भागवत युद्ध
जब मैं श्रीअरविन्द आश्रम की दिल्ली शाखा के इतिहास के सम्बन्ध में पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मैं इस नतीजे पर पहुँचता हूँ कि जो आश्रम इस स्थान पर स्थापित हुआ है वह अवश्य ही किसी ऐसे बहुत लम्बे युद्ध का परिणाम और फल है जो कहीं ऊपर आध्यात्मिक स्तर पर लड़ा जा रहा था। इसकी सारी कहानी इतनी मोहक व आकर्षक है जिस पर सहसा विश्वास करना कठिन है। ऐसा लगता है कि यह पुराणों के किन्हीं पृष्ठों से ली गई हो, परन्तु है तो एकदम असली और सच्ची। यदि इसका साक्षी मैं स्वयं ही नहीं होता तो इसका विवरण जानने पर मुझे भी ऐसा ही लगता कि यह तो एक ऐसी कहानी है कि जैसी कहानियों का वर्णन हमारे पुराणों में किया गया है और जिन्हें इस तर्क के युग में मनुष्य कल्पित या मनगढ़न्त समझते हैं।
ऐसा समझिये कि पहले यहाँ पर आश्रम बनाने का कोई विचार, ख़्याल अथवा स्वप्न भी नहीं था। किसी तरह का सुझाव, कोई नक़्शा, ख़ाका, ढाँचा और योजना तो कभी थी ही नहीं। फिर भी जब मैं इस भू-सम्पत्ति के बारे में जोकि अब आश्रम के पास आ गई है विचार करता हूँ तो इससे बहुत साफ़ ज़ाहिर होता है कि यह भी किसी बड़े और लम्बे अभियोग की पराकाष्ठा है जिसकी भगवान् के दरबार में कल्पना हुई, योजना बनी और उसका निश्चय किया गया व निर्णय लिया गया।
ऐसा प्रतीत होता है कि सब देवताओं ने चाहा कि इस भूमि को इसकी अन्तर्निहित पवित्रता व पुनीतता प्रदान की जाय और यह प्रतिष्ठा की पात्र बने। इस भूमि के आस-पास-जहाँ कि महलों के खण्डहर और भग्नावशेष, क़िले, मस्जिद और मन्दिर थे- आसुरिक शक्तियों को अवसर मिला और उन्होंने ऐसे वीरान और उजाड़ स्थानों पर अपना कब्ज़ा जमा लिया। परन्तु देवताओं को भी यह स्थान अच्छा लगा और आकर्षण हुआ क्योंकि भगवान् ने इस स्थान को अपने युग-परिवर्त्तनकारी कार्य के लिए पहले से ही नियोजित कर रखा था और अपने भविष्य के कार्य की महती योजना के लिए इसे चुनकर रक्खा था। इसलिए यह स्थान झगड़े का कारण बन गया और फलस्वरूप दैवी व आसुरिक शक्तियों के बीच घमासान युद्ध इसी स्थल पर छिड़ गया।
इस युद्ध के बीच सन् 1938-40 में यह भू-सम्पत्ति ख़रीद ली गई और आसुरिक शक्तियों ने यह स्पष्ट और साफ़ रूप से देखा कि दैवी शक्तियों ने उनके विरुद्ध अपना एक क़दम आगे बढ़ा लिया है। यह सब देखकर आसुरिक शक्तियों ने दैवी शक्तियों के हरेक चरण पर अपनी विघ्न-बाधायें डालनी शुरू कर दीं। तीन बार तो यह भू-खण्ड कुछ क़ानूनी अड़चनों के कारण हाथ से निकल गया। अब इस स्थान में भवन-निर्माण सम्बन्धी जो कार्य हो चुका था उसे आर्किटेक्ट और इंजीनियरों ने आकर देखा और उन्होंने अपनी राय दी कि इस भवन का निर्माण पूर्णतया ख़तरनाक हो रहा है। नतीजा यह हुआ कि आगे निर्माण का कार्य बन्द कर देना पड़ा और उसके निकट ही नये सिरे से भवन का निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ। इस नये निर्माण में अभी थोड़ी ही प्रगति हुई थी कि तरह-तरह की नई समस्यायें-उसकी रूप-रेखा, धन-सम्बन्धी व सरकार की तरफ़ से-खड़ी हो गईं। काम में देरी पर देरी होने लगी जिसके परिणामस्वरूप मन में निराशा घर करने लगी।
फिर भी अनेक कठिनाइयों के बाबजूद समय पाकर भवन के निर्माण का कार्य पूरा हो गया और यह प्रयास चलने लगा कि इस स्थान को सामाजिक, राजनैतिक और अन्त में लोककल्याण कार्य के लिए प्रयुक्त किया जाय। परन्तु ये धारणायें भी व्यर्थ सिद्ध हुईं और फिर से ये प्रयत्न प्रारम्भ हुए कि इस भवन तथा इसके साथ लगी हुई जो ज़मीन थी उसमें नर्सिंग-होम सहित एक बड़ा अस्पताल, कृषि-फार्म, छात्रालय, हवाई-ज़हाज़ चलाने वालों के लिए एक विश्राम-गृह और अमेरिकी सैनिकों के लिए कुछ लम्बी-लम्बी बैरकें बनाई जायें। चूँकि उन दिनों द्वितीय विश्व-महायुद्ध चल रहा था इसलिए ये सब चीज़ें आवश्यक प्रतीत हुईं। परन्तु अन्त में ये सब धारणायें और योजनायें भी विफल हो गईं। और अब सन् 1947 में पाकिस्तान से आये हुए शरणार्थियों की समस्या आ खड़ी हुई। यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि लाखों निराश्रित लोगों को रहने का स्थान कहाँ और कैसे दिया जाय? शरणार्थी लोग सारी पुरानी छोटी-मोटी इमारतों के खण्डहरों में, टूटे-फूटे हुए पुराने मकानों, स्थानों और यहाँ तक कि सड़कों के किनारों पर भी टिक गये थे, परन्तु इस भवन में कोई नहीं आया।
इस भूमि में दो सौ फ़ीट गहरा एक ट्यूब-वेल खोदा गया लेकिन जब उसमें नीचे से अच्छे पानी का कोई आसार ही नज़र नहीं आया तब उसे भी छोड़ देना पड़ा। यह ज़मीन इतनी बंजर थी कि कोई फूल-फल, वृक्ष उगना तो दूर रहा, घास का एक तिनका भी यहाँ मानों सहन नहीं होता था। मनुष्यजाति तो एक तरफ़, जानवरों तक को भी यहाँ रखना मुश्क़िल काम था। परन्तु फिर भी कुछ ही सालों के अर्से में चेष्टायें की गयीं और प्रारम्भ में कुछ गायें यहाँ रखी गयीं। जब ये गायें और इनके बछड़े मिलाकर अठारह के करीब हो गये थे तभी डाकू इन्हें उड़ा ले गये। सब लोगों की वर्षों की सामूहिक मेहनत, प्रयास और आगे की योजनायें सब खड्ड में पड़ गईं और बेक़ार हो गयीं।
इस तरह यह स्थान बहुत साल तक उजड़ा हुआ और वीरान पड़ा रहा। अन्धकार, टूटी-फूटी क़ब्रों और खण्डहरों से घिरे हुए इस बियाबान स्थान ने एक भयावनी जगह का रूप धारण कर लिया। डरावने जंगली जीव-जन्तुओं के जमाव का यह डेरा बन गया। भ्रष्ट और भयानक प्राणियों के लिए अन्धेरे और वीराने में यह खाने-पीने का मानों एक सैरगाह बन गया। चोर-डाकुओं के छिपने के लिए अड्डा हो गया और बड़े-बड़े चूहों, चमगादड़ और उल्लुओं ने भी इसे अपना बसेरा बना लिया। हर प्रकार के साँपों ने रहने के लिए बिल बना लिये और गीदड़ भी अपनी हुआँ-हुआँ की बोली से दिन-रात धरती-आकाश गुँजाने लगे। यह सब आसुरिक शक्तियों को तो बहुत अच्छा लगा और उन्होंने सोचा कि चलो अब यह स्थान भगवान् के काम के तो योग्य ही नहीं रहा। इस प्रकार यह स्थान आसुरिक शक्तियों का एक सुदृढ़ गढ़ बनता गया जो भागवत-कार्य के ऊपर हमला बोलने के लिए हमेशा उद्यत् और तत्पर रहती थीं।
इसी समय कुछ ऐसी घटनाएँ घटीं जो तर्क से समझाई नहीं जा सकतीं। एक ऐसे व्यक्ति जिनका मेरे साथ 1942 की क्रान्ति-‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के समय जेल में वास्ता पड़ा था, परन्तु उसके पश्चात् उनका कुछ पता नहीं चला, एक दिन अचानक मेरे घर सन् 1955 में आ पहुँचे। मैं उस समय 27 औरंगज़ेब रोड पर रहता था। अजीब बात यह थी कि जब मेरी जान-पहचान इन सज्जन से पहले जेल में हुई तो पुलिस यह कभी पता नहीं लगा पाई कि वह हैं कौन? क्या उनका नाम है तथा उनके बाप का क्या नाम है और क्या उनका पता है?’ इस कारण पुलिस कभी उनके विरुद्ध कोई मुक़द्दमा भी न बना सकी। बातचीत करने और देखने से तो वह बिलकुल सनकी, झक्की और ख़ब्ती मालूम होते थे। कहने लगे कि-‘‘मैं भगवान् का दूत हूँ।’’ मैंने उनका अता-पता जानने की बहुत कोशिश की परन्तु कभी कुछ पता नहीं लगा। तो भी एक दिन वे कहने लगे कि-‘‘मैं इस समय एक विशेष लक्ष्य को लेकर आया हूँ और वह यह है कि आपका जो एक भवन कुतुब के रास्ते में है और जिसमें आसुरिक शक्तियों ने अपना डेरा जमाया हुआ है और अपना कब्ज़ा किया हुआ है उस भवन में से मुझे उन आसुरिक शक्तियों को निकाल बाहर करना है।’’ मैं उनकी बातों को सुनकर बड़ा हैरान हुआ। परन्तु वे शख़्स तो शाम को अपने लक्ष्य पर चले ही गये। मैं तो यह कभी सोच भी नहीं सकता था न आशा करता था और न ही मान सकता था।
दूसरे दिन प्रातः वे मेरे घर पर आ पहुँचे। उनका हाल बुरा था। फटे हुए कपड़े, सिर के बाल और दाढ़ी ऐसी बिखरी हुई जैसे कि बुरी तरह से पिटे हुए हों। आते ही कहने लगे-‘आसुरिक शक्तियों की ताक़त बहुत अधिक थी जिसका मुझे अन्दाज़ ही नहीं था। इस कारण भयंकर युद्ध करना पड़ा। परन्तु मैं उन्हें मारकर छोडूँगा। हाँ! उनको जरूर हराकर छोडूँगा।’’ ऐसा निश्चयपूर्वक कहते हुए वे चले गये।
अगले दिन प्रातः जब वे फिर मेरे घर आये तो इस बार उनकी हालत इतनी अधिक ख़राब थी- इतनी ख़स्ता थी और हाल इतना बेहाल था कि वे बिलकुल टूटे हुए, चूर-चूर व क्षत्-विक्षत् अवस्था में थे। इसके विपरीत उनकी आँखों में थी विजय की एक चमक और वे उसी अद्भुत चमक से जगमगा रही थीं। भाव-भरे स्वर में वे बोले-‘‘आसुरिक शक्तियों ने डटकर मुक़ाबला किया और आखिरी दम तक हमारी घमासान लड़ाई चलती रही, परन्तु अब उनका समय ख़त्म हो चुका है और मैंने उन्हें पूरी तरह से निकाल बाहर फेंका है। अब यह भवन हमेशा के लिए भगवान् के अवतरण के लिए ख़ाली है।’’
अगली बार जब मैं पांडिचेरी आश्रम पहुँचा तो मैंने माताजी से प्रार्थना की कि आश्रम उद्घाटन के लिए कोई तिथि निश्चित कर दें।
माताजी ने तुरन्त 12 फरवरी 1956 निश्चित कर दिया।
मैंने कहा-‘‘माताजी 21 फरवरी क्यों नहीं, जोकि बहुत महत्वपूर्ण है और आपका पवित्र जन्मदिन है।’’
माताजी ने कहा-‘‘12 और 21 एक ही बात है, इसमें कोई अन्तर नहीं है।’’ माताजी ने आगे कहा-‘‘बारह लोग उस दिन ध्यान में बैठ सकते हैं। एक पुराना विश्वास है कि यदि बारह लोग इकट्ठे होकर प्रार्थना करें तो वह प्रार्थना मंज़ूर होती है।
तो इस प्रकार दिल्ली आश्रम की प्रतिष्ठापना हुई।
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ज्यों ही यह रहस्यमयी विजय प्राप्त हुई कि दिल्ली पुलिसवालों का टेलीफ़ोन आया कि वह हमारे भवन के चारों तरफ के क्षेत्र की पूरी छानबीन करना चाहते हैं और इस भवन में अपना शिविर गाड़ना चाहते हैं। मैंने हाँ कर दी और उसी समय पुलिस का एक दल बन्दूक और संगीनों से लैस होकर भवन की दूसरी मंज़िल में आकर जम गया। इससे भगवान् के दूत ने जो संग्राम किया था और आसुरिक शक्तियों को निकालने के लिए हमला किया था, उसकी पुष्टि हो गई।
यह सब क्यों हुआ और कैसे हुआ इसके लिए तो मैं खुद हैरान हूँ परन्तु कुछ समय पश्चात् मैं अपने अन्दर यह सोचने लग गया कि इस स्थान का कुछ उपयोग होना चाहिये। अन्त में एक ऐसा क्षण भी आ गया जबकि इस स्थान पर रूपान्तर करने का काम भी हाथ में ले लिया गया। बहुत ही जल्दी मरम्मत का काम शुरू किया गया, सारे भवन की सफ़ाई की गई और सुन्दर पोताई हुई। इसके बाद ध्यान में कुछ ऐसे विचार बने कि इसके साथ कुछ नई इमारतें भी खड़ी की जायें।
अब काम चल पड़ा। मुझे हिम्मत हुई कि इस स्थान में खेलने के लिए बड़े-बड़े मैदान, विद्यालय और छात्रावास इत्यादि बनाये जायें। मैंने माताजी को लिखा। इन सब योजनाओं में जोकि माताजी को मैं भेज रहा था उनमें सबसे ऊपर मेरे मन में एक ऐसा विचार आता था कि यहाँ पर श्रीअरविन्द की कोई यादगार बननी चाहिये परन्तु उसका कोई आकार मैं नहीं बना पा रहा था। माताजी की तरफ़ से मेरे सुझावों पर कभी कोई उत्तर नहीं मिला। अन्त में एक ऐसा ऐतिहासिक दिवस भी आया जबकि मैंने माताजी से पूछा-‘‘माताजी, दिल्ली के स्थान के सम्बन्ध में मैं समय-समय पर अपने सुझाव भेजता रहा हूँ और कुछ-न-कुछ कहता भी रहा हूँ परन्तु मुझे कभी आपका कोई मार्गदर्शन और निर्देश प्राप्त नहीं हुआ।’’
तब माताजी ने कुछ ऐसे सहज भाव से कहा जिसका गहरा प्रभाव मेरे मानस-पटल पर जन्म-जन्मान्तर पर्यन्त छाया रहेगा। माताजी ने कहा-‘‘लेकिन क्यों! यह स्थान तो श्रीअरविन्द आश्रम होगा और अवश्य ही इस स्थान पर श्रीअरविन्द की समाधि बनेगी जिसके लिए मैंने श्रीअरविन्द के अमूल्य व क़ीमती अवशेष भी सँभालकर रखे हुए हैं।’’
साफ़ ज़ाहिर है कि आसुरिक शक्तियों के निकल जाने के पश्चात् और इस स्थान को ख़ाली कर देने के बाद दैवी शक्तियों ने माताजी के ऊपर भी अपना प्रार्थना-प्रभाव डाला होगा कि इस स्थान को मुक्त व पवित्र करें। क्योंकि भगवान् की यही इच्छा है और इस इच्छा को पूरी करने के लिए इतने लम्बे समय तक इतना भीषण युद्ध करना पड़ा है।
माताजी का यह गहरा और महत्वपूर्ण निश्चय सुनकर मैं काफ़ी समय तक अचंभित और अभिभूत रहा। मन की इसी अद्भुत अवस्था में मैं दिल्ली लौट आया।
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वाह! क्या खुशी और हैरानगी की बात हुई कि जिस दिन मैं दिल्ली पहुँचा उसी दिन एक रजिस्ट्री-पैकेट पांडिचेरी से प्राप्त हुआ। मैंने पैकेट खोलकर देखा कि श्रीअरविन्द की समाधि के निर्माण के लिए पूरे रेखाचित्र, आदेश और निर्देश सब विधिवत् दिये हुए थे। अब मैं इस अद्भुत घटना के ऊपर कह ही क्या सकता हूँ।
भला अब मेरे रास्ते में कौन-सी रुकावट थी!
समाधि का पूरा रेखाचित्र मिल गया था। मेरी पुकार सुन ली गई थी और स्वीकृति दे दी गई थी। अब तो कुछ ऐसा होना प्रारम्भ हुआ जोकि इसके पहले कभी संभव नहीं हो रहा था।
बीस साल की व्यर्थ कोशिश और निष्फल प्रयास अब जादू की छड़ी के छूने की तरह ठीक होने लगे। उस समय दिल्ली में बिजली की बहुत कमी थी और इस स्थान के पाँच-सात मील के अन्दर न कहीं खम्भे थे और न कोई बिजली की लाइन। परन्तु अब ख़ास तौर पर वे हमारे लिए लगाये गये जिससे कि पम्प लगाकर कुओं से पानी निकालना भी शुरू हुआ। ऐसे कुएँ जो सैकड़ों वर्षों से वीरान पड़े हुए थे, और वे ख़ेत जोकि वर्षों से उजाड़ ख़ाली पड़े हुए थे-उन्हें अब इधर-उधर के लोग किराये पर लेने लगे और घास, खेती तथा सब्ज़ी लगनी शुरू हो गई जिससे आश्रम के लिए कुछ आमदनी भी शुरू हुई।
चारों ओर से हर प्रकार की ऐसी मदद आनी शुरू हो गई जिसका कभी स्वप्न में भी ख़्याल नहीं हो सकता था।
हर एक कठिनाई और उलझन के लिए स्वतः ऐसी शक्तियाँ आ उपस्थित होने लगीं जिन्होंने खुशी और स्वेच्छा से सहायता देना प्रारम्भ कर दिया। एक उद्यान-विशेषज्ञ अपने-आप आये और उन्होंने बाग़-बग़ीचे व वृक्ष लगाने और लॉन बनाने में मदद देनी शुरू कर दी। एक-दो आर्किटेक्ट और इंजीनियर भी आ गये जिन्होंने निर्माण-कार्य में अपना मूल्यवान समय देकर समय आने पर श्रीअरविन्द की संगमरमर की समाधि बनाने में अपना योगदान दिया। एक अन्य सैनिटरी-इंजीनियर ने आकर पाइप-लाइन डालने की समस्या को हल कर दिया। इस तरह बीसों लोग चारों ओर से छोटे-बड़े मुश्किल कामों और समस्याओं को हल करने के लिए व हाथ देने के लिए आ जुटे जिनका आश्रम से या मुझसे कोई सम्बन्ध था।
अब तो ऐसी बात हो गई कि जो सब मुश्क़िलें और उलझनें पड़ी रहती थीं और जिनका कोई हल नहीं मिलता था व कोई बात आगे चल नहीं पाती थी अब वही सब बातें सीधी व सरलता से हल होने लगीं। सब काम सफल होने लगे। इस तरह थोड़े ही महीनों के भीतर विद्यालय की स्थापना भी हो गई।
23 अप्रैल 1956 को जब आश्रम के विद्यालय की स्थापना की गई-वहाँ कुछ भी न था। न कोई विद्यार्थी, न ही कोई अध्यापक। कोई साज़ो-सामान भी नहीं। यहाँ तक कि कोई योजना भी नहीं कि किस स्थान पर विद्यालय की कक्षाएँ होंगी। तो भी 23 अप्रैल 1957 को-एक वर्ष के भीतर ही यह स्कूल दिल्ली के शिक्षा क्षेत्र में अपना एक विशिष्ट स्थान बना चुका था। दो सौ के लगभग उसमें छात्र थे और बीस से अधिक अध्यापक काम कर रहे थे।
श्रीअरविन्द के पवित्र देहावशेषों की आश्रम-समाधि में स्थापना करके भागवत अनुष्ठानस्वरूप दीर्घकाल से चले आ रहे देवासुर संग्राम में दैवी शक्तियों की विजय और आसुरी शक्तियों के सम्पूर्ण विघटन व विनाश के लिए श्रीमाँ ने अपनी निर्णायक मुहर लगा दी व इस क्षेत्र को आसुरी प्रभाव से विमुक्त कर विजय-मण्डल की सच्ची महिमा से मण्डित कर दिया। ऐसा लगता था कि यही थी चरम व परिणति भागवत प्रक्रिया की और भारत की राजधानी में नवीन युग के उद्घाटन के प्रथम चरण की सम्पूर्ति जिसके प्रादुर्भाव के हित देवताओं ने इतने दीर्घकाल तक दुर्धर संघर्ष किया व जिसमें साधकों का प्रयोग उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र व आयुधों के रूप में किया।
यह कोई मात्र आकस्मिक घटना नहीं है बल्कि जीवंत निरूपण है जिससे माताजी के ऐतिहासिक संदेश का सत्य स्पष्ट परिलक्षित होता है-
‘‘अतिमानस का अवतरण हो चुका है आसुरी शक्तियाँ पछाड़ी जा चुकी हैं। वे पीछे हट रही हैं। मानवता का अतिमानस युग में प्रवेश हो गया है।’’