चाचा जी की आत्मकथा
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व्यक्तिगत सत्याग्रह


सन् 1940 में महात्मा गाँधीजी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह की घोषणा कर भारत की जनता का स्वाधीनता यज्ञ में आत्माहुति देने का आवाह्न किया। पर मैं तो इस बार भी जेल न जा पाया। मैं गंभीर रूप से रोग-ग्रस्त हो गया था और सूखकर हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया था। परन्तु मैं अपने देश के लिये आन्दोलन में भाग लेने की अदम्य इच्छा को अपनी शारीरिक विवशता के चलते भी रोक नहीं सका। सो मैंने अपना आवेदन-पत्र फार्म भरकर, प्रॉविन्शियल (प्रदेश) कांग्रेस कमेटी के पास उनकी अनुमति के लिये भेज दिया। इसी दौरान मैंने श्री मुरारी लाल पाराशर जी को अपने बच्चों की शिक्षा के लिये ट्यूटर, बतौर शिक्षक के नियुक्त कर लिया था। वे, आज जहाँ श्रीअरविन्द आश्रम की दिल्ली शाखा है, वहाँ उसी स्थान पर एक कुटिया में निवास करते थे। मैं भी वहीं पर स्वास्थ्य-लाभ कर रहा था और पाराशर जी मेरी देखभाल करते थे। वे मुझे बार-बार समझाते कि मैं जेल जाने का अपना इरादा- अपना विचार छोड़ दूँ। मेरा इस बारे में एक ही जबाब थाः “हरेक को एक बार तो मरना ही है। तो जिस समय देश की पुकार है- आवश्यकता है उस समय क्यों न जीवन का विसर्जन किया जाय? यदि मेरी मृत्यु होनी है तो मैं यहाँ पर भी मरूँगा। अब यदि मैं जेल चला जाऊँ और वहाँ पर जाकर मर जाऊँ तो वह कहीं बेहतर होगा और अभिनन्दनीय और सुखद भी।”

तो भी वे तो पीछा छोड़ ही नहीं रहे थे बल्कि और अधिक सख्ती से अपनी बात पर अड़कर निरन्तर धुन पकड़कर मुझ पर जोर डाले जा रहे थे कि इस अवस्था में मुझे किसी भी क़ीमत पर जेल नहीं जाना है। यहाँ तक कि वह, जिन्होंने कभी भी काँग्रेस पार्टी या देश के किसी आन्दोलन में कभी भाग नहीं लिया था, कभी उसके लिये प्रेरित नहीं हुए, आगे नहीं आये वही अब सत्याग्रह करने के लिये स्वयं को प्रस्तुत करने लगे। कहने लगेः “भई यह तो व्यक्तिगत सत्याग्रह है न। चलिए आपके स्थान पर आपके बदले मैं ही जेल चला जाता हूँ।” और उन्होंने अपने को ‘व्यक्तिगत सत्याग्रही’ के तौर पर प्रस्तुत कर दिया। उन्होंने आवेदन-पत्र लिया, भरा और उसे लेकर कॉग्रेस के दफ़्तर में जमा करा भी आए और व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए स्वयंसेवक के तौर पर अपने को पेश भी कर दिया।

उनको एक वर्ष के कारावास की सज़ा सुनाई गयी और उन्हें रावलपिण्डी जेल में भेज दिया गया।’

यह उनका परस्पर स्नेह व मुक्त प्रशंसा का सहज संबंध था कि पाराशर जी को मानों चाचाजी की प्राण-रक्षा हेतु ही और कोई विकल्प न पाकर स्वयं को ही उस आग में झोंकना पड़ा देखें तो तब जाकर उनकी इस भागवत कर्म के यंत्र के रूप में रक्षा हो पायी। जिसको हम आज श्रीअरविन्द आश्रम दिल्ली शाखा के नाम से पहचानते हैं।

पूज्य चाचाजी बतलाते थे कि इधर सूचना मिली कि पाराशर जी ने गिरफ्तारी दे दी है और फिर एक साल की जेल हुई है वह भी रावलपिण्डी में। तो जहाँ वे उनके लिये बेचैन हुए कि कहाँ तो ‘हाईली इंटेलैक्चूअल’ - बुद्धिजीवी पाराशर जी और कहाँ वह जेल का जीवन वह भी रावलपिण्डी का-सख्त गर्मी- सख्त सर्दी की चुनौती से भरा। क्या तो उन्हें खाने-पीने को मिलेगा। पर उसमें भी प्रभु का वरदान था कि चाचाजी की बड़ी वाली बहन श्रीमती धनवन्ती जी की ससुराल रावलपिण्डी में थी और उनके व्यापारिक सहयोगी- बिजनेस पार्टनर श्री कन्हैयालाल जी पु०ज की पत्नी श्रीमती दयावती पु०ज जो पूज्य चाचाजी की मुँहबोली बहन थीं उनका पीहर भी रावलपिण्डी ही था। उन दोनों का व उनके परिवारों का भी पूज्य चाचाजी पर असीम श्रद्धा व प्रेम था। जब चाचाजी से उनको मालूम हुआ कि श्री पाराशर जी तो पूज्य चाचाजी की जान बचाने के लिये उनके बदले में जेल आये हैं और उनके परिवार के शिक्षक ही नहीं एक अंग हैं तो वे लोग भाव-विह्वल हो उठे और जब तक कि वे जेल में रहे उनकी न केवल चाचाजी की भाँति बल्कि कृतज्ञता-स्वरूप उससे भी अधिक आदर- मान-सम्मान पूर्वक सार-संभाल करते रहे। फल-फूल-मेवा-भोजन आदि सब प्रकार की भेंट- सेवा खुशी-खुशी करते रहे। पाराशर जी बड़ी आनन्दमयी भाव-मुद्रा में उस समय की इफ़रात का वर्णन किया करते थे कि इतना सामान खाने-पीने का आता रहता था कि वे अकेले खा भी न पाते थे। जेल के साथी कैदियों को आकर उसे ठिकाना लगाना पड़ता था।

फिर ऐसा भी समय आया जबकि भारत स्वाधीन हुआ। देश के लिये जिन्होंने क़ुर्बानियाँ दी थीं, त्याग किये थे, जेलें काटी थीं उन्हें स्वाधीनता सेनानियों के रूप में सम्मानित किया गया। देश के राष्ट्रपति द्वारा ताम्र-पत्र अर्पित किये गये। उनकी सुख-सुविधा के लिये नियमित आय- पेन्शन की व्यवस्था स्वतंत्र भारत की सरकार द्वारा की गयी। रेल-यात्रा के लिये एक साथी सहित निःशुल्क प्रथम दर्जे में सुविधा दी गयी। रोग की स्थिति में अच्छी से अच्छी चिकित्सा सुविधा भी मुहैया की ज़ाती है। हमारे ऋषि पाराशर जी अरसे से मधुमेह-डायबिटीज़ के मरीज़ थे। एक समय उन्हें गैंगरीन भी हो गयी तो पैर का अंगूठा व दो अँगुलियाँ भी कुर्बान करनी पड़ीं। कितना असह्य शारीरिक कष्ट था पर वे थे कि सदा ही साधना की उच्च स्थिति में श्रीमाँ व श्रीअरविन्द में अटूट विश्वास लिए सभी कुछ- उनका वरदान- देय मानकर पूरे प्रेम-भक्ति से श्रद्धापूर्वक ‘रिसीव’ करते थे- लेते थे। लिहाज़ा कि उसमें से पूर्ण स्थिति में सभी भयंकर कष्ट सदा-सर्वदा नवीन-नूतन साधना रत्न पाकर निकलते थे। जितनी महत उनको पीड़ा की डुबकी लगवाई जाती थी वह उतनी ही गहराई में मानों भक्ति का पैंतरा बदलकर उसमें से दोनों हाथों में रत्न-राशि समेटे बाहर हँसते हुए प्रगट हो जाते थे।

उनका जीवन का हर लमहा, हर क्षण, हर घटना, हर चोट भागवती उपस्थिति व श्रीमाँ की उन्मुक्त क्रीड़ा का प्राकट्य लिये होता था। वे कभी न हारे। कष्ट में कभी न सिसके। कभी न अकुलाये।

अंत में जाकर श्रीमाँ-श्रीअरविन्द की अनंत-धारा में हँसते-खेलते पांण्डिचेरी में समाहित हो गये।

* श्री पाराशर जी और चाचाजी के बीच अत्यंत मधुर सम्बन्ध थे। आश्रम की स्थापना से पहले ही उनके बच्चों की शिक्षा के संदर्भ में विचारों का गहरा आदान-प्रदान चलता था। पाराशर जी चिर-कुमार होने के नाते मस्त-मौला थे। आदर्शवाद के प्रकाश में दोनो ही खूब फक्कड़ थे और फ़कीरी मौज में उनकी गहरी छनती थी। ‘हँसी-मजाक’ पर सार्थक और गहन साधना के हाथों दोनों ही बिके हुए थे। चाचाजी उन्हें ऋषि पाराशर जी कहते थे।