चाचा जी की आत्मकथा

17. मुठभेड़ मेरा पुलिस से आमना-सामना · Part 2 of 2

पुलिस द्वारा मेरी गिरफ़्तारी


मैं अपने घर गया और अपना बिस्तर ले लिया। मेरी पत्नी और मेरे छोटे भाई गुरुबख़्शलाल मेरी गाड़ी में मेरे साथ बैठकर कनॉट सर्क स पर मेरे दफ़्तर आ गए। जब हम वहाँ पहुँचे तो और दो लॉरी भर के बन्दूकों और पिस्तौलों से लैस पुलिसमैन वहाँ पहले ही मौजूद खड़े थे।

कनॉट प्लेस में जब मैं अपनी कार से उतरा और अपने दफ़्तर की ओर जाने को बढ़ा तो वहाँ पर पहले से ही गलियारे में तीन हज़ार के लगभग लोग मौजूद थे जो बड़े उत्तेजित थे और सरकार और पुलिस के खिलाफ़ गुस्से में भरे हुए थे। तब तो हालात नियंत्रण के बाहर ही हो गये जब पब्लिक-सारी जनता दृढ़ता से प्रतिवाद करती हुई सामने आ गई। विरोधी स्वरों और नारों से वातावरण गूंजने लगा। मेरी पत्नी और मुझको पुलिस वराण्डा में घसीटने लगी। मेरी पत्नी ने मेरी टांग पकड़ ली और उनको भी मेरे साथ वराण्डों में घसीटा जाने लगा बिना किसी लिहाज़ या दया-रहम के। जब स्थिति तनाव-ग्रस्त हो गई और हालात बेक़ाबू ही हो गए तब मजिस्ट्रेट ने मुझे गोली मार कर जान से मार डालने का आदेश जारी कर दिया। किसी एक पुलिस अधिकारी ने अपनी पिस्तौल मुझ पर तान भी दी। किन्तु इसी बीच, पुलिस ने मुझे अपने घेरे में ले लिया, मुझे खींचकर पकड़ा और पकड़ कर पुलिस की वैन (गाड़ी) में धकेलकर डाल दिया।

सरदार खुशदेवसिंह (मेरे चचेरे भाई और ज़बरदस्त वकील) ऐडवोके ट ने मेरे लिये पुलिस अधिकारियों से बहस करने की कोशिश की तो उनको भी पुलिस-वैन में डाल दिया गया और हम दोनों को नई दिल्ली पुलिस स्टेशन (पार्लियामेंट स्ट्रीट, थाना) पर ले जाया गया।

यह सारी पुलिस-कार्यवाही-‘पुलिस ऑपरेशन’ सुपरिंटेंडेंट पुलिस स़ीआई़ड़ी मिस्टर आऱज़ीमैल्लर की लीडरशिप में की गई थी। जब हम पुलिस-स्टेशन पर पहुँचे तो मिस्टर मैल्लर ने मेरे ड्राइवर को बड़ी बुरी तरह मारा-पीटा और फिर मुझको भी मारने लगा। परन्तु मैं ने उसे चेतावनी दीः “देखो बेशक़ हमारे हथकड़ियाँ लगी हुई हैं। पर तुम ध्यान रखना मेरी टांगें अभी भी आज़ाद हैं, मैं तुम्हें ऐसी ठोकरें मारुंगा कि तुम नीचे आ गिरोगे। मैं अपनी ज़िंदगी की परवाह नहीं करता हूँ अगर तुम इस तरह का व्यवहार करोगे और इस तरह मार-पीट करोगे तो फिर देख लेना।” उसने मुझे एक या दो ठोकरें मारीं। मैं उससे उसकी ही भाषा में बोलाः “यदि तुम्हारा देश मेरे देश की स्थिति में होता और यदि तुम अपने देश को स्वंतत्र कराने के लिये हमारी तरह लगे होते तो तुम्हारी क्या हालत होती?” इससे उस अंग्रेज अधिकारी मिस्टर मैल्लर को कुछ समझ आई और उसने मारना पीटना, चिल्लाना और गाली-गलौच करना बन्द किया।

हमें एक कोठरी में डाल दिया गया। मेरा खाना और बिस्तर मेरी कोठरी में नहीं दिया गया। उसकी इजाज़त ही नहीं दी। यहाँ तक कि मुझे पेशाबघर भी नहीं जाने दिया गया। अगले दिन मेरे मित्र व सहानुभूतिक लोग, हमदर्द मुझसे मिलने के लिए पुलिस स्टेशन पर आए। क्योंकि मेरी गिरफ़्तारी और ऐडीशनल सुपरिटेंण्डेंट पुलिस से जो मेरी मुठभेड़ की खबरें अखबारों में छपीं तो बीसियों अंग्रेज़ औरतें और आदमी भी मुझे उत्सुकता में भरे देखने को आ गये।

मिस्टर मैल्लर के दफ़तर की गतिविधियों की सूचनाएँ मुझे किसी न किसी कॉन्स्टेबल के द्वारा मिलती रहती थीं क्योंकि वे सभी रायसाहब गोपाल दास के हेंकड़ी भरे अक्खड़पन के व्यवहार के शिकार होने के कारण, अन्दर से उसके ख़िलाफ़ थे।

मुझे बताया गया कि पुलिस अधिकारी मेरे व मेरे कर्मचारियो के विरुद्ध “हत्या की कोशिश” का मुक़द्दमा गढ़ने में लगे थे। मैंने यह भी सुना कि गिरफ़्तारी के बाद वे मेरे ‘देहात-घर’ में गए और वहाँ जाकर उन्होंने मेरे सभी नौकरों व कर्मचारियों को गिरफ़्तार कर लिया जिनमें मेरे बढ़ई (दरख़ान) निरंजन सिंह भी थे। वहाँ से उन्होंने हमारी कार्पेंट्री के साज़ो-सामान को अपने कब्ज़े में ले लिया जिनमें बड़ी-बड़ी लाठियाँ-लट्ठे, बढ़ईगिरी के औज़ार आरी-आरे, हथौड़े आदि थे, जिनको आधार बनाकर वे हम पर इलज़ाम लगाना चाहते थे कि इन हथियारों और औज़ारों का प्रयोग हम उनकी जान लेने के लिये करने वाले थे। एक पुलिसमैन ने तो मुझे यह भी बताया कि कैसे गोपालदास ने अपनी कमीज़ उतारी और बनियान को भी उतार कर मेज़ पर रख दिया। आरी से खुद अपनी पीठ खुरची, थोड़ा ख़ून भी निकाला जिससे अपने कपड़ों को रंग लिया। फिर खून रंगें कपड़ों को सबूत के तौर पर-प्रमाण स्वरूप मुक़द्दमें के लिए पेश कर दिया। इसके बाद एक डॉक्टर से झूठा मेडिकल सर्टिफ़िकेट भी बनवा कर ले लिया गया कि यह चोटें आरी द्वारा लगाई गई हैं। उन्होंने इस बारे में ज़िक्र तक नहीं किया-एक शब्द भी नहीं कहा कि किस प्रकार उन्होंने मुझ पर हमला किया था या जो हमारी मुठभेड़ हुई या किस प्रकार मैंने पुलिस अधिकारी से पिस्तौल छीनी थी। ये सारी बातें वे जानबूझ कर दबा गए।

दो दिन के बाद मुझे हथकड़ियाँ लगाकर सेन्ट्रल जेल विचाराधीन बन्दी के तौर पर ले जाया गया। मैं अत्यंत कष्टकर हालत में रखा गया था। अब जाकर इजाज़त हुई थी कि मेरे कपड़े और मेरा बिस्तर हमारे घर से आने दिया गया। मेरे ख़िलाफ़ पुलिस द्वारा संभवतः पाँच या छः झूठे और जालसाज़ी भरे म़ुक़द्दमें दायर कर दिये गये थे जिनसे कि मुझे अधिकतम व सख़्त से सख़्त सज़ा दिलाई जा सके।

कुछ ही दिन के बाद मुझे मिस्टर डिस्ने की अदालत में पेश किया गया जो कि अतिरिक्त ज़िला अधिकारी (ऐडीशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट) थे। उनको रायसाहिब गोपालदास से मेरे साथ उनकी मेरे ‘देहांत-घर’ में हुई मुठभेड़ की कहानी रायसाहब की ही ज़बानी मालूम हो चुकी थी जो उन्होंने मिस्टर डिस्ने को घटना वाले दिन ही बताई थी। उन्होंने मुझे जेल में अच्छे व्यवहार के साथ चलने की सलाह दी क्योंकि वह मेरे लिये सहानुभूतिपूर्ण रवैया रखते थे। वह इसलिए भी कि उन्हें इस मुक़द्दमें की वास्तविक कहानी अच्छी तरह मालूम थी और यह भी कि किस प्रकार राय साहिब दुष्टतापूर्वक मुझको हत्या के झूठे और जालसाज़ी भरे मुक़द्दमों में फँसाने की साज़िश भरी कोशिश में था। चोर डाकू के समान मुझे हथकड़ियाँ लगाकर ही अदालत के इजलास में समय-समय पर लाया ले जाया जाता था।

मुक़द्दमें की पहली सुनवाई जेल के बाहर हुई क्योंकि अदालत की बैठक जेल के बाहर के एक कमरे में रखी थी। मुझे हथकड़ियाँ लगाई हुई थीं; मुझे घसीटा जा रहा था और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। मेरी माताजी, मेरी पत्नी और रिश्तेदार बाहर खड़े हुए थे। जैसे ही उन्होंने मुझे देखा, वे बिलखकर रोने लगे। रोते ही जायें और ग़ुस्से में पुलिस को बद-असीसें देने लगे। जब मैं अंदर अदालत में लाया गया तो मजिस्ट्रेट ने पुलिस को मेरी हथकड़ियाँ उतारने का हुकु म दिया और कहा कि ‘आइन्दा कभी अदालत में मुझे हथकड़ी में नहीं लाना है।’ तो भी वे तो मुझे अदालत तक हथकड़ी लगाकर ही लाते ले जाते रहे बस केवल अदालत में मजिस्ट्रेट के सामनें हथकड़ी निकालकर पेश कर देते थे, जैसा कि उनका ऑर्डर था।

मैं अपने मुक़द्दमें की सूचना प्रति सप्ताह-हर हफ़्ते नियमपूर्वक श्रीअरविन्द को अपनी एकाकी कोठरी (सौलिटरी सैल) से भेजता रहता था। उन दिनों में ब्रिटिश सरकार ने विशेष ऑर्डिनेंस जारी करके देश में विशेष अदालतों की स्थापना कर दी। इन अदालतों की विशेषता यह थी कि इनमें ‘न ही दलील, न ही वकील और न ही अपील’ हो सकती थी। मिस्टर डिस्ने को ऐसी ही एक विशेष अदालत का जज नियुक्त किया गया था।

जब मैं जेल में था तब मैं कोलाइटिस रोग से पीड़ित था जिसमें वृहदान्त्र का शोथ हो जाता है। डॉक्टरों ने मेरी जाँच की और उन्होंने सरकार से मुझे छोड़ देने की सिफ़ारिश भी की। परन्तु विशेष अदालतों में तो ज़मानत पर भी छोड़ने का कोई प्रावधान नहीं था। तो भी मिस्टर डिस्ने ने हस्ताक्षर कर दिये और इस पर मुझे जेल से मुक्ति मिली।

मेरी रिहाई से दिल्ली प्रशासन (दिल्ली ऐडमिनिस्ट्रेशन) में तो एक हलचल मच गई। खलबली मच गई। चीफ़ कमिशनर और डिप्टी चीफ़ कमिश्नर बेहद चिढ़ गये। उन्होंने एकदम मजिस्ट्रेट और पुलिस अफ़सरों की मीटिंग बुलाई जिसमें यह तय किया गया कि मुझे फिर गिरफ़्तार किया जाये। तदनुसार मुझे अपनी अगली ही सुनवाई के दिन दुबारा गिरफ़्तार कर लिया गया। अनधिकृत तौर पर मुझे बताया भी गया कि मुझे चौदह वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा दी जा सकती है। मुझे तो इस धमकी से ज़रा भी डर नहीं लगा। जब एक बार मैं आज़ादी की लड़ाई में कूद ही पड़ा था तो मुझे इस प्रकार के परिणामों की कोई परवाह नहीं थी।

जब विशेष अदालतों का उन्मूलन हुआ तो उनकी समाप्ति के साथ ही मेरे पिताजी नें दिल्ली के सबसे योग्य व वरिष्ठतम वकील श्री रंगबिहारी लाल को मेरे मुकद्दमें में बचाव की पैरवी के लिये अनुबन्धित कर नियुक्त किया। और इसके साथ लाहौर हाई कोर्ट में अपील दायर कर दी गई। हाई कोर्ट में लाहौर के प्रमुख वकील श्री पुरी नें मेरा केस उठा लिया। दिल्ली प्रशासन की ओर से मिस्टर ताराचंद माथुर पेश हो रहे थे। हाई कोर्ट ने सरकारी वकील को दो दिन के अंदर इस ‘कमज़ोर केस’ से सम्बद्ध और भी तथ्य जुटाने को कहा नहीं तो अभियुक्त को रिहा कर दिया जायेगा। उचित साक्ष्य व प्रमाणों के अभाव के कारण हाई कोर्ट नें मुझे ज़मानत पर रिहा कर भी दिया। इससे दिल्ली प्रशासन के अधिकारियों को बेहद असुविधा व परेशानी हुई। वे मुझे फिर से गिरफ़्तार करना ही चाहते थे परन्तु आखिर चली अधिक समझदार परामर्श की ही। क्योंकि वरिष्ठ व पुराने समझदार ‘घाघ’ अफ़सरों की धारणा थी कि मेरी ज़मानत पर रिहाई के लाहौर हाई कोर्ट के निर्णय की उपेक्षा करके यदि मैं फिर गिरफ़्तार कर लिया गया तो हाई कोर्ट दिल्ली प्रशासन के अफ़सरों के खिलाफ़ निन्दा-सूचक कटु आलोचना पूर्ण निर्णय (स्ट्रिक्चर्स) जारी कर सकता है। यह केस दो वर्ष से अधिक समय तक चलता रहा। श्री रंगबिहारी लाल, जो मेरे वकील मेरे पिताजी ने मेरे बचाव के लिए नियुक्त किये थे, मेरे पास जेल में आये और मुझे जिरह के (क्रॉस-एग्ज़ामिनेशन) बारे में विवरण देकर कानूनी हिदायतें दे गए। बावजूद अपनी शुरुआती झिझक के जो अपनी आर्य समाजी नैतिक पृष्ठभूमि के कारण और गाँधी जी के प्रभाव की भी थी, मुझे अपने एडवोके ट के निर्देशन के अनुसार ही रेखाबद्ध होकर चलना पड़ा। वास्तव में मैं तो मनोवैज्ञानिक ‘द्वन्द्व’ की स्थिति में फँस गया था। सो मैनें इसमें श्री अरविन्द का मार्ग-दर्शन मांगा। श्री अंबा भाई पुराणी जी जो श्री अरविन्द के वरिष्ठ शिष्य थे उन्होंने मुझे बताया कि जब पुराणी जी मेरा पत्र श्री अरविन्द को पढ़कर सुना रहे थे तो उन्होंने पुराणी जी से मेरा पत्र अपने हाथ में खींचकर ले लिया और स्वयं पढ़ने लगे। उसे स्वयं ही पढ़ा। पढ़कर पुराणी जी को कहा गया कि मुझे उनका यह ‘सन्देश’ पहुँचाया जाये किः ‘सुरेन्द्रनाथ को पुलिस की असंगतियों का पूरा लाभ उठाना चाहिए। सत्य को उसकी समग्रता में लेते हैं टुकड़ों में नहीं।’

श्रीअरविन्द के मार्ग-निर्देशन की प्राप्ति होने पर जिरह के समय मैनें अपनी गवाही ध्यान पूर्वक दी और मैं पुलिस के बयान में व्यक्त असंगतियों का भी लाभ उठा सका। इस समय बड़ी दिलचस्प बात घटी। मेरे वकील ने मेरे केस को किसी दूसरी अदालत में बदलने की दरख्वास्त दाखिल कर दी थी। कारण यह था कि मजिस्ट्रेट मेरे विरुद्ध पूर्वधारणा या कहें कि प्रतिकू ल पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। जब पेशी में मैं अदालत में गया तो मजिस्ट्रेट मिस्टर डिस्ने नें मुझसे पूछ ही लियाः “यह कैसे है कि तुम्हें मुझमें विश्वास नहीं है?” मैने उन्हें खुलकर साफ़-साफ़ कह दियाः “आप देखिये, पुलिस जालसाज़ियाँ करके झूठे इलज़ाम लगाकर मेरे खिलाफ़ ऐसे मुक़द्दमें बना रही हैं जिनमें मुझे लम्बी जेल की सज़ा मिल जाये। स्वाभाविक तौर पर मेरी कोशिश और कर्त्तव्य भी यही बनता है कि अपने बचाव का अधिक से अधिक और अच्छे से अच्छा प्रयास करूँ। इसीलिए मैं नहीं चाहता कि यह केस आप द्वारा निर्णीत हो।”

मिस्टर डिस्ने बोलेः “आपको मुझमें कुछ तो भरोसा, कुछ तो विश्वास होना चाहिए।”

मैनें उत्तर दियाः “बहुत अच्छा! लीजिए मैं अपनी दरख्व़ास्त वापस ले लेता हूँ। ठीक है, आप ही मेरा केस कीजिये।”

आख़िरकार दो साल के बाद यह केस मेरे पक्ष में निर्णीत हुआ। और हम सब बरी कर दिये गये। मजिस्ट्रेट मिस्टर डिस्ने नें मेरे ख़िलाफ़ झूठे मनगढंत इलज़ाम लगाकर झूठे सबूत बनाने के लिए पुलिस को करारी झाड़ लगाई-कानूनी कोड़े भी बरसाये।

इस प्रकार यह केस लम्बी पीड़ा, अत्याचार और असह्य कष्ट के बाद अंत को प्राप्त हुआ।