कृष्णा
भगवान की प्राप्ति
यह कहानी गौएँ चरानेवाले एक गूजर लड़के की है, जिसका नाम कृष्णा था।
उस कृष्णा की नहीं, जो वृन्दावन में गौएँ चराया करता था और चोरी कर-करके माखन खाया करता था और फिर कहता था-
‘मैया, मैं नहीं माखन खायो’
और जब मुँह में माखन लगा देख यशोदा मैया डाँटतीं तो फिर कहता -
‘ग्वाल-बाल सब बैर पड़े हैं बरबस मुख लपटायो’
ये सब ग्वाल-बाल तो मेरे दुश्मन हो गये हैं। इन्होंने ज़बरदस्ती मेरे मुँह में माखन लपेट दिया है और झूठमूठ मुझे बदनाम कर रहे हैं। और फिर चोरी कब करता हूँ? भोर में ही तो मुझे गायों के पीछे भेज देती हो और शाम को कहीं लौटता हूँ-
‘भोर भई गइयन के पाछे मधुवन मोहि पठायो
चार पहर बंसीवट भटक्यो, साँझ भई घर आयो।’
उस कृष्णा की कहानी भी यह नहीं है जो गोपियां के साथ रासलीला करता था और उनके घड़े फोड़ दिया करता था तथा बाद में बड़े होने पर वही भगवान् बन बैठे और अर्जुन से कहने लगे-
‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज....’
और फिर जिन्होंने नया युग लाने के लिए हजारों-लाखों को कुरुक्षेत्र के युद्ध में बलि चढ़ा दी।
जिस गूजर लड़के की यह कहानी है वह अनाथ था। उसने अपने माँ-बाप को कभी नहीं देखा। न मालूम कब अनाथ हो गया और कैसे मुहल्लेवालों के आश्रय में पला। कभी खाना भी अच्छी तरह मिला कि नहीं। और दशा यह थी कि संसार में उसका कोई नहीं था- न बहन, न भाई, न चाचा, न ताऊ, न मासड़, न मामा, न फूफा, न नाना, न दादा और न ही कोई ख़ानदानी सहारा था।
कृष्णा ग्यारह-बारह साल की उम्र में एक सम्भ्रांत ज़मीन्दार परिवार में आ गया और उसको बहुत बड़े बाल-बच्चेदार कुटुम्ब में मिला लिया गया तथा उसे सारे कुटुम्ब के जानवरों को चराने का काम दे दिया गया। यह साधारण और सरल लड़का था जिसको कोई घरेलू या सांसारिक लोभ-लालच नहीं था। यह सबेरे नाश्ता करके और दिन का खाना साथ लेकर गौएँ चराने जंगल में चला जाता और साँझ होने पर जब जानवरों को वापस ले आता और उनको ठिकाने-ठिकाने पर पहुँचा देता। रोज़ का यही काम! वह अपने काम को बड़ी मस्ती और कुशलता से करता था।
चरागाह बहुत सुन्दर और रमणीक जंगल में था.....वहाँ एक सुहावनी नदी बहती थी। बड़े-बड़े वृक्ष। कृष्णा बड़े आनन्द से उस रमणीक स्थान पर घूमता, नदी में जितनी बार चाहे स्नान करता, नदी का शीतल-स्वच्छ पानी पीता और एक बड़े वृक्ष के नीचे बैठकर खाना खाता और जब जी चाहे विश्राम करता। उसकी ज़िन्दगी प्रकृति के साथ खेलती आनन्द से व्यतीत हो रही थी।
अब तो कृष्णा बड़ा हो गया अठारह-उन्नीस वर्ष का नवजवान। एक दिन जब वह नदी किनारे गौएँ चरा रहा था कोई ब्राह्मण वहाँ से निकले और उसी वृक्ष के नीचे बैठ गये जिस वृक्ष के नीचे कृष्णा विश्राम किया करता था। कृष्णा ने दूर से बड़ी उत्सुकता और आश्चर्य से देखा। पंडित जी ने झोले में से स्वच्छ धोती निकाली और नदी पर आकर स्नान किया और धोती बदली। पहली धोती अच्छी तरह धोकर वृक्ष के पीछे सूखने डाल दी और आराम से बैठकर आसन लगाकर ध्यान-पूजा और प्राणायाम आदि करने लगे। इस सब पूजा-पाठ में काफ़ी समय लगाया। पूजा-पाठ के पश्चात् थैले में से उन्होंने पका भोजन निकाला जिसमें लड्डू आदि मिठाई भी थी और निश्चिन्त होकर खाया और नदी से लोटे में पानी लाकर ख़ूब पीया। तत्पश्चात् सूख गयी धोती उठायी, तह कर झोले में रखी और उठकर चलने लगे।
कृष्णा यह सब क्रिया ध्यान से देख रहा था और बहुत हैरान हो रहा था; क्योंकि उसने अपने जीवन में कभी ऐसा नहीं देखा था। वह भागता हुआ पंडित जी के पास आया और सम्बोधित करते हुए कहा कि, ‘पंडित जी! मैं एक बात पूछूँ? आप यह सब क्या कर रहे थे?’ पंडित जी ने कहा कि, ‘मैं भगवान् के दर्शन कर रहा था।’
कृष्णा ने पूछा- ‘क्या आपको भगवान् दर्शन भी देता है।’ पंडित जी ने तुरन्त जवाब दिया- ‘हाँ, क्यों नहीं!’
ज्यों ही पंडित जी गये और आँखों से ओझल हुए, कृष्णा ने भी कपड़े उतार नदी में स्नान किया और ठीक उसी प्रकार पंडित जी की नकल शुरू की। युवा तो था ही, और तीक्ष्ण बुद्धिवाला भी था। पंडित जी ने जैसे-जैसे क्रिया की थी-वे सब उसको याद थीं और उसी प्रकार आसन लगा आँखें बन्द कर नाक दबाने लगा और लम्बी साँस लेने लगा- कभी एक तरफ तो कभी दूसरी तरफ। बहुत कठिन तपस्या और परिश्रम किया। बहुत समय तक इसी क्रिया में जुटा रहा परन्तु भगवान् के दर्शन नहीं हुए। बहुत क्रोधित और बेचैन हो गया। बार-बार निश्चय किया कि जबतक भगवान् के दर्शन नहीं होंगे, मैं नाक दबाना नहीं छोडूँगा भले मेरी जान चली जाये। यदि पंडित जी को आधे घण्टे के अन्दर दर्शन हो सकते हैं तो कई घण्टे तपस्या करते हो गये, मुझे भगवान् क्यों नहीं दर्शन देते!
इस निश्चय और तड़प के साथ कृष्णा ने बहुत ज़ोर से नाक दबायी और साँस रोकी। उसका दम घुटने लगा और प्राण छूटने लगे।
यह तड़प और सहज-तीव्र पुकार और भगवान् को पाने की उत्कट अभीप्सा की तरंगें विष्णु भगवान् के दरबार में पहुँचीं। विष्णु भगवान् विश्राम कर रहे थे। लक्ष्मी जी का भी आसन हिलने लगा और वह तुरन्त विष्णु भगवान् के कक्ष में पहुँचीं और पुकारने लगीं - ‘महाराज! आप सो रहे हैं और आपका एक भक्त धरती पर आपके दर्शनों के लिए तड़प रहा है। उसके प्राण छूटे जा रहे हैं। फ़ौरन पहुँचिये। अन्यथा अनर्थ हो जायेगा।’
विष्णु भगवान् शीघ्र ही कृष्णा के सामने उपस्थित हुए और बोले-‘बेटा, आँखें खोल, मैं आ गया हूँ।’ कृष्णा ने जब एकदम आँखें खोलीं तो वह सामने एक दिव्य मूर्ति देखकर हैरान और हक्का-बक्का रह गया। अन्तरात्मा में आनन्द भी झूम रहा था। पूछा कि, ‘आप ही भगवान् हैं?’ ‘हाँ, मैं ही भगवान् हूँ। मुझे ही तो तुम बुला रहे थे। मेरे ही दर्शनों के तो तुम उत्सुक थे।’ भगवान् ने कहाँ
किन्तु कृष्णा को विश्वास न हुआ इसलिए उसने कहा- ‘परन्तु यह कैसे निश्चय हो और क्या प्रमाण है कि आप ही भगवान् हैं?- ज़रा ठहरिये, मैं अभी पंडित जी को बुलाकर लाता हूँ। वे आपको जानते हैं और वे रोज़ आपके दर्शन करते हैं’ भागा वह पंडित जी को बुलाने परन्तु दस क़दम भागकर फिर वापस आ गया और भगवान् से बोला- ‘पंडित जी तो दूर निकल गये होंगे, मुझे बुलाकर लाने में काफ़ी देर लगेगी। तब तक आप क्या यहाँ रुकेंगे?’ भगवान् ने कहा- ‘निश्चय, मैं यहीं खड़ा रहूँगा जब तक तुम वापस नहीं आ जाओ।’
कृष्णा का सन्देह फिर भी बना रहा। बोला-‘आपका क्या भरोसा। पहले ही आपने मुझे घण्टों परेशान किया और आने में इतनी देर लगायी। मैं पंडित जी को बुलाने जाऊँ और आप भाग जायें तो- मुझे विश्वास नहीं होता। आप जरा ठहरिये। मैं पक्का प्रबन्ध करके जाता हूँ।’ कृष्णा भागा-दौड़ा और अपनी गायों के रस्से खोल लाया और भगवान् को पकड़कर उसी बड़े पेड़ के तने के साथ खूब कसकर बाँध दिया। रस्सों के कई चक्कर लगाये और कसकर कई गाँठें लगायीं। और कहने लगा- ‘अब मैं पंडित जी को बुलाकर लाता हूँ। पंडित जी ने कह दिया कि आप ही भगवान् हैं तो फिर मैं आपको खोल दूँगा। आप घबराइये नहीं।’
भागता हुआ गया और कई मील जाकर पंडित को पकड़ा और कहा कि, ‘भगवान् आये हुए हैं और मैं उनको पेड़ के साथ बाँध आया हूँ। कृपया आप चलिये और देखिये कि सचमुच वही भगवान् हैं या कोई झूठा-फ़रेबी आ गया है।’
पंडित जी यह सब सुनकर हैरान हो गये और बहुत डरे, परन्तु नौजवान कृष्णा का ऐसा निश्चय देखकर कोई हील-हुज्जत न कर सके क्योंकि वह निश्चय ही उन्हें ले जाने पर तुला हुआ था। यदि न जाते तो नौजवान के हाथ पिट जाते। बहुत बेबस होकर चल पड़े और उसी स्थान पर पहुँचे।
अब कृष्णा ने पंडित जी से पूछा- ‘देखिये, ये जो पेड़ के साथ बँधे हुए हैं- ये कहते हैं कि मैं ही भगवान् हूँ। क्या सचमुच में यही भगवान् रोज़ आपको दर्शन देते हैं?’ परन्तु पंडित जी को रस्सियों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था तो भी डर के मारे पंडित जी ने कह दिया कि ‘हाँ, यही भगवान् हैं।’ तब कृष्णा ने भगवान् को खोल दिया और उनके चरण छुए। भगवान् ने सिर पर हाथ रखते हुए आशीर्वाद दिया और पूछा- ‘तुम्हें क्या चाहिये?’ कृष्णा हैरान हुआ और कहने लगा, ‘मुझे तो कुछ भी नहीं चाहिये। पंडित जी को जब आप रोज़ दर्शन देते हैं तो उनको क्या कुछ देकर जाते हैं-क्या देते हैं?’
भगवान् ने कहा- ‘मैंने तो आज तक इस पंडित को कभी दर्शन नहीं दिये। वह महा झूठा है। सामने खड़ा है परन्तु मुझे नहीं देख सकता। वह तो सांसारिक, फ़रेबी और मोह-माया में फँसा हुआ है। वह तो सब लोगों को धोखा देकर अपना स्वार्थ पूरा करता है। मैं उसको दर्शन नहीं दे सकता। तुमने चूँकि मुझे सहज भाव से पुकारा है इसलिए मैं बैकुण्ठ से उतरकर तुम्हें दर्शन देने आया हूँ। माँगों, तुम्हें जो कुछ चाहिये अथवा मैं अब वापस जाता हूँ।’
कृष्णा ने कहा- ‘मेरी माँग यह है कि आप इन पंडित जी को भी दर्शन दीजिये क्योंकि इन्हीं के कारण मुझे आपके दर्शन हुए हैं।’ भगवान् ने कहा- ‘यह नहीं हो सकता। पंडित जी मेरे दर्शन के योग्य और अधिकारी नहीं हैं।’
कृष्णा ने कहा- ‘आप कहते हैं कि आप भगवान् हैं परन्तु महा-झूठे हैं। अभी तो आपने मुझसे वायदा किया कि जो माँगोगे दूँगा और अब अपने वचन से पीछे हट रहे हैं।’
भगवान् पकड़े गये और मज़बूर हो गये और पंडित जी को भी दिखाई देने लगे। पंडित जी चकित रह गये और हतचेत हो भगवान् के चरणों में गिर पड़े। कुछ ही क्षणों में भगवान् ग़ायब हो गये।
अब कृष्णा और पंडित जी के बीच झगड़ा शुरू हो गया। पंडित जी कृष्णा के पाँव पर गिरने लगे और कहने लगे कि, ‘तुम मेरे गुरु हो, तुमने मुझे भगवान् के दर्शन करवाये।’ उधर कृष्णा कहता कि, ‘पंडित जी! आप मेरे गुरु हैं, आपके ही कारण मुझे भगवान् के दर्शन हुए हैं।’ बार-बार एक-दूसरे के ऊपर-नीचे होकर झगड़ा ख़त्म हुआ और गले मिले। कृष्णा कहने लगा-‘आप मेरे गुरु।’ और पंडित जी कहने लगे- ‘तुम मेरे गुरु।’ दोनों एक-दूसरे के गुरु हो गये तत्पश्चात् दोनों पेड़ के नीचे आराम से बैठे और कुछ देर विश्राम किया।
कुछ समय के बाद उठे और सहज भाव में दोनों ने सारी आयु इकट्ठा रहने का निश्चय किया। पंडित जी ने कहा कि, ‘जो कुकर्म मैं करता था मैंने इसी क्षण से सब छोड़ दिया।’ और कृष्णा से कहा कि, ‘तुम भी अपना गायें चराने का काम छोड़ दो और इन्हें मालिक के घर छोड़ आओ। दोनों आज से साधु हो जाते हैं और संन्यास लेते हैं और सारी आयु केवल भगवान् का भजन करेंगे और कुछ नहीं करेंगे।’
ऐसा निश्चय कर दोनों गंगातट पर कुटिया बनाकर रहने लगे और धूनी रमाने लगे और दिन-रात भगवान् का भजन करने लगे।
सच्चे भक्त सहज भाव से तो बन ही गये थे। उनकी बहुत पूजा होने लगी और उनके भजन-कीर्तन से हज़ारों लाखों लोगों को लाभ होने लगा।