सुरेन्द्रनाथ जौहर की रिहाई
Part 1 of 2
मुकद्दमा न0 120/3
दिनांक 26/9/1942
सरकार विरोध में सुरेन्दरनाथ जौहर
ताज मंगतराम, देवाराम,
नरंजन सिंह, गफू र
और हीरालाल
इस मुक़द्दमे में निम्नलिखित व्यक्तियों पर सैक्शन 325(बी) के तहत जिसे 149 भारतीय दंड संहिता (I.P.C.) एवं सैक्शन 332 जिसे 149 जिसे भारतीय दंड संहिता (I.P.C.) के साथ पढ़ा जाए अभियोग चलाया गया है।:-
1. सुरेन्दर नाथ जौहर वल्द लाला काहन चन्द
2. मंगतराम वल्द गनेशी लाल
3. देवा सिंह वल्द बुलाजी दास
4. नरंजन सिंह वल्द नथा सिंह
5. गफू र वल्द मौला दक़् शब
6. हीरालाल वल्द हुकमी
संक्षेप में बताया जाये तो अभियोग का मुक़द्दमा इस प्रकार हैः-
दिनांक 17 सितम्बर 1942 को राय साहब गोपालदास जो तब दिल्ली में सी0 आई0 डी0 के ऐडीशनल सुपरिण्टैडैन्ट पुलिस के पद पर थे, उनको सुपरिण्टेन्डैन्ट पुलिस सी0 आई0 डी0 मिस्टर मैल्लॅ र से हिदायत मिली कि उनको सुरेन्द्र नाथ जौहर को भारत सुरक्षा कानून के तहत 129 धारा में गिरफ़्तार करना है। इस पर राय साहब गोपालदास ने कुछ पुलिस अधिकारियों को जौहर के रिहायशी मकान पर और जौहर की आवा-जाई पर निगरानी रखने की हिदायतें जारी कर दीं और उन्हें निर्देश दिया कि जैसे ही जौहर की मौजूदगी का निश्चित रूप से पता लगे तो उनको (राय साहब गोपालदास को) तत्काल सूचित किया जाये। अगले दिन यानी 18/9/42 को दोपहर को एक बजे के करीब राय साहब गोपालदास को अपने एक पैदल कॉन्स्टेबल से टेलीफ़ू न पर सन्देश मिला कि उस समय जौहर को उसके ऑफ़िस में पाया जा सकता है। इस समय वह वहीं है। सब-इन्स्पैक्टर भगवानदास जैन को अपने साथ लेकर राय साहब गोपालदास नई दिल्ली पुलिस स्टेशन पर आ गए जहाँ से और कई पुलिस अफ़सरों से लैस होकर वे जौहर के कनॉट प्लेस में स्थित ऑफ़िस की ओर बढ़े। जब वे ऑफ़िस के पास पहुँचे तो हेड कान्स्टेबल रामलुभाया द्वारा पुलिस पार्टी को सूचना मिली कि जौहर एक छोटी सी कार में, जिसका रजिस्टर्ड नम्बर डी0 एल0 एच0-3803 था, बैठकर अभी-अभी अपने घर के लिये निकल गये। इस सूचना के मद्दे-नज़र (दृष्टि में रखकर) राय साहब गोपालदास, इन्स्पेक्टर सीताराम, सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन और असिस्टेंट ऐडीशनल सब-इन्स्पेक्टर रशीद-उल-हसन सभी जौहर के मकान पर जो सेंट्रल लेन नई दिल्ली में है अपने पुलिस वाहनों से आ पहुँचे। वहाँ पर इन्स्पेक्टर सीताराम और ए0 एस0 आई रशीदुल हसन को घर के सामने की ओर से निगरानी के लिए नियुक्त किया गया जब कि सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन और राय साहब गोपालदास घर के पिछवाड़े पर तैनात हो गए। वहाँ उनको पैदल कान्स्टेबल नज़ीर अहमद से खबर लगी कि जौहर अभी-अभी अपनी कार से बाबर रोड की ओर निकल गये हैं। इस पर राय साहब गोपालदास और सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन, राय साहब गोपालदास की कार में बैठकर उस दिशा में चले गये। वहाँ वे जौहर तक पहुँचने में नाक़ामयाब रहे। पर राय साहब गोपालदास को यह मालूम था कि जौहर महरौली पर अपना एक मकान बनाने में लगे हैं इसके आधार पर वह महरौली की ओर बढ़ गए। इत्तफाक़ से वे मक़ान को पार करके आगे ही निकल गये। यह पता लगने पर राय साहब गोपालदास ने अपनी कार पीछे की और वापस आ गए। वह और उनके साथी ने घर का पता लिया यानि ढूंढ-ढांढकर घर पहुँच गए जो निर्माणाधीन था, जहाँ उनको सूचना दी गई कि जौहर वहाँ पर नहीं थे। तब वे वापिस फिर देहली की तरफ बढ़ने लगे और तभी घर से लगभग एक मील दूरी पर राय साहब गोपालदास ने उलटी दिशा से कार को आते देखा जिस पर रजिस्टर्ड नम्बर डी0 एल0 एच0 3803 लगा था। ज्यूँ ही वह गुज़री तो राय साहब गोपालदास ने देख लिया कि जौहर इसे चला रहे थे। राय साहब गोपालदास ने अपनी कार मोड़कर पीछे की और जौहर का पीछा करने लगे। अपने घर तक पहुँच पाने के लिए जौहर के लिये यह ज़रूरी था कि यें मुख्य पक्की सड़क को छोड़ दें और कच्चे रास्ते पर आ जायें। ऐसा करते हुए उन्होंने अपनी कार अपने निर्माणाधीन मकान के सामने लाकर रोक दी। राय साहब गोपालदास भी अपनी कार कच्ची सड़क पर ले आये और उसे जौहर की कार के पीछे रोक दिया। जैसे ही जौहर अपनी कार से उतर कर बाहर आ रहे थे कि राय साहब गोपालदास और एस0 आई0 भगवानदास जैन ने उन्हें पकड़ लिया। जौहर ने पूछा कि, ‘क्या बात है-क्या मामला है!’ और राय साहब गोपालदास ने उन्हें सूचना दी कि उनको भारत रक्षा कानून-डिफ़े न्स ऑफ़ इंडिया रूल की 129 धारा के अन्तर्गत गिरफ़्तार किया जा रहा है। इस पर जौहर ने शोर मचा दिया। -संकट- सूचना हो गई। ख़तरे का संकेत पाकर उनके मक़ान पर काम करने वाले आठ या नौ जने घर के भीतर से और आस-पास में से आ निकले और एकदम राय साहब गोपालदास और एस0 आई0 भगवानदास जैन पर हमला शुरू कर दिया। ये लोग आरे, करनी, डंडों और लाठियों से लैस थे। अब क्योंकि पुलिस अफ़सरों के विरुद्ध परिस्थितियाँ इतनी अधिक विसंगति में थीं कि जौहर को बचा लिया गया।
जौहर ने अपने ड्राइवर को बुलाया जिसने उनकी कार को पीछे किया और जौहर को दिल्ली गाड़ी में ले चला। बड़ी कठिनाई से राय साहब गोपालदास और एस0 आई0 भगवानदास जैन ने अपनी मुक्ति करवा पाई और फिर अपनी गाड़ी में बैठकर जौहर का पीछा करने लगे।
वे रास्ते में तो जौहर को पकड़ नहीं पाए पर तो भी वे ठीक उनके पीछे ही आ रहे थे, जब वे अपने सेन्ट्रल लेन में अपने घर में प्रविष्ट हुए। सब-इन्स्पेक्टर सीताराम और ए0 एस0 आई0 रशीदुल हसन को तो पहले से ही इस घर पर छोड़ा हुआ था और ज्यूँ ही जौहर यहाँ पहुँचे, राय साहब गोपालदास ने इन दोनों पुलिस अफ़सरों को जौहर को गिरफ़्तार करने को कहा। इन्स्पेक्टर सीताराम ने और ए0 एस0 आई0 रशीदुल हसन ने जौहर को पकड़ लिया इससे पहले कि उन्हें गाड़ी से उतरने का समय भी मिल पाता।
उन परिस्थितियों में जो जौहर, मंगतराम (ड्राइवर) और दूसरे अन्य व्यक्तियों के खिलाफ़ एक और ही अभियोग के कारण-सूत्र में ग्रथित हो गइंर् कि जिसके तहत पुलिस दल मय जौहर और मंगतराम (ड्राइवर) सेन्ट्रल लेन के घर से ज़ाहिराना तौर पर, प्रगट रूप में तो नई दिल्ली पुलिस थाने (पार्लियामेन्ट स्ट्रीट) के लिये गए।
अब मैं अपने इस निर्णय में जौहर के सेन्ट्रल लेन के घर पर जहाँ जौहर को गिरफ़्तार किया गया और उसके पश्चात् क्या हुआ, उसके साक्ष्य पर अपनी कोई टिप्पणी देने का इरादा नहीं रखता। सिवाय शायद इसके कि सरकारी तौर पर बस कुछ उक्तियाँ दे दूँ, जो मेरे अपने ही दिनांक 10/1/1944 के ऑर्डर में से हैं उस दूसरे अभियोग मुकद्दमें के सिलसिले में जो इसी अदालत में चल रहा है (फ़ाइल नं0119/3, 1942 की) ।
इस मुकद्दमें के सभी मुलज़िम सारे अभियुक्त अपने पर लगाए इलज़ामों व आरोपों को नकारते हैं और अपने निर्दोष होने की पैरवी करते हैं। सभी ने अपनी सफ़ाई के बयानों में एक सी ही वारदात-व्याख्या की प्रस्तुति की है। इनके अनुसार संक्षेप में प्रतिवाद की कहानी इस प्रकार है कि जब राय साहब गोपालदास और सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन महरौली में बन रहे मकान देहात-घर पर पहुँचे वे जौहर के लिये बिल्कुल अपरिचित थे सो उनसे जौहर ने स्वाभाविक रूप से पूछा कि वे अनजान लोग कौन हैं और वहाँ क्या कर रहे थे। जिस पर सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन ने अपना रिवॉल्वर निकाल लिया और जौहर की छाती पर निशाना साधते हुए कहा, “हैण्ड्स अप्” यानी हाथ उठाने की समर्पण की मांग की। इसी दौरान राय साहब गोपालदास ने एस0 आई0 भगवानदास जैन को सम्बोधित करते हुए कहाः “शूट हिम! शूट हिम!, व्हाय डोन्ट यू शूट हिम?” -इसको गोली मार दो। इसे गोली मार दो। अरे तुम इसे गोली मारते क्यों नहीं? इस पर जौहर ने एकदम से सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन की रिवॉल्वर पकड़ ली और सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन से भिड़ गए। छीना-झपटी व हाथापाई करके उसे नीचे गिरा दिया। राय साहब गोपालदास के हाथ में एक छोटा डंडा था जिससे उन्होंने जौहर को मारना शुरू कर दिया। पिस्तौल से जौहर की पकड़ को छुड़ाने की कोशिश में सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन ने जौहर के हाथ पर दाँतों से काट लिया। तो भी जौहर ने सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन के हाथ से उसकी पिस्तौल तो छीनकर ही छोड़ी। इस बीच जौहर के कुछ कामगार मज़दूर घटनास्थल पर आ गये। इसके बाद राय साहब गोपालदास ने ‘युद्ध-विराम’ की मांग करी और दोनों पक्षों में सन्धि-वार्त्ता के लिये विचार-विमर्श होना शुरू हो गया। इसके आगे प्रतिवादी पक्ष ने सफ़ाई में यह भी आरोप लगाया कि राय साहब गोपालदास ने अपने इस प्रकार के व्यवहार के लिये क्षमा मांगी और श्री जौहर से प्रार्थना की कि इस बात को आई-गई कर दें। उन्होंने “हाथ भी जोड़कर” पिस्तौल की वापसी के लिये ख़ुशामद की। मिन्नत-समाजत की।
आगे बातचीत चलने पर यह तय किया गया कि यदि सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन को पिस्तौल वापस की जाती है तो उसके एवज़ में उसके बदले में जौहर को उनके घर जाने दिया जायेगा जो सेन्ट्रल लेन में है, उन्हें अपने कपड़े बदलने दिये जायेंगे और वहाँ से बिस्तर लेने दिया जायेगा और तब वहाँ से वह अपने ऑफ़िस जायेंगे, जहाँ उनका दस मिनट का ज़रूरी काम है। उसके बाद ही उनको कानूनी तौर पर गिरफ़्तार किया जा सके गा और थाने यानि पुलिस स्टेशन पर ले जाया जा सके गा। राय साहब गोपालदास ने, यह बताया जाता है कि खुशी से अपनी रज़ामन्दी इस प्रस्ताव को दे दी। इस पर उन्हें ‘पिस्तौल’ वापस कर दी गई और राय साहब गोपालदास ने अपनी कार कच्ची सड़क से पीछे हटा ली जिससे कि जौहर की कार निकालकर आगे बढ़ाई जा सके। इसी व्यवस्थित क्रम में जौहर अपनी कार में आगे चले और दो पुलिस अधिकारी राय साहब गोपालदास की कार में उनके पीछे-पीछे लगे जौहर के सैन्ट्रल लेन स्थित घर पर आ पहुँचे। लगता है कि वहाँ इस घर पर आकर एक और ही वैमनस्य या कहें, ग़लतफहमी की स्थिति पैदा हो गई जब राय साहब गोपालदास ने जौहर को घर में इस बहाने या कारण से जाने नहीं दिया कि भीड़ इकट्ठी होनी शुरू हो गई है और दोनों कारें जौहर और पुलिस अफ़सरों के साथ कनॉट प्लेस में जौहर के ऑफ़िस पर आ गई।
महरौली हाउस की वारदात के सम्बन्ध में उसे मद्दे-नज़र रखते हुए बिला शक़ जिसके ऊपर ही इस मुक़द्दमें के सभी इलज़ामों का इस अभियोग के आरोपों का पूरा दारोमदार है मैंने, इस्तगासे के गवाह अभियोग-साक्षी न0-प् राय साहब गोपालदास, अभियोग साक्षी न0-प्प् सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन और जो दो पुलिस अफ़सर जो मुख्य रूप से सम्बद्ध हैं; और रतन सिंह लम्बरदार अभियोग साक्षी न0-प्ट और फ़रीदुद्दीन ठेकेदार अभियोग साक्षी न0-ट की परीक्षा की है। जाँच की है।
अन्तिम दो नामांकित साक्षी चश्मदीद गवाह बयान देते हैं कि उन्होंने स्वयं इस घटना को होते हुए अपनी आँखों से देखा है या तो मुख्य पक्की सड़क से अथवा खेत से जो मकान के पास ही है। इस मामले में उनके बयानों में असंगति दोष है। वे आत्म-विरोधी हैं।
पहले मैं इन दोनों गवाहों के बयानों की समीक्षा करूंगा। रतन सिंह चश्मदीद गवाह न0-प्ट मुझे बताता है कि वह खेत में, जो मकान के पास ही है, खड़ा था जब कि उसने इस वारदात को होते देखा। जब कि फ़रीदुद्दीन चश्मदीद गवाह न0-ट कहता है वह रतन सिंह के पास ही खड़ा था और वे दोनों मुख्य पक्की सड़क पर थे। मैंने मौके का मुआयना 7/4/1944 को किया। जैसा कि मेरी जाँच रिपोर्ट से मालूम होगा कि मकान मुख्य पक्की सड़क से बहुत नहीं तो सौ ‘100 गज़ की दूरी’ पर है। हालाँकि फ़रीदुद्दीन में इतनी ढिठाई है कि वह इसे पंद्रह कदम की दूरी बताता है। मुख्य पक्की सड़क और मकान के बीच की ज़मीन पर निश्चित रूप से घटना के समय या दूसरे समय भी कुछ काश्तकारी खेतीबाड़ी की जाती रही है। इस हल्के का पटवारी मन्नू लाल इस्तगासे का गवाह न0-24 अपने बयान में रिकार्ड ‘खसरा गिरदावरी 1943’ में से सबूत देता है कि इन खेतों की “चरी” की काश्त मकान और मुख्य पक्की सड़क के बीच है। वह आगे अपने बयान में कहता है कि सितम्बर के महीने में ‘चरी’ की फ़सल की ऊँचाई औसत एक आदमी की ऊँचाई के बराबर होती है।
इस बात की पुष्टि मोहम्मद फ़ज़लुद्दीन के बयान से भी होती है जो स्वयं एक इस्तगासे का गवाह है और जो वारदात के बाद जल्द ही वारदात के मौके का घटनास्थल का नक़्शा बनाने के लिए गया था। उसका कहना है कि तब उस समय वहाँ खेतों में जो जौहर के मकान को चारों तरफ से घेरे थे, उन पर 2 से 3.5 फीट ऊँची चरी की फसल खड़ी थी। पटवारी का आगे कहना था कि मकान के सामने पक्की मुख्य सड़क पर खड़ा हुआ कोई व्यक्ति मकान के कम्पाउंड व अहाते को, बीच के खेतों पर उगी चरी की फ़सल के कारण कुछ नहीं देख सकता। पटवारी उस सड़क से जो घर के सामने पड़ती है, अक्सर आया-गया है और क्योंकि उसका बयान मेरे अवलोकन व निरीक्षण जो मैंने किया था जब मैं वहाँ गया था, उससे मेल खाता हैं तो मुझे इसे ठीक मानकर स्वीकार कर लेना चाहिए। मेरा निरीक्षण-पत्र का विवरण दर्शाता है कि यदि चरी या कोई दूसरी फस़ल जो आदम-क़द की हो और मकान के खेतों में उग रही हो अर्थात् खेतों में जो मकान और सड़क के बीच में हैं उग रही हो, तो यह काफ़ी असंभव है किसी ऐसे व्यक्ति का जो सड़क पर खड़ा हो, कुछ भी देख पाना कि घर के किसी भी हिस्से में क्या हो रहा है। इस लिए मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ चाहे ये प्रत्यक्ष-दर्शी गवाह रतन सिंह और फ़रीदुद्दीन पक्की मेन सड़क पर खड़े थे या चरी की फ़सल के बीच, उनके इस वारदात को अपनी आँखों से देख पाने की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने इसे बिल्कुल नहीं देखा है। ये दोनों प्रत्यक्षदर्शी लगता है कि छँ टे हुए गवाह हैं। चुने हुए गवाह हैं फिर यह भी काफ़ी अजीब बात है कि ये एक दूसरे से ख़ूब अच्छी तरह परिचित हैं। घुले-मिले हैं। फ़रीदुद्दीन स्वीकार करता है कि वह रतन सिंह को अपने व उसके बचपन से जानता है और यह भी कि उसके इसके साथ व्यावसायिक संबंध भी रहे हैं। मुझे यह बड़ा ही सन्देहजनक लगता है कि ये जो दो गवाह आपस में इतनी घनिष्ठता से एक-दूसरे को जानते हों और उन्हीं में से उनमें से एक रतन सिंह जो इस मुकद्दमें से सम्बद्ध अफ़सरों को भी जानता-पहचानता है अचानक आकस्मिक तौर पर वारदात के स्थान पर आ निकला वह भी उस नाज़ुक क्षण में जब उन पुलिस अफ़सरों पर हमला हो रहा है। मैं आगे यह भी देख सकता हूँ कि इन दो गवाहों में से कोई एक भी न तो उस समय उन पुलिस अफ़सरों से बोला-चाला, अपनी तरफ से बात तक नहीं की, और न ही इस मामले की रिपोर्ट ही की। इन हालातों में ये गवाह कैसे बन गए इसके स्पष्टीकरण की ज़रूरत है। सफ़ाई देनी चाहिए जो कि इस रिकार्ड पर नहीं दर्ज की गई है।
इसको छोड़कर भी जो हो इन दो गवाहों की उस दिन की मौक़ा-ए-वारदात पर उसके समय मौजूदगी की जो दलीलें और कारण दिये गये हैं वे न केवल असंतोषजनक हैं बल्कि फ़रीदुद्दीन के विषय में तो बेहद विसंगति पूर्ण और परस्पर-विरोधी हैं। मैं इसलिये सीधा कह सकता हूँ कि मैंने फ़रीदुद्दीन और रतनसिंह का पूरी तरह से अविश्वास किया है। मुझे बहुत मजबूर होकर कहना पड़ रहा है कि मैं यह रिमार्क देने को बाध्य हूँ कि इनका चश्मदीद गवाहों की हैसियत से इस मुकद्दमें में शामिल किया जाना पुलिसिया पैबन्दबाज़ी है, पैडिंग से कम नहीं है जो निहायत अफ़सोसजनक और शोचनीय है।
रतनसिंह के बारे में इससे आगे दर्ज करना चाहता हूँ कि हालाँकि वह एक लम्बरदार है, -जब मुठभेड़ हो रही थी उसने कोई बीच-बचाव नहीं किया न ही एक लम्बरदार होने के नाते पुलिस स्टेशन में कोई रिपोर्ट लिखवाई या अपने निकटतम वरिष्ठ अफ़सर को ही इस घटना की खबर तक की हो! वह अपनी सरकारी डूयटी व ज़िम्मेदारी को पूरा करने में नाकाम साबित हुआ है।
गवाह व ग़ौर-तलब बयानां में से दो चश्मदीद गवाह रतनसिंह और गवाह फरीदुद्दीन के बयानों को हटा देने के बाद मेरे पास रह जाते हैं राय साहब गोपालदास और सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन के बयान, जो इस अभियोग के घटना तथ्यों व वारदात के हालात से जुड़े हैं, गुँथे हैं कि वहाँ पर लड़ाई (संघर्ष) हुई थी या कि थोड़ी-बहुत धक्कामुक्की हो गई हो इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता। शक की कोई गुंजाइश नहीं है। निर्धारण करने व तय करने का सार-बिन्दु तो यह है कि यह मुठभेड़ जौहर को बचाने के लिये ‘रैस्क्यू’ करने में हुई या कि यह इस प्रकार हुई है जैसा कि बचाव पक्ष ने अपने बयानों में पेश किया है, कि भगवानदास जैन को रिवॉल्वर से निरस्त्र करने के लिये था जिससे कि किसी गंभीर चोट या मृत्यु से बचाव किया जा सके। इस ‘सार-बिन्दु को निर्धारित करने के लिये कई परिस्थितियों को विचार में रखना पड़ेगा। इनमें पहली है चोटें जो राय साहब गोपालदास और सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन पर लगी हुई पाई गयीं। सिविल सर्जन के असिस्टैन्ट डॉक्टर जे0 जे0 एफ0 दुन्न इस्तगासा गवाह न0-12 ने राय साहब गोपालदास की 18/9/1942 को रात के 10 बजकर 20 मिनट पर जाँच की और सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन की उसी रात को 10.30 बजे जाँच की।
राय साहब गोपालदास के शरीर पर डॉक्टर दुन्न ने पायाः-
(1) बहुशाखीय आड़ी ‘मल्टिमल’ - ट्रांसवर्स लाइनदार खरोचें 4” × 1½” के क्षेत्र में बाएं कंधे की तिकोनी हड्डी के पास अन्दुरूनी हिस्से की तरफ उनमें से कई एक खरोंचें 1½” के अनुपात से थीं।
(2) गुमटे और छिलने 1½” × 1½” बाईं कोहनी के पीछे।
(3) लाइनदार खरोंच 5½” × ¼” दाईं नितम्ब के ऊपरी भाग के आरपार।
(4) सूजन दाहिनी कलाई के बाहरी तरफ 2”× ½ अनुलम्बता में।
रा.सा. गोपालदास का कथन है कि उनको एक चोट आरे से और एक चोट लाठी से पीठ पर लगी है। वह और किसी चोट का जो उन्हें लगी हो कोई हवाला नहीं देते हैं।
चोट नं0 (1) जो कि बहुशाखीय-‘मल्टिपल’ ‘ट्रांसवर्स’ आड़ी लाइनदार खरोंचे-कहा गया है कि इस चोट का कारण है आरी। राय साहब गोपालदास के बयान के मुताबिक़ उनको एक ही वार में आरे की चोट उनकी पीठ पर दी गई थी। डॉ0 जमनादास बचाव पक्ष के गवाह नं07 हैं। वे इस चोट के जिक्र पर बयान देते हैं कि यह चोट इस प्रकार से नहीं लगी हो सकती है। यही राय डॉक्टर एन.सी.पाण्डेय बचाव पक्ष के गवाह नं0 10 की है। चोट की प्रकृति नैसर्गिकता व उसकी शक़्ल दिखाव एवं रूप-रंग आरी की एक चोट के सिद्धान्त की पुष्टि नहीं करती। यदि मल्टिपल-ट्रांसवर्स बहुशाखीय ऊपरी लाइनदार खरोंचें जिनमें से प्रत्येक लगभग 1) इंच लंबी है, जो रा.सा. गोपालदास के बाएँ कंधे की तिकोनी हड्डी पर मौजूद थे यह चोट तो आरे के एक वार से नहीं हो सकती। किन्तु आरी के दाँतां को कंधे की तिकोनी हड्डी पर रगड़ने से- ‘रब’ करने से बन सकती है। आरी की सीधी चोट जब कंधे पर लगे तो दाँतों के बिन्दु-पॉइंट्स बहुत छोटी-छोटी चोटों के निशान छोड़ेंगे जैसे जख़्मों में छेद कर दिया हो।
चोट नं0 3 रा.सा. गोपालदास: दाईं नितम्ब के ऊपरी भाग के आरपार
5½” × ¼” साइज की लाइनदार खरोंच हो सकता है कि वह लाठी की चोट से ही हो जैसा कि रा.सा. गोपालदास ने अपने बयान में कहा भी है कि लाठी के एक वार से लगी होगी।
दूसरी अन्य दो चोटें नं02 और नं0 4 बयान की गिनती में नहीं आई हैं परन्तु यह तो निःसंदिग्ध है कि चोटें आईं तो मुठभेड़ में ही थीं।
फिर भी अधिक महत्वपूर्ण हैं वे चोटें जो सब-इंस्पेक्टर भगवानदास जैन और अभियुक्त एस.एन. जौहर को आईं हैं।
चोट नं0 1: सब-इन्सपैक्टर भगवानदास जैन को आई चोट दाँतों से काटे जाने की थी। डॉक्टर दुन्न जिसने वारदात की रात को जौहर का भी डॉक्टरी मुआयना किया था उनके शरीर पर आई चोटों के बारे में बयान देते हुए कहा था कि मैंने जौहर के शरीर पर ‘दाँतों से काटे’ की चोट के कोई निशान नहीं पाये। फिर भी ज़िरह के दौरान चोटों के बारे में ज़िक्र करते हुए कहा कि ऐसा लग सकता है कि जौहर की चोट न0-1 दाँतों से काटे जाने की वजह से थी। यह ठीक ही होना चाहिए क्योंकि सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन स्वीकार करता है कि हां उसने जौहर को हाथ पर दाँतों से काटा। यहाँ पर रक्षा-पक्ष के घटना-विवरण को याद किया जाये जो यूँ है कि जौहर भगवानदास जैन से हाथापाई में भिड़ रहे थे कि जिससे वह जैन से रिवॉल्वर लेकर उन्हें निरस्त्र कर दें। इस्तगासे का मुकद्दमा वह यूँ है कि भगवानदास जैन ने जौहर को पकड़ा, जब जौहर अपने को छुड़ाने की कोशिश करने लगे, इसमें उन्होंने भगवानदास जैन को दाँतों से काट लिया। इन दोनों व्यक्तियों के शरीरों पर आई चोटों को लेकर इन दोनों में से किसी भी तरह से अर्थ-निर्णय ‘इन्टरप्रैट’ किया जा सकता है और इतने थोड़े से उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर जो रिकार्ड पर है, मैं स्वयँ को इस विषय में किसी भी एक निश्चयात्मक निष्कर्ष या निर्णय पर पहुँचने में असमर्थ पाता हूँ। भगवानदास जैन और गोपालदास (राय साहब) इस बात की पुरज़ोर मुखालफत करते हैं कि उनके पास कोई हथियार था। जबकि दूसरी ओर लेखराम बचाव गवाह न0-5 जगननाथ बचाव गवाह न0-7 और सल्हार बचाव न0-8 बयान देते हैं कि उनमें से एक अफ़सर पिस्तौल से लैस था। भगवानदास और जौहर के हाथों पर दाँतों से काटे के निशान तब आये होंगे जब जौहर भगवानदास जैन की पिस्तौल लेने की कोशिश कर रहे होंगे और भगवानदास इसको अपने अधिकार में रखने की कोशिश में रहे होंगे और इस कारण से भी हो सकता है जब कि जौहर अपने ऊपर से भगवानदास जैन की पकड़-गिरफ़्त छुड़ाने की कोशिश में रहे हों। मैं इस बात-प्रसंग-बिन्दु पर, राय साहब गोपालदास और भगवानदास जैन का अविश्वास करने का कोई कारण नहीं पाता।
परन्तु उसके साथ ही साथ मेरे पास प्रामाणिक व विश्वसनीय रिकार्ड के रूप में पर्याप्त सामग्री का काफ़ी अभाव है कि जिससे मैं बचाव पक्ष के साक्षियों के दिये हुए विपरीत प्रमाण को नकार ही सकूँ। अतः यह संभव है, ऐसा लग सकता है कि राय साहब गोपालदास, सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन और जौहर के शरीर पर जो चोटें पाई गई हैं वे जौहर की भगवानदास जैन को रिवॉल्वर से निरस्त्र करने-बेहथियार करने की कोशिश में परिणामस्वरूप हुई हाथापाई और मुठभेड़ में पहुँची हैं।
मुझे अभियुक्त के विद्वान वकील द्वारा बताया गया है कि राय साहब गोपालदास की चोटों का कारण उनका सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन की मदद के लिये आना था जब वह अपनी पिस्तौल बचाने की कोशिश में संघर्ष कर रहे थे। यह काफ़ी युक्तियुक्त संतुलित व उचित स्पष्टीकरण-वाजिब कैफ़ियत उन चोटों के लिये है और इसे पूर्णतया असन्तोषजनक कहकर नामंज़ूर भी नहीं किया जा सकता; मेरी पिस्तौल को लेकर दी गई टिप्पणी को मद्दे-नज़र रखते हुए। यह मामला फिर भी क़ाफी संदेहों-शक़ों व शुबहों से घिरा है और पूरी सच्चाई और निष्पक्षता को रखते हुए इसका लाभ मुझे अभियुक्त को देना ही चाहिए। जौहर के ऊपर आयी चोट के बारे में जो भगवानदास जैन द्वारा उसके दाँतों से काटे जाने की वजह से आई है और जिसे वह स्वीकार भी कर चुके हैं, इस अभियुक्त के शरीर पर आई अन्य चोटों के बारे में कोई सफ़ाई या स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।
मंगतराम की चोटों के बारे में इस्तगासे के गवाहों द्वारा कोई सफ़ाई नहीं पेश की गई है। मंगतराम ने अपनी ‘अन्यत्र-स्थिति’ यानि दूसरी जगह होने की पुष्टि में समुचित प्रमाण एवं मज़बूत सबूत पेश किये हैं और निःसन्दिग्ध रूप से परिस्थितियाँ दर्शाती हैं कि मंगतराम वारदात के दौरान महरौली-हाउस पर मौजूद नहीं था। उसकी चोटें दूसरी घटना-वारदात के दौरान पहुँचाई गईं थी जो कनॉट प्लेस में हुई जिस पर मैंने पहले ही रिहाई की डिक्री दे दी है।