर्ड साहब से मिलायेंगे। उनसे मिलने के लिए समय माँगा है। अभी आपको सूचना देंगे। आप जाकर अपने कमरे में आराम करें।’’
अब मैं अपने कमरे में चला गया और दुबारा अच्छी तरह से नहा-धोकर तैयार हुआ। जो अच्छे-से-अच्छे कपड़े मेरे पास थे वे मैंने पहने और इतने में ख़बर आई कि, ‘‘चलिये फोर्ड साहब ने आपको बुलाया है।’’
एक नया ही अफसर चुस्त वर्दी में और तमग़े लगाये हुए मुझे फ़ोर्ड साहब के कमरे में ले गया। मैं तो कमरा देखते ही चकित रह गया।
कमरा क्या था एक बहुत बड़ा महल था। चारों तरफ ज़र्क़-बर्क़ पर्दे, शानदार फ़र्नीचर, चारों तरफ फूलों की सजावट. . .क्या वर्णन करूँ ऐसा तो ज़िन्दगी में कभी सोचा ही नहीं था - मेरी आँखें चुँधिया गईं। फ़ोर्ड साहब एक बहुत बड़ी शानदार कुर्सी पर बैठे थे। और उनके सामने बहुत बड़ा चमकता हुआ मेज़ था कि उनके इर्द-गिर्द घूमना भी मुश्किल था। ऐसा नज़ारा तो स्कूल में इतिहास (History) की किताबों में भी राजा-महाराजा मुग़ल बादशाहों का या अंग्रेज़ सम्राटों का भी नहीं पढ़ा था।
फोर्ड साहब अपनी कुर्सी पर से उठकर आये और मुझसे ज़ोरों से हाथ मिलाया और कहने लगे, ‘‘पधारिये (Good morning welcome!)’’
मुझे अपने सामने कुर्सी पर बिठाया और बहुत प्यार से और धीरे-धीरे सब कुछ पूछने लगे। - ‘‘क्या मोटर बनाने का कारख़ाना अच्छी तरह से देखा? खाना-पीना और रहना आराम से मिला? कोई तकलीफ तो नहीं हुई?’’
मैंने कहा - ‘‘बहुत-बहुत धन्यवाद। मुझे तो बहुत अच्छी तरह और आनन्द में रखा गया।’’
अब वे भारत का सारा वृत्तांत पूछने लगे।
वे मुझ से भारत के जुगराफ़िया के बारे में पूछने लगे। वहाँ के लोगों के बारे में, भाषाओं, तौर-तरीकों, रीति-रिवाजों ऋतुओं, त्योहारों-मेलों, फसलों, सभ्यताओं, धर्म, संस्कृति, हुकूमत, ग्राम्य-जीवन खेती-बाड़ी, आवागमन के साधनों, रेलवे आदि कोई विषय न छोड़ा जिस पर उन्होंने मुझ से प्रश्न न किये हों।
आख़िरकार उन्होंने महात्मा गाँधी के विषय में पूछा जो कि भारत में अफ़्रीका से राष्ट्रीय नेता बनकर अभी-अभी आये थे।
यह सन् 1920 का ज़माना था और मैं मुश्किल से सत्रह वर्ष का हुआ हूँगा। इन सवालों के पीछे कोई स्वार्थ या ज़ाती मतलब तो था नहीं। उन्होंने भारतवर्ष के सम्बन्ध में बहुत कुछ सुन रखा था और उनके हृदय में हमारे देश के प्रति बहुत स्नेह व आदर का भाव था। उन्हें इसका भी बहुत ख़्याल हो रहा था कि कितनी छोटी उम्र का यह लड़का अपने प्रश्नों को लेकर उनका उत्तर खोजने यहाँ तक आ गया है। वे बहुत ही प्यार, माधुर्य व कोमलता से मुझे पेश आ रहे थे।
यद्यपि वे सब प्रश्न मेरे ज्ञान व शक्ति से बाहर थे पर मैंने भी हिम्मत न छोड़ी और उस चुनौती को स्वीकार कर लिया। लगता था कि सारा ज्ञान किसी दैवी शक्ति के रूप में ऊपर से उतरने लगा। मैं भारत के पर्वतों, नदियों, वन-जंगलों, जीवन-पद्धति, ऋतुओं, खेती-बारी, तीज-त्यौहार, शिक्षा-सभ्यता, संस्कृति, धर्म, अध्यात्म, साधु-सन्त, तीर्थ, राजनीतिक अवस्था व भारत में अंग्रेज़ी राज्य के बारे में बताता गया - धारा प्रवाह बोलता गया। न मालूम कहाँ से मुझे ज्ञान और शक्ति मिली कि मैं हरेक बात का जवाब अच्छी तरह देता गया।
यह बातचीत तीन-चार घंटे चलती रही। फोर्ड साहब मुझसे बहुत खुश हुए और कहने लगे कि ‘‘यदि ज़िन्दगी का भविष्य यहाँ बनाने की इच्छा हो तो यहाँ तुम्हारे सीखने-सिखाने और परिपूर्ण शिक्षा (All round education) का पूरा प्रबन्ध सब किया जा सकता है।’’
मैंने कहा - ‘‘आपकी बहुत मेहरबानी। आपकी बहुत कृपा। अभी मैं एक बार तो वापस घर जाऊँगा।’’
फ़ोर्ड साहब कहने लगे - ‘‘मैंने भारतवर्ष की बहुत प्रशंसा सुनी है। - और मुझे भारतवर्ष बहुत अच्छा लगता है। मेरी बहुत इच्छा होती है कि कब भगवान् की कृपा हो और मैं भारतवर्ष को देखने जा सकूँ।’’
अब मैंने कहा, ‘‘मैं तो यह समझकर आया था कि आप खटाखटी के औज़ार लेकर स्वयँ मोटर बना रहे होंगे। परन्तु इतने लम्बे समय में मैंने तो आपको किसी विभाग में भी काम करते और मोटर बनाते नहीं देखा। कारखाने में कितने इंजीनियर और सैकड़ों कारीगर तेल से लिप्त कपड़ों में काम कर रहे थे। परन्तु आप तो चमकीले और भड़कीले सूट में शान से यहाँ बैठे हैं। इसका क्या कारण है और क्या भेद है?’’
फ़ोर्ड साहब मुस्कुराने लगे और कहने लगे, ‘‘मेरे कारख़ाने का सब काम जनरल मैनेजर देखते हैं और करते हैं।’’
मैं तो यह सुनकर आग-बबूला हो गया, दोनों हाथ अपने माथे पर मारे और रोने और चिल्लाने के भाव में आ गया। मैंने चीखकर कहा कि, ‘‘तो मुझे इतने लम्बे समय तक क्यों भटकाया और परेशान किया गया? अब मुझे जल्दी से जनरल मैनेजर के पास भेजिये या उनको यहाँ बुला दीजिये ताकि मैं उनसे मिल सकूँ।’’
फ़ोर्ड साहब जोर से हँसने लगे, ‘‘बेटा (My dear son!) जनरल मैनेजर तो यहाँ ही है और हर समय मौजूद रहते हैं।’’
मैंने चिल्लाकर कहा, ‘‘वे कौन हैं और कहाँ हैं?’’
तो फ़ोर्ड साहब फिर हँसकर कहने लगे, ‘‘वह तो स्वयँ भगवान् हैं जो इस सारे संसार को चलाने वाले हैं। तो क्या वे मेरा कारख़ाना नहीं चलाते हैं?’’
यह सुनकर मैं हैरान रह गया और तब से मैंने भी अपने सारे काम के लिए जनरल मैनेजर को नियुक्त कर लिया है।
इतनी देर में मेरी आँख खुल गई और मैंने देखा कि कितनी देर हो गई है। सूरज तो चढ़कर सिर पर आ गया है।