8. स्वाधीनता संग्राम में मेरी ग़ोता - मेरी छलांग · Part 3 of 4
जीवन-संघर्षः जीने के लिये जद्दो-जहद
मेरा देहली में आजीविका का कोई ज़रिया नहीं था। कोई साधन नहीं था। ख़ैर इसके पीछे एक लम्बी कहानी थी। मेरे पिताजी ने मेरा पता लगाकर अलवर से मुझे दस रुपये का मनीऑर्डर भेजा। परन्तु मैंने लेने से इन्कार कर दिया। उसे वापस कर दिया। क्योंकि उन्होंने ही तो मुझे कहा था कि उन्हें मेरे कॉलिज (डी0ए0वी0 कॉलिज, लाहौर) छोड़ने का बहुत दुःख था!
कम से कम दो वर्ष तक मैं दिल्ली में एक आना (चार पैसे) रोज़ के ख़र्चे पर रहा जो मैं एक घण्टे में कमा लेता था। मैंने दो रुपये डॉक्टर युद्धवीर सिंह जी (जो काँग्रेस और आर्यकुमार सभा के नेता थे और जो दिल्ली के पहले चीफ़ एक्सीक्यूटिव कौंसिलर के उच्चपद पर पहुँचे) की धर्मपत्नी श्रीमती राजरानी देवी से उधार में लिये। सदर बाजार से उनकी ढेर सारी स्टेशनरी - कागज़, कलमें, दवात, स्याही, कापियाँ, पैंसिल, रबड़ आदि खरीदकर ले आया। यह क्रम चलता रहा। उन दिनों में तो दो रुपयों में काफ़ी सारा सामान आ जाता था। चरख़ेवालान में तब एक स्कूल होता थाः “कामर्शियल हाईस्कूल”। आधी छुट्टी के घंटे में मैं स्कूल से बाहर एक छोटी सी चादर पर यह सारा सामान कापी, पैंसिल, कलम, दवात आदि करीने से लगाकर बेचने को बैठ जाता। उससे रोज़ एक आना या उससे ज़रा ऊपर-नीचे कमा लेता। उसी पर लगभग दो साल जिया। गुज़र-बसर की। इस बीच मैंने टाइपिंग भी सीख ली।
श्रद्धानन्द बाज़ार - तब के ‘बर्न बैस्शन रोड’ पर एक रोज़गार दिलाने की एक प्राइवेट संस्था थी। मैं वहाँ गया और उनसे पूछताछ की कि क्या वह मुझे भी नौकरी दिलवा सकते हैं। इस पर उन्होंने बताया, “हाँ, पर इसके लिये पहले तो वहाँ मुझे अपना नाम दर्ज कराना होगा। रजिस्टर कराना होगा। जिसके लिये दो रुपए भरने होंगे। फिर नौकरी मिलने पर पहले महीने की आधी तनख़्वाह भी रोज़गार दफ़्तर में देनी होगी।” मैंने उत्तर दिया;“मैं अपने पहले महीने की आधी तनख़्वाह दे दूँगा परन्तु अभी मैं दो रुपया नहीं दे सकता।” वहाँ का मैनेजर बड़ा सहृदय था। वह मुझे रजिस्ट्रेशन फ़ी के दो रुपये भी बाद में नौकरी मिलने पर आधी तनख़्वाह के साथ लेने को मान गया। लिहाजा मुझे टाइपिस्ट के तौर पर नई सड़क में शोलापुर में नौकरी मिल गई। तब मैंने अपने आधे महीने की तनख़्वाह के साथ रजिस्ट्रेशन फीस के दो रुपये भी रोजगार दफ़्तर में अदा कर दिये। मैंने दुकान के मालिक के साथ एक समझौता कर लिया कि दिन में केवल चार पाँच घंटे ही उनका काम कर सकूँगा क्योंकि मुझे तो काँग्रेस और आर्यकुमार सभा के लिये काम करना होता है। वह मेरी शर्त पर राज़ी हो गये और मुझे प्रतिमाह 25 रुपये देने लगे। वह मुझे जो भी काम देते वह मैं आनन फ़ानन में निबटा देता। उन्होंने मेरे काम की इतनी अधिक गुण ग्राहकता की... क़दरदानी की कि उन्होंने मुझे दीवाली पर दस रुपये पुरस्कार स्वरूप बोनस में दिये और साथ में एक मिठाई का डिब्बा भी दिया जो कि उन दिनों के लिहाज़ से असाधारण था-बिरला ही था।
इसी दौरान मेरे पिताजी देहली में मुझे खोजते हुए आये और आर्य समाज के रास्ते से मुझे ढूँढ़ निकाला। मैं अभी भी शोलापुर मिल में काम कर रहा था जब कि रहता श्री गणपतरामजी के घर के बरामदे में ही था जो कि सँकरी गली में था। श्री गणपतराम के यहाँ एक गाय पाली हुई थी और उसी के साथ लगकर मेरी खाट रहती थी जिस पर मैं सोता था। कभी-कभी, सोते-सोते अचानक मैं पाता कि गाय ने मुझ पर गोबर कर दिया है। मैं अपनी अँगीठी को जो कि मिट्टी की थी अपनी खाट के नीचे ही रखता था क्योंकि अपना भोजन मैं अपने हाथ से स्वय बनाता था। सवेरे-सवेरे ही मैं अपने लिये दिन भर के लिये ढेर सारी चपातियाँ बनाकर रख लेता था और पास के हलवाई (मिठाई वाले) से सैपरेटा दूध का दही ख़रीद लाता था। रोज़ का नियमित ग्राहक होने के नाते मैं उसे एक पाई (एक पैसे का तीसरा भाग) पकड़ाता और वह बदले में मुझे ढेर सारा दही दे देता। दही बड़ा स्वादिष्ट होता था और मुझे अपना भोजन खाने में बड़ा ही आनन्द और रस आता। जब मुझे पच्चीस रुपये मासिक वेतन भी मिलने लगा और मैं बेहतर रहन-सहन के लिए समर्थ भी हो गया था परन्तु तब भी भोजन मैं अपना स्वयं ही बनाता था और रहता भी श्री गणपतरामजी के मकान में ही था।
मेरे पिताजी मुझे लाला दीवानचन्द के यहाँ ले गये जो ज़िला जेहलम के पास के ही गाँव से थे। वे मिलिटरी-सेना के लिये कोयला और नमक के ठेकेदार थे और दिल्ली में आर्य समाज के लिए शक्ति-स्तम्भ थे। पुरानी दिल्ली में जामा मस्जिद के पीछे ही उनका अपना मकान था। जिसका नाम था ‘दीवान भवन’। मेरे पिताजी ने उन नवयुवक ठेकेदार से मेरे परिचय में कहाः “लालाजी हम लोग भी जेहलम ज़िला से ही हैं। यह मेरा पुत्र है पर विद्रोही है, बाग़ी है। यह यहाँ आ गया है बिना किसी भरण-पोषण के सहारे के। और यह वापस भी जाना नहीं चाहता। यह टाइप-राइटिंग जानता है। यदि आप इसे अपनी कम्पनी में काम में लगा सकें तो मुझे यह तसल्ली रहेगी कि यह एक सुरक्षित जगह पर है।” लाला दीवानचन्द मुझे 50 रुपये महीना पर टाइपिस्ट के पद पर रखने के लिये राज़ी हो गये। वे मेरा बहुत ध्यान रखते थे, नहीं तो टाइपिस्ट को इन दिनों में इतनी अधिक तनख़्वाह पर नौकरी नहीं मिलती थी। शायद वे मेरे पिताजी के आग्रहपूर्ण अपील और कार्य-सिद्धि के लिये लगनपूर्ण अनुसरणशीलता से हिल गये थे। प्रभावित हो गये थे।
तदनन्तर श्री गणपतरामजी के घर से मैं अपना सामान लेकर दीवान भवन में आ गया। दिन के समय मैं अपना बिस्तर दफ़्तर में अपने काम की मेज़ के नीचे रख लेता था और रात के समय वही बिस्तर अपनी मेज़ पर बिछा लेता और सो जाता। अपना भोजन अब मैं नई सड़क और चावड़ी बाजार के चौरस्ते पर के ढाबों में से एक ढाबे में खाने लगा। ढाबे का नाम पेड़ के नाम पर रखा गया था ‘बड़शाह बुल्ला’ और इसके मालिक यानी ढाबे वाले का नाम था सरदार केशर सिंह। कभी-कभी लाला दीवानचन्द जी की पत्नी मुझे अपने यहाँ से खाना दे देतीं। उन दिनों मैं दफ़्तर में टाइपिस्ट का काम दिन में करता और काँग्रेस व आर्यकुमार सभा का काम तड़के सुबह से दफ़्तर के समय तक और शाम को दफ़्तर के समय के बाद से देर रात तक करता रहता था।
एक वर्ष बाद या कुछ इधर-उधर, यह एक अद्भुत संयोग था, कि सरदार नानक सिंह को हमारे ऑफ़िस में ही एक छोटा कमरा दिया गया। उन्होंने अपना शीर्षनामा (लेटर-हैड) बड़ी ख़ूबसूरती से छपवाया ‘दिल्ली आयरन सिंडीकेट’। उन्होंने मुझे अपने कमरे में बुलाया और और मुझसे बोले, “क्या तुम पाँच से दस सर्कुलर-व्यापार पत्र रोज़ टाइप कर के मुझे दे सकते हो जिन्हें ठेकेदारों को भेजा जाय?” मैंने उत्तर दिया, “आपको कुल कितने सर्कुलरों की ज़रूरत है?” उन्होंने कहा, “मुझे क़रीब 500 या 1000 तक चाहिये। पर यह कोई विशेष ज़रूरी नहीं है। ऐसा ‘अर्जेंट’ नहीं है। कृपया आप जब ख़ाली हों तो उसमें से वक़्त निकाल धीरे-धीरे करते रहें।” बेशक़ मैं दिल्ली आयरन सिंडीकेट का तो मुलाज़िम नहीं था। शायद यही कारण था कि वह मुझसे विनय पूर्वक माँग कर रहे थे। सो जैसे ही 5 बजे सायं हमारा दफ़्तर बन्द हुआ मैंने टाइप करना शुरू कर दिया और सुबह तक 1000 कापियाँ बना दींऔर उन्हें उनकी मेज़ पर रख भी दिया।
अगले दिन 10 बजे जब सरदार नानक सिंह दफ़्तर में आये तो अपनी टेबल पर सर्कुलर की 1000 कापियाँ देख कर हैरान हो गये। उन्होंने मुझे बुलाया और गुस्से से पूछा, “यह तुमने कहाँ से इनको टाइप कराया है?” मैंने उत्तर दिया, “मैंने स्वयं इन्हें टाइप किया है।” पर वह तो कहते ही गये, “अरे यह इन्सानी तौर पर कैसे मुमक़िन हो सकता है? कोई भी इंसान एक हजार 1000 कापियाँ तो टाइप नहीं कर सकता है। मैंने तो तुम्हें यह काम कल शाम को ही दिया था!” उन्होंने जाँचा, परखा और पाकर हैरान हो गए कि वे सभी एक ही टाइपराइटर पर टाइप किये गये थे। मैंने उन्हें बतायाः “बस सारी रात भर मैं टाइप करता रहा था और मैंने ही इन्हें टाइप किया है।” उन्होंने सर्कुलर की सारी 1000 कापियाँ उठाईं और लाला दीवानचन्द के पास ले गये और इस असाधारण कार्य के बारे में उन्हें अवगत कराया। लालाजी ने भी इसकी पुष्टि कीः “जब सवेरे चार बजे मैं घुड़सवारी कर रहा था तो मैंने इसे टाइपिंग करते देखा था। यह सच है।” इस उपलब्धि, चमत्कारिक कार्य-सिद्धि से पूरे ऑफ़िस में एक सनसनी/उत्तेजना फैल गयी और इससे मुझे बहुत प्रशंसा और आदर भी मिला। यह मेरी एक आन्तरिक गुण-धर्मिता है कि मैं प्रत्येक कार्य को शक्ति और उत्साह से करता हूँ। यदि कहीं शहर में आग लग जाये तो मैं पहला व्यक्ति होऊँगा जो वहाँ दौड़कर घुस जाये और आग बुझाने में लग जाये। यह भावना मुझमे-मेरे पूरे अस्तित्व के कण कण में पूरी तरह छाई रही-समाई रही। वह क्यों थी यह तो मैं बता नहीं सकता पर वह थी तो थी ही।