जेल जीवन
जज के निर्णय के अनुसार मुझे ‘ए’ क्लास की सजा दी गयी थी। परन्तु जब मैं मुल्तान जेल में पहुँचा तो मुझे बताया गया कि उनके पास ‘ए’ क्लास की कोई व्यवस्था नहीं थी। सो मुझे ‘बी’ क्लास के वार्ड में भेज दिया गया। मेरे साथी क़ैदियों में से अधिकतर पंजाबी या देहली से थे। शायद हम लोग सौ से अधिक संख्या में थे जो विभिन्न धर्मों व वर्गों से थे जैसे - हिन्दू, मुस्लिम, सिख, सन्यासीगण, मौलाना-मौलवी, सनातनधर्मी नेतागण, हकीम, वैद्य, डाक्टर, अध्यापकगण, प्रोफेसर, शिक्षा-शास्त्री, व्यवसायी, समाज-सुधारक कार्यकर्त्ता यानी छोटा सा प्रतिनिधि समाज ही था।
उन्हीं में से एक दिल्ली के लाला शामनाथ थे जो स्वाधीन भारत की सरकार में उपमंत्री बने। एक अन्य थे जो दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामियाँ में शिक्षक थे। अभी चार-पाँच वर्ष पहले मेरा मन किया और मैं जामिया मिलिया गया और जाकर अपने जेल के कै दी-साथी और स्वाधीनता सेनानी से मिला-भेंट की। लाहौर के मशहूर व धाक के डाक्टर प्रकाशचन्द्र का तो मुझसे दोस्ताना ही था। मित्रवत् प्रेम था। चौधरी शेरजंग1 जो राजनीतिक डाकू कहलाता था जिसने देश की आज़ादी की खातिर स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये कितनी ही डकैतियाँ की थीं। और जान जोख़िम में डालकर डाके डाले थे बड़े जीवट का नौजवान था और आयु में मुझसे कहीं छोटा था आदि आदि। हम सब एक साथ एक ही वार्ड में थे।
वहीं पास ही एक दूसरे वार्ड में ‘कामागाटा मारू’ के सिख समुदाय के लोग थे जो देश की आज़ादी के लिये बाहर विदेश से संगठन करने में लगे थे। वे अंग्रेजी सल्तनत को उखाड़ने के उद्देश्य से इस जल जहाज ‘कामागाटा मारू’ से अस्त्र शस्त्र लेकर कलकत्ता आ रहे थे जहाँ वे गिरफ्तार कर लिये गये।
राजद्रोह के जुर्म में कइयों को फाँसी व इन्हें सख्त उम्र-क़ैद की सजा दी गयी थी। फिर वहाँ एक वार्ड पठानों के लिये ही था जिनको आजीवन कारावास की सज़ा मिली हुई थी। वे सबसे अधिक शक्तिशाली और बहादुर लोग थे। उनमें से अधिकतर तो छः फीट से अधिक ऊँचे-लम्बे थे।
जेल में राशन बाँटने का काम पठानों के हाथ में था, क्योंकि वे सबसे वरिष्ठ थे। बुज़ुर्ग और पुराने लोगों में से थे। वे पीली पोशाक पहना करते थे। जेल में यह तऱीका था कि उमर-कैदियों को पहले के वर्षों में काली पोशाक ही पहननी पड़ती थी फिर लम्बी क़ैद भुगतने के बाद उनको पीली रंग की पोशाक दे दी जाती थी। वे सभी थे तो बहुत अच्छे। हमें खाना पकाने के लिये मदद के तौर पर दो या तीन कैदी मुहैया किये गये थे। हमने अपना काम राजनीतिक क़ैदियों में बाँट लिया था। राशन डिपार्टमेण्ट से रोज का राशन हर दिन हमारे लोग ले आया करते थे। हालाँकि अपना खाना स्वयं बनाना सीखने में तो हमें कुछ दिन तो लग ही गये परन्तु अपना खाना हम बनाते स्वयं ही थे।2 अपने खाली समय में हम ‘हैंड-बाल’ और विशेषकर बैडमिण्टन प्रतिदिन चार से पाँच घण्टों तक खेला करते थे।
वैसे हम सदा कुछ न कुछ ऐसा करते ही रहते थे जिससे जेल के अधिकारियों को परेशानी रहे- दिक्कतें पेश आयें- समस्यायें बनें। सो पहली पाबन्दी मुझ पर सजा के तौर पर जो लगाई गयी वह थी घर से पत्र-व्यवहार बन्द। न ही मैं कोई पत्र लिख सकता था और न ही कोई मुझे भेज सकता था। कुछ दिन बाद मेरी परिवार के लोगों से मुलाकातें भी बन्द कर दी गयीं। अब मुझसे मिलने कोई भी नहीं आ सकता था। थोड़े और दिन बीते तो मेरे हाथों में प्रतिदिन लगभग चार घण्टों के लिये हथकड़ी लगाई जाने लगी। इसी तरह एक महीना भी न बीता होगा कि मुझे लोहे की ‘डण्डा-बेड़ी’ लगा दी गयी और उसी के साथ मुझे सोना पड़ता था। इसके बाद मुझे वार्ड में से निकाल लिया गया और तीन महीने के लिये काल-कोठरी में एकान्तवास में डाल दिया गया। ऊपर से मुझे हर दिन अट्ठारह सेर गेहूँ चक्की पर पीसने को देने लगे। जब मैंने पीसने से इन्कार किया तो जेल अधिकारियों ने गेहूँ पीसने की मात्रा और बढ़ा दी। अट्ठारह से बीस सेर कर दी।
हमें अपनी नैसर्गिक क्रियाओं के लिये, प्राकृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये भी (जैसे लघुशंका व मलविसर्जन आदि) शौचालय नहीं ले जाया जाता था। बल्कि वहीं छोटी सी काल-कोठरी में ही निवृत होना होता था। खाना भी वहीं दे दिया जाता था। वैसे हमें अपनी कोठरी को ‘साफ’ रखना होता था। और अपना बिस्तर ठीक ठिकाने से सहेजकर रखना होता था।
एक बार की बात है कि मैं दरवाजे की ओर पीठ किये अपने किसी ध्यान में बैठा हुआ था। अचानक कब पीछे से जेलर आ गया फिर क्या था मुझे याद है झट से वार्डन ने आकर मुझे बलपूर्वक ठेलकर खड़ा कर दिया। मेरी टाँगें खींची-तानी गयीं। उधर मेरे हाथ भी खींचे गये और फिर मेरा हाथ घसीट कर जबरदस्ती माथे पर रख दिया गया। इस तरह जेलर के लिये सैल्यूट बनाकर ‘चढ़ाई’ गयी तो मैं इस क्रूरता भरे दुर्व्यवहार पर जोरों से चीख-चिल्ला रहा था। ज़ोर-ज़बरदस्ती के खिलाफ आवाज बुलन्द कर रहा था। जबकि जेलर अपने मातहत अफ़सरों के साथ मुआयने पर आया हुआ था। उसने उनको एकदम वहाँ से चले जाने को कहा।
वे लोग उधर से गये और वह मेरी कोठरी के भीतर आ गया और अन्दर से कुण्डा लगा लिया- बन्द कर लिया। वहाँ वह मुझसे दो घण्टे से भी अधिक देर तक बातें करता रहा जिसमें कि वह मुझे जेल के नियम कायदे-कानून पालन करने के बारे में मनवाने और राजी करने की कोशिश करता रहा। पर मैने तो मुहतोड़ एक जबाब दिया, “हम यहाँ अपनी जिन्दगियाँ बचाने के लिये नहीं आये हैं। बल्कि हम तो यह ज़्यादा पसन्द करते हैं कि यहाँ हम अपनी जानें कुर्बान कर दें। हम तुम्हारे ये कायदे-कानून जो बिल्कुल गलत हैं- उनको मान देने को, पालन करने के लिये नहीं आये हैं। हम कभी भी उनका पालन नहीं करेंगे। हम तो जेल में इसलिये आये हैं कि देश को विदेशी पंजों से आज़ाद कराना है। हम अपनी सुरक्षा या अपनी ज़िन्दगी और इन सब छोटी-छोटी बातों की बिल्कुल परवाह नहीं करते।” उसने एड़ी चोटी का ज़ोर लगा लिया पर वह मुझे क़ायल नहीं कर सका। आख़िरकार वह गुस्से में भनभनाता चला गया।
अगले दिन वहाँ ‘टिकटिकी’ लाई गयी और हमारी काल-कोठरियों के बाहर रख दी गयी। यह शारीरिक यातना देने की ऐसी जुगत थी - यंत्र था जिससे हमें बाँधा जाता, और फिर हमारे नंगे शरीरों पर बेंत या कोड़े लगाये जाते। हम तो पहले ही ‘डंडा-बेड़ी’ में थे- जिससे हमारी एड़ियाँ बुरी तरह जख्मी हो चुकी थीं। हमें सोते-जागते जब कभी मुड़ना होता या करवट बदलना होता तो ‘डंडा-बेड़ी’ का मुँह - उसका अग्रभाग इस ओर या उस ओर पहले से ही घुमाना पड़ता था। हफ्ते या दस-एक दिन बाद जाकर उन्होंने हमारे घायल टख़नों पर थोड़ी दवा लगायी। और तब उन्होंने एक चमड़े का खोल भी जख़्मी टखनों पर बाँध दिया जो बिल्कुल वैसा ही था जैसा कि घोड़ों के बाँधा जाता है। यह इसलिये कि ‘डंडा-बेड़ी’ का लोहा सीधा हमारी खाल या हड्डियां पर टकराकर चोंट न करे। जो चमड़े का खोल मैं वहाँ पहना करता था मैं ले आया और अब भी मेरे पास है।
चक्की-पिसाई के बारे में मैं बताना चाहता था कि शुरू के दिनों में गेहूँ पीसना तो दूर हमने तो कभी चक्की को छुआ तक नहीं। हाथ भी न लगाया। परन्तु वहीं एक शुभचिन्तक ख़ैरख्वाह आ निकले और उन्होंने हमें नेक सलाह दी ‘भाई! कृपा करके थोड़ा सा गेहूँ तो पीस ही दिया करो। और नहीं तो आधा सेर या सेर भर ही सही। क्योंकि अगर तुमने ज़रा सा भी नहीं पीसा तो ये लोग तुम्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर देंगे और तब पूरी की पूरी हुकुम-उदूली का एक नया ही इलज़ाम लगाकर एक और सजा छः महीने के कै द में ठोंक दी जा सकती है। इसलिये यही ज्यादा अच्छा है कि कम से कम नाम मात्र को ही सही पर थोड़ा बहुत गेहूँ चक्की पर पीस ही दो बनिस्बत इसके कि बिल्कुल ही न पीसो।” हालांकि मेरी इसके अनुसार चलने की बिल्कुल रुचि नहीं थी। लेकिन मुझे अपने मित्र की भलाई की भावना से भरी सलाह को स्वीकार करना ही पड़ा। मुझे तो इस क्रूर सजा पर बड़ा ही गुस्सा आया और मैं जेल सुपरिण्टेण्डेण्ट पर चिल्लाया भीः “कौन पीसेगा इतना अनाज भला? क्या तुम्हारा बाप बैठा है जो आकर पीस जायेगा?” बेशक वह बहुत गुस्सा हो गया और मेरी काल-कोठरी खुलवाई और लगा मुझे बेतहाशा मारने-पीटने। कभी खींचता, धकियाता फिर खड़ा करता और तरह-तरह से मारता। फिर सबसे अधिक कष्टदायक और यातना भरी क्रूर सजा का साधन ‘टिकटिकी’ लाया गया जिससे बाँधकर हमारे नंगे शरीर पर बेंत लगाये जाने थे। इसे शुरू भी मुझी से करना था। पहले नम्बर का निशाना जो था।
मगर इसी बीच पूरे पठान वार्ड ने जिसमें 150-200 उमर कैदी आजीवन कारावास भोगने वाले बन्दी थे बगावत पर आ गये और धमकी दे दी, “देख लो अगर इनमें से एक को भी बेरहमी से सताया गया। टिकटिकी से बाँधकर बेंत लगाये गये तो हम भी चुप नहीं बैठेंगे। यहाँ के सारे दरवाजे तोड़ देंगे और जेल का गेट उखाड़ फेंकेंगे। हम इन सारे अफ़सरों को, वार्डनों को ज़ान से मार डालेंगे”। यह कहानी तो हमारी ओर घट रही थी उधर उत्तेजित भीड़ ज्यादा नहीं तो 25 से 50 हजार मुलतान नगर के निवासी अपने घरों से बाहर निकल आये और देश की आज़ादी के लिये कुरबानी करने वाले राजनीतिक कैदियों पर किये जाने वाले इन भयंकर जुल्मों के ख़िलाफ आवाज बुलंद करने लगे। लगता था जैसे कि अचानक कोई तूफान आ गया। उधर एक अजीब ही सनसनीख़ेज चमत्कारपूर्ण और ही किस्म का किस्सा खड़ा हो गया। हुआ ऐसा कि जेलर का इकलौता बेटा एकदम बहुत बीमार हो गया। उसे सख़्त तेज बुखार 104-105 डिग्री चढ़ गया। जेलर की पत्नी ने अपने जेलर पति को बुलाकर रो-रोकर कहाः “अब लो देखो! क्योंकि तुम इतने बेरहम हो, क्रूर हो। इसीलिये हमारा बेटा इतना सख्त बीमार हो गया है। कौन जाने कि यह बचता भी है कि इसकी जान ही चली जाए।” और वह जोर-जोर से रोने लगी।
तब शायद या तो वह डर से सहम गया था या फिर उसके अन्दर से ही कोई गहरी समझ जाग उठी। वह हमारे वार्ड पर आया, काल-कोठरियाँ खोलीं और सामने के लॉन में जहाँ ‘टिकटिकी’ रखी थी काफी सारी नई दरियाँ मँगवाकर बिछ-बिछा गईं तो हमें काल-कोठरियों से बाहर निकाला गया। फिर हमारे डंडा-बेड़ी हथौड़े से मारकर तोड़-तोड़कर बड़ी मुश्किल से निकाले गये। उसके बाद हमको वापस हमारे वार्ड में भेज दिया गया। सो यह था हमारे जेल-जीवन का एक पक्ष। एक रुख।
इसका दूसरा पक्ष तो पूरा का पूरा आनन्दोत्सव ही था। मौज-मस्ती, हँसी-मजाक, ठहाके, नटखट शरारतें, नकलें निकालना, एक दूसरे पर आमोद-प्रमोद में नाटक-स्वाँग बनाना, ऑन दी स्पॉट ड्रामे बनाकर छकना-छकाना यह हमारा दिन-रात का शगल था। हमने अपने जेल-जीवन के हर पहलू का पूरा-पूरा रस लिया। उपभोग किया। आनन्द उठाया।
हम लोग जेल में शास्त्रार्थ भी रखा करते थे। किसी भी विषय को लेकर उस पर गहरी सोच के साथ बहस-मुबाहसा। पक्ष व विरोध में वाद-विवाद। एक बार इसका विषय था ‘मांसाहार’। इसमें भाग लेने वाले अच्छे सुविज्ञ, जानकार धुरन्धर विद्वान भी थे। ये सभी लोग भिन्न-भिन्न धर्मों से अलग-अलग विचार धाराओं के थे जैसे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, यहूदी, आर्यसमाजी, सनातनी आदि। दो टोलियाँ बन गईं जिसमें एक मांसाहार के पक्ष में थी और दूसरी टोली मांसाहार के ख़िलाफ थी। यह सारी गतिविधि खूब प्रसन्नता, उत्साह और उल्लास से चल रही थी। सत्र के बीच में पूर्ण सद्भावना की मौंजे चलती थीं जैसा कि अच्छे खिलाड़ियों के बीच में रहती है जिसे कहते हैं ‘स्पोर्टिंग-स्पिरिट’। यह मुबाहसा आदर्श शास्त्रार्थ जेल में लगभग तीन मास तक चलता रहा। नित्य हम लोग एक या दो घण्टों से अधिक इसमें लगे रहते थे। चर्चा में विषय के अनुसार समुचित हवाला देने के लिये प्रमाण भी प्रस्तुत करने होते थे सो निर्देश के लिये सन्दर्भ-पुस्तक व ग्रन्थों को भी पेश करना पड़ता था। इसके लिये हमें उचित स्तर की प्रामाणिक पुस्तकों की कितनी ही लाइब्रेरियों से उधार लाने की व्यवस्था करनी होती थी। और यहाँ आर्य समाज लाहौर से भी सम्पर्क काम आता था। कई मूल व अन्य प्रलेख जुटाने होते थे जिनसे उद्धरण देकर अपने आप दी गई दलीलों व प्रमाणों में वज़न डाला जाता था। दूसरे पक्ष के लोग अपने ही प्रमाणों सहित मांसाहार के औचित्य के पक्ष में दलील देते कि मांसाहार तो ‘अश्वमेध यज्ञ’ के साथ ही जुड़ा है। वह तो श्रीरामचन्द्र के युग में भी प्रचलित था। राजा महाराजा मांस खाते ही थे। यह उनका आहार ही था।
इस प्रकार की गतिविधि हमारे लिये उच्च कोटि के बौद्धिक एवं प्रतिभाशाली मन-बहलाव का साधन थी जिसमें हम लोग व्यस्त रहते थे। यह हमारे लिये शिक्षा का अपूर्व तरीक़ा बनकर उपस्थित हुआ। अन्त में निर्णय के तौर पर कोई भी यह प्रस्थापित नहीं कर पाया कि मांसाहार लाभकारी है अथवा हानिकारक। मैच अनिर्णीत रहा।
यद्यपि हमारी मुल्तान जेल नई ही थी परन्तु उसकी प्रबन्ध व्यवस्था एवं आयोजन व निबटन, क्रम-विन्यास काफी विश्रृंखल थे-दोषपूर्ण थे। शौचालय ठीक से साफ ही नहीं किये जाते थे। हम अक्सर अधिकारी लोगों से शौचालयों की बुरी हालत और उनके रख-रखाव के बारे में कितनी ही बार शिकायतें करते रहते थे। परन्तु उन्होंने कभी कोई परवाह नहीं की। कोई ध्यान ही नहीं दिया। तब हमने एक आदर्श उपस्थित करने की ठान ली। कि ठीक है अपने शौचालयों की सफाई हम स्वयं ही करेंगे। यहाँ पर भी मैंने इस मुहिम का नेतृत्व सँभाला। मैंने एक मेहतर-भंगी का वेश धारण किया। सिर पर पगड़ी बाँधी। अपनी बाईं बाँह के नीचे टोकरी पकड़ी। एक झाडू और दूसरे उपकरण (औज़ार) दायें हाथ में सँभाल लिये। मैंने अपना काम खूब कुशलता पूर्ण बढ़िया से किया। दूसरे लोगों ने भी इसका अनुसरण किया। हमने अपने कार्य का खूब मज़ा लिया और फिर तो यह एक आदत ही बन गई। जिसको हमने नियम से चलाया जब तक कि हम जेल से न छोड़ दिये गये। हम अपने शौचघर-संडास इतने स्वच्छ और बढ़िया कायदे से रख सके थे कि हमें लगता था कि कितने तो रसोईघर भी इतने साफ नहीं रखे जाते।
सो वहाँ खेले गये ड्रामों में से एक ड्रामा यह भी था जिसका हमने ख़ूब रस लिया। आनन्द मनाया।
क्योंकि मैं छोटा था। शरारत मेरे स्वभाव का एक अंग थी और दूसरी ओर राहतें थीं ताश खेलना, पहेली बूझ-बुझौवल, चुटकुलेबाज़ी वग़ैरा वग़ैरा। हमारी जेल के सत्ताधारी अधिकारीगण से लड़ाई चल रही थी इस बात को लेकर कि गर्मी के मौसम में हमें बाहर सोने दिया जाए। बेशक़ यह लड़ाई क्या थी, युद्ध था। कठिन। अन्त में जीत हमारी हुई और हम बाहर खुले आसमान के नीचे सोने लगे। एक रात को मैं बस उठा और सब लोगों के जूते इकट्ठे किये और धीरे से साथ के वार्ड में रख दिये। उनके साथ अपने जूते भी जरूर रखे जिससे शक की कोई गुंजाइश न हो। अगले दिन जब सब लोग सोकर उठे तो वे अपने जूतों के गायब हो जाने पर एकदम हक्के -बक्के रह गये।
दो तीन घण्टों के बाद जाकर उस दूसरे वार्ड का वार्डन हमारे तरफ आया और कहने लगा, “यह कैसे हुआ कि तुम लोगों के जूते उस तरफ पड़े हुये थे?” मैंने कहा, “हमें तो पता नहीं यह कैसे हुआ?” सारे मामले की रिपोर्ट जेल-सुपरिण्टेण्डेण्ट तक पहुँची। काफी दिन बीतने के बाद मैंने रहस्योद्घाटन किया कि यह मेरी कारस्तानी थी। पर कोई इस बात की कल्पना नहीं कर सकता था सो किसी ने इस बात पर यक़ीन नहीं किया। ये तो भोली भाली नटखटिया शरारतें थीं। ऐसी शरारतें बेशक़ हम अक़्सर कर लिया करते थे।
कभी-कभी हम बिजली को गुल कर देते थे। फ़्यूज उड़ा देते। सारी जेल में बिजली चली जाती और सारे जेल में घुप्प अँधेरा छा जाता। सारे जेल में चीख पुकार मच जाती। क़ैदी लोग चित्र-विचित्र आवाजें करते। अजीब धूम सी मच जाती। उन दिनों में दो और चार आने के सिक्के हुआ करते थे जिन्हें दुअन्नी चवन्नी के नाम से जाना जाता था। इनसे बल्बों को फ्यूज करना बहुत आसान था। सिर्फ बल्ब को होल्डर से हम निकालते, होल्डर में दुअन्नी या चवन्नी रख देते। उस पर बल्ब फिर वैसे ही लगा देते थे और बिजली का बटन बिजली चालू करने को ऑन कर देते। इतने भर में बिजली की पूरी लाइन फ्यूज हो जाती और सारे जेल की बिजली गुल हो जाती। और उसी के साथ जेल में चीख़-पुकार चिल्लाहटों का बाज़ार गरम हो जाता। पूरे जेल में हज़ार दो हज़ार लोग जब एक साथ चीखने-चिल्लाने लगते तो सारा जेल डोलने लगता था। इसमें तो बड़ा ही मज़ा आता था। हम ऐसी-ऐसी बातों का ख़ूब आनन्द-रस लिया करते थे।
जेल में मेरे पिताजी और मेरी पत्नी मुझसे मिलने को - ‘मुलाक़ात करने’ को आये। मेरी एक साल पहले ही शादी हुई थी। मेरी पत्नी गज भर का लम्बा घूँघट निकाले होती थीं ख़ासतौर पर तब वह भी इसलिये क्योंकि वे अपने श्वसुर के साथ होती थीं। परन्तु मेरी तो मुलाक़ातें ही बन्द करा दी गयी थीं। सो मुझको उनके पास मुलाक़ात के लिये बाहर जाने की इजाज़त नहीं थी। परन्तु तभी जेल सुपरिण्टेण्डेण्ट ने सन्देश भेजा कि मुझे मुलाकातों के लिये बाहर (वार्ड के बाहर) जाने दिया जाए। परन्तु अब मैंने जाने से इन्कार कर दिया। कहा, जब मेरी ‘मुलाकातें’ ही बन्द कर दी गई हैं तो फिर मैं बाहर क्यों जाऊँ? मैं नहीं जाऊँगा। पहले तो वह हुकुमनामा-आर्डर रद्द होना चाहिये।’
इत्तफाक़ से मुलतान के सीनियर अफ़सरों में एक थे सरदार नारायण दास। वे चीफ़ ऑफ पंजाब थे। सरदार हमारे परिवार को अंगरेजी सरकार का दिया हुआ ख़िताब था। सरदार का अर्थ यहाँ लीडर के रूप में रखा है। पर थे वे अंगरेज़ों की नज़रों वाले ही। वे मेरे रिश्ते से चचाज़ाद भाई होते थे। उनके दादा और मेरे दादा जी सगे भाई थे। सो मेरे पिताजी इस समस्या को लेकर उनके पास गये और उन्हें साथ ही लेकर आ गये। वे सीधे मेरी काल-कोठरी पर आये। जेल सुपरिण्टेण्डेण्ट उनके साथ में थे। मेरी मनाही और ज़िद के बावजूद उन्होंने बस मुझे घसीट कर बाहर निकाल लिया और मुझे अपने पिताजी और पत्नी से जबरन मुलाक़ात करने को पेश कर दिया। तब मैं चला तो गया परन्तु मैंने उनसे कोई बातचीत नहीं की क्योंकि उन दिनों मैं बहुत अधिक गुस्सैल और गरम मिज़ाज का था। सो मैं गया और उसी समय वापस आ गया। काल-कोठरी की क़ैद-तन्हाई (एकान्तवास) ने मेरे चित्त पर कोई जख़्म का निशान नहीं छोड़ा था। कारण यह था कि वह तो किसी महत् उद्देश्य को लेकर अपने ही द्वारा स्वयं बुलाया गया था। वैसे अपनी कहूँ तो सच्चाई यह है कि वहाँ जेल जीवन में मैंने तो हर एक चीज, हर एक बात का पूरा आनन्द लिया। अब भी कोई भी आकर मेरे टखने देख सकता है जिन पर डंडा-बेड़ी के छोड़े ठीक हुये जख़्मों के निशान हैं जो कितने स्पष्ट हैं। मैं मुलतान जेल में नौ मास रहा और 1931 में गाँधी-इरविन समझौते के तहत रिहा कर दिया गया।