9. ख़िलाफ़त मूवमेंट और हिन्दू-मुस्लिम एकता · Part 1 of 3
हिन्दू-मुस्लिम एकता
उन दिनों में साम्प्रदायिक भेदभाव नहीं होता था और इसलिए न ही सम्प्रदायों में तनाव होता था न ही झगड़े-दंगे। ख़िलाफ़त मूवमेंट नें हिन्दू व मुसलमानों को गांधी जी के नेतृत्त्व में मिलाकर एक कर दिया था। कांग्रेस नें हिन्दू व मुसलमानों को प्रेम व सौहार्द के सूत्र में पिरोने में पहल की। स्वामी श्रद्धानन्दजी जो आर्य समाज के चोटी के नेता थे मुस्लिम नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे थे। केवल वही एक व्यक्ति थे जिन्हें जामा मस्जिद के पाक ‘मिम्बर’ - प्रवचन मंच से मुस्लिम जनता को सम्बोधित करने का अवसर उन दिनों में दिया गया था मुझे बताया गया था कि अन्य किसी भी दूसरे व्यक्ति को जो इस्लाम के अलावा किसी दूसरे धर्म का अवलम्बी हो यह अवसर या यह रुतबा कभी भी प्रदान नहीं किया गया। इसकी कभी आज्ञा तक नहीं दी गई। यह अपने में ही हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द व सौजन्य का जीता. जागता उदाहरण था-प्रमाण था जिसके लिए महात्मा गांधी जी-जान से लगे हुए थे।
उन दिनों के धार्मिक समुदायों की मनोवृत्ति और रवैये आजकल के साम्प्रदायिक और कट्टर पंथी, गुटबंदी की भेद-भावना भरे जैसे नहीं होते थे। देश की मुक्ति के लिये भिन्न. भिन्न धर्मों के मतों के समुदाय के समुदाय हाथ में हाथ मिलाकर एक जुट हो गये थे। कांग्रेस मूवमेंट में - उसके आन्दोलनों में सहयोग देनें के लिए हमारी मदद को सिख भाई आ जुड़ते थे, भले ही वे कहलाते अकाली ही थे। तब तक उन्होंने राजनीतिक दल या पार्टी का रूप नहीं अख्तियार किया था। बिल्कुल वैसे ही जिस तरह से हमनें आर्य कुमार सभा का निर्माण किया था उन्होंने अकाली दल बना लिया था और उनमें से अधिकतर तो नौजवान ही थे जो देश के लिए अपनी जानें तक कुर्बान करनें को - प्राण न्यौछावर करनें को तत्पर रहते थे। प्रस्तुत रहते थे।
हिन्दू-मुस्लिम एकता कोई ‘सुविधा-गत शादी’ जैसी समझौते-बाज़ी वाली घटना तो थी नहीं, जैसा कि कई आलोचकों का मत है। वरन यह तो देश के लिए या यूँ कहें कि एक महत्तर उद्देश्य था जिसके लिए सब एक हो दिलो-जान से विदेशी शक्ति से लड़ें। वे पूरी तरह से उस ज़माने में एक हो गये थे। हर एक था कि एक दूसरे की इज़्ज़त करता था। अपने अंदर से अदब-आदर करता था। कांग्रेस को ही लें, हम कभी एक क्षण के लिए भी नहीं सोच सकते थे कि यह हिन्दु है या मुस्लिम है या फ़लाना। उदाहरण के तौर पर हकीम अजमल ख़ाँ का ही दृष्टांत ले लें। मुझे याद है कि हालाँकि वे District (ज़िला) कांग्रेस कमेटी के नियमित सदस्य भी कभी नहीं रहे परन्तु हिन्दू समाज द्वारा वे अत्यन्त सम्माननीय माने जाते थे, जो था उनके अपने व्यक्तित्त्व व पेशे के कारण। वे अपनी शफ़ा को - रोग निवारक क्षमता को सभी के लिए समान रूप से बिना किसी भेदभाव के, प्रयोग में लाते थे। जब ‘ख़िलाफ़त’ आंदोलन चलाया गया तो इससे राष्ट्रीय लक्ष्य को भी बल मिला। निःसंदेह यह तो उस समय की आवश्यकता ही थी। ऐसी प्रवृत्तियाँ कुछ समय तक चलती हैं फिर धीरे-धीरे मंद पड़कर गतिहीन हो जाती है और अपनी प्रासंगिकता खो देती हैं। किन्तु सभी धर्मों के मतों के बुनियादी उसूल उनके मौलिक तत्त्व तो सर्वकालीय व सार्वभौमिक होते हैं। विश्व ‘जनीन’ ही होते हैं। यह तो सिर्फ़ हमारी अपनी कट्टरता भरी धर्मान्धता और संकुचित मनोवृत्ति होती है जो हमें दूसरे प्रकार की विचार-धारा में डाल कर और ही तरह के सोच देने लगती है। इससे तो कोई ख़ास फ़र्क्र नहीं पड़ता कि कोई किस प्रकार से उठ बैठ कर अपनी प्रार्थना व दुआ करता है या उससे सम्बद्ध क्रियायें करता है। दरअसल कट्टरता और धर्मांधता तो बहुत ही बुरी चीज़ है, बल्कि यह तो धर्म के उजले नाम पर ही धब्बा है।
सन् 1920 के दशक और उसके शुरू के वर्षों में दिल्ली के प्रमुख नेता थे हक़ीम अजमल ख़ाँ, डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी, बैरिस्टर मिस्टर आसफ़ अली, मौलाना हासरी और जनाब अब्दुल्ला चूड़ीवाला। हज़ारों मुसलमान थे जो राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय थे। डॉक्टर मुख्तार अहमद अन्सारी की शानदार व सुव्यवस्थित मेडिकल प्रैक्टिस चली हुई थी और कितनी ही मुस्लिम रियासतों के तो वह डॉक्टरी सलाहकार थे। मैडिकल कॉन्सल्टैन्ट थे। मिस्टर फ़रीदुल हक़ अन्सारी थे जो डॉक्टर अन्सारी के भतीजे थे और जो काँग्रेस के प्रमुख नेताओं में से थे और बीस वर्षो तक वे प्रांतीय काँग्रेस कमेटी (प्रॉविन्शियल काँग्रेस) कमेटी के सदस्य भी रहें। वह तो जब समय बीतने पर महात्मा गांधी और श्री मोहम्मद अली जिन्ना के बीच में लम्बी विचार विमर्श भरी वार्त्ताएँ शुरू हो गईं कि हालात भी धीरे-धीरे बदल कर गिरावट की ओर जाने लगे और चरम परिणति के रूप में हिन्दू और मुस्लिम की दरार पड़ गई और भारतीयों की दो खेमों में टूटकर बाँट होने लगी।
दिल्ली में गाँधीजी का अनशन
18 सितम्बर 1924 को जब हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए तो गांधीजी नें अनशन (भूख हड़ताल) कर दिया। तब वे दिल्ली के कूँचा चेलाँ मुहल्ले में मौलाना मोहम्मद अली के घर पर उपवास में थे। सारे शहर में बड़ी उत्तेजना व हलचल थी। हर एक इन्सान बेहद बेचैन परेशान था। जो हो सभी लोग प्रार्थना कर रहे थे कि गांधी जी इस कठिन दौर को पार कर लें और सफलतापूर्वक इस अग्नि-परीक्षा से नाजुक परिस्थिति बाहर आ जायें। मैं गांधीजी के इस उपवास को भावनात्मक रूप से बहुत गहराई से महसूस कर रहा था। सो मैं मौलाना मोहम्मद अली के घर रोज़ जाता और वहाँ पर कुछ समय अवश्य बैठकर आता। इस उपवास से हिन्दू-मुस्लिम एकता के लक्ष्य की पूर्त्ति में काफ़ी बढ़ावा हुआ।
वर्ष 1924 की त्रासदी थी या कहें कि महा-भयंकर दुर्घटना श्रृंखला थी (हिन्दू. मुस्लिम) साम्प्रदायिक दंगों के अलावा देश के विभिन्न स्थानों में फूट पड़ना जो विशेषकर दिल्ली, लखनऊ, शाहजहाँपूर, इलाहाबाद, जबलपुर, गुलबर्गा और कोहाट में हुए। सितम्बर 9 व 10 के उत्तर के पश्चिमी सीमान्त प्रांत में कोहाट में भीषण दंगे हो गए। साम्प्रदायिक एकता को पोषण करनें वाले गहरे प्रयत्नों को जिनकी रचना साधनें में उनको संजोनें में एक दशक का समय लग गया था, भारी व गहरा धक्का पहुँचा। अंदाज़ लगाया गया कि उनमें 155 व्यक्ति मारे गए, मंदिर तोड़े गए ध्वस्त किये गए भीषण हत्या-काण्ड हुए। गांधी जी और शौकत अली को लेकर इस दंगे के कारणों और हालात की जाँच करने के लिए कमेटी नियत की गई। उन दोनों नें रिपोर्ट पेश तो की परन्तु दंगों के लिए ज़िम्मेदार पार्टियों को लेकर उनमें ही मतभेद था। कोहाट के भयानक एवं नृशंस हत्याकाण्ड पर कोहाट शरणार्थी कार्य समिति की ओर से मुद्रित व प्रकाशित भर्तृहरि स्कूल कोहाट के हेडमास्टर लाला नन्दलाल द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट को लेकर मुस्लिम सम्प्रदायों में गहरा तनाव हो गया। अतः एक स्पेशल रेलगाड़ी द्वारा चार हज़ार हिन्दुओं को वहाँ से बाहर निकाला गया जिनमें से अकेले दो हज़ार छः सौ को तो रावलपिण्डी में दो महीनें के लिए शरण दी गई और शेष चौदह सौ को अन्य स्थानों पर रक्खा गया।
इन हालात में यह तर्क संगत था कि गांधीजी इक्कीस दिन के उपवास पर चले जाते। उन्होनें सबकी ओर से अपने आप को इन सभी हिंस्त्र व नृशंस दंगों के लिये उत्तरदायी माना सो आत्म-शुद्धि के लिए व अपने अपराध का प्रायश्चित करनें की अंदर की आवाज़ की पुकार को सुना। यह उपवास उनके लिए एक कठिन अग्नि-परीक्षा बन गया क्योंकि अभी हाल ही में तो वे प्राणघाती अपेंडिसाइटिस के हमले से निकले थे। उपवास का प्रारंभ तो मौलाना मोहम्मद अली दिल्ली वालों के निवास पर हुआ किन्तु बाद में उनको शहर के बाहर एक मकान में पहुँचा दिया गया। अब सब सम्प्रदायों के प्रमुख भारतीय नेतागण ‘एकता सम्मेलन’ - ‘द यूनिटी कॉन्फरेंस’ में शिरक़त करने को एक मंच पर इकट्ठा हुए जिसकी लम्बी लम्बी बैठकें 26 सितंबर से 22 अक्टूबर 1924 तक चलीं। एक केन्द्रीय पंचायत का गठन किया गया जिसके संयोजक व प्रधान थे गांधीजी और इसके सदस्य थेः हकीम अजमल खाँ, लाला लाजपतराय, श्री जी. के. नरीमन, डॉक्टर डी. के. दत्ता और लायलपुर के मास्टर सुन्दरसिंहजी। ‘यूनिटी कॉन्फ़रेंस’ नें प्रतिज्ञा ली कि शुद्ध अंतःकरण और धर्म के मार्मिक सिद्धान्तों को लागू करने की स्वाधीनता के लिए पूरी सच्चाई व ईमानदारी से दिलोज़ान से भरपूर कोशिश की जायेगी और न सिद्धान्तों में कठिन से कठिन व भारी से भारी उत्तेजक परिस्थिति में भी रंचमात्र भी हटना या समझौता करना घोर निन्दनीय होगा। उन्होंने धार्मिक विश्वासों के रखनें की और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकार को लेकर जिनमें पूजा व इबादत स्थानों की पवित्रता, गो-वध, मस्जिदों के सामने संगीत आदि के नियम प्रतिबंधों सहित निर्धारित कर दिये। समाचार-पत्रों एवं पत्रकारों को भी अपने संवाद-सूचना, समाचार व खबरें देने में सतर्कता व संयम रखने की सलाह अनुशंसा दी गई। एवं लोगों को गांधी जी के अनशन के अंतिम सप्ताह में शुद्ध हृदय से प्रार्थना व दुआ करने का अनुरोध किया गया। 8 अक्टूबर का दिन जन-सभाओं और धन्यवाद ज्ञापन की सार्वजनिक प्रार्थना के लिए रेखांकित कर दिया गया।