स्वाधीनता संग्राम में मेरी ग़ोता - मेरी छलांग
Part 1 of 4
मेरे पिताजी पक्के आर्य समाजी बन गये थे। जब मैं करीब दस वर्ष का हुआ तो उन्होंने जैसे ही मैं अपनी प्राइमरी की शिक्षा पूरी कर लूँ मेरी आगे की पढ़ाई के लिये मुझे लाहौर भेज कर डी0ए0वी0 हाईस्कूल में पढ़ाने का मन बना लिया जिसकी शिक्षा का माध्यम तब प्रचलित दस्तूर के अनुसार सहज रूप से ‘उर्दू’ था। इधर यह हाईस्कूल समूचे देश में शायद एक ही था जिसमें शिक्षा का माध्यम था ‘हिन्दी’। क्योंकि मुझे तो हिन्दी का एक शब्द भी ‘क-ख-ग’ भी नहीं आता था। मुझे उठा कर एक विशेष ही कक्षा में डाल दिया गया। वह थी - ‘क्वारन्टाइन’। इस कक्षा के विद्यार्थियों को क्रमगत श्रेणी की मुख्य धारा से हटाकर (सारे विषयों की पढ़ाई छुड़ाकर)- केवल आरंभ से पाँचवे दर्जे तक का पूरे दिन केवल हिन्दी का ही शिक्षण व अभ्यास कराया जाता था। तत्पश्चात् अगले वर्ष जा कर ही मैं छठी कक्षा में बैठ पाया। फिर जब मैंने 1919 में डी0ए0वी0 कॉलिज लाहौर में प्रवेश लिया तो यहाँ मुझ को संस्कृत से पाला पड़ गया। यह तो महात्मा गाँधी आ गए और उन्होंने मेरी जान छुड़ाई कि “सरकारी शिक्षा-संस्थाओं और अदालतों का बहिष्कार करो!” “असहयोग आन्दोलन करो, कॉलिज छोड़ो! अदालतें छोड़ो!” की आवाज उठी और मैं कूदकर बाहर आ गया।
गाँधीजी ने मुझे मुक्त कर दिया।
मार्शल लॉ और राजनीति की उमड़ती लहर
जलियाँवाला बाग के काण्ड के बाद 1919 में लाहौर में अमानवीय तानाशाहीपूर्ण अत्याचारी ‘मार्शल लॉ’ लग गया व उसके बड़े-बड़े पोस्टर हमारे हाईस्कूल कम्पाउंड के चारों ओर और हमारे छात्रावास-‘बोर्डिंग हाउस’ में भी चिपका दिये। एक नोटिस-बोर्ड तो ठीक हमारे होस्टल में ही लगा दिया गया जिस पर हर दिन एक या दो मार्शल लॉ के पोस्टर चिपका दिये जाते थे। हमें बाहर आने-जाने की भी मुमानियत थी क्योंकि मार्शल-लॉ में स्कूल बन्द कर दिया गया था। परन्तु मैं तो हर समय यह जानने के लिये बेचैन रहता था कि क्या कुछ हो रहा है। हर रोज़ मैं तो होस्टल की छत पर चढ़ ही जाता और देखता कि मुख्य सड़कां पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर क़दम-क़दम पर गोरा-मिलिटरी के फ़ौजी हाथों में बंदूकें -बर्छे लिये ड्यूटी पर तैनात खड़े हैं।
जब-जब भी मुझे मौका मिलता व मेरा दाँव लगता मैं मार्शल-लॉ के पोस्टर स्कूल नोटिस-बोर्ड से तो फाड़ ही देता। इस पर इन्क्वायरी की गई। मैं पकड़ा गया और गोरे सोर्जेंटों द्वारा सख्ती से बुरी तरह पीटा गया। उनके साथ पीटने में हमारे पंजाब के पुलिस-मैन भी थे। बेशक़ तब मैं सब कुछ जानने और समझने के लायक नहीं था क्योंकि मैं तो बहुत छोटा था। पर मुझे आज तक उन पोस्टरों में लिखे आर्डरों में से कुछ तो अभी भी अच्छी तरह याद हैं, जैसेः
“सभी मोटर-कारें फ़लानी-फ़लानी जगह पर जमा कर दी जाएँ।” अगले दिन यह फरमान- यह आर्डर निकाल दियाः
“सारी साइकिलें फलाँ-फलाँ जगह पर जमा कर दी जायें। सारे ताँगे-घोड़े डिपाज़िट कर दिये जायें।”
फिर किसी दिन यह हुक़ुम आ जाये किः
“जिस किसी के पास बीस सेर से ऊपर या एक मन से अधिक जो भी गेहूँ या अनाज है उसे इस स्थान विशेष में जमा करवा दिया जाये।” यह इतनी बड़ी मुसीबत थी, इतना जुल्म था-उत्पीड़न था। फिर यह इतना अपमान-जनक भी था कि इसने लोगों में अंग्रेज़ी सरकार के मनमाने निरंकुश और स्वेच्छाचारी शासन के ख़िलाफ़ गहरा रोष उत्पन्न कर दिया। मुझे अन्दर से महसूस होता था कि ‘बस, हो गया!, अंग्रेजों को इस देश से हट जाना चाहिये। ये कैसे क्रूर, ज़ालिम और अत्याचारी हैं कि इन्हें हमारे देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है।’ इतनी कोमल वयस में भी, इतनी कम उम्र में भी मुझे इस बारे में दृढ़ता से स्पष्ट सोच था-निश्चित भावना थी।
मार्शल लॉ के कायदे-कानून, नियम-विनियमों को लेकर हमारे तीन पेपर रखे थे। सरकारी अधिसूचना द्वारा घोषित कर दिया गया कि यदि हम इस परीक्षा में पास न हुए तो हमें मैट्रिक्यूलेशन परीक्षा में नहीं बैठने दिया जायेगा। मुझे याद है कि मुझे उस परीक्षा में 80 प्रतिशत अंक प्राप्त हुए थे।
1919 में कांग्रेस का अधिवेशन अमृतसर में ही हुआ जिस की अध्यक्षता की पंडित मोतीलाल नेहरू ने। मैं प्रतिनिधि की हैसियत से तो इस अधिवेशन में शामिल होने के लिये उचित उम्र का नहीं था और न ही मेरे पास उसके लिये ज़रूरी पैसे ही थे। हमें होस्टल से बाहर निकलने की भी इज़ाज़त नहीं थी। परन्तु किसी न किसी तरह जैसे-तैसे मैं होस्टल में से बाहर खिसक ही आया और अमृतसर निकल गया। वहाँ मैं उस ऐतिहासिक जुलूस में भी शमिल हुआ जिसका नेतृत्व पंडित मोतीलाल नेहरू ने अमृतसर की प्रमुख सड़कों व रास्तों पर किया था और फिर ‘लाल-बाल-पाल’ से सज्जित ऐतिहासिक कांग्रेस अधिवेशन में भी भाग लिया। इसके बाद मैं लाहौर आकर वापस अपने होस्टल में लाहौर आ मिला।
डॉक्टर सैफ़ुद्दीन किचलू जो देश के प्रसिद्ध व लोकप्रिय नेता थे, गोल-बाग़ में जो लाहौर का मशहूर बाग़ था और जो शहर के केन्द्र में था, वहाँ वे प्रतिदिन देश की दशा पर भाषण दिया करते थे। क़रीब दो सौ विद्यार्थी उन्हें सुनने के लिए हर रोज़ आया करते थे। मैंने कभी भी उनका एक भी लेक्चर नहीं छोड़ा। शायद मैं ही पहला व्यक्ति होता था जो सभा-स्थल पर पहुँच जाता था। इसके अलावा भी जब-जब कोई राष्ट्रीय गतिविधि होती तो उसमें भाग लेने के लिये मैं होस्टल से खिसक लेता।
सन् 1920 में महात्मा गाँधी का लाहौर में आगमन हुआ। उन्होंने अपना असहयोग आन्दोलन (नॉन-को-ऑपरेशन मूवमेण्ट) का प्रोग्राम जनता को समझाया। उसकी व्याख्या की कि वकीलों को अदालतों का बहिष्कार करना चाहिये। विद्यार्थियों को स्कूल-कॉलिज छोड़ देने चाहिएँ। उस विशाल जन-सभा में लगभग एक लाख लोग रहे होंगे जिसको महात्मा गाँधी ने सम्बोधित किया। उसमें मैं खड़ा हो गया और मैंने सीधे उनसे कुछ सवाल भी किये। सारे लोग हैरान हो गये क्योंकि मैं तो उमर में अभी बहुत छोटा ही था।
आज़ादी का बिगुल बज गया
महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के आह्नान के प्रत्युत्तर स्वरूप कॉलिज छोड़ने वाले विद्यार्थियों में मैं शायद पहला या दूसरा ही था। अब हमने लाहौर के पंडित रामभज दत्त जी के निवास-स्थान पर ही पंजाब में पहले नेशनल कॉलिज की संयोजना की। हमारे प्रोफेसर-शिक्षक थे एक से एक प्रतिष्ठित व उच्चकोटि के धुरंधर विद्वान नेता-गण यथाः पंडित रामभज दत्त, श्रीमती सरला देवी चौधुरानी, स्वामी सत्यदेव, प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम लाल सांधी और पंडित के0 संथानम् जो लक्ष्मी इन्श्योरैंस कम्पनी के मैनेजिंग डाइरेक्टर भी थे।
यद्यपि मेरा परिवार तो निष्ठावान् राज्य-भक्तों का था, विदेश सरकार के ‘पिट्ठुओं’ का। पर मैं तो राष्ट्रीय संग्राम में कूद ही पड़ा। शायद यही मेरे लिए नियत था। वास्तव में मेरे अन्दर एक आग थी- जो मुझे राह दिखा रही थी और मुझे ठेल रही थी। एक अग्नि-ज्वाल थी जो मेरा मार्ग-दर्शन कर रही थी और मेरा संचालन भी। जहाँ कहीं भी कुछ सशक्त व सामर्थ्यपूर्ण करने को होता था तो मैं उस में एकदम कूद पड़ता था। मैंने अपनी पढ़ाई छोड़ी तो इसलिये कि मेरे भीतर एक प्रचण्ड अग्नि प्रज्ज्वलित थी जो पढ़ाई-लिखाई करने की आवश्यकता से कहीं अधिक तीव्र थी-तेज थी और जिसने मुझे असहयोग आन्दोलन में कूद पड़ने को ठेल दिया-ढकेल दिया-मानों मुझे मजबूर कर दिया।
इस दौरान मेरे पिताजी अलवर में थे वहाँ की रियासत के ‘भूमि-बन्दोबस्त-विभाग’- (लैंड-सैटलमेण्ट-डिपार्टमेंट) में डेपुटेशन- (प्रतिनियुक्ति) पर लगे थे। यह जानने पर कि मैंने गाँधीजी के असहयोग आन्दोलन के तहत डी0ए0वी0 कॉलिज छोड़ दिया है, वे लाहौर आये और मुझे अपने साथ चलने को कहा। इधर सरदार हरी सिंह जो हमारे विशाल कुनबे के तीन सौ लोगों के पूरे परिवार के मुखिया थे-‘चीफ़ ऑफ पंजाब’ थे और गवर्नर कौंसिल के मेंबर भी, उन्होंने मुझे और मेरे पिताजी को बुलाया और धमकी दी। उनके शब्द थेः “देखो हमारे परिवार के सभी सदस्य सरकारी नौकरियों में ऊँचे-ऊँचे पदों पर नियुक्त हैं -सरकारी सेवारत हैं। और हम सारे पंजाब के मुखिया यानी ‘चीफ आफ पंजाब’ के नाम से जाने जाते हैं। यदि हमारे परिवार का कोई भी व्यक्ति कांग्रेस आन्दोलन व राष्ट्रीय आन्दोलन जैसी ओछी, आवारा हरक़तों में भाग लेगा तो क़ुदरती बात है कि इससे हमारे परिवार पर बड़ा धब्बा लगेगा और हम सब को नुक़सान पहुँचेगा।” परन्तु उस छोटी उमर में भी मैं इतना गुस्से में था और मुँहफट था कि मैंने उन्हें दृढ़ता से, बेबाक़ी से साफ़-साफ़ कह दियाः
“मैं तो किसी भी हालत में आपसे सहमत नहीं हो सकता, आप जो चाहें कहें।”
मेरे पिताजी ने जब उनका नायब तहसीलदार की पोजीशन में आने का कुछ मौका था तो उन्होंने सरदार हरी सिंह से संबंधित सत्ता अधिकारियों-हुक़ुमरानों से अपनी तरफ से ज़रा इशारे के तौर पर ही कह देने को कहा था जो काफ़ी होता। इस पर यह साहब बोले थे, “मैं यह कैसे कह सकता हूँ? मैं इन हुक़ुमरानों को - अफ़सरों को कैसे कहूँ, किस मुँह से कहूँ कि तुम मेरे अपने ही चचेरे भाई हो जो कि सिर्फ़ गिरदावर कानूनगो ही हो?” और उन्होंने सिफारिश करने से साफ़ इनकार कर दिया। शायद यह भी एक कारण था कि जिस ने मुझ में इतना गुस्सा और विद्रोह भर दिया था कि बड़बोला बनकर मैंने -‘सरदार हरीसिंह!’ को पलटकर टका सा जबाब दे दिया था।
पर जो हो मेरे पिताजी ने मुझे वहाँ नहीं छोड़ा। जबरदस्ती करके वे मुझे राजस्थान में तहसील रामगढ़ में ले ही आये, जो अलवर रियासत में थी और जहाँ वे अपनी सरकारी नौकरी पर काम कर रहे थे। पर मुझे समझ नहीं आता था कि मैं अब करूँ तो करूँ क्या। सो वहीं अपने रिहायशी मकान के पास जो एक प्राइमरी स्कूल था, मैं दिन भर वहाँ चला जाया करता और बिना किसी तनख़्वाह के बच्चों को पढ़ा दिया करता।