18. सुरेन्द्रनाथ जौहर की रिहाई · Part 2 of 2
- देखिये मेरा रिहाई आदेश -
हुकु मनामा मिस्टर डिस्ने
दिनांक 10-1-1944
1942 का केस नम्बर न0 119/3 इसी अदालत से
मुझे अब समय के ‘घटक-तत्त्व’ पर ध्यान देना होगा। अभियुक्त के रक्षा पक्ष के विद्वान परामर्शदाता व अभिवक्ता ने इसका उल्लेख मात्र एक पूरक - सहायक अतिरिक्त - प्रमाण के रूप में या कि गौण दलील के तौर पर किया है। मैं तो भी इसको एक महत्त्वपूर्ण परिस्थिति के रूप में लेता हूँ जिससे यह निश्चित रूप से सत्यापित किया जा सके कि जब जौहर ने महरौली-हाउस छोड़ा जैसा कि इस्तगासे ने आरोपण किया है कि वह एक भगोड़ा व्यक्ति था और न्याय-प्रक्रिया से बचने वाला विद्रोही असामाजिक तत्त्व था।
जैसा कि राय साहब गोपालदास और सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन ने अपने बयान में कहा वे महरौली में मकान पर लगभग 1 बजे दोपहर को पहुँचे। तो भी मुझे लगता है कि वह समय बाद का है और 1.30 बजे के आसपास रहा होगा क्योंकि राय साहब गोपालदास यह भी कहते हैं यह लगभग 1 बजे का समय था जब कि उन्हें अपने ऑफ़िस में ख़बर मिली कि जौहर अपने ऑफ़िस में मिल जायेंगे। मोटे तौर पर समय का हिसाब लगाकर अंदाज़ा किया जाये तो राय साहब गोपालदास को पुलिस-स्टेशन जाने में वहाँ से जौहर के आफ़िस, फिर घर पर सेन्ट्रल लेन में और फिर महरौली में मकान पर। यह सब करके महरौली-हाउस पर उनके पहुँचने का समय 1ण्30 दोपहर के आसपास होगा। यह मान लिया गया है और बिना शक़-ओ-शुबहा साबित भी हो गया है कि वारदात के बाद जौहर अपने घर पर सेन्ट्रल लेन में मध्यान्ह 3.30 व 4 बजे के बीच में पहुँचे।
इसका अर्थ है कि महरौली-हाउस और उनके घर जो सैन्ट्रल लेन पर है उसके रास्ते को लेकर घर तक पहुँचने में दो घण्टे खर्च हो गए। आगे इसके राय साहब गोपालदास और सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन ने यह भी क़बूल किया है कि महरौली-हाउस पर वास्तविक मुठभेड़ और लड़ाई में 4 या 5 मिनट से अधिक समय नहीं लगा है। यह मानते हुए कि महरौली से 7 मील की दूरी तय करने में पंद्रह मिनट का समय लगेगा जहाँ सैन्ट्रल लेन में घर है। इस प्रकार फिर भी 1( घन्टा फिर भी रह जायेगा या फिर तर्क की खातिर 1) तो भी रह जाता है हिसाब में। हिसाब करने में देने में यह 1) घन्टे का समय तो निस्सन्दिग्ध रूप से महरौली में बिताया गया था। किस प्रकार यह समय बिताया गया इसका स्पष्टीकरण रक्षा के गवाहों ने तो दे दिया है परन्तु अभियोगी पक्ष इस मुद्दे पर अर्थपूर्वक मौन साधे हैं। खामोश हैं।
अपने को दोहराते हुए मैं पुनः बचाव पक्ष के घटना-विवरण का हवाला देता हूँ। ‘पिस्तौल’ को लेकर यह इस प्रकार है कि जब जौहर भगवानदास जैन को निरस्त्र करने में कामयाब हो गए थे तो उसके बाद उनको राय साहब गोपालदास द्वारा प्रार्थना व मिन्नतें की जाने लगीं कि उनकी पिस्तौल उन्हें वापस कर दी जाये। क्योंकि एक पुलिस अफ़सर होने के नाते जब यह जाना जायेगा कि उनकी पिस्तौल उनसे छीन ली गई है तो इससे उनकी बहुत बेइज़्ज़्ती होगी। भदद् होगी, बड़ी शर्मनाक बात होगी। बचाव पक्ष के कथन के अनुसार इन्हीं बातों में ही, जो समय महरौली-हाउस पर बीता था उसका अधिक भाग निकल गया। यह सोचने में कोई भी कठिनाई नहीं है और फिर यहाँ एक और परिस्थिति है जिसमें से उसको, बचाव पक्ष की गवाही के उस विवरण को, बल मिलेगा कि पुलिस अफ़सरों में से एक हथियारबन्द था और उसके पास पिस्तौल थी। तो भी मैं दुहराता हूँ कि मैं अपने को इस नतीजे पर निश्चित रूप से पहुँचने में असमर्थ पाता हूँ कि भगवानदास जैन आया कि वास्तव में पिस्तौल से लैस था या नहीं था। जैसा कि परिस्थिति अन्तर-सूचना देती है-दर्शाती है कि वह ‘था’-हथियारबन्द था। -और क्योंकि उसने अपना ‘रिवॉल्वर’ जौहर पर तान दिया कि यह लड़ाई-मुठभेड़ शुरू हो गई। तो भी यह ऐसा भी हो सकता है जौहर की गिरफ़्तारी करने और उसके बाद की मुक्ति। -इसके बाद उन दो पुलिस अफ़सरों ने अपने आपको उनके अनुपात में संख्या की दृष्टि से इतना कम पाया कि उनकी व्यावहारिक बुद्धि ने उनको मुजरिम के साथ समझौते पर पहुँचने के लिए प्रलोभन देकर प्रवृत्त कर दिया।
यदि मैं यह ‘थ्योरी’ स्वीकार करूँ कि जौहर ने अपने को छुड़ा लिया था या वह अपने साथी-मुजरिमों द्वारा बचा लिए गए थे तो यह निश्चित करना ज़रूरी हो जाता है कि पहले कोई अपराध या नाराज़गी ‘ऑ करने को बढ़े तो जौहर की जानकारी में यह नहीं था कि ये लोग पुलिस के अफ़सर हैं जो अपनी ड्यूटी को अंजाम देने में संलग्न थे। कर्त्तव्य पूरा करने में तत्पर थे। मुब्तला थे। यह तो निश्चित रूप से लगता है कि राय साहब गोपालदास और सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन तो जौहर को जानते थे परन्तु वहाँ कोई सबूत नहीं मिलता जो ज़ाहिर करे कि इसके विपरीत भी वैसा ही था। अर्थात् कि जौहर भी जानते हों कि ये लोग यानी राय साहब गोपालदास और सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन पुलिस अफ़सर थे। इस मुद्दे की काट के लिये राय साहब गोपालदास ने अपने पहले ही बयान का जो उन्होंने पुलिस स्टेशन में दिया था हवाला दिया कि ‘जौहर ने उनको उनका नाम लेकर संबोधित किया’। इसके द्वारा जौहर पर यह ज्ञान आरोपित किया कि वह राय साहब गोपालदास पुलिस सुपरिण्टेन्डेन्ट हैं। कचहरी में अपना बयान देते हुए अलबत्ता राय साहब गोपालदास कहते हैं कि जौहर ने उनको ‘कप्तान साहब’ कहकर सम्बोधित किया। (कप्तान साहब यानि कि ‘सुपरिण्टेन्डेन्ट पुलिस’) । जब उनका उनके पुलिस को दिए हुए बयान से सामना हुआ तो राय साहब गोपालदास सफ़ाई देते हैं -व्याख्या करते हैं कि जौहर ने उनको ‘नाम से पुकारा’, से उनका असली मतलब था ‘कप्तान साहिब’ से। यह व्याख्या मैं तो स्वीकार कर नहीं सकता हूँ। मेरे लिये इसे गले उतारना संभव नहीं होता है। किसी व्यक्ति को उसके व्यक्तिगत नाम से पुकारना तो निश्चित रूप से उसको उसके सरकारी ओहदे व पदनाम को पुकारना नहीं होता। ये दो शब्द ‘गोपालदास’ और ‘कप्तान साहब’ कोई पर्यायवाची या समानार्थी तो बिल्कुल ही नहीं हैं। मुझे अभियुक्त के विद्वान अभिवक्ता के द्वारा भारत रक्षा कानून (डिन्फे स ऑफ इंडिया रूल) के तहत धारा 129 की शब्दावली का हवाला दिया गया जिसके अधिकार-क्षेत्र के अन्तर्गत जौहर की गिरफ़्तारी की जानी थी। गिरफ़्तार करने वाले के पास तो जिस व्यक्ति को उसने गिरफ़्तार करना होता है उसके ख़िलाफ़ यथोचित तर्क संगत संदेहजनक पृष्ठभूमि का आधार होना आवश्यक ही होता है। इस प्रस्तुत केस में मिस्टर मैल्लोर सुपरिण्टेन्डेन्ट पुलिस सी.आई.डी. का राय साहब गोपालदास, ऐडीशनल सुपरिण्टेन्ट पुलिस को जौहर की गिरफ़्तारी करने के लिये आर्डर मिला, नामजद किया। प्रतिनियुक्त किया। और यह औचित्यपूर्वक तर्क -संगति से कहा जा सकता है कि ज्यूँ ही राय साहब गोपालदास को यह ज्ञान हुआ था कि वह जौहर को गिरफ़्तार करने का अधिकारी हो गया। परन्तु दुबारा, यहाँ न तो राय साहब गोपालदास और न ही सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन अपनी अफसरी ‘वरदी’ में ही थे। उनके पास जौहर की गिरफ़्तारी का कोई ‘वारण्ट’ भी नहीं था। उन्होंने कोई पद-सूचक निशान बैज या बिल्ला भी नहीं लगाया था जो ‘डिस्प्ले’ होने से दिखने में ही आ जाता और स्थिति प्रगट हो जाती। क्योंकि जौहर इन दोनों भद्र पुरुषों को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते थे, मुझे हालात जौहर के अनुकू ल-उनके पक्ष में लगते हैं कि वह उनको (दोनो व्यक्तियों को) पुलिस अफ़सर करके नहीं जानते थे। इसलिये यहाँ पर पुनः मुझे अभियुक्त को शक का लाभ ‘बैनीफ़िट ऑफ़ डाउट’ देना ही चाहिए और इस बात पर निश्चित रूप से क़ायम रखना चाहिये कि गिरफ़्तारी में जौहर का प्रतिरोध और मुकाबिला केवल साधारण दो व्यक्तियों के प्रति का था जो जौहर को ज़बरदस्ती करके पकड़ रहे हों उन पर काबिज़ हो रहे हों, इसको ‘कानून की कार्रवाही में बाधा देना’ नहीं माना जा सकता।
यह दुर्भाग्य की बात है कि यह वारदात हो गई हो। मैं इस मुठभेड़ के सुनिश्चित कारण का निर्धारण करने में असमर्थ हूँ परन्तु यह निश्चित रूप से हुआ लगता है कि संघर्ष के बाद पक्षों में बातचीत हुई जिसका परिणाम एक समझौते में हुआ। मेरे निरीक्षण-नोट का पुनः अवलोकन किया जाये। राय साहब गोपालदास की कार सड़क के कच्चे हिस्से पर खड़ी थी जो मुख्य पक्की सड़क से घर की ओर जाने के लिए निकलता था और जौहर की कार उस कार के और घर के बीच में लगी खड़ी थी। राय साहब गोपालदास की कार को बिना उसकी जगह से हटाये और उसे कच्चा रोड से दूर किये बिना यह बिल्कुल नामुमकिन-असंभव होता कि जौहर की कार मुख्य पक्की सड़क तक पहुँच भी पाती और ज़्यादा कर के इस सूरत में जब कि राय साहब गोपालदास की कार के दोनों तरफ दायें ओर बायें खेतों में कोई उगी हुई खड़ी-फ़सल हो। यह सम्भाव्य से, सम्भवतः! से कहीं अधिक था कि राय साहब गोपालदास की कार वापस - ‘रीवर्स’ की गई थी और ‘कच्चा रोड’ से हटाई गई थी जिससे कि जौहर की गाड़ी को चलाकर निकालकर ले जाने की अनुमति मिल सके। रास्ता मिल सके।
यह ऐसा इशारा बिल्कुल नहीं देता कि जौहर कहीं भाग रहे थे या बच रहे थे। इसके विपरीत यह तो ज़ाहिर करता है कि जौहर उस महरौली के मकान से राय साहब गोपालदास की पूरी सहमति रज़ामन्दी के साथ ही गाड़ी चलाकर गए। यहाँ पर पुलिन्दा भर साक्ष्य मौजूद है और जो अकाट्य हैं और तर्क से भी अभेद्य हैं और साफ़ दर्शाता है कि जौहर तब अपनी कार में अकेले अधिभोक्ता होकर सफ़र कर रहे थे। इस सन्दर्भ में मेरा इसी अदालत में चले अभियोग नम्बर 119/3 1942 दिनांक 10/1/1944 के निर्णय-पत्र ‘आर्डर’ का, परिणाम व निष्पादन सम्बन्धी भाग देखा जाये। इसको बचाव पक्ष की गवाही के साथ जोड़कर देखने से भरपूर बहुलता से स्पष्ट हो जाता है कि जौहर अकेले थे जब वे अपनी कार में महरौली-हाउस से निकले और अपने सैन्ट्रल लेन पर घर भी अकेले ही गये थे। राय साहब गोपालदास कहते हैं कि वे महरौली-हाउस से जौहर के चलने के पाँच या सात मिनट बाद रवाना हुए।
इसका मतलब तो यह होगा कि जौहर महरौली-हाउस और सैन्ट्रल लेन वाले घर का रास्ता, कम से कम उसकी आधी दूरी तो पहले से ही तय कर चुके थे जिस समय राय साहब गोपालदास ने महरौली-हाउस से चलना शुरू ही किया। फिर भी बड़ी अजीब बात है कि जब जौहर की कार सैन्ट्रल लेन घर पर पहुँची, राय साहब गोपालदास की कार जौहर की कार के एकदम पीछे आकर लगी थी। यहाँ भी पुनः एक और सूरते-हाल है परिस्थिति है जो साफ़ ज़ाहिर कर रही है-दर्शा रही है कि महरौली में एक समझौता हुआ था राज़ीनामा हुआ था जो दोनों पक्षों के बीच तय कर लिया गया था।
इस मुकद्दमें की बाकी की गवाही आदि तो कम या ज़्यादा करके औपचारिक ही है फिर भी मुझको ‘पहचान-क़वायद’-‘आइडेंडिफ़िके शन पैरेड’ जो जेल में चौधरी सूबा सिंह फ़र्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट ने करवाई थी; उसका उल्लेख करना होगा। इस्तगासे के विद्वान वकील नें फिर से बहस की है कि ‘पहचान-कवायद’ के परिणाम को दूसरे मुलज़िमों की इस अपराध में शिरक़त के रूप लेकर देखा जाना चाहिए। जब कि दूसरी ओर रक्षा की ओर के सुविज्ञ वकील का दावे से कहना है कि ‘पहचान-परेड’ को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। कारण वारदात के बाद ही दूसरे नामांकित अभियुक्तगण भी या तो उसी रात को या अगले दिन ही गिरफ़्तार कर लिये गए थे और पुलिस-स्टेशन पर ले आये गये थे; राय साहब गोपालदास और सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन के पास उनके पास आने का पूरा-पूरा मौक़ा था। मुझे इसमें कोई शक़ या सन्देह नहीं कि चौधरी सूबा सिंह ने ‘पहचान-परेड’ समुचित रीति से कराई थी। परन्तु मुझे यह नियन्त्रित करके संभालना है व पकड़ रखनी है कि इस्तगासे के गवाहों के पास पहचान-परेड के होने से पहले अभियुक्त-जनों को देखने का समय और मौका था। सुविधा थी।
नतीजे के तौर पर निष्कर्ष में और पेश सबूतों और दलीलों के आधार पर मेरी पक्की राय बन गई है कि अभियुक्त व्यक्ति यानी मुजरिम ने, उन सब व्यक्तियों के विरुद्ध भी जो अभियोग या इलज़ाम लगाया गया था, जहाँ तक कि मुकद्दमें के मुख्य पहलू का सम्बन्ध है, उसका, खण्डन कर दिया है और दूसरे ‘पिस्तौल’ के सम्बन्ध में जो अन्य परिस्थितियाँ हो गई उनका लाभ अभियुक्त को दिया जाना चाहिए।-एवं जौहर की गिरफ़्तारी को लेकर मुझे इस बात की पुष्टि में कोई प्रमाण, कोई सबूत नहीं मिलता है कि; जौहर राय साहब गोपालदास और सब-इन्स्पेक्टर भगवानदास जैन को पुलिस के अफ़सर करके जानते थे। - और वे लोग जौहर की गिरफ़्तारी कोई यथोचित ढंग से कानूनी तरीके से अंजाम दे रहे थे।
यह मेरे लिये व्यर्थ होगा कि मैं जौहर और मंगतराम के अतिरिक्त दूसरे अभियुक्त व्यक्तियों के अभियोगों पर अलग-अलग व्यक्तिगत रूप से ग़ौर करूँ, क्योंकि जौहर को मेरे दिये हुए वक्तव्य व रिमार्क दूसरे सभी अभियुक्तों पर समान रूप से लागू होते हैं। इसके साथ, तो भी, यह भी जोड़ा जाये कि ये दूसरे मुलज़िम घटनास्थल पर से घटना के थोड़ी देर बाद गिरफ़्तार किये गये थे। यदि वास्तव में वे दो पुलिस अफ़सरों को उनकी ड्यूटी की अदायगी के दौरान हमला करने के दोषी, अपराधी होते, तो मैं अनुभव से कह सकता हूँ कि वे अपने स्थान पर बने न रहते परन्तु भाग खड़े होते, फ़रार हो जाते या अपने को ख़ारिज करने की हर मुमकिन कोशिश करते और गिरफ़्तारी से बचने की पूरी कोशिश करते। उनका वहीं पर टिके रहना और उसी मकान में काम करते रहना-ये परिस्थितियाँ हैं वे हालात हैं जो बहुत मज़बूती से उनके पक्ष में जाती हैं।
मंगतराम (ड्राईवर) के विषय में मुझे उसके अन्यत्रता की स्थिति (दूसरी जगह होने) के लिये गये प्रतिवेदन के पक्ष में ठोस प्रमाणों का समुचित आधार प्राप्त है।
इन कारणों से मैं सभी अभियुक्तों को दोष-मुक्त करके बरी करता हूँ। घोषित किया: 6.5.1944 मि. डिस्ने
(हस्ताक्षर)
सेक्शन 30 मजिस्ट्रेट
दिल्ली
(देखने की बात है कि पूज्य चाचाजी श्री सुरेन्द्रनाथ जौहर फ़क़ीर को जान से मारने के लिए घेरने वाले भारतीय अपने ही देशभाई थे! और मुक़द्दमें का पासा पलटा और प्राणों की रक्षा की तो विदेशी सरकार के प्रतिनिधि ‘मिस्टर डिस्ने’ एक अंगरेज़ मजिस्ट्रेट ने। इसमें भी ‘गांधीवादी एकांगी आदर्शवाद’ से बचकर संकुचित दृष्टि को छोड़ पूर्णता-‘पूर्ण सत्य की समग्र दृष्टि का दर्शन’ मानों भगवद्गीता में दर्शाये भगवान कृष्ण के विश्वरूप दर्शन की याद ताज़ा कर गया- यहाँ श्रीअरविन्द हज़ारों मील दूरी पर बैठे आधुनिक युग के अर्जुन के प्रतिरूप का जो जेल की ‘एकाकी सैल’ में बैठा उनसे मार्ग-दर्शन लेकर ही मातृभूमि की स्वाधीनता का युद्ध-आधुनिक महाभारत लड़ रहा है। -किन्तु सुरक्षा-शस्त्र गांडीव वह तभी उठा सकता है जब कि अंतर-धुंध दूर हो ज्ञान का ‘विश्व रूप के सत्य दर्शन’ का ‘प्रकाश’ हो जो भगवान् श्रीअरविंद के रूप में श्रीपुराणी जी द्वारा प्रेषित संदेश में मिला। “Tell Surendra Nath that he must take full advantage of the discrepancies of the Police. Truth to be taken in its totality and not in piecemeal.” आह! क्या क्षण होंगे जब पत्र सुनाते हुए पुराणी जी के हाथ से हँसते हुए
श्रीअरविंद ने स्वयं पढ़ने के लिए पूज्य चाचाजी का जेल से लिखा पत्र ‘छीन’ लिया और तब ‘महावाक्य’ के रूप में युग-युगों के लिए सत्य के प्रतिपादन का सच्चा मार्ग उद्घोषित कर दिया। परिणाम तो वही हुआ जो होना था। “जहाँ कृष्ण हैं वहीं जय है।” - करुणामयी)