तीन प्रश्न
गया ज़माना राजाओं, महाराजाओं, नवाबों और बादशाहों का। उस ज़माने में कुंवर दिल बहादुर सिंह मगध के महाराजा थे। वे बहुत प्रभावशाली और ज़िन्दादिल व्यक्ति थे। वे अपने राज्य को अनेकानेक उत्साह और उल्लासपूर्ण गतिविधियों से आनन्दित रखते थे। उनके राज्य में हर समय उत्सव और मेला-सा लगा रहता था।
उनके दरबार में हर क्षेत्र के और हर चमत्कार के असाधारण प्रतिभाशाली सैकड़ों रत्न रहते थे। महाराजा को शौक़ था कि कोई भी ऐसा क्षेत्र न हो जिसके माहिर व्यक्ति उनके दरबार में न हों-संगीतज्ञ, नर्तक, कलाकार, नाटककार, कथाकार, ज्योतिषी, हस्तरेखाविद् (Palmists) वैज्ञानिक, डॉक्टर, हक़ीम, अभियन्ता (Engineers) वास्तुकलाविद् (Architects) शिक्षाविद् ज्ञानी, पंडित आदि सभी उनके दरबार में थे।
इन हर क्षेत्र के रत्नों को महाराजा बहुत प्रेम और आदर से रखते थे और उनकी सुख-सुविधाओं का पूरा ध्यान और प्रबन्ध रखते थे। उनकी यह इच्छा रहती थी कि उनके दरबारी हर तरह से सन्तुष्ट और आनन्द में रहें।
महाराजा के दरबार में एक समय एक प्रभावशाली व्यक्तित्व का भद्रपुरुष आया और उसने महाराजा से अपने दरबार में रखने के लिए प्रार्थना की। उसने बताया कि मैं पंडित, ज्ञानवान् और दूरद्रष्टा हूँ और महाराजा के प्रतिष्ठित दरबार की शोभा में अपना योगदान देकर उसे और भी समृद्ध बनाने की चेष्टा करूँगा।
उसने अपने को प्रभात गिरि का वासी- सत्य चैतन्य गिरि- अपना नाम बताया। महाराजा इनके प्रभावशाली व्यक्तित्व को देखकर बहुत प्रसन्न हुए और उनको अपने दरबार में स्वीकार कर लिया।
महीनों और सालों बीत गये। सत्य चैतन्य गिरि बिना किसी चिन्ता और उत्तरदायित्व के आनन्द और विलास में रहते रहे और दरबार का कोई काम उनके ज़िम्मे नहीं लगाया गया और न उनको बताया गया। ऐसा प्रतीत होता था कि महाराजा भी भूल गये और उन्होंने सत्य चैतन्य गिरि को कभी दरबार में नहीं बुलाया।
दूसरे सैकड़ों दरबारी अपने-अपने क्षेत्र में हर समय व्यस्त रहते थे और उन्हें अपने आपको अभ्यस्त और क्रियाशील रखने के लिए बहुत कठिन परिश्रम करना पड़ता था; क्योंकि महाराजा उनमें से किसी को कभी भी उनके कौशल और निपुणता-प्रदर्शन के लिए बुला सकते थे।
सब दरबारियों को सत्य चैतन्य गिरि के मुफ़्त में और बिना किसी काम के खाते हुए और विलास में रहते हुए देखकर बहुत ईर्ष्या और क्रोध होता था और वे लोग हर समय यही बातें करते रहते थे कि न मालूम महाराजा इस व्यक्ति को क्यों रखे हुए हैं। एक दिन ऐसा समय आया कि सब लोगों ने मिलकर महाराजा को चेतावनी दी कि इस दरबार में ऐसे आलसी और अकर्मण्य मनुष्य को क्यों स्थान दिया गया है और क्यों रखा जा रहा है। महाराजा चेते और उनको सत्य चैतन्य गिरि के आने के समय की याद आयी और महसूस किया कि बात तो सच्ची है। इस व्यक्ति ने दरबार में कभी योगदान ही नहीं किया और न कभी आकर पूछा कि उनके योग्य कोई काम है या नहीं। इस विचार में महाराजा को कुछ क्रोध भी हुआ और उन्होंने तुरन्त सत्य चैतन्य गिरि को दरबार में बुला भेजा और इस अवस्था का कारण पूछा। चैतन्य गिरि घबरा गये और उन्हें कुछ कहते न बना। इस पर दरबार ने कहा कि तुमने जो अपना योग्यता-पत्र प्रस्तुत किया था उसके अनुसार कभी योग्यता दिखायी नहीं और न उसका कोई प्रमाण ही दिया। अब मैं तुमसे तीन प्रश्न पूछता हूँ- यदि मुझे उनका संतोषजनक उत्तर न मिला तो तुम्हें फाँसी अथवा आजीवन कारावास की सज़ा दे दी जायेगी। वे प्रश्न हैं-
1. भगवान् हैं, तो कहाँ रहते हैं?
2. भगवान् ब्रह्माण्ड को सब ओर से कैसे देखते हैं?
3. भगवान् क्या काम करते हैं?
इन प्रश्नों को सुनकर चैतन्य गिरि विचलित हो गये, घबरा गये और उलझन में पड़ गये तथा हताश होकर महाराजा से प्रार्थना की, कि मुझे पन्द्रह दिन का समय दिया जाये जिससे तैयारी करके इन प्रश्नों का उत्तर दे सकूँ। प्रार्थना स्वीकार कर ली गयी।
अब सत्य चैतन्य गिरि ने तमाम धर्मग्रन्थ और शास्त्र और ज्ञान की पुस्तकें उलट-पुलट कर डालीं परन्तु कहीं किसी पुस्तक के किसी पन्ने पर भी इन प्रश्नों के उत्तर का संकेत नहीं मिला। वे बहुत घबराये और दिन-रात निराशा में डूबते चले गये, भूख बन्द हो गयी, खाना-पीना हराम हो गया, सूखते चले गये और हड्डियाँ निकल आयीं। उनका सेवक सीताराम उनकी दशा देख-देखकर चिन्तित होता था परन्तु कुछ कर नहीं पाता था। एक दिन सीताराम ने हिम्मत की और पूछा-‘भगवन्, आपकी इस दशा का क्या कारण है। मैं छोटा हूँ, सेवक हूँ, यद्यपि अल्प-बुद्धि हूँ तो भी मैं आपका हितचिन्तक तो हूँ। मुझे आपको स्पष्ट रूप में अपनी इस दशा का कारण बतला देना चाहिये और बतलाना ही होगा। मैं इस दशा को और सहन नहीं कर सकता। चाहे मैं अज्ञानी हूँ, तो भी हो सकता है, मैं आपका कष्ट निवारण कर सकूँ।’
सत्य चैतन्य गिर ने कहा- ‘प्रिय सेवक, समस्या बहुत जटिल है। जब मैं ही उसका समाधान नहीं ढूंढ पा रहा हूँ तो तुम क्या कर सकोगे। फिर भी मैं अन्तिम समय तुम्हें अपनी जटिल समस्या का पूरा विवरण दे रहा हूँ ताकि तुम्हारा दर्द और बोझ कुछ कम हो।’
सीताराम ने सारा विवरण सुनते ही तत्काल कहा-‘भगवन्! यह तो कोई समस्या ही नहीं है। मैं महाराजा के पास जाता हूँ, आपकी अनुपस्थिति का कारण भी ढूंढ लूँगा और महाराजा के प्रश्नों का उत्तर भी दे लूँगा।’ सत्य चैतन्य गिरि को तनिक भर भी विश्वास नहीं हुआ परन्तु वह कर ही क्या सकता था! और अपने सेवक को रोक भी कैसे सकता था!
निश्चित समय पर सेवक सीताराम दरबार में पूरे निश्चय और आत्मविश्वास के साथ पेश हुआ और महाराजा को विनय और नम्रता के साथ सम्बोधित करते हुए बतलाया कि, ‘मेरे स्वामी अटूट समाधि में हैं और भगवान् में लीन हैं। मुझे ज्ञात है कि उनको आपके तीन प्रश्नों का उत्तर देना है परन्तु मैं उनकी समाधि को भंग नहीं कर सका। इसलिए आशावान होकर आपके दरबार में उपस्थित हुआ हूँ और विनयपूर्वक प्रार्थना करता हूँ कि आप मेरे स्वामी की अनुपस्थिति को क्षमा करें। आपके प्रश्नों का उत्तर मैं दूंगा।’
महाराजा पहले तो क्रोध में आये परन्तु, तुरन्त बाद आकस्मिक प्रेरणा हुई कि इसमें दोष भी क्या है, चाहे यह प्राणी अज्ञानी है, उसको प्रश्नों का उत्तर देने की आज्ञा देने में दरबार का क्या बिगड़ता है! महाराजा ने सीताराम को प्रश्नों का उत्तर देने की आज्ञा दे दी।
अब तो सीताराम का व्यक्तित्व आकाश पर चढ़ गया और महाराजा से कहने लगा- ‘भगवन् आप तो राज्य के महाराजा हैं, प्रमुख हैं और हर प्रकार से श्रेष्ठ हैं परन्तु इस समय आप प्रश्नकर्ता हैं, जिज्ञासु हैं, याचक हैं और भगवान् के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं और मैं इस समय आपके प्रश्नों का उत्तर देनेवाला हूँ और आपको भगवान् का ज्ञान देनेवाला हूँ। अतः आपका गुरु हूँ। आपको यह यथार्थ स्थिति स्वीकार करनी चाहिये और उसका आदर और मान करना चाहिये। ऐसी दशा में आपको सिंहासन से नीचे उतर कर प्रश्नार्थी के रूप में खड़ा होना चाहिये और मुझे गुरु मानकर सिंहासन पर बैठाना चाहिये; तभी इस स्थिति का औचित्य सिद्ध हो सकता है।’
महाराजा एकदम घबरा गये और चकित रह गये। परन्तु उनको बात ठीक, सच्ची और उचित लगी। अतः उन्होंने बात मान ली। और दरबार और प्रश्न पूछने का दिन तथा मुहूर्त्त निश्चित कर दिया गया।
इस अद्भुत और आश्चर्यजनक दरबार की चर्चा सारे राज्य में और सारे राज्य के समाचार-पत्रों में फैल गयी। राज्य के सब ज्ञानी, प्रमुख व्यक्ति, शिक्षाविद्, पत्रकार, वकील, विद्वान और पंडित दरबार में उपस्थित थे और दरबार-हॉल खचाखच भरा था। कोई कोना ख़ाली नहीं था यहाँ तक कि कई लोगों को अन्दर आने का रास्ता और कोई स्थान भी नहीं मिला। बाहर खुले में भी हज़ारों लोग खड़े थे और उनके लिए भी दरबार की कार्यवाही सुनने का प्रबन्ध कर दिया गया। सारी प्रजा इस अद्भुत नाटक और अपने महाराज की ऐसी स्थिति देखकर चकित रह गयी और आगे आनेवाले नाटक के दृश्य की प्रतीक्षा करने लगी।
महाराजा के आदेश के अनुसार सेवक सीताराम को मंच के ऊपर ले जाया गया और सिंहासनासीन करा दिया गया। सारे दरबार में सन्नाटा छा गया।
सेवक सीताराम ने शान, निर्भयता और स्थिरता से महाराजा को अपने प्रश्न पूछने के लिए संकेत किया।
महाराजा कष्ट, व्यथा, दुर्गति और संकट में तो थे ही, परन्तु बेबस और लाचार थे। उन्होंने पहला प्रश्न पूछा, ‘भगवान् कहाँ विराजमान हैं?’
सीताराम ने दृढ़ता से परन्तु मधुरता और प्रेम से कहा - ‘लबालब भरा दूध का एक प्याला मंगवाइये’ जो कि तुरन्त आ गया। सीताराम ने महाराजा को सम्बोधित करते हुए कहा कि, ‘बतलाइये कि इस दूध में मक्खन और घी कहाँ है और दिखायी देता है कि नहीं। महाराजा ने जवाब दिया कि, ‘मक्खन और घी दूध के अन्दर है परन्तु दिखायी नहीं देता।’ सीताराम ने तत्काल कहा - ‘ठीक! इसी प्रकार भगवान् इस सृष्टि में हैं और कण-कण में हैं और हम सब में हैं परन्तु दिखायी नहीं देते। जैसे परिश्रम करके दूध का मन्थन करके इसमें से मक्खन और घी को प्रत्यक्ष कर लिया जाता है, उसी प्रकार भगवान् को ढूंढनेवाले आत्ममंथन करके भगवान् को साक्षात् और प्रत्यक्ष कर लेते हैं और भगवान् के रहने का स्थान पा लेते हैं।’ यह उत्तर सुनकर महाराजा चकित रह गये, सन्तुष्ट हो गये और प्रसन्न हो गये।
अब सीताराम ने संकेत किया - ‘हे सत्य के जिज्ञासु महाराजा, अब आप अपना दूसरा प्रश्न पूछिये?’
महाराजा ने कहा- ‘भगवान् ब्रह्माण्ड को सब ओर कैसे देखते हैं?’
उसी गंभीरता और स्थिरता की मनःस्थिति में सीताराम ने कहा- ‘आप एक मोटी मोमबत्ती मंगवाइये और उसे प्रज्वलित कीजिये!’ जो कि तुरन्त आ गयी और महाराजा ने उसे प्रज्वलित भी कर दी। तब सीताराम ने फिर पूछा- ‘हे सत्य के अन्वेषी, साधक महाराजा! बतलाइये कि इस मोमबत्ती की ज्योति किस ओर पड़ रही है?’ महाराजा ने तुरन्त उत्तर दिया - ‘‘चारों ओर।’’ सीताराम ने फिर कहा - ‘हाँ ठीक! इसी प्रकार भगवान् सृष्टि का संचालन चारों ओर देखकर कर रहे हैं।’
महाराजा दूसरा उत्तर पाकर भी बहुत खुश हुए और उनकी प्रसन्नता की कोई हद न रही।
अन्त में महाराजा ने उमंग और उत्सुकता से तीसरा प्रश्न पूछा- ‘‘भगवान् करते क्या हैं?’’
यह तीसरा प्रश्न सुनते ही सीताराम खिलखिलाकर हँस पड़े और सिंहासन पर उछलने लगे और कहा - ‘क्या अब तक आपको इस प्रश्न के उत्तर का साक्षात् अनुभव नहीं हुआ? भगवान् जब जी चाहे किसी को ऊँचे स्थान से नीचे उतार देते हैं और नीचे से किसी को सिंहासन पर बिठा देते हैं। भगवान् का यही काम है।’
यह सुनकर और नाटक का चरमोत्कर्ष देखकर सारा दरबार चकित रह गया और विस्मय और खुशी से झम उठा। और सारे दरबार में हैरानगी छा गयी।
महाराजा का सिंहासन बना तो रहा ही, प्रतिष्ठा और यश से और भी सुदृढ़ और समृद्ध हो गया। सीताराम को महाराजा की ओर से दरबार में दरबारी के पद से पुरस्कृत कर दिया गया और सीताराम के स्वामी, मालिक, आका को दरबार में सर्वोच्च पद से विभूषित कर दिया गया क्योंकि महाराजा ने विचार किया कि जिस ज्ञानी का सेवक इतना निपुण और विद्वान हो सकता है तो उसके स्वामी के ज्ञान की ऊँचाई और सामर्थ्य क्या होगी!
सत्य चैतन्य गिरि को जब पूरी घटना का ब्योरा मिला तो उसके दम में दम आया। हड्डियों पर मांस चढ़ना शुरू हो गया और कुछ ही दिनों में चेहरे पर सुन्दरता और लाली लौट आयी। और अत्यन्त गहरी बात तो यह थी कि दोनों सेवक और स्वामी की ही भावना में रहने लगे।
सत्य चैतन्य गिरि के जीवन का रूप, दृष्टिकोण और गतिविधि ही बदल गयी। उनके जीवन में आग भर गयी और तब से केवल दरबार के ही नहीं, समस्त राज्य के प्रजा के हितकारी और उनकी सुख-समृद्धि के मार्गदर्शक बन गये। और भगवान् की ओर से उनके अन्दर इस महान कार्य के लिए नयी चेतना, शक्ति, और क्षमता आ गयी।