चाचा जी की आत्मकथा
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मेरी पत्नी


उसके पास अपने बड़प्पन का सबसे बड़ा व गहन तर्क यह था कि वह उस स्थान से संबंध रखती थी जहाँ पर रेल यातायात सेवा उपलब्ध थी (हालाँकि वह रेलवे स्टेशन एक अंतिम स्टेशन था) और इसलिए वह एक सभ्य स्थान से आई थी जबकि मैं पहाड़ों के एक दूर के गाँ व से था जो कि अपने निकटतम रेलवे स्टेशन से 13 (तेरह) मील दूर था जहाँ पर सभ्यता को एक मील प्रतिवर्ष की चाल से चलकर पहुँचने पर काफी समय लगता क्योंकि उन दिनों सभ्यता के लिए चलने के अन्य साधन नहीं थे।

वह मुझको नहीं जानती थी और मैं उसको नहीं जानता था। उसने मुझको पहले कभी नहीं देखा था और न मैंने उसको कभी देखा था। लेकिन ऐसा केवल हमारे साथ ही नहीं था। बल्कि उन दिनों सभी के साथ ऐसा होता था क्योंकि विवाह उन दिनों एक संयोग मात्र, लाटरी अथवा जुआ की तरह होते थे।

लेकिन मेरे साथ एक बढ़त का हिस्सा था। मेरी बहन को गाड़ी लेने के लिए उस गाँव से होकर जाना पड़ता था और उसको दिन में अथवा रात में वहाँ रुकना पड़ता था। अवसर आने पर उसने इस लड़की को देखा और उससे प्रभावित हो गई। किसी प्रकार उसने इस लड़की के माता-पिता से यह वचन ले लिया कि वह मेरी भाभी बनेगी।

किसी तरह हमारा विवाह हो गया और हमारा खेल शुरू हो गया। मैंने एक श्रेष्ठता का तर्क खोज लिया। मैं दसवीं कक्षा पास था जबकि उसने केवल सातवीं या आठवीं तक पढ़ाई की थी। हालाँकि वह हर वक्त कहती थी कि मेरे मैट्रीकुलेट होने के बावजूद वह मुझसे अधिक बुद्धिमान थी लेकिन वह मेरे इस तथ्य को परास्त नहीं कर पाई कि मैं मैट्रिकुलेट हूँ और मेरे पास पंजाब के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय का सर्टिफिकेट है जो उन दिनों कोई छोटी चीज़ नहीं थी।

यह हीन भावना उसके मन में रहती थी और उसको कष्ट देती थी। उसको पुस्तकें व उपन्यास पढ़ने की अत्यधिक रुचि थी जिसका मैंने कभी बुरा नहीं माना। लेकिन कभी-कभी इस बात पर विवाद होने लगा कि वह एक विशेष पन्ना अथवा अध्याय नहीं बल्कि पूरी पुस्तक पढ़ने के बाद ही किसी अन्य काम को करेगी। मेरी मजबूरी को कोई भी समझ सकता है। किसी तरह समय व्यतीत होता गया। समय-समय पर मैंने उसके कमरे में पुस्तकें, अभ्यास पुस्तकें, कलम-दवात-स्याही इत्यादि देखता था किन्तु इनका प्रयोजन नहीं समझ पाता था। एक दिन अकस्मात् वह बोल उठी कि वह एक परीक्षा दे रही है। ‘‘परीक्षा कैसी परीक्षा?’’ मैंने पूछा। जिसका उसने उत्तर दिया ‘‘पंजाब विश्वविद्यालय की हिन्दी रत्न’’ जो दसवीं कक्षा के समकक्ष थी। मैं उसको परीक्षा भवन में ले गया और यह जानना एक सुखद आश्चर्य था कि जो वह कह रही थी वह एक तथ्य था। अस्तु, मैंने यह सोचा भी नहीं था कि वह सफल होगी। लेकिन जब एक माह बाद परीक्षा-फल घोषित हुआ वह सचमुच सफल थी और समयानुसार उसने मेरे सामने पंजाब के उसी प्रसिद्ध विश्वविद्यालय का सर्टिफिकेट रख दिया। मुझको ऐसा प्रतीत होता था कि विश्वविद्यालय कार्यालय में भूलवश किसी अन्य के नम्बर उसको दे दिये गये हैं। मैंने कभी भी विश्वविद्यालय से अंक तालिका मँगाने का यत्न नहीं किया - कहीं ऐसा न हो कि यह ग़लती पकड़ी जाये।

अतः अब मैंने अपनी कोई दूसरी श्रेष्ठता ढूँढ़नी शुरू कर दी। किन्तु मैं अपने पक्ष में एक ही तर्क ठोंककर कह सका कि मैं अँग्रेज़ी में उससे अधिक शब्द जानता था। उसने तुरन्त प्रत्युत्तर दिया कि वह चार भाषाओं की ज्ञाता थी - अँग्रेज़ी, उर्दू, हिन्दी, पंजाबी - जबकि मैं केवल तीन भाषायें जानता था।

विवाद चलता रहा। मैं इसको झगड़ा नहीं कह रहा हूँ क्योंकि ‘झगड़ा’ एक साधारण शब्द है और विवाह का मतलब है एक स्थाई या पक्का और दीर्घजीवी ‘झगड़ा’। वह यह हमेशा मानती थी कि वह बहुत-सी कलायें जानती थी जैसे संगीत, पाकविद्या और कपड़ा-सिलाई इत्यादि। जबकि मैं इनमें से कुछ नहीं जानता था। देश की स्वतंत्रता के बाद जिस गति से स्त्रियाँ आगे बढ़ रही हैं इससे लगता है कि यदि उन दिनों हम स्वतंत्र होते तो मेरी पत्नी ने संगीत, पाकविद्या व वस्त्र धुलाई में स्नातक डिग्री प्राप्त कर ली होती, जबकि मैं मात्र मैट्रीकुलेट ही रहता और मेरी मुश्किलें कई गुना बढ़ गई होतीं।

प्रतिदिन के जीवन में एक-आध तर्क की आवश्यकता थी और यह मेरे अथवा उसके लिए मुश्किल नहीं था। किन्तु वे अधिकतर साधारण थे। उनका वर्णन करना उचित नहीं है, हो सकता है औरों के अनुभव इससे अच्छे हो। हाँ सबसे अधिक विवादास्पद और तर्क करने योग्य विषय था हम दोनों की ऊँचाई में भिन्नता जिसका निर्णय मध्यस्थ भी नहीं कर पाये। मैं लम्बा हूँ और वह छोटी है। मैं लम्बा होने के लाभों पर ज़ोर देता था - मैं बिना स्टूल अथवा सीढ़ी के दीवार साफ़ कर लेता, मैं दीवार में कील ठोंक लेता और परदे टाँग लेता इत्यादि। किन्तु वह हमेशा प्रत्युत्तर देती कि ज़मीन पर ज़्यादा अच्छा काम कर लेती है क्योंकि अधिकांश कार्य ज़मीन पर ही किया जाता है। - और वह यह भी तर्क देती कि उसका छोटा कद बहुत ही कम खर्चीला है। जैसे उसे छोटा कोट चाहिए, कम कपड़ा, छोटे जूते और वह आधे टिकट में यात्रा कर सकती है। जबकि मेरे लिए हर वस्तु अधिक मूल्यवान है और मैं कभी आधे टिकट में यात्रा नहीं कर सका।

अब मैंने इस खेल के लिए नई चाल सोचना शुरू किया। मैंने घर छोड़ दिया और राजनीति में कूद पड़ा और गाँधी जी का अनुयायी बन गया। मैंने खद्दर पहनना शुरू कर दिया और अपनी श्रेष्ठता से उसे विस्मित करने का यत्न करने लगा। जल्दी ही 1930 में मुझे गिरफ्तार कर मुल्तान की जेल में भेज दिया गया। इसी बीच मेरे पहले बच्चे ने जन्म लिया और वह हमारे नए बच्चे के साथ जेल में मुझसे मिलने आई। मेरे पिता उसके साथ थे। इसलिए हम बिल्कुल बात नहीं कर सके। क्योंकि वह परदा करती थी इसलिए मैं उसका मुख भी नहीं देख सका। जब वह मुझसे जेल में मिलने के बाद चली गई मुझे एक ही अफ़सोस था कि इतना लम्बा समय बीत गया और हम दोनों ने न तो कोई विवाद ही किया और न झगड़ा। मुझे नहीं मालूम कि वह क्या भाव लेकर वापस गई किन्तु लगता है कि उसके भाव मिश्रित थे। मैं यह नहीं जान सका कि करुणा के साथ-साथ बदले की भावना भी वह लेकर गई। वर्ष 1931 के अंत तक मेरी रिहाई हुई। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि रिहाई के बाद मैंने उससे श्रेष्ठता की चेतना प्राप्त कर ली।

1932 में एक दिन जब मैं अपने व्यापार से लौट कर घर आया तो मैंने उसे लापता पाया जबकि मेरे दो बच्चे वहाँ खेल रहे थे। मैंने सोचा कि वह जल्दी वापस आ जायेगी। किन्तु जब बहुत देरी हो गई और मैं उलझन में पड़ गया तो अचानक काँग्रेस कमेटी के कार्यालय से टेलीफोन आया कि मैं अपनी पत्नी के लिए सेन्ट्रल जेल में बिस्तर भेजूँ। बाद में मुझे मालूम पड़ा कि वह रोज़ काँग्रेस के कार्य हेतु जाती थी और उस संध्या को वह चाँदनी चौक के प्रदर्शन में राष्ट्रीय झण्डा उठाए जा रही थी तभी स्त्रियों की पूर्ण टोली को गिरफ़्तार कर लिया गया। यह दण्ड स्वयं आमंत्रित था, कोई मुकदमा नहीं बनता था इसलिए कोई बचाव भी नहीं किया जा सकता था। जब मैं अगले दिन जेल में मामले की सुनवाई के लिए गया तब उसको छः माह का कठोर कारावास का दण्ड दिया जा चुका था और उसको उसी शाम को लाहौर के स्त्री-जेल में स्थानान्तरित करने का आदेश भी हो गया था। क्योंकि दिल्ली की सेन्ट्रल जेल में स्त्री-कैदियों के लिए जगह व उचित प्रबंध नहीं थे। अब समस्या बच्चों की थी और स्पष्ट रूप से निश्चित हो गया कि छोटा बच्चा वह अपने साथ ले जायेगी और बड़ा बच्चा मेरे साथ छोड़ जायेगी।

संयोगवश उसके माता-पिता लाहौर में रहते थे। अहोभाग्य! मैं समय-समय पर मिलने लाहौर जाता। मैंने अपनी धर्ममाता (सास) को बताया कि उसकी पुत्री पिछले दो माह से लाहौर में है। ‘‘आओ चलें और उसे देखें’’ मैंने कहा। ‘‘लाहौर? कहाँ? वह मुझसे कभी मिली नहीं’’ उसकी माँ ने चकित होकर कहा। ‘‘वह स्त्री-सेन्ट्रल जेल’ में है।’’ ‘‘तुमने क्या कहा, जेल में?’’ उनको धक्का सा लगा और वे स्तब्ध हो गईं। ‘‘सम्भ्रान्त परिवारों की लड़कियाँ जेल कैसे जा सकती हैं जोकि बदनाम व्यक्तियों के लिए होती हैं?’’ अब यह तथ्य कि वह अपने मायके शहर में उसके लिए बहुत संतोषप्रद व लाभकर था। न केवल उसके माता-पिता उससे मिलने के लिए आते बल्कि उसके लिए इच्छित फल और मिठाइयाँ भी लाते।

शीघ्र ही छः माह बीत गये। वह घर वापस आ गई - मालाओं और पुष्प-गुच्छों से लदी हुई, प्रशंसा और जय-जयकार के नारों सहित। वह अपनी नव-अर्जित विजय से सचेतन थी जिसने मेरी थोथी और बनावटी श्रेष्ठता को मिटा दिया था।

तो अब हम यों कहिए कि एक समान थे। इस समानता ने हमारे अन्दर नया सम्बन्ध स्थापित कर दिया - अब हम दोनों मित्र बन गये। हमने उत्सवों में, सिनेमाघर में और सामाजिक आयोजनों में साथ-साथ जाना शुरू कर दिया। नित्य प्रातः हम सैर के लिये इकट्ठे बाहर जाते। हमको वे मित्र और सम्बन्धी भी मिले जिन्होंने हम दोनों की कद और उम्र की भिन्नता देखकर पूछे बिना रह न सके कि वह किसकी लड़की थी। वह शरमा गई लेकिन मैं यह कहने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाया कि ‘‘वह अपने माँ -बाप की बेटी है।’’

अब, जब भी और जहाँ भी मौक़ा होता, जेल जाने और सज़ा भुगतने की शोभा व मान उसको ही मिलता किन्तु मेरी गिरफ़्तारियों और त्याग का कोई जिक्ऱ नहीं।

यह वास्तव में मेरे लिए बहुत हो चुका था। और मुझे अपनी गरिमा को पुनर्स्थापित करने के लिए एक प्रकार से पीड़ित कर रहा था। अब मैंने एक बहुत पुराना तरीका अपनाया। मैंने अपने मित्रों और संबंधियों को यदा-कदा घर पर पार्टियों में निमंत्रित करना शुरू कर दिया इस आशा से कि मेरा स्तर कम से कम आमंत्रित जनों के सम्मुख बढ़ जायेगा जो कम से कम मेरी पत्नी के सम्मुख मेरी प्रशंसा और वाह-वाह न करने की कृतघ्नता नहीं करेंगे। उन्होंने प्रशंसा तो की किन्तु उनकी प्रशंसा मेरे लिए नहीं थी, यह फिर मेरी पत्नी के लिए थी जिसकी उच्च स्वर से उन्होंने अत्यधिक आदर-सत्कार और सुस्वादु और मनोहर पकवानों के लिए की। इस प्रकार यह योजना भी ग़लत हो गई और आशा विपरीत हो गई।

अब, एक दिन, जब हम सैर कर रहे थे, मैंने भड़क कर कहा ‘‘देखते हैं कौन अधिक चलता है?’’ और अकड़कर फिर कहा ‘‘अब हम तभी वापस घर जायेंगे जब तुम हार मानकर निवेदन करोगी कि तुम बिल्कुल थक गई हो, शक्तिविहीन, रुकने और वापस जाने की प्रार्थना करोगी।’’ उसने कुछ नहीं कहा और मेरी चुनौती स्वीकार कर ली।

उन दिनों दिल्ली बहुत छोटी थी, शहर केवल दीवारों में ही सीमित था। इसलिए सैटिलाइट की तरह हमने पूरी दिल्ली के चारों ओर चक्कर लगाने शुरू कर दिये। हम बिना रुके चलते जा रहे थे। अंधेरा हो गया, रात हो गई और लो चलते-चलते आधी रात भी बीत गई। एक-दो बार रात की ड्यूटी पर तैनात पुलिस वालों ने भी पूछा व रोका, लेकिन हम चलते गये। प्रभात होने वाली थी और प्रातः 3 बजे तक हमने शहर के चारों ओर तीन चक्कर लगा लिए थे। जब हमने अपने घर पर तीसरा चक्कर पूरा किया, मैं खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर उससे माफी माँगी ‘‘हाँ, देवीजी, तुम जीतीं और मैं हारा किन्तु अब हमें घर जाना चाहिए।’’