चाचा जी की आत्मकथा

8. स्वाधीनता संग्राम में मेरी ग़ोता - मेरी छलांग · Part 2 of 4

दिल्ली में भाग्य निर्णायक आगमन


उस शाम को मेरे पिताजी दूसरे कुछ लोगों के साथ बैठे हुए थे और वे लोग मेरे बारे में ही बातें कर रहे थे। पिताजी बोले, “हमारे सारे परिवार में करीब दो सौ या तीन सौ लोग हैं। उनमें से हर एक ऊँचे से ऊँचे ओहदों पर पहुँच गये हैं। ऊँची से ऊँची शिक्षा प्राप्त कर वे लोग एम0ए0, एल0एल0बी0 हैं; मिलटरी अफ़सर हैं, डिपुटी कमिश्नर हैं, पब्लिक-प्रौसीक्यूटर हैं और क्या-क्या नहीं हैं ....। और इधर एक मैं था, मैं भी आस लगाये रहता था कि मेरा बेटा भी पढ़ेगा, उच्च शिक्षा प्राप्त करेगा और वह भी कुछ बनेगा।” कहते कहते उनकी आँखें भर आयीं और आँसू बह निकले। एकाएक मेरी ओर घूमकर मुझे ही संबोधित करते हुए बोले, “अगर मेरे चार बेटों में से एक मर जाता तो भी मुझे उतना अफ़सोस नहीं होता। पर तुम्हारे कॉलेज छोड़ देने और पढ़ाई छोड़ देने ने तो मुझे बेहाल कर दिया है!”

इस से मुझे भारी चोट.. अन्दर ही अन्दर गहरा धक्का लगा। बिना किसी से कुछ कहे-सुने मैंने उसी रात घर छोड़ दिया।

मेरे पास पैसा-धेला तो कुछ था नहीं। मैं सीधा देहली आ गया जो कि अलवर के सब से पास का बड़ा शहर था। यह बात है सन् 1921 की। मैं तो देहली में किसी को भी नहीं जानता था। न ही तब तक मैंने कभी अकेले सफ़र ही किया था। सिवाय इसके कि स्कूल की छुट्टियों में अपने गाँव के पुश्तैनी घर से लाहौर और वापस घर। दिल्ली में उतरते ही मैंने काँग्रेस दफ्तर की दरयाफ़्त की। सीधा वहाँ चला गया और वहीं ठहर भी गया। तब फिर एक हफ़्ते के अन्दर ही आर्य-समाज की पूछताछ की.. तफ़तीश की तो मालूम हुआ कि उनके यहाँ तो ‘आर्य-कुमार सभा’ भी है। डाक्टर युद्धवीर सिंह उस के प्रेज़िडेण्ट थे और मैं भी इस का मेंबर बन गया।

वालंटियर मूवमेंट

सन् 1921 में ‘वॉलंटियर-मूवमेण्ट’-स्वयंसेवक आन्दोलन की हलचलें ‘प्रिंस ऑफ वेल्स’ की भारत-यात्रा को लेकर शुरु हो गईं जिनमें उनके स्वागत-समारोहों का डटकर बहिष्कार - ‘बॉयकॉट’ करना था। काँग्रेस ने युवराज के स्वागत से संबंधित सभी उत्सवों का जमकर बॉयकॉट किया जिसको विदेशी कपड़ों की होली जलाने के प्रोग्राम के साथ समूचे भारत में जगह-जगह आयोजन कर पूरा किया गया। परन्तु नवम्बर 1921 में ठीक युवराज के आगमन के दिन बम्बई में झगड़े शुरू हो गये। दंगे और खून-खराबा तीन या चार दिन तक होता रहा जिनमें 53 लोग मारे गये और लगभग 400 लोग हताहत हुए। गाँधीजी और श्रीमती सरोजिनी नायडू की पुरज़ोर अपीलों और उपदेशों के बावजूद उनको रोका नहीं जा सका। इस पर गाँधीजी ने लोगों की ज्यादतियों को लेकर प्रायश्चित-स्वरूप पाँच दिन का अनशन कर दिया।

देखने की बात है कि प्रिंस आफ वेल्स की भारत-यात्रा ने वॉलंटियर-मूवमेण्ट-स्वयंसेवक आन्दोलन को देशव्यापी युवाशक्ति संयोजना का स्वरूप दे दिया। तब तक के काँग्रेस वॉलंटियर सामाजिक कार्यकर्त्ताओं की एक टोली मात्र थे जो जनता की व तीर्थ यात्रियों की मेलों-ठेलों में, उत्सव-त्यौहारों में सहायता कर देते थे। बाढ़ व महामारी के समय- रोगियां व पीड़ितों की मदद को आ जाते और विचार-गोष्ठियों में, राष्ट्रीय जन-सभाओं के संयोजन में सेवीजन उपलब्ध करा देते थे।

अब वे हड़तालें कराने लगे। विदेशी कपड़ों का बॉयकॉट करने लगे। विदेशी कपड़ों की होली जलवाने के आयोजन करने लगे। मैं तो अभी बहुत छोटा था, सिर्फ सत्रह या अट्ठारह बरस का। मैं था एक दूत या हरकारा जो भी समझ लें। मेरा काम था संदेश आदि, चिट्ठी-पत्री लाना ले जाना व खादी एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाना और संयोजन संबंधी कार्यों में जहाँ जैसी आवश्यकता हो सहयोग व सहायता देना। मैं इसे दिन-रात एक करके पूरी लगन के साथ करता था क्योंकि मेरे भीतर एक आग धधक रही थी कि मैं देश के लिये क्या न कर दूँ।

13-14 लोगों की एक टोली से स्वयंसेवक आन्दोलन की शुरुआत की गई और एक व्यक्ति को इस का नेता या लीडर होना होता था। इस के प्रथम लीडर थे श्री आसफ़ अली। सभी स्वयंसेवकों को खादी यूनीफ़ॉर्म में होना होता था। खादी की कमीज़, खादी पैंट और खादी टोपी। मैं तो छोटा ही था सो बेश़क मेरे लिये इससे बढ़कर कोई मनोरंजन ही नहीं था कि मैं वालंटियरों के जुलूस में शुरू से आख़ीर तक जाऊँ। एक हफ़्ते में या पन्द्रह दिन में एक बार में समुचित संख्या में वॉलंटियर जुटा पाने पर यह मार्च संयोजित कर लेते थे।

‘वॉलंटियर मूवमैण्ट’ के कामकाज के बारे में पूरी गोपनीयता बरती जाती थी। ब्रिटिश सरकार और उसकी पुलिस को कुछ भी पता नहीं होता था कि अगले दिन के जुलूस में वॉलंटियरों का नेतृत्त्व कौन करेगा। कौन-कौन इसके वॉलंटियर होंगे और पीछे रहकर कौन इस आन्दोलन का संचालन करेंगे। वरना सरकार और उसकी पुलिस वॉलंटियरों को वरदी सिलने तक का मौका न देते और न ही उनका जुलूस ही निकलने देते। यहाँ तक कि मुझे भी इन गोपनीय योजनाओं का पूरा पता नहीं होता था।

इस संगठन में और भी कई संयोजक होते थे। मैं उन संयोजकों की अपनी पूरी योग्यता और क्षमता के अनुसार हर प्रकार से मदद करता था जैसे खादी खरीदना, कपड़ा दर्ज़ी के पास वॉलंटियरों के मापों के साथ ले जाना, वर्दियाँ तैयार करवाना, उनको लेकर विशेष स्थान पर जमा कराना और वॉलंटियरों को उपलब्ध कराना।

नई सड़क में पुरानी दिल्ली की एक पतली संकरी सी गली में मोहम्मद क़दरीस नाम का एक दरजी हुआ करता था जो वहाँ पर अपनी एक छोटी सी दुकान में ये सब वर्दियाँ सिया करता था। मैं उसे कपड़ा लाकर देता, वर्दियाँ तैयार करवाता, फिर मैं उन्हें डॉक्टर सुखदेव के दफ़्तर में जाकर सौंप देता था।

वॉलंटियरों के एक और लीडर थे जिनका नाम था सरदार नानकसिंह। वॉलंटियरों की कुछ टोलियों ने तो दिल्ली की मुख्य सड़कों पर जुलूस निकाले जिनमें चाँदनी चौक विशेष था। पर कुछ समय के बाद वॉलंटियरों की टोली के लिये लीडर ढूँढ़ना बेहद कठिन हो गया था।

उन दिनों मेरे पास बिल्कुल पैंसे नहीं होते थे। नई सड़क में टाइपिंग और शार्टहैंड की एक ‘पिटमैन्स अकैडेमी’ होती थी। उनके मालिक थे श्री गणपत राम। श्री गणपतराम जी और श्री राधारमण (वे नहीं, जो दिल्ली के चीफ़ एक्सीक्यूटिव कौंसिलर बने) हिस्सेदार थे। उनके दो तरह के कारोबार चलते थे। एक तो था स्विस घड़ियों के पुर्जों का जो पूरे देश भर में बेचा करते थे और दूसरा था टाइपिंग व शार्ट हैण्ड की इस संस्था का।

मैं उस संस्था में गया और टाइपिंग सीखने की अपनी इच्छा प्रकट की। वे चाहते थे कि मैं 2 रुपये मासिक उसकी फ़ीस के तौर पर अदा करूँ जो कि मैं कर नहीं सकता था। मैंने गणपत राम जी के सामने प्रस्ताव रखा किः “फ़ीस के बजाय क्या मैं आपके किसी काम आ सकता हूँ? यदि आप चाहें तो एवज़ में आपकी कुछ सेवा-ख़िदमत कर सकता हूँ। परन्तु पैंसे तो मैं दे नहीं सकता।” दया पूर्वक वे सहमत हो गये और मैं उनके घर के नीचे के ही एक बराण्डे में रहने लगा और सेवा के तौर पर बाज़ार से सब्ज़ी-तरकारी व अन्य ख़रीदारी का सौदा-सुलुफ़ करके ले आता। उनकी पत्नी मेरे मुफ़्त में टाइप सीखने के एवज़ में खूब कसकर काम लेतीं। वह एक अनुशासन-प्रिय ईसाई महिला थीं।

एक दिन जब मैं अकादमी में बैठा टाइपिंग की प्रैक्टिस कर रहा था कि श्री गणपत राम जी के साझेदार श्री राधारमण दफ़्तर में चले आये। उनकी कमीज़ शानदार विदेशी कपड़े की बनी थी। चलते हुए यह मेरी मेज़ में फँसकर उलझ गयी और फट गई। मैं तत्काल बोल उठा, “अगर आपने खादी पहनी होती तो वह फटती नहीं।” इस पर उनकी प्रतिक्रिया हिंसक हो उठी और उन्होंने खींच कर मेरी गाल पर एक थप्पड़ जड़ दिया।

डॉक्टर सुखदेव श्री गणपत राम और श्री राधारमण के अच्छे मित्र थे। उनकी आपसे में खूब बनती थी। जब उन्हें स्वयँसेवकों (वॉलंटियरों) के अगले जत्थे के लिये कोई नेता नहीं मिल रहा था तो हो सकता है कि किसी बदले की भावना या अन्दर के ग़ुस्से के मारे मैंने डॉक्टर सुखदेव को सुझाया किः “क्यों नहीं इस बार श्री राधारमण जी से ही जुलूस के लीडर बनने के लिये पूछा जाये?” उन्हें यह सुझाव जँच गया। उन्होंने जब राधारमण जी से पूछा तो वह वालंटियरों के जुलूस का नेतृत्व करने को एकदम तैयार भी हो गये।

अब क्योंकि जुलूस तो अगले दिन ही निकालना था तो वर्दियाँ तैयार करने में और दूसरे इंतेज़ामात करने के लिये हमें पूरी रात दौड़-घूप करनी पड़ी। जिस समय श्री राधारमण दरियागंज थियेटर में बैठे सिनेमा देख रहे थे हम कार्यकर्त्ता लोग वहाँ पहुँच गये। उन्हें बाहर बुलाया और उनके नाप लिये और उनकी खादी की वरदी भी दरज़ी के पास बैठकर तैयार करवा ली। निश्चित कार्यक्रम के अनुसार उन्होंने वॉलंटियरों के जुलूस का नेतृत्व किया और उन सबकी गिरफ़्तारी हुई। सभी को एक-एक वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गयी और सभी को दिल्ली से दूर पश्चिमी पंजाब (आज के पाकिस्तान) में मियाँवाली जेल में भेज दिया गया।

डॉक्टर सुखदेव और सरदार नानक सिंह जी ने दिल्ली के राष्ट्रीय आन्दोलन में अत्यंत महत्वपूर्ण भाग अदा किया। डॉक्टर सुखदेव गुरुकुल में पढ़े-बने आर्यसमाजी थे और राष्ट्र को पूर्णतया समर्पित व तपे हुए देशभक्त थे। सारे जीवन भर वे देश व काँग्रेस के काम में ही जुटे रहे। वे अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धानन्द जी के जमाई थे। उनकी पत्नी का देहान्त विवाह के कुछ ही समय बाद हो गया था। फिर उन्होंने दुबारा विवाह तो किया नहीं। वे बाक़ायदा एम0बी0बी0एस0 पदवीधारी मैडिकल प्रेक्टिशनर डॉक्टर थे। वे बरनाला गाँव में ऐलोपैथिक अस्पताल शुद्ध सेवावृत्ति से चलाते थे। ग़रीब, निर्धन और साधनहीन लोगों का इलाज वे बिना कुछ फ़ीस लिए निःशुल्क ही करते थे। बल्कि उन्हें कीमती दवाइयाँ भी मुफ़्त अपनी ओर से दिया करते थे। वे काँग्रेस में किसी पद या शक्ति के लिये नहीं थे। बल्कि बलिदान और आत्म त्याग की भावना के वशीभूत होकर जन-जन की सेवा के लिये लगे हुये थे। उनका काँग्रेस के क्षेत्र में त्याग, ग़रीबों और रोगियों की अथक व निरंतर सेवा के कारण न्यायतः बहुत ही ऊँचा दर्जा था।

उधर सरदार नानक सिंह एक व्यवसायी-व्यापारी थे। इन्होंने मैसर्स ई0 औस्बोर्न एण्ड कम्पनी की स्थापना हौज़ क़ाज़ी दिल्ली में की थी जो विदेशी रबड़ की कालीनों व रबड़ के ही अन्य सामान का कारोबार करती थी। मैं उनके दफ़्तर में ‘वॉलंटियर मूवमेण्ट’ के कामकाज के सिलसिले में अपने जुड़ाव की वजह से आया-जाया करता था। जब उनकी गिरफ़्तारी होनी थी या यूँ कहें कि जब उन्हें अपनी गिरफ़्तारी देनी थी तो उन्होंने अपने पिता सरदार वधवा सिंह से पूछा कि क्या वे उनकी अनुपस्थिति में उनके व्यवसाय की देखभाल करेंगे? उन्होंने मुझे भी बताया था किः “निश्चित है कि मेरी ग़ैरहाज़िरी में मेरा सारा बिज़नैस चौपट हो जायेगा। पर मैं इसकी परवाह नहीं करता। मुझे तो काँग्रेस मूवमैंट में सक्रिय रूप से भाग लेना ही है।” उन्हें एक साल के कठोर कारावास की सज़ा दी गई और उन्हें भी सुदूर मियाँवाली जेल में पंजाब में भेज दिया गया। जब वे जेल से वापस आये तो उनके बिज़नेस का- फले-फूले व्यापार का कुछ भी बाक़ी नहीं बचा था। उसी को फिर से खड़ा करने में उनको तीन या चार साल लग गए। उनको ‘देहली आयरन सिंडिके ट’ शुरू करना पड़ा जिसमें साझेदार थे लाला दीवान चन्द, सेठ रग्घूमल और डॉक्टर केशवदेव शास्त्री। सरदार नानकसिंह को इसका मैनेजिंग डायरेक्टर, बिना किसी पूँजी लगाने पर वर्किंग पार्टनर यानी कार्यकारी साझेदार के तौर पर नियुक्त किया गया।