मधुर कहानियाँ
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चैन और शान्ति


(राजा का कर्त्तव्य)

कहाँ गयी? भारत सर्वदा चैन और शान्ति का देश था। अब कहीं ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलती। ऐसी स्थिति बना दी गयी है कि सत्य और सरलता से कुछ भी प्राप्त न हो सके। चारों तरफ घोर अन्धेर और अन्धकार।

भारतीय एक ऐसी कौम थी जिसके हर प्रान्त के लोगों में तरह-तरह की भरसक पहल करने का उत्साह और जीवट था और अपना व्यवसाय वे स्वयँ ढूंढ़ते थे। भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि दूर-दराज़ के देशों में भी। अब व्यवसाय के लिए भी प्रशासन से पुकार की जाती है। यदि ऐसी हालत कुछ वर्षों तक चली तो चैन और शान्ति तो गयी ही, उसके साथ उत्साह और साहसिकता (initiative & adventure) भी पूर्णतः समाप्त हो जायेगी और क़ौम युग-युगान्तर तक के लिए निष्प्राण हो जायेगी।

पहले के भारतवर्ष में राजा का काम केवल प्रजा का हित देखना ही नहीं बल्कि प्रजा का आचार-व्यवहार निर्माण करना भी था और आचार-व्यवहार से ही प्रशासन चलता था। इस युग में प्रजा का आचार-व्यवहार बनाना तो कहाँ, ऐसे हालात बना दिये गये हैं कि आचार-विचार बन ही न सके। शासक प्रजा पर लांछन लगा रहे हैं तथा प्रजा शासकों पर कीचड़ उछाल रही है। हे भगवान्! क्या यह तेरा राज्य है। भारत के शासन में तेरा तो कहीं नाम भी सुनने में नहीं आता। शायद मना है!

शासन जब तक साधु-सन्तों के हाथों में नहीं होगा, जिनकी कोई आवश्यकता न हो, कोई इच्छा न हो, किसी प्रकार का अहंकार न हो- तब तक न प्रजा का आचार-व्यवहार बन सकता है और न ही सुख, चैन और शांति प्राप्त हो सकती है, जैसा कि राजा जनक के समय में था।

राजा अशोक के समय की एक कहानी है। सम्राट अशोक बराबर इस चिन्ता और चेष्टा में रहते कि उनकी प्रजा कैसे अधिक-से-अधिक सुख-शान्ति से रहे तथा उसका आचार-व्यवहार ठीक बना रहे और बिगड़े नहीं। समय-समय पर वे भाँति-भाँति के वेश बदलकर प्रजा के आचरण को परखने के लिए जाते थे।

एक अँधेरी रात में वे अपनी राजधानी पाटलिपुत्र नगर की गलियों में घूमने निकल पड़े। विचार यह था कि प्रजा में कहीं दुख-दर्द तो नहीं है और कोई कष्ट में रो-धो तो नहीं रहा है, कोई चोरी-चकारी से किसी को सता तो नहीं रहा है। ऐसा सोचते ही अपना वेश भी वैसे ही बदल लिया और एक थैले में ताले तोड़ने तथा सेंध लगाने का पूरा सामान भर लिया और कन्धे पर लटका लिया।

एक अन्धेरी गली में कुछ लोग छिप कर चुपके-चुपके बातें करते सुनायी दिये। ये झट उनके पास पहुँच गये और उन्हें चौंका दिया। जब उन लोगों ने इनके कन्धें पर थैला देखा तब वे लोग हँसने लगे और पूछा- ‘तुम्हारे थैले में क्या है?’, अशोक ने झट खोलकर दिखा दिया। अरे! इसके पास तो हम सब लोगों से भी अच्छे चोरी के औज़ार हैं।’ सम्राट ने पूछा- ‘तो क्या आप लोग भी चोर हैं और आपके पास भी ऐसा ही सामान है?’ सबने खुशी-खुशी अपने थैले दिखा दिये।

परन्तु पूछा कि, ‘आप अकेले कैसे हैं?’ वे कहने लगे- ‘‘मैं तो हमेशा अकेले ही ऐसे काम के लिए जाता हूँ और भगवान् मेरे साथी होते हैं और वे ही मुझे रास्ता दिखाते हैं कि कहाँ चोरी करनी है।’

‘अरे!’ सब एक साथ बोले- ‘तब तो हमें इनको साथी बनाना चाहिये।’ अब एक-एक करके वे अपने प्रबल गुण बतलाने लगे। एक ने कहा कि, ‘मैं मज़बूत-से-मज़बूत लोहे की तिजोरी को क्षणों में तोड़ने में माहिर हूँ।’ दूसरे ने कहा कि, ‘मैं कुत्ते के भौंकने से पहचान सकता हूँ कि कौन से मकान में अधिक धन-दौलत रखी है।’ तीसरे ने कहा- ‘दबे और गड़े धन की जगह पहचान सकता हूँ।’ चौथे ने कहा- ‘मैं अन्धेरी रात में देखे हुए लोगों को दिन में पहचान सकता हूँ।’

फिर चारों एक आवाज़ से कहने लगे कि ‘आज तो हमारा ध्येय बड़े सेठ के घर में ही चोरी करने का है।’ उन्होंने पाँचवें चोर से पूछा- ‘आप में क्या विशेषता है?’ उसने कहा- ‘जो विशेषताएँ आपने वर्णन की हैं वे सब तो मुझमें हैं ही और एक ऐसी विशेषता है कि भगवान् न करे यदि आप पकड़े भी जायें तो आपको छुड़ा सकता हूँ।’

सब हैरान हुए। यह कैसे? ऐसे गुणी के साथ होने से तो बेधड़क और निश्चिन्त रहेंगे।

अब पहुँचे पाँचों नगर-सेठ के घर की ओर और अपने-अपने गुण के अनुसार चोरी का काम शुरू कर दिया बेधड़क और बेफ़िक्र होकर। इसी बीच राजा ने खबर देकर अपने पहरेदारों को बुलवा लिया। पहरेदारों ने घेर लिया और पकड़ लिया। परन्तु जब जेल की कोठरी में पहुँचे तो देखा पाँचवाँ साथी तो गायब है। बहुत चिन्ताग्रस्त हो गये।

कुछ ही दिनों में दरबार में पेश किये गये और रँगे हाथों तो पकड़े ही गये थे, कड़ी-से-कड़ी सज़ा सुना दी गयी।

जो चोर रात में देखे हुए को दिन में पहचान लेता था, उसने चौंककर सम्राट को कहा- ‘आप भी तो हमारे साथ थे। तो इतनी कड़ी सज़ा में भी आप हमारे साथ होंगे।’

‘और हाँ याद आया कि आपने तो कहा था कि आप हमें पकड़े जाने पर भी छुड़ा सकते हैं। उस वचन का क्या हुआ?’

सम्राट कहने लगे- ‘हाँ, मैं आपके साथ भी हूँगा और आपको छुड़ा भी सकता हूँ परन्तु एक शर्त है कि आप लोग आज के दिन प्रण करें कि फिर सारी आयु ऐसा घृणित कार्य कभी नहीं करेंगे। वे लोग ख़ुशी से मान गये।’

इस तरह से राजा अपनी प्रजा का आचरण सुधारते थे। लेकिन आजकल....