भँवर
अब स्कूल में दाख़िल होने के बाद मैंने देखा कि मेरी क़िश्ती तो एक भँवर में फँस गई है। स्कूल वालों ने कहा कि “तुमको तो हिन्दी का ‘क’ ‘ख’ भी नही आता और तुमने कभी हिन्दी का नाम भी नहीं सुना। इसलिये एक साल के लिये तुम्हें ‘क्वारंटीन’ (Quarantine) में रहना पड़ेगा और केवल हिन्दी पढ़नी होगी। अगर तुम इस एक साल के समय में हिन्दी लिखना-पढ़ना अच्छी तरह से सीख गये तो अगले साल तुम्हें छठी श्रेणी में दाख़िल कर लिया जायगा।”
मैं पढ़ने-लिखने में होशियार था। इसलिये मुझे कोई डर नहीं लगा और मैं स्कूल में सारा दिन हिन्दी पढ़ता रहता था। फिर भी मार-पिटाई तो रोटी-दाल की तरह चलती ही रहती थी।
मुझे पण्डित जी ने यह आदेश दिया था कि, ‘चार सफ़े (पृष्ठ) हिन्दी सुलेख प्रतिदिन लिखकर लाया करो और मुझे दिखाया करो।’
महीनों मैं प्रतिदिन चार सफ़े लिखकर ले जाता रहा और वे उस पर लाल स्याही से हस्ताक्षर कर दिया करते थे। प्रायः मेरा सुलेख अच्छा ही रहता था परन्तु क्या लिखा है यह मेरे पंडित जी ने कभी पढ़ा नहीं था।
हर रविवार को हम सब छात्रावास के लड़कों को दो-दो की क़तार में आर्य समाज अनारकली में ले जाया जाता था, जहाँ आर्य प्रचारकों के भाषण सुनने पड़ते थे। मेरे अन्दर तो भाषण की कोई बात पहुँचती नहीं थी परन्तु एक दिन प्रचारक महाशय कुछ कविता में बोल रहे थे वह मुझे झट याद हो गया। वह कोई उपमा दे रहे थे। उनकी कविता कुछ इस तरह थीः-
“आग लगी इस वृक्ष में,
जल गये सारे पात।
तुम क्यों बैठे पक्षियों,
जब पंख तुम्हारें साथ।” पक्षियों ने उत्तर दिया-
“फल खाया इस वृक्ष का,
गन्दे किये सब पात।
यही हमारा धर्म है,
जलेंगे इसके साथ।”
मैं सारा दिन यही गाता रहा और दूसरे दिन हिन्दी सुलेख की कॉपी में मैं यह लिखकर ले गयाः-
“आग लगी इस बोर्डिंग को,
जल गये सारे हॉल।
तुम क्यों बैठे बोर्डरों,
जब टाँग तुम्हारे साथ।”
बोर्डिंग के बच्चों नें उत्तर दियाः-
“दाल पी इस बोर्डिंग की,
गन्दे किये टट्टियों के पॉट
यही हमारा धर्म है,
जलेंगे इसके साथ।”
उस दिन मेरी ऐसी बदक़िस्मती थी कि पहली बार पंडित जी ने हमारे सुलेख को पढ़ लिया। उस समय मेरा ध्यान कहीं दूसरी तरफ़ था। उन्होंने मुझे एक ऐसा ज़ोर का थप्पड़ लगाया कि मैं दो डेस्क पार जा पड़ा।
ख़ैर किसी न किसी तरह मैं छठी क्लास में पहुँच गया और अब नियमित रूप से सारे विषयों की पढ़ाई मेरी शुरू हुई। यद्यपि हिन्दी में तो मैं कमज़ोर ही रहा परन्तु अंग्रेज़ी, गणित और भूगोल मेरे अच्छे थे। केवल इतिहास मुझे नहीं आता था और न वह मुझे कभी अच्छा ही लगता था। छठी, सातवीं और आठवीं श्रेणी में गणित में मुझे 150 में से पूरे 150 अंक प्राप्त हुये थे। इस तरह छठी, सातवीं और आठवीं श्रेणी में मेरी क़िश्ती सहज ही पार निकल गई।
अब नवीं क्लास में आकर मैंने हिन्दी छोड़ दी और साइंस (Science) विज्ञान का विषय (Subject) ले लिया। अब मेरी क़िश्ती नये भँवर में फँस गई। मैं अपने स्कूल की हॉकी टीम के ग्यारह खिलाड़ियों में चुन लिया गया। हमारे स्कूल को हमेशा ही दो बातों की धुन लगी रहती थी पहली तो यह कि वह हॉकी (Hockey) व रस्साकशी की प्रतिस्पर्धा (Tug-of-war) में यूनिवर्सिटी टूर्नामेण्ट्स में जीते और दूसरे यह कि अपनी यूनिवर्सिटी के रिकार्ड तोड़े और अव्वल रहे और अपने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया जाता था।
हॉकी खेलने और टूर्नामेण्ट जीतने के लिये हमें छः सात महीने लगातार प्रतिदिन छः सात घण्टे खेलाया जाता था। और अभ्यास भी (Practise) कराया जाता था। और ताक़त में वृद्धि करने तथा ख़ुश रखने के लिय प्रत्येक खिलाड़ी को प्रतिदिन जलेबी डालकर आधा सेर दूध पिलाया जाता था। हमें डिस्ट्रिक्ट टूर्नामेण्ट में दूसरे स्कूलों के साथ खेलने के लिये महीनों लगातार स्कूल से बाहर जाना पड़ता था और इधर स्कूल में झूठी हाज़िरी लगती रहती थी। इस तरह हमारी सब पढ़ाई मिट्टी में मिल गई।
जब यूनिवर्सिटी टूर्नामेंट (University Tournament) ख़त्म हुये तब हमें परीक्षा के दो तीन महीनें पहले ही स्कूल भेजा गया। जब स्कूल में पहुँचे तब पढ़ाने वाले सब शिक्षक (Teachers) हमें देखकर आग-बबूला हो गये। कक्षा (Class) शुरू होने से पहले ही शिक्षकों ने कहा कि, “हॉकी, फ़ुटबॉल और ‘टग ऑफ़ वार’ (Tug of war) रस्साकशी के सब खिलाड़ी (Players) बेंच पर खड़े हो जायें।”
जब हमने पूछा कि, “स्कूल वालों नें ही तो हमें खेलने के लिये भेजा था इसमें हमारा क्या दोष है?” तो शिक्षकों से हमें यह उत्तर मिला कि, “तुम्हें बेंच पर बैठने दिया तो तुम तो सोये ही रहोगे और इन दो-तीन महीनों में भी कुछ नहीं पढ़ सकोगे और फ़ेल हो जाओगे।”
लेकिन नवीं और दसवीं श्रेणी में जबकि पढ़ाई ठीक तरह से नहीं की और खेलते ही रहे तो दो-तीन महीने में साल भर की पढ़ाई कहाँ से आ सकती थी।
यह था मेरी क़िश्ती का अगले भँवर में फँसना।
अब यूनिवर्सिटी (University) इम्तहान (Examination) का साल आ गया। उस समय साल में बार-बार तिमाही इम्तहान हुआ करते थे जिनमें मैं हमेशा फ़ेल होता रहा। कोई आशा नहीं थी कि मैं यूनिवर्सिटी की वार्षिक परीक्षा में पास हो जाऊँगा, फिर भी आख़िर परीक्षा में तो बैठना ही था।
अब थोड़ा सा प्रसंग हमारे माननीय हेडमास्टर साहब बख़्शी रामरतन का भी सुन लीजिये। यद्यपि उनका शरीर तो छोटा सा और टेढ़ा-मेढ़ा था परन्तु थे बड़े कड़े हेडमास्टर। स्कूल के अनुशासन पर वे इतना ज़ोर देते थे कि उन्हें अनुशासन करने से ही कभी फ़ुरसत नहीं मिलती थी। तो वे सप्ताह में एक दिन दसवीं क्लास के सभी सैक्शनों के सारे छात्रों को हाल में इकट्ठा करके एक किताब को पढ़ाते जाते थे, और उसका सार अंग्रेज़ी में बतलाते जाते थे। और इस प्रकार सौ डेढ़ सौ पृष्ठ की किताब तीन चार घंटे में ख़त्म कर देते थे। सारे विद्यार्थी बेचारे ध्यान लगाकर अपनी कॉपियों में नोट लिखते जाते थे। लेकिन हेडमास्टर साहब इतना तेज़ बोलते थे कि मुझसे तो कभी नोट लिखा ही नहीं जाता था। एक दिन गुस्से में आकर मैंने खड़े होकर कहाः-
‘‘Sir, you are going like a mail train. I can’t follow you.”
यानिः “श्रीमान् आप तो मेल-ट्रेन की तरह दौड़ते जा रहे हैं मैं आपके पीछे चलने में असमर्थ हूँ।”
हेडमास्टर साहब नें गुस्से में आकर मुझे तुरन्त जवाब दिया (Rebuke) कियाः-
“You get out of the class. Third class passengers are not allowed in the mail trains!”
यानिः ‘‘तुम क्लास से बाहर निकल जाओ। मेल ट्रेन में थर्ड क्लास पैसेंजरों (यात्रियों) को आने की इजाज़त नहीं होती है!’’
खैर! भँवर में फँसी क़िश्ती का यही हाल होना था। इसके सिवाय और हो ही क्या सकता था?
मुझे उस समय अंग्रेज़ी पाठ्य-क्रम में चलने वाली पुस्तकों के नाम अब भी याद हैं जो इस तरह हैः-
1. Hunch back of Notre Dame
2. The Prisoner of Zenda
3. Ranganathan
हाँ एक पुस्तक और थी जिसका नाम मैं इस समय भूल रहा हूँ।
एक विषय (Subject) स्वास्थ्य और शरीर विज्ञान (Hygiene & Physiology) था। यह था (Optional subject) ऐच्छिक विषय। और मैं कभी इसकी क्लास में गया ही नहीं था। फिर भी बीच में छमाही इम्तिहान में तो बैठना ही पड़ता था। इसकी परीक्षा के पूरे प्रश्न-पत्र (Question paper) में से मैंने केवल एक प्रश्न का उत्तर दिया।
“where are the Scapulas in the body?”
मैंने प्रश्न के उत्तर में लिख दिया:-
“In the waist” कमर में। Hygiene physiology के अध्यापक को इस पर बहुत ही गुस्सा आया और कहा, कि “मैं तो साल भर पढ़ाता रहा हूँ और इस लड़के नें दस प्रश्नों में से केवल एक का तो उत्तर दिया है और वह भी इतना ग़लत और अशुद्ध कि जिसका कोई ठिकाना नहीं।”
अध्यापक मेरा कान पकड़कर मुझे हेडमास्टर साहब के दफ़्तर में ले गये और रोष में आकर हेडमास्टर साहब को सारा क़िस्सा सुनाया और कहा, “इस लड़के के अंग्रेजी में से पाँच नम्बर काट लें।”
हेडमास्टर साहब ने कहा-“आप चाहें तो Hygiene Physiology में से एक जीरों की बजाय डबल जीरों नम्बर दे दें किन्तु एक विषय (Subject) के नम्बर दूसरे विषय (Subject) में से कैसे काटे जा सकते है?”
अब आ गया क़तल का दिन। मैं पहुँचा यूनिवर्सिटी में इम्तहान देने के लिये। जैसे तैसे सारे विषयों (Subjects) के इम्तहान तो दे आया परन्तु स्वास्थ्य और शरीर विज्ञान (Hygiene Physiology) के इम्तहान में नहीं गया क्योंकि यह एक ऐच्छिक विषय (Optional subject) था। जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है इतिहास (History) तो मुझे आता ही नहीं था। किसी नें मुझे समझाया कि कॉपी ख़ाली न छोड़ना- जो जी चाहे ऊट-पटांग लिख देना। लेकिन तीन चार कॉपियाँ ज़रूर भर देना। परीक्षकों (Examiners) को फ़ुरसत तो होती नहीं है यदि कॉपी जाँचने के दिन अगर वे अपनी बीवी से लड़े हों तो कॉपियों के हिसाब से नम्बर डाल देते हैं, शायद तीर चल ही जाये। तो मैंने इस नेक सलाह का अनुसरण करते हुये बीस-पचीस पृष्ठों पर केवल लिख दिया-‘‘Akbar was a great king. Akbar was a great king.”
अब यह तो मालूम नहीं कि क्या हुआ परन्तु इतिहास (History) और भूगोल (Geography) इकट्ठे विषय थे और दोनों के 50-50 अंक थे। ‘जुगराफ़िया’ (भूगोल) तो मुझे बहुत अच्छा आता था और भारतवर्ष का नक़शा भी मैं बहुत अच्छा और सैकण्डों में बनाता था जिसमें बर्मा और सीलोन यानी आज का श्रीलंका भी शामिल हुआ करते थे। साधारणतया मैं 50 में से 40 या 45 अंक भूगोल में प्राप्त कर ही लिया करता था और ये नम्बर दोनों विषयों में पास होने के लिये काफ़ी हुआ करते थे। इस तरह इम्तहान हो गया! गंगा नहा लिये।