श्रीअरविन्द का द्वितीय विश्व-युद्ध में मित्र देशों को समर्थन एवं पुष्टीकरण
सन् 1940 से मैं श्रीअरविन्द आश्रम, पांडिचेरी वर्ष में हर तीसरे-चौथे महीनों के अन्तर पर जा रहा था। साथ में होते थे मेरे मित्र डॉ. इन्द्रसेन जो दिल्ली यूनिवर्सिटी में फ़िलॉसोफ़ी-दर्शन शास्त्र के प्रोफ़ेसर थे। एक बार जब हम आश्रम गये तो श्रीअरविन्द द्वारा प्रेषित घोषणा नोटिस-बोर्ड पर सामने आई जिसमें सुस्पष्ट शब्दों में प्रकट करके उन्होंने निर्देश जारी कर दिया था कि हमें द्वितीय विश्व-युद्ध में ब्रिटिश व मित्र देशों के साथ सहयोग करना चाहिए। तथा आश्रम में यदि कोई भी इसके विपरीत विश्वास रखता हो या विरुद्ध आचरण करता हो उसे स्वतः स्वयं ही आश्रम से बाहर हो जाना चाहिए क्योंकि वह शत्रु है देश का भी और आश्रम का भी।
मैं तो बड़ा हैरान हुआ और परेशान भी। बड़ा धक्का लगा, यह तो उसके एकदम विपरीत था जो कि महात्मा गांधी कह रहे थे। मैं तो, लगता था कि बस वहीं पर, नोटिस-बोर्ड के सामने ही बेहोश होकर, मूचि्र्छत होकर गिर पड़ूँगा। जैसे ही मैने यह अधिसूचना पढ़ी, मैं तो भयंकर द्वन्द्व में फँस गया। मेरे भीतर भीषण अन्तर्द्वन्द्व मच गया। एक ओर तो मेरी कब की पुरानी चिरकालिक निष्ठा एवं वफ़ादारी थी काँग्रेस और महात्मा गाँधी के प्रति और दूसरी ओर निष्ठा एवं वफ़ादारी थी मेरे आध्यात्मिक-गुरु श्रीअरविन्द के प्रति। उन दिनों इन दो विपरीत विचार धाराओं के कारण मेरी मानसिक स्थिति अत्यंत दुखद एवं दुष्कर हो गई। मेरी हालत दुश्वार हो गई।
थोड़े ही दिनों के बीच में श्रीअरविन्द और श्रीमाता जी के हस्ताक्षरों के साथ एक अन्य अधिघोषणा-उनका ‘विस्तृत एवं संयुक्त संदेश’ आश्रम के नोटिस-बोर्ड पर लगा दिया गया। इस बयान में उन्होंने विस्तार से समझाया था कि यह युद्ध ‘मित्र और धुरी’ राष्ट्रों के बीच में नहीं था। यह तो सत और असत के बीच हो रहा था। ‘देवासुर-संग्राम’ था यह। यदि यह लड़ाई हार गये तो मानव-सभ्यता विकास- ‘इवोल्यूशन’ की दृष्टि से हज़ारों साल पीछे जा पड़ेगी। सो भागवत उद्देश्य की पूर्ति के लिए इस महायुद्ध को तो हर हालत में -सभी परिस्थितियों में विजय करना ही करना है।
हमें यह भी पता लगा कि श्रीअरविन्द ने वाइसरॉय-युद्ध-कोष में पाँच सौ रुपये की राशि का अंशदान भी भेजा, जबकि वे तो साधु ही थे। साथ ही उन्होंने यह प्रस्तुति भी पेश कर दी कि सरकार युद्ध-प्रचार के उद्देश्य से शत्रु के विरुद्ध उनके ‘नाम’ को भी प्रयोग में ला सकती है। उन्होंने अपनी समस्त दिव्य एवं आध्यात्मिक शक्तियों को भी मित्र राष्ट्रों की विजय के लिए प्रयोग में झोंक दिया।
जब ‘क्रिप्स मिशन’ भारत में अपने प्रस्ताव लेकर आया तो श्रीअरविन्द को अनुभव में आया कि यह मिशन तो स्वयं परम प्रभु द्वारा प्रेषित था। श्रीअरविन्द चाहते थे कि उनका यह सन्देश महात्मा गांधी तक और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों तक पहुँचा दिया जाये।
श्री दोराइस्वामी जो मद्रास-चेन्नई के प्रमुख बैरिस्टरों में से एक थे और श्रीअरविन्द आश्रम से भी जुड़े हुए थे, उन्हें नई दिल्ली इसी कार्य के निमित्त भेजा गया। मैं स्वयं उनको अपनी कार में लेकर सब जगह गया। महात्मा गांधी के पास और कांग्रेस कार्य समिति के मेम्बरों के पास भी हम गए कि क्रिप्स मिशन के बारे में श्रीअरविन्द की राय से अवगत करा सकें। श्री दुराइस्वामी श्रीअरविन्द के सन्देशवाहक प्रतिनिधि या व्यक्तिगत दूत थे जो श्रीअरविन्द का दृष्टिकोण इन निर्णायक लोगों के सम्मुख रखने के लिए विशेष रूप से भेजे गये थे। अपना कार्य पूर्ण करने के पश्चात् श्री दोराइस्वामी वापस चले गये। मेरा ख्याल है कि वह संदेश गंभीरतापूर्वक नहीं लिया गया क्योंकि उन लोगों ने तो ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के द्वारा ब्रिटिश सरकार को भारत से बाहर निकालने का निर्णय ले लिया था। उनका सोच था कि ब्रिटिश राज्य को जब कि वह स्वयं अपनी कठिनाइयों से निबटने में लगे हुए थे उस समय देश को छोड़ने के लिए मजबूर किया जा सकता है। यह कांग्रेस की मुख्य युद्ध-नीति थी जिसकी सूचना हमें बैरिस्टर आसफ अली से मिली जब वे कांग्रेस कार्य-समिति की मीटिंग से होकर आये।
सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में
मेरा योगदान-मेरी भूमिका
मैं देश की राजनीतिक गतिविधियों में पूरी तौर से जुड़कर लगा हुआ था जो किसी स्वार्थ-भावना से प्रेरित न होकर केवल अपनी मातृ-भूमि को विदेशी राज्य की ग़ुलामी से मुक्त कराने के लिए अपनी आहुति की भावना को लेकर था जो सन् 1919 में ब्रिटिश सरकार द्वारा लाहौर में लगाये मार्शल-लॉ के दिनों से ही चल रही थी जबकि मैं स्कूल में ही पढ़ता था।
सन् 1942 में बतौर मेम्बर दिल्ली प्रॉविंशियल कांग्रेस कमेटी के देश का काम कर रहा था। क्योंकि ‘भारत छोड़ो’ इन्क़लाबी आन्दोलन तेज़ी पर था और अपने में घोर क्रांतिकारी था, मैंने भी अपनी सेवाएँ इसमें प्रस्तुत कीं। यद्यपि मेरे भीतरं महात्मा गांधी के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के लिए आह्नान और श्रीअरविन्द के मित्र देशों को द्वितीय महायुद्ध में समर्थन व सहयोग के संदेश को लेकर मन में संघर्ष तो था परन्तु मैं ‘करो या मरो’ व ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने की अपनी तीव्र पुकार, उत्कट को नहीं दबा पा रहा था।
क़रीब 30-40 कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता नई दिल्ली के एक गुप्त स्थान पर नरेन्द्र प्लेस में इकट्ठा हुए जहाँ कि दिल्ली में आंदोलन की गतिविधियाँ क्या हों और कैसे चलाई जाएँ- इसकी योजना बनाई जानी थी। मुझे कहा गया कि मैं जाकर श्रीमती अरुणा आसफ अली को सभा-स्थल पर लेकर आऊँ क्योंकि वे अभी तक वहाँ पहुँची नहीं थींऔर सबका विचार था कि जब वे वहाँ होवें तभी सभा की कार्यवाही शुरू की जाये। मैं उनको लेने उनके घर पर गया पर वे वहाँ पर भी नहीं मिलीं। जब तक मैं सभा-स्थल पर वापस आया तो मैंने देखा कि वहाँ तो पुलिस आ गई थी और धर-पकड़ शुरू हो गई थी। कई प्रमुख कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जा रहा था जो उस गुप्त सभा में भाग लेने को आये हुए थे।
मिसिज़ अरुणा आसफ़ अली, श्री जुगल किशोर खन्ना और मैं पुलिस की गिरफ़्तारी से बच निकले। सो ‘भूमिगत’ (अन्डरग्राउण्ड) होकर दिल्ली के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन का संयोजन और नेतृत्व हम तीनों द्वारा वहन हुआ। श्री जुगल किशोर खन्ना ज़्यादातर हमारे साथ नहीं होते थे। और वह अपने को अन्य-अन्य स्थानों पर छिपाकर रखते थे। मिसेज़ आसफ़ अली और मैं अक्सर मिलते थे। पुलिस और सी.आई.डी. को निरंतर चकमे देकर मिलजुल कर आंदोलन का काम कर रहे थे। जहाँ पर भी हम छिप कर रहते थे तो वहाँ मिसेज़ आसफ़अली को दम साधकर चुपचाप ख़ामोशी के साथ अकेले बैठकर समय गुज़ारना होता था। पूरा दिन बिना किसी साथ के बिल्कुल अकेले निकालना पड़ता था। पूरे समय उन्हें यह चिन्ता लगी रहती थी कि कौन जाने कब कहाँ से किस ज़रिये से सी.आई.डी. अफ़सरों को उनकी टोह मिल जाये, वे आयें और उन्हें गिरफ़्तार करके ले जायें।
कितने ही बार तो ऐसे दिन भी होते थे जबकि एक ही दिन में उनका छिपने का स्थान दो-दो या तीन-तीन बार तक भी बदलना पड़ता था। साधारणतया कोई ही ऐसा स्थान होता था जहाँ हम दो या तीन दिन से अधिक ठहर सकते थे। एक बार जब हम किसी हित-चिंतक मित्र के घर पहुँच जाते तो हम एकदम वापस तो निकल नहीं सकते थे। उधर वह चाहता नहीं होता कि हम वहाँ पर ठहरें। यद्यपि वह हमारे वहाँ पर आ जाने से निश्चित रूप से हम से भी अधिक भयभीत हो जाता था तो भी वह पुलिस को खबर देने की हिम्मत नहीं कर सकता था कि हम उसके घर ज़बरदस्ती घुस आये हैं। या हमने बलपूर्वक उसके यहाँ प्रवेश किया है। यदि पुलिस को पता चल जाता कि उसने हमें शरण दी है तो सरकार के बाग़ी अपराधी कांग्रेस कार्यकर्ताओं को पनाह देने के लिए पुलिस उसे परेशान करती या गिरफ़्तार भी करती।