चाचा जी की आत्मकथा

8. स्वाधीनता संग्राम में मेरी ग़ोता - मेरी छलांग · Part 4 of 4

दिल्ली - मेरी कर्मभूमि


आर्यसमाज

आर्यसमाज के सबसे विशिष्ट और उत्कृष्ट नेता थे स्वामी श्रद्धानन्द। अन्य लीडर थे बाबा मिल्खा सिंह, लाला नारायण दत्त, सेठ रग्घूमल और लाला बनवारीलाल। उन दिनों नई दिल्ली कॉम्पलेक्स जिसमें वायसरीगल लॉज (आज का राष्ट्रपति भवन), सैंट्रल असैम्बली (आज का पार्लियामेण्ट हाउस), सैंट्रल सैक्रेटेरियेट (आज का केन्द्रीय सचिवालय) आदि ये सब उस समय निर्माणाधीन थे- बनाये जा रहे थे। उनमें कितने ही बड़े और छोटे ठेकेदार आर्यसमाजी ही थे। वे वास्तव में आर्यसमाज के क्रिया-कलापों में, गतिविधियों में बड़ी सचाई और भक्तिभावना से भाग ले रहे थे। आर्य समाज मन्दिर चावड़ी बाज़ार में साप्ताहिक सत्संग एवं प्रवचनों का नियमित रूप से आयोजन होता था। उसी ज़माने में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में हिन्दू व मुस्लिम इकट्ठा हो रहे थे- मिल रहे थे। इधर स्वामी श्रद्धानन्द के नेतृत्व में आर्यसमाज मन्दिर में ‘शुद्धि’3-हिन्दू धर्म में परिवर्तन की हवा ज़ोरों पर चल रही थी। परन्तु अब काँग्रेस द्वारा ‘शुद्धि’ मूवमेण्ट को बिल्कुल बन्द कर दिया गया।

डा0 युद्धवीर सिंह के नेतृत्व में हम लोग ‘वाई.एम.सी.ए.’ (यंग मैन्स क्रिश्चियन एसोसियेशन) की तर्ज़ पर ‘वाई.एम.ए.ए.’ (यंग मैन्स आर्यन एसोसियेशन)-यानी “आर्यकुमार सभा” का सशक्त और सुव्यवस्थित संगठन निर्माण करना चाहते थे। इसकी स्थापना दिल्ली में की गई और विशाल व्यापक आधार पर संयोजित यह संस्था थोड़े से ही समय में अच्छी विकसित हो गई। डॉक्टर केशव देव शास्त्री जो अभी हाल ही में अमेरिका से लौटे थे ‘आल इंडिया आर्यकुमार सभा’ के अध्यक्ष चुने गये। इसकी कई कार्यशाखाओं की स्थापना यू0पी0, राजस्थान व पंजाब में की गई। वार्षिक सम्मेलन व अधिवेशन भिन्न-भिन्न स्थानों पर आयोजित होने लगे। हम केवल 25 वर्ष तक की आयु के नवयुवकों को ही इसका सदस्य बनाते थे और उस आयु को पार करने के बाद वे ‘समर्थक’ (Sympathisers) की कोटि में आ जाते थे। थोड़ा समय बीतने पर मैं आर्यकुमार सभा दिल्ली का सैक्रेटरी चुना गया। स्वाभाविक था कि मैं अपनी अधिक से अधिक योग्यता व क्षमता से इसका काम करता था। हम साप्ताहिक मीटिंग नियमित रूप से आयोजित करते थे। समय-समय पर ‘मॉक् पार्लियामेण्ट’ द्वारा विदेशी सरकार की आततायी नीतियों की धज्जियाँ उड़ाया करते और सामाजिक कार्य स्वयं सेवा की भावना-वॉलंटरी आधार पर करते थे। जब कभी जनता को कोई कठिनाई या कष्ट आ उपस्थित होते तो उनकी कठिन व भयंकर आवश्यकता के समय सच्चे मित्रों की भाँति मदद करने को तत्पर रहते। सहायता करते। मेलों, त्यौहारों, उत्सवों, धार्मिक समारोहों क्रिया-कलापों समारोहों और जन-सभाओं की समायोजना व उनका कुशलतापूर्वक संचालन करते। हम लोग आर्यसमाज की सक्रिय व सुसंगठित स्वयंसेवी युवा-शक्ति थे जो जन-सभाओं की आयोजना में, जुलूसों और प्रभात फेरियों के संयोजन संचालन में और पंडाल लगाने आदि हर क्रिया-कलाप की ज़िम्मेदारी तत्परता से उठाते थे। हम अपनी एक पत्रिका भी निकालते थे जिसका नाम था ‘आर्य कुमार’ जो पंडित नारायण प्रसाद ‘बेताब’ जी के वैनगार्ड प्रिंटिंग प्रेस में छपती थी-बिना कोई ख़र्चा दिये। आर्यकुमार की अधिकतर कवितायें भी बेताबजी की ही होती थीं। वे उर्दू के बड़े ऊँचे शायर थे। कवि थे। उनकी भाषा गंगा-जमुनी यानी मिली-जुली हिंदी व उर्दू की होती थी जिसे गाँधीजी ने ‘हिन्दुस्तानी’ के नाम से मानांकित करके देश के लिये स्वीकृत किया था। हमारे सदस्य लोग भी इसके लिए लेख लिख कर अपना-अपना अंशदान करते थे। हमने स्वामी दयानन्द जी की शताब्दी के अवसर पर आगरा में ‘अखिल भारतीय आर्यकुमार सभा’ का विशाल सेमिनार-विचार गोष्ठी-सम्मेलन का सफल आयोजन भी किया।

उन्हीं दिनों में एक बंगाली इंजीनियर मार्टिन एंड बर्न कम्पनी में काम करते थे जो कि ट्रावरकोर हाउस बना रही थी। यह सज्जन मेरे पड़ोसी थे। उन दिनों मैं पुरानी दिल्ली में अजमेरी गेट के पास रहता था। उनका एकलौता बेटा जो नौ-दस के बीच की उम्र का होगा चेचक यानी शीतला (बड़ी माता) के भयंकर आक्रमण में मर गया। उन दिनों में दिल्ली में बहुत थोड़े से ही बंगाली थे और उन्हें बच्चे को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान-भूमि तक ले जाने के लिये कोई भी नहीं मिल पा रहा था। वह मेरे पास आये और सहायता माँगी। मैं तत्काल उनके घर गया और उनके बेटे के मृत शरीर को देखा। उसकी लाश तो एकदम सड़ गई थी। मैं एकदम गया और आर्यकुमार सभा के पन्द्रह बीस सदस्यों को हाथोंहाथ बुला लाया जो मदद करने के लिये तत्क्षण तैयार हो गये थे। बिना किसी भय या घृणा के -जुगुप्सा के झटपट हमने मृत शरीर को एक कपड़े में लपेटा और जमुना जी ले गये और वहाँ उसका अंतिम संस्कार भी विधिवत् कर दिया। इसी तरह यदि कहीं बाढ़ आ जाती या अग्निकांड हो जाता तो आर्यकुमार सभा के सदस्य पीड़ित व्यक्तियों की सेवा-सहायता करने व राहत पहुँचाने को एकदम दौड़ पड़ते थे।

आर्यसमाज एक क्रान्तिकारी आन्दोलन था। यह परम्परागत हिन्दू समाज को सुधार कर इसको रूढ़िवाद और अंधविश्वासों से मुक्त करके उसे उसके वैदिक आदर्शों की प्राचीन और गौरवमयी स्थिति में पुनः प्रतिष्ठित करने के लिये कटिबद्ध था। पूर्णतया समर्पित था। इसने पंजाब के अधिकतर समझदार व प्रबुद्ध वर्ग के कल्पना -जगत को अभिभूत करके अपने अधिकार में ले लिया था और यह प्रगतिशील सामाजिक व धार्मिक चमत्कार था जो कि तथ्य बनकर उभर कर सामने आ रहा था। युगों से चली आ रही धार्मिक रूढ़ियों और भेड़चाल गत परम्परा पालन के विरोध में उठे इस चेतना के ज्वार में सशक्त और क्रान्तिकारी युवावर्ग को हिन्दू समाज की परम्परागत कट्टरता को चुनौती देने का मुँहमाँगा अवसर प्रदान कर दिया था। लाला लाजपतराय, स्वामी श्रद्धानन्द और महात्मा हंसराज आर्यसमाज के उत्कृष्ट उच्च कोटि के बढ़े-चढ़े सशक्त वक्ता थे-व्याख्यानदाता थे। ये सभी तीनों ही गाँधीजी के नेतृत्व में काँग्रेस में शामिल हो गये- वहाँ के नेतृत्व को सँभाला और देश की-भारतीय राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिये महान त्याग किये। जहाँ तक इस आग का सम्बन्ध है (पंजाब व उत्तर भारतीय) काँग्रेस के सक्रिय सदस्यों और लीडरों में से अधिकतर आर्यसमाज की धारा से ही खिंचकर आये थे।

लाला देशबन्धु गुप्ता जो पक्के आर्यसमाजी थे और मेरी ही उम्र के थे दिल्ली में मुझसे क़रीब एक वर्ष बाद ही आये थे। वह केवल मैट्रिक पास थे। वह एक लम्बा कुर्ता और तहमद (लुंगी) उनकी पोशाक थी और उनके हाथ में आठ फ़ीट लम्बी लाठी रहती थी। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने उनको अपने प्रथम सेनानायक के रूप में चुन लिया जब उन्होंने ‘तेज’ नाम से उर्दू दैनिक पत्र निकाला। गुप्त जी उर्दू, हिन्दी व अंग्रेज़ी तीनों भाषाओं में निष्णात थे और उनकी भाषा में ओज का प्रकाश था। काँग्रेस की गतिविधि में हम दोनों साथी थे कन्धे से कन्धा मिला कर काम करते थे। उन दिनों जब दक्षिण से श्री सी0 राजगोपालाचारी, श्रीसत्यमूर्त्ति व अन्य विद्वान् नेता आते व विशाल जन-सभाओं को अंग्रेज़ी में धाराप्रवाह भाषण देकर संबोधित करते थे, उस समय लाला देशबन्धु गुप्ता अपरिहार्य होते थे। उनके बिना तो गाड़ी चल ही नहीं सकती थी क्योंकि वही थे जो कि इन लोगों के गूढ़ विचारों से विजड़ित भाषणों का उसी समय शब्दशः रूपान्तर करते चलते थे। यहाँ तक कि कभी-कभी तो उनके मूल भाषण से भी अधिक सशक्त बनाकर इसे जनता के सम्मुख पेश करते थे। समय पाकर वह उच्चतम कोटि के प्रचण्ड राष्ट्रीय पत्रकार के रूप में सामने आये और अखिल भारतीय पत्रकार सभाओं में चोटी के पदाधिकारी होकर चुने गये- जैसे कि ‘ऑल इंडिया एण्ड इस्टर्न न्यूज़पेपर एडीटर्स सोसाइटी’ के अध्यक्ष और ‘आल इण्डिया न्यूज़पेपर्स एडिटर्स कान्फ्रेंस’ के सेक्रे टरी। फिर तो उन्होंने कई ‘अन्तर्राष्ट्रीय पत्रकार सम्मेलनों’ में देश से बाहर अनेक बार लंदन जाकर भी अपना अमूल्य योगदान दिया।

सुरेन्द्रनाथ जौहर

एक दिन मुझे सहसा लगा कि मेरा आरंभिक मूल नाम ‘सिकन्दर लाल’ (जिसके साथ मैंने अपनी मैट्रिकुलेशन परीक्षा भी पास की थी) तो कमी-बेशी में एक विदेशी नाम ही था और आर्य-समाज की विचार-धारा से जो भारत की वैदिक परम्परा से जुड़ी थी - कहीं भी मेल नहीं खाता था। तो मैंने अपना नाम परिवर्तन करने का निश्चय कर लिया। आर्यकुमार सभा की एक मीटिंग बुलाई गई जिसमें दो सौ से अधिक मेम्बर उपस्थित थे। वहाँ बाक़ायदा धार्मिक रीतिपूर्वक अनुष्ठान हुआ हवन-यज्ञ सम्पन्न हुआ व लड्डू का प्रसाद बाँटा गया और मैंने अपना नाम बदलकर ‘सुरेन्द्रनाथ’ कर लिया। हम लोग खत्री हैं पर उसका तो कोई विशेष महत्त्व नहीं है। नाम को बुलंद या वाक़ई में ज़ोरदार बनाने को हमारे परिवार के लोग जोहार (Johar) लिखा करते थे। मैंने इसे भी बदल दिया ‘जौहर’.श्रंनींत मानो शूरवीरता और पराक्रम को लेकर ही मेरे नाम में आ जुड़ा।