चाचा जी की आत्मकथा
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श्रीमती दयावती की स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागिता एवं उनकी लाहौर जेल में क़ैद


सन् 1932 में मैंने लाला दीवान चंद के यहाँ की अपनी नौकरी छोड़ दी और पंडित कन्हैया लाल पुंज के साथ साझेदारी में अपना व्यापार (बिज़नैस) शुरू कर दिया। कांग्रेस और आर्य समाज के अपने कार्य के अलावा मैं अपने बिज़नैस में जैसा कि स्वाभाविक था पूरे तौर पर लवलीन रहता था।

मेरी पत्नी दयावती और मैं आपस में किसी न किसी बात को लेकर झगड़ते रहते थे - कभी तो मज़ा लेने को तो कभी अपनी वाक् -चातुर्य क्षमता को और पैना करने को। वे शिकायत करतीं: “आप घर के काम में कुछ भी ध्यान नहीं देते। बच्चे इतने छोटे - छोटे हैं।” मैं पलट कर कहता: “आप तो घर में ही रहती हैं न। पर देखिए मैं तो बाहर जाता हूँ और कांग्रेस का, आर्य समाज का और फिर व्यापार का काम करता हूँ। इसके अलावा और भी दूसरे तीसरे महत्वपूर्ण काम करने पड़ते हैं।” उस समय हमारे दो बच्चे थे। अनिल और लता। एक दिन उन्होंने मेरे ऊपर शरारत में दक्ष-चाल चली। दोनों बच्चों को जुलाब की दवा पिला दी और स्वयं घर से बाहर खिसक गईं। इधर दोनों बच्चे थे कि दस्त पर दस्त हो रहे थे। मुझे मालूम नहीं था कि वे गईं तो कहाँ गई हैं। अब तो मैं सारा दिन घर से किसी भी काम के लिए निकल ही नहीं सका। जो हो, अब तो मुझे बच्चों को ही सम्भालना था और डॉक्टर को बुलाकर इनको दवा दिलवाना, ठीक करवाना था। मैं उनको छोड़कर अपनी पत्नी का ठौर -ठिकाना ढूंढ़ने भी नहीं जा सकता था। आख़िरकार मैंने अपने मुलाज़िमों को ढुंढ़वाने भेजा और तब पता लगा कि वह तो हमारे ही एक मित्र के यहाँ गई हुई हैं। वे वापस आई और कहने लगीं: “अब आपको पता लगा कि मैं घर में रहकर बच्चों के लिए क्या-क्या काम करती हूँ। यह एक सबक़ है जो मैं आपको सिखाना चाहती थी।” सो मुझे अपनी पत्नी के काम-काज की जो वह घर में करती थीं कद्र हुई और बच्चों की देखरेख का भी परिबोध हुआ।

परन्तु उनका व्यवहार तो बदल ही रहा था। एक शाम वे घर से ग़ायब हो गईं। वह चान्दनी चौक गईं, कांग्रेस का झं डा उठाया और महिलाओं के एक जलूस का नेतृत्त्व किया। बहुत रात गए तब जाकर मुझे मालूम हुआ कि वह तो गिरफ़्तार हो गई हैं। 12 अक्टूबर 1932 को उनको छः महीने की जेल की सज़ा सुनाई गई और उन्हें लाहौर जेल में भेज दिया गया। इसलिए परिणाम-स्वरूप मैं 1932 में जेल जाने से वंचित रह गया क्योंकि न समय रहा और न ही मौक़ा। बात यह हुई कि मेरी पत्नी ने मुझ पर पहल की चाल चली और आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने में मुझसे आगे होकर बाज़ी मार ली। अब मेरी हालत यह थी कि मुझे कांग्रेस का काम तो करना ही करना था उसके साथ-साथ बच्चों की देखभाल भी करनी पड़ती थी, फिर आर्य समाज का काम और व्यापार-व्यवसाय अलग। हमारा बड़ा बच्चा बेटा था व छोटी सन्तान बेटी थी। दो-तीन दिन के बाद मैं लाहौर गया और बेटी लता को उसकी माँ के पास जेल में छोड़ आया। बेशक़ मैं अपने बड़े बच्चे अनिल को अपने साथ वापस देहली ले आया। मेरी पत्नी के छः मास के कारावास की अवधि में मुझे अपने बेटे अनिल को भी हफ़्ता-दो-हफ़्ता के लिए लाहौर जेल माँ के पास रहने के लिए भेजना पड़ता था। फिर मैं जाकर अपने साथ वापस ले आता था। जब मैं जेल में अपनी पत्नी से मिलने जाता तो लाहौर में मैं अपनी ससुराल में ही ठहरा करता था। मेरी सास पुराने ज़माने की महिला थीं और मैं जब-जब भी वहाँ जाता तो बहुत प्रसन्न होती थीं।

यह तो बाद की बात है पर मेरी पत्नी के जेल जाने पर हमारी पहली बातचीत यूँ हुई। मेरी सास ने मुझे देखा तो पूछाः “मेरी बेटी कैसी है?” मैंने शिष्टतापूर्वक उत्तर दियाः “जी ठीक-ठाक हैं।”

उन्होंने पूछाः “वह कहाँ है?”

मैंने उत्तर दियाः “वह यहीं लाहौर में हैं।”

उन्होंने पड़ताल कीः “वाह! यह कैसे हो सकता है? मैंने तो उसे देखा भी नहीं।”

मैंने समझाया किः “जी वह लाहौर जेल में पिछले एक मास से हैं।”

वह तो आश्चर्य च़कित रह गईं। धक्का खा गईं। बोलींः “अरे भई! किसी अच्छे घर की लड़की कैसे जेल जा सकती है? क्या हो गया!” उन्हें तो मेरी बात पर विश्वास ही नहीं हो रहा था।

तब मैंने कहाः “यह तो एक सच्चाई हैं। आप चलिये और उन्हें स्वयं देख लीजिए।”

अगली सुबह मैं उन्हें जेल लेकर गया और वहाँ उन्हें उनकी बेटी को दिखाया। यह तो उनको काफ़ी समय लगा यह समझने, जानने और स्वीकार करने में कि क्या औचित्य है इस बात का कि सैकड़ों स्त्रियाँ अच्छे घरों की महिलाएं दिल्ली और पंजाब के अलग-अलग भागों से अपने घरों को पति-परिवारों को, बाल-बच्चों को छोड़कर जेलों में जावें।

इन बहादुर स्वतंत्रता-वीरांगनाओं में से कुछ प्रमुख थींः “लेडी लाडो रानी ज़ुत्शी, कौषल्या देवी, स्वामी श्रद्धानन्द की वीर-सुपुत्री बहन तू फ़ानी-सत्यवती, और मुल्तान जेल के हमारे साथी डॉक्टर प्रकाश चन्द्र जी की पत्नी और भी कई अन्य राजनैतिक महिला बंदीजन।” पूरे छः मास की जेल काटकर मेरी पत्नी दयावती रिहा हुईं और विजयोल्लास के साथ वापस आईं।

उनका सोच था कि क्योंकि मैं देश सेवा में जेल गया था तो मुझमें उसका अहंकार आ गया था और इस तरह मैं अपने को उनसे बढ़कर या ऊँचा समझ रहा था। अब उन्होंने दिखला दिया कि वह भी आज़ादी की लड़ाई में पीछे नहीं हैं, हिस्सा ले सकती हैं। जेल भी जा सकती हैं और इसमें कोई विशेष बड़ी या ख़ास बात नहीं थी जो मैंने जेल जाने में कर दी हो। सो यह थी दास्तान मेरी पत्नी के “द्वितीय सार्वजनिक अवज्ञा आन्दोलन 1932” में भाग लेने की।

तब मैं कांग्रेस पार्टी का सक्रिय सदस्य था और नियमित रूप से कांग्रेस के कार्य को करने में संलग्न था। जहाँ प्रांविंशियल (प्रांतीय) कांग्रेस कमेटी के एक सदस्य की हैसियत से सारे व्यापक संगठन व्यवस्था के प्रबंधन को देखना पड़ता था तो ऊपर से प्रधान के बताए हुए सभी कामों को भी अंजाम देना होता था। बैरिस्टर आसफ़अली दिल्ली प्रॉविंशियल (प्रदेश) कांग्रेस कमेटी के प्रेज़िडेंट (प्रधान) थे। वे राष्ट्रीय कांग्रेस कार्य समिति (कांग्रेस वर्किंग कमेटी) के मेम्बर भी थे। जब-जब भी वे कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग में हिस्सा लेने जाते तो हम लोग बड़ी उत्सुक़ता के साथ उनकी वापसी का इन्तज़ार करते जिससे कांग्रेस के निर्णयों और चर्चाओं की भी सीधी जानकारी हो सके।

1934 के चुनाव

उन दिनों की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना थी 1934 का चुनाव जिसमें हमारे उम्मीदवार थे बैरिस्टर श्री आसफ़अली और सरकार’ ने अपना आदमी करके मिस्टर नानकचंद को मुकाबले में उतारा था। विरोध में बैरिस्टर श्री आसफ़अली थे। मैं नई दिल्ली में चुनाव अभियान - ‘इलैक्शन कैम्पेन’ का इन-चार्ज था। वहाँ लगभग सारे ही वोटर तो सरकारी कर्मचारी थे। सिवाय उन गिने-चुने ठेकेदारों के जो उन दिनों की नई दिल्ली - ‘रायसीना’ के निर्माण कार्य में लगे थे। हमारा कांग्रेस संगठन कारगर ढंग से धारालेखित था और क्रमानुसार काफ़ी सुव्यवस्थित था भी। नई दिल्ली क्षेत्र का विस्तार दिल्ली छावनी (कैन्टोनमेंट) तक था। हमने अपने उम्मीदवार के परचे लगभग प्रत्येक वोटर तक व्यक्तिगत रूप से पहुँच कर स्वयं पहुँचाए थे। सच कहें तो निश्चित रूप से यह हमारे अभियान या प्रभाव की वजह से नहीं था कि श्री आसफ़अली ने यह चुनौती भरा प्रतिष्ठा का चुनाव गौरवशाली ढंग से विजित किया। नई दिल्ली के निवासी सरकारी कर्मचारियों नें अपना वोट कांग्रेसी उम्मीदवार को ही दिया क्योंकि मतदान गुप्त था - “सीक्रेट बैलेट” था। सरकार यह जान नहीं सकती थी कि किसने किसको वोट दिया। सो नई दिल्ली के मतदाताओं में से बहुत अच्छी संख्या में वोट श्री आसफ़अली को ही डाले गये और यही कारण था कि जिससे वह सारी विघ्न-बाधाओं के होते हुए भी निर्वाचित हुए।

इधर क्योंकि मैं नई दिल्ली में ही रहता था चुनाव क्षेत्र का चप्पा-चप्पा मेरी जानकारी में था। कांग्रेस पार्टी के सदस्यों, स्वयंसेवकों, अपने मित्रों और संबंधियों की मदद लेकर मैंने चुनाव अभियान योजनाबद्ध नियमित तरीके से संयोजित किया। राष्ट्रीय आंदोलन और श्री आसफ़अली को लेकर मात्र तीन-चार पैम्फ़लेट-परिचय-पत्र तैयार किये। हमने अपने मित्रों व परिचितों से स्वयं जाकर प्रार्थना की कि वे अपना बहुमूल्य वोट मत हमारे कांग्रेसी उम्मीदवार को दें देवें - श्री आसफ़अली को दें। बेशक़ खुले तौर पर तो कोई भी नहीं कह सकता था कि वह श्री आसफ़अली को वोट देगा परन्तु लोगों में से बड़ी संख्या में उन्हीं को अपना वोट दिया। -और सफल बनाया।

∗ तत्कालीन विदेशी ब्रिटिश सरकार से तात्पर्य