मुठभेड़ मेरा पुलिस से आमना-सामना
Part 1 of 2
एक दिन मैं बाबर रोड पर अपने सेंट्रल लेन के घर पर गया था कि मुझे ख़बर मिली कि दो सी.आई.डी.- ख़ुफ़िया पुलिस के आदमी बाहर खड़े थे। मेरी पत्नी की छोटी बहिन जो मुश्किल से ग्यारह या बारह वर्ष की रही होगी, उसने भोलेपन से सहज भाव से उनके पूछने पर बता दिया कि मैं -यानि उसके जीजाजी घर में हैं। एकदम पुलिस वालों ने अपने अफ़सरों को मेरी घर में मौजूदगी के बारे में सूचना दे दी। उसी दौरान मैं अपने घर के पिछले दरवाज़े से बाहर निकल आया जहाँ दो और सी.आई.डी. के आदमी मुझे पकड़ने को खड़े हुए थे। मैंने उन्हें थप्पड़ मारे और ठोकरें मारता हुआ अपनी कार में जा बैठा और उसे ले उड़ा। मैं अपने ‘देहात-घर’ पर जो कुतुबमीनार के निकट लगभग सात मील की दूरी पर है- और जहाँ अब श्रीअरविन्द आश्रम की दिल्ली शाखा की मुख्य इमारत है, वहाँ आ गया। उस समय वहाँ मुश्किल से दो कमरे थे और एक झोंपड़ी थी। मैंने तय किया कि मैं वहाँ से अपना ड्राइवर ले लूंगा और अपने देहात-घर से सीधा मथुरा या आगरा चला जाऊँगा और ऐसे ही बच निकलूँगा।
इसी दौरान राय साहिब गोपालदास- ‘अतिरिक्त पुलिस सुपरिण्टेंडैंट (तब की भाषा में एडीशनल सुपरिंटेडैंट पुलिस) को मेरे कार में फ़रार होने की सूचना मिल गई थी। संभवतः वे लोग इस स्थान के आस-पास ही थे और उन्होंने मेरा पीछा किया। ज्यूँ ही मैं अपने स्थान पर ‘देहात-घर’ पहुँचा और जुते हुए खेतों से होकर घर की ओर मुड़ा कि सामने से एक व्यक्ति पिस्तौल ताने आ गया और मेरी कार को रोक दिया मैं अपनी कार से बाहर आया। यह मिस्टर जैन-पुलिस इन्सपेक्टर था जो अपनी पिस्तौल मुझ पर ताने था और गोपालदास उसे बार-बार हुक्म दिये जा रहा था, “इसे गोली मार दो। एकदम गोली मारो!” (शूट हिम एट वंस!) और वह मेरे पास और पास आ गया और मुझे कहा कि मैं गिरफ़्तार कर लिया गया हूँ मैंने उŸार दिया, “ठीक है यदि मैं गिरफ़्तार कर लिया गया हूँ तो मैं अपनी कार अपने गैराज में रख लेता हूँ और तब मैं आपके साथ चल पड़ूंगा”। पर वे तो मुझे धकियाने और मारपीट करने लगे। उन्होंने मेरी कमीज़ पकड़ ली और हाथापाई में उसे फाड़ दिया। इस पर मैंने मिस्टर जैन का हाथ पकड़ लिया और मैंने उसकी पिस्तौल छीनना चाहा। पर उसने मेरे हाथ को दाँतों से काटकर चबा लिया। आज तक भी जिसके निशान मेरे हाथ पर मौजूद है।ं उधर गोपालदास अपने डण्डे से बराबर मुझे मारे जा रहा था। इसी समय मेरा ड्राइवर मंगतराम अचानक इस जगह पर आ निकला उसने गोपालदास को पकड़ लिया और उसको अच्छी मार लगाई। अब तो मैंने भी जैन को दबोच लिया और उससे उसकी पिस्तौल भी छीन ली। अब हम उनको पकड़कर हॉल में ले आए जहाँ अब आश्रम का मैडिटेशन हॉल- ‘ध्यान कक्ष’ है। ए.एस.पी. गोपालदास की तो साँस ही उखड़ गई थी। अब वह मुझसे कुछ पानी पिलाने की मिन्नत करने लगा - जो मैंने उसे एकदम दिलवाया और पिलवाया। इसके बाद वह मेरे पैरों को हाथ लगाने लगा और प्रार्थना करने लगा कि मैं उसको और मिस्टर जैन को छोड़ दूँ नहीं तो उनकी नौकरी खतरे में पड़ जायेगी। मेरे पैरों में पड़कर मिन्नतें करनें लगा कि मैं पिस्तौल वापस कर दूँ और उनको छोड़ दूँ! मुक्त कर दूँ।
अब तक मैं भी थोड़ा नरम पड़ गया था। शायद मेरी थकान इसका कारण रही हो और कुछ गांधी जी की अहिंसा की शिक्षा का असर भी रहा हो। आख़िरकार पकड़े तो मुझे कभी न कभी जाना ही था और जेल भी भुगतनी ही थी। सो मैंने अब पुलिस के सामने गांधीजी के दिखलाये मार्ग के अनुसार चलकर अपने आप को पुलिस के हाथों में आत्म-समर्पण कर देने का औचित्य समझकर अपने को उनके हवाले करने का निर्णय ले लिया।
तदनन्तर हम लोगों ने एक भद्र-पुरुषीय अनुबंध या समझौता (जैन्ट्लमैन्स ऐग्रीमेंट) किया। वह इस प्रकार था कि मैं अपनी कार में अपने निवास-स्थान पर सैन्ट्रल लेन के घर पर जाऊंगा और वे अपनी शासकीय-सरकारी कार में मेरे पीछे रहेंगे। मेरा पीछा करेंगे। मैं अपना बिस्तर घर से ले लूंगा और कनॉट सर्क स में अपने ऑफिस में आ जाऊंगा अपने लोगों को ज़रूरी हिदायतें देकर अपनी गिरफ़्तारी देने के लिए तैयार हो जाऊंगा।
इसके अनुसार मैं अपनी गाड़ी में चल पड़ा और वे मेरे पीछे हो गये। जब हम अपने निवास- स्थान पर पहुँचे तब क्या देखते हैं कि वहाँ तो पहले से ही दो लॉरी भर के पुलिसमैन डिप्टी-सुपरिण्टेण्डेंट-पुलिस पंडित सीताराम के तहत खड़े हैं। जैसे ही मैं अपनी कार से बाहर निकला कि ड़ीएस़प़ीने मुझे धर दबोचा। गोपालदास ने तब बीच-बचाव कियाः “हमनें इनको वचन दिया है। इन्हें इनके घर जाने दो और वहाँ से हम इनको ले सकते हैं।”