मेरा सर्वोत्तम आविष्कार
कोलम्बस ने अमेरिका ढूँढा। न्यूटन परेशान हुआ कि सेब नीचे क्यों गिरा, ऊपर क्यों नही गया। उसने ‘लॉ ऑफ़ ग्रेविटेशन’ गुरुत्वाकर्षण नियम की खोज की। मैंने भी एक बहुत बड़ी खोज की है। बताऊँ आपको?
ऐसा हुआ कि 1939 के दिसम्बर में मेरे योग्य और सम्माननीय मित्र डा0 इन्द्रसेन तथा मैंने सोचा कि भारत की यात्रा की जाय। भिन्न-भिन्न प्रान्तों को देखने के लिए नहीं बल्क़ि देश की विभिन्न संस्कृतियों की झाँकी के लिए। हम लोगों का मेल बहुत ही अजीब और दिलचस्प था। कहाँ डा0 इन्द्रसेन- विद्वान और दार्शनिक और कहाँ मैं -एक व्यवसायी जिसमें राजनीति की ओर प्रवृत्ति भी।
जब मेरी पत्नी को यह मालूम हुआ तो उन्होंने अनुरोध किया कि मेरे बेटे को भी साथ ले जायें। अनिल उस समय 9 वर्ष के थे। मैंने कहा कि ‘मैं तुम्हारे बेटे की देखभाल करूँगा या सैर करूँगा।’ तो वह फिर कहने लगीं कि, ‘मैं नौकर को साथ भेज देती हूँ’ किस्सा-कोता यह कि मैं मजबूर हो गया।
बाँध लिए बिस्तर। कर ली तैयारी। दाल, चावल, आटा, नमक, घी, मिर्च-मसाले सब हिसाब से एक माह के लिए साथ बाँध लिए।
क्षेत्रीय टिकट (Zonal Ticket) ख़रीदे जिन पर यात्रा-मार्ग के रंगीन नक़् शे बने हुए थे। ऐसा लगता था कि पासपोर्ट ले लिया हो। उसका आकार-प्रकार भी पासपोर्ट से कुछ बड़ा ही था। दिल्ली, मथुरा, आगरा, अलीगढ़, कानपुर, लखनऊ, प्रयाग, बनारस, पटना, कलकत्ता, पुरी, भुवनेश्वर, विशाखापट्टनम, विजयवाड़ा, मद्रास, बंगलौर, मैसूर, हैदराबाद, शोलापुर, पूना, बम्बई, सूरत, बड़ौदा, अहमदाबाद, अजमेर, जयपुर तथा पुनः दिल्ली। अब तो कोई विश्वास ही नहीं करेगा। जैसे कोई आजकल विश्वास कर सकता है कि 25-30 वर्ष पहले एक रुपये का 20 सेर आटा मिलता था और 6 पैसे का एक सेर दूध? इसी तरह सारे भारत की यात्रा-चक्र का मूल्य केवल 36रु0 आठ आने - यानि कि 50 पैसे था।
हमारा ध्यान, ज़ोर और निश्चय इस बात पर था कि कम-से-कम ख़र्च हो और कहीं एक पैसा भी बचाया जा सकता है तो बचाया जाये। क्षमता भी नहीं थी।
तो ऐसा करते थे कि दिन तो घूमने-फिरने में बिता देते... गाँव, शहर, ऐतिहासिक स्थान, मन्दिर, मस्जिद, बाज़ार, स्थानीय लोगों की संस्कृति, रहन-सहन, बोल-चाल, रंग-ढंग देखने में लगा देते और रात गाड़ी में काट लेते।
प्रातः फिर जहाँ किसी बड़े शहर में गाड़ी खड़ी होती, उतर जाते। स्टेशन के समीप किसी घने पेड़ के नीचे डेरा डाल देते, सामान की देख-रेख और भोजन बनाने की व्यवस्था नौकर के लिए कर देते और चल पड़ते पैदल। सारी यात्रा के दौरान एक पैसा भी सवारी पर ख़र्च नहीं किया। सवारी होती भी क्या थी- इक्का, टाँगा, बैलगाड़ी। उससे तो हमारी टांगें ही तेज़ थीं। और उस ज़माने की टांगें मज़बूत भी हुआ करती थीं। फिर हर समय उपलब्ध भी। कहीं सवारी ढूँढने जाने की जरूरत नहीं। जब जी चाहे तैयार हैं। जवानी भी और अन्दर जोश भी। फिर थकावट कहाँ?
कुली भी हम ख़ुद ही थे। भारी बोझा नौकर उठा लेता था और एक-एक सूटके स या बिस्तर हम उठा लेते थे। टोकरी अनिल के हाथ दे देते थे।
वापस दिल्ली पहुँचकर जब हिसाब-किताब किया और रोकड़ मिलायी तो क्या ख़र्च आया- यह सुनने से पहले ज़रा आप कुर्सी पर बैठ जाइये और छाती पर हाथ रख लीजिये। कहीं पैरों तले की ज़मीन न निकल जाये। केवल 75 रुपये आठ आने प्रति व्यक्ति। खाने पर तो सम्भवतः ख़र्च होने ही नहीं दिया, क्योंकि राशन पूरा हिसाब से साथ लेकर चले थे। केवल हरी सब्ज़ी और प्याज़ ख़रीदा करते थे। लेकिन कोयले ने आधे रास्ते में ही जवाब दे दिया।
यात्रा के दस दिनों के बाद, हम पहुँचे मद्रास। यहाँ समुद्र की लहराती तरंगों ने हमारा स्वागत किया। पहली बार समुद्र देखा जिसका ओर न छोर। उसकी विशालता देखकर हम चकित रह गये। यही जी चाहे कि पहले तो इसका दूसरा पार देखकर आयें, कहीं है भी कि नहीं। किन्तु हम तो यात्रा के ज़ोनल टिकट से बँधे थे।
मद्रास का सारा शहर जब देख चुके, लम्बी-चौड़ी सड़कें और उन पर दौड़ती ट्राम-गाड़ियाँ, बड़ी-बड़ी इमारतें, भव्य-विशाल मन्दिर, विस्तृत समुद्रतट, बन्दरगाह इत्यादि, तो किसी ने बताया कि भारतवर्ष तो अभी बहुत नीचे तक है। यह सुनकर हम हैरान रह गये। विश्वास तो नहीं होता था किन्तु बात निकली सच्ची। सच्ची, अद्भुत, विचित्र और मनोरंजक। सारे दक्षिण में एक अंग्रेज़ कम्पनी -‘साउथ इण्डियन रेलवे’ ने हज़ारों मील में छोटी लाइन का जाल बिछाया हुआ था और उस पर ‘बेबी-रेलगाड़ी’ चलती थी। देखा तो सचमुच छोटे-छोटे डिब्बे, छोटे बचकाने रेल इंजिन, यहाँ तक कि उसके चलाने वाले, स्टेशन-मास्टर, गार्ड, टिकट-कलक्टर, कुली आदि अधिकारी भी छोटे क़द के और बारातियों की तरह आकर्षक वस्त्र, रंगीन गोटे की धारी वाली पगड़ी पहने हुए थे। उत्तर भारत की नार्थ वेस्टर्न रेल से आकृति-प्रवृत्ति, प्रकृति-संस्कृति सब भिन्न। देख-देखकर आश्चर्य होता था।
जो भी हो, जब हमने उन लोगों से बेबी-रेलवे पर सारे दक्षिण भारत की सैर की बात करनी शुरू की तो ये लोग निकले बड़े उदार। उन्होंने हम लोगों को ‘मनमानी यात्रा’ (Travel as you please) करने का टिकट दे दिया। 15 रुपये में 15 दिनों के लिए। जिधर मर्जी जाओ, जहाँ मर्जी सैर करो। चाहो तो एक-एक लाइन पर बार-बार घूमो और यह टिकट था भी बड़ा सुन्दर।
दक्षिण की यात्रा रही बड़ी मज़ेदार। गाड़ी ही हमारा ठिकाना, गाड़ी में ही खाना-पकाना, गाड़ी में ही नहाना-धोना और रात को गाड़ी ही हमारे सोने का स्थान। जब हम गाड़ी में जिधर चाहे जितनी बार जा सकते थे तो रात को किसी प्लेटफ़ार्म, धर्मशाला या किसी और रहने के स्थान में उतरें ही क्यों? इसलिए वापस लौटकर अपने मनमाने स्टेशन पर उतर जाते थे।
दक्षिण भारत क्या था- कितना भिन्न, कितना रमणीक जैसे कि स्वर्ग का सारा वैभव और सौन्दर्य लाकर चारों ओर बिखेर दिया गया हो। पश्चिमी और पूर्वी तटों पर रमणीक वन-उपवन, दक्षिण भारत के अपूर्व सौन्दर्य-वर्णन के लिए तो एक बड़ा ग्रन्थ चाहिए, परन्तु इस समय हम मुख्य रूप से बेबी-रेलवे में यात्रा का ख़ास जिक्ऱ कर रहे थे। इस रमणीक यात्रा में हमारा खाना बनाने का ईंधन (Charcoal) अचानक समाप्त हो गया। बड़ी परेशानी हुई। दाल-चावल भीगे और सब्ज़ियाँ कटी-कटायी रह गयीं। सौभाग्य से एक जंक्शन-स्टेशन आया। वहाँ के इन्जिन-यार्ड से हमनें इन्जिन का थोड़ा जला हुआ कोयला चुन लिया। गाड़ी चल पड़ी। हमने आग सुलगाना शुरू किया। लगा दिया सारा ज़ोर, फूँकें मार-मारकर। धुएँ से आँखें भी बेहाल हो गयीं। धुआँ इतना बढ़ता गया कि हवा के ज़ोर से पीछे के गार्ड तक के सब डिब्बों में धुआँ ही धुआँ भर गया। हाहाकार मच गया। सब चिल्लाने लगे, “आग लग गयी!” “आग लग गयी!” गार्ड ने तुरन्त घने जंगल में ही खतरे की ज़ं जीर खींचकर गाड़ी रोक दी और पीछे की तरफ़ से गार्ड और सामने से इन्जिन-ड्राइवर, ख़लासी तथा गाड़ी के सब मुसाफ़िर भी भागते हुए हमारे डिब्बे पर पहुँच गये।
गार्ड और रेलवे के दूसरे अधिकारी हमारे डिब्बे में घुस आये तथा गार्ड ने आग-बबूला होकर पूछा-“यह क्या हो रहा है? आप लोग क्या कर रहे हैं?” हमने नम्रता से बताया कि, “जी खाना पका रहे हैं। इसमें ईंधन ख़त्म होने के कारण इन्जिन के जले हुए कोयले से आग सुलगाने का प्रयास किया। परन्तु यह जला ही नहीं और धुआँ ही धुआँ हो गया। ओफ़्फ़ोह! आप लोगों को नाहक़ परेशानी हो गयी।” अब तो गार्ड और दूसरे अधिकारी एक आवाज़ हमारे ऊपर टूट पड़े कि, “रेलगाड़ी कोई खाना बनाने का स्थान है?” -“आपने बहुत भारी अपराध किया है।” -“यदि सारी गाड़ी में आग लग जाती तो?” -“अभी आपको पुलिस के हवाले किया जायेगा।” -हमने कहा-“राम का नाम लीजिये। ऐसी आग लगने की तो भावना-कल्पना ही न कीजिये।” गार्ड-बाबू और भी तेज़ हुए। कहा-“इस तरह नियम-विरुद्ध यात्रा करने का आप लोगों को साहस हुआ तो कैसे?” अब तो मैंने भी झल्लाकर कहा-“अजी साहब, हमें इजाज़त है कि हम जैसे भी चाहें यात्रा करें। हमारे पास इसके लिए टिकट है।” अब तो गार्ड साहब और दूसरे अधिकारियों के गुस्से का ठिकाना न रहा। इसके पहले कि वे हमें घसीटकर नीचे फेंकते मैंने टिकट उनके हाथ में दे दिया और कहा कि,“पढ़िये, इसमें क्या लिखा है? कितने मोटे अक्षरो में लिखा है -जैसे जी चाहे यात्रा कीजिये (Travel as you please) ।’’
बस अब क्या था? भगवान् ने उनका रूप ही बदल दिया और सब खिलखिलाकर और ठहाका मारकर हँसने लगे। रंग ही बदल गया। मित्र बन गये। और भागते हुए वापस जाकर सीटी बजायी और गाड़ी चलायी।
हमारी खोज अभी दूर है। अब तो हम रामेश्वरम् पहुँचे, जहाँ से भगवान् राम अपनी वानर सेना लेकर लंका पर धावा बोलकर सीताजी को छुड़ाने गये थे।
यहाँ हमारी नीयत बिगड़ गयी और लोभ सवार हुआ कि सोने की लंका भी देख आयें जहाँ रावण रहता था और जिस वाटिका में सीताजी को रखा था। पूछ-ताछ पर पता चला कि अगला स्टेशन धनुषकोटि है जो पास में है और दक्षिण भारत की सैर करने वाली हमारी प्यारी रेलवे का अन्तिम स्टेशन है। समुद्र के रास्ते लंका केवल 40 मील है। यहीं से जहाज़ में बैठकर हम लोग गये और उस देश का भी भ्रमण किया। राजधानी कोलम्बो पहुँचे। इस देश की यात्रा से हम बेहद ख़ुश थे, क्योंकि आनन्ददायक और ज्ञानवर्द्धक के साथ-साथ यह यात्रा विविध घटनाओं से भरपूर थी।
भारत-दर्शन की क्षेत्रीय टिकट (Zonal Ticket) हमें जल्दी से जल्दी लौटने पर बाध्य कर रही थी। जब हम मद्रास की ओर अपने यात्रा-चक्र के लिए बड़ी रेलगाड़ी पकड़ने को लौट रहे थे तो रास्ते में एक जंक्शन आया जिसका नाम था विल्लीपुरम्। हम अपने साथी-यात्रियों से पूछ-ताछ कर रहे थे कि इधर और कोई दर्शनीय और प्रभावशाली स्थान तो नहीं है। तभी एक सज्जन ने कहा कि, यहाँ से 20 मील पर पॉण्डिचेरी है जो फ्ऱांसीसी राज्य में है; एक योगाश्रम है योगी श्रीअरविन्द का। साथ ही, मैंने यह भी सोचा कि यहाँ से लौटने के बाद अपने मित्रों से दो-दो विदेशों से लौट आने के कारण अपने को -फ़ॉरेन रिटर्ण्ड’ कह सकूँगा; जिसमें एक तो विश्व का आकर्षण-केन्द्र फ्ऱांस का एक भाग ही है। हम लोग रुक न सके! उतर गये और दूसरी गाड़ी पकड़कर पाँडिचेरी पहुँच गये।
वहाँ पहुँचकर आश्चर्य हुआ कि वहाँ तो कुछ भी विदेशी नहीं था। हर स्थान, हर आदमी मद्रास की ही तरह वे ही लोग, वही क़द-रंग, वही पोशाक़ और भाषा भी वही तमिल।
आश्रम की इमारत देखकर तो और भी निराशा हुई। यह अन्य मक़ानों की तरह ही एक मामूली मक़ान था, जहाँ एक भारतीय के मन में आश्रम शब्द से उठी भाव-तरंगों से ताल-मेल रखने वाला कोई वातावरण नहीं था। अन्दर जाने पर लोग तो बहुत दीखे, -सादे और साफ़-सुथरे लिबास में, कुछ पैण्ट और कोट में भी, किन्तु कहीं भी साधु या सन्यासी या महन्त दिखायी नहीं पड़ा और न ही कहीं जटाधारी, गेरुआ वस्त्रधारी, तिलकधारी, मूर्ति या कोई ग्रन्थ।
जिज्ञासा करने पर पता चला कि इस आश्रम के योगी श्रीअरविन्द ऊपर के कमरे में रहते हैं और पिछले 14 वर्षों से बाहर कभी नहीं आये। वर्ष में केवल चार दर्शन-दिनों के अतिरिक्त उन्हें कभी कोई भी नहीं देख सकता। और वह भी सिर्फ दर्शन! प्रणाम या बातचीत नहीं कर सकते।
यह हमें बड़ा विचित्र-सा लगा। किन्तु कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुई। बाद में यह भी मालूम हुआ कि आश्रम में एक माताजी भी हैं जो फ्ऱांसीसी महिला हैं।
एक फ्ऱांसीसी महिला और आश्रम की माँ! विदेश के लोगों का योग या योगाश्रम से क्या सम्बन्ध? क्या लेना-देना और वह भी महिला। इससे हमारे आश्चर्य की हद न रही।
वहाँ की एक-एक बात रहस्य बनकर मेरे हृदय की गहराई में उतरती गयी और जिज्ञासा गुब्बारे की तरह फैलती गयी। मैं सोचता, आख़िर क्या किया जाये। हम यहाँ आये ही क्यों? योगी जी का दर्शन नहीं हुआ। माताजी से मिल न सके। न कोई भजन-कीर्तन, न उपदेश-प्रार्थना, न कोई शिक्षा-दीक्षा। भजन-आरती, शास्त्रार्थ या धर्म-चर्चा, यज्ञ-हवन, आसन-प्राणायाम, मन्त्र-तन्त्र, घण्टा-घड़ियाल अरे! कुछ भी तो नहीं है। फिर यह कैसा आश्रम है? अजीब भूल-भूलैयाँ! इतने में किसी ने बताया कि शाम के समय ध्यान होता है जिसमें हम भी शामिल हो सकते हैं।
ठीक सात बजे शाम हम ध्यान-कक्ष में पहुँच गये। कुछ लोग पहले से वहाँ ध्यान में बैठे थे-नतमस्तक आँखें बन्द। बत्तियाँ बन्द थीं। आकर्षक शान्त अंधेरे में कहीं से एक मन्द रोशनी की किरण आ रही थी। ध्यान का वातावरण बहुत ही चुम्बकीय था। हमें भी आँखें बन्द कर ध्यान करने की तीव्र इच्छा हुई। किन्तु हम जानना चाहते थे कि आगे क्या घटने वाला है। इसलिए हम लोग अपलक दृष्टि से उसी ओर निहारते रहे। जब वहाँ मात्र निस्तब्धता थी। तभी मेरी आँखों ने सहसा ऐसा देखा जो भव्य होकर भी स्वप्न सरीखा था!
सौन्दर्य की साक्षात् देवी स्वर्ण-मुकुट धारण किये, कोमल, मुलायम कालीन बिछी सीढ़ियों से धीरे-धीरे नीचे की ओर उतर रही थीं।
उनके चारों ओर एक तरह का अलौकिक प्रकाश और पवित्र आत्मा की महिमा थी। उनकी गति में शालीनता थी और समस्त मुखमण्डल पर गरिमामयी आभा बिखर रही थी। उनकी आँखों में एक ऐसी दीप्ति थी जिससे सहसा आसपास का बिखरा अन्धकार मिट गया। मेरी दृष्टि उस रहस्यमयी स्वर्गिक प्रतिमा पर टिक गयी जिन का शान्त अलौकिक अप्रतिम सौन्दर्य वहाँ के कण-कण को हर तरह से आलोकित कर रहा था कि वे मुझे स्वर्ग से उतरी साक्षात देवी-सी लगीं।
सहसा सीढ़ियों से उतरते वे कोमल-कान्त-पावन चरण रुक गये। उनकी अनुकम्पामयी दृष्टि में हॉल के एक छोर से दूसरे छोर तक का सारा दृश्य समा गया और कुछ ही क्षणों में न जाने कौन से लोक-लोकान्तरों में वे लुप्त हो गयीं। मुखमण्डल परमानन्द की आभा में डूब गया। वे वहाँ मूर्त्तिवत् खड़ी थीं, किन्तु मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे वे आधारहीन आकाश में धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठती जा रही हैं। यद्यपि उनकी पलकें स्थिर थीं, फिर भी मुझे ऐसा आभास हुआ जैसे कि वे सहज खिली आत्माओं को सूक्ष्म संकेतों और मूक संवादों द्वारा कुछ दे रही हैं। उस मूर्ति का समस्त शरीर दिव्यता से आलोकित हो उठा। मुझे लगा जैसे उनके चारों ओर सौन्दर्य का इन्द्रधनुष लहरा गया है और तभी एकाएक उनकी आँखों पर अलौकिक मधुर मुस्कान बिखर गयी जो बिजली की कौंध की तरह आँखों, कपोलों और सारे मुखमण्डल पर दीप्त हो उठी। मैं नें देखा, वह मुस्कान कोमल कली की तरह अनुग्रह भरे सुवासित पुष्प में साकार हो उठी और धीरे-धीरे शुभाशीषों की पंखुड़ियाँ बन-बनकर ध्यानमग्न साधकों पर बरसने लगी। तब साधकों ने कृतज्ञता के भार से दबी पलकों को ज़रा-सा उठाकर उस दिव्यमूर्ति को वापस निवास-कक्ष की ओर जाते हुए देखा। उनका जाना भी अद्भुत और रहस्यमय था। और आह! मेरी दृष्टि अचानक उस दिव्या के स्वर्गपथ से वंचित हो गयी। जब ध्यान टूटा तो पता चला कि यही “माताजी” थी,- फ्ऱांसीसी महिला।
उस रात जैसे ही मेरी पलकें झपकींकि मुझे एक विचित्र और अलौकिक अनुभूति हुई। एक स्वप्न टूटता और उसी में से दूसरा उभर जाता। वही गरिमा, स्नेह और सौन्दर्य की रहस्यमयी सजीव मूर्त्ति चलचित्र की भाँति रह-रहकर चित्रित हो उठती थी। मेरी नींद टूट गयी। एक तरह से यह मेरी आत्मा का मुक्ति-जागरण था। तन-मन का समस्त बोझ उतर गया। मुझे लग रहा था जैसे मेरे अन्दर-ही-अन्दर कुछ हो रहा है- एक कम्पन-सा जो लौकिक न होकर अलौकिक था। लेकिन वह सब क्या था?
सो मैं कैसे भी न जान सका।
अपने जीवन की अद्भुत और सौभाग्य-भरी उस साँझ के बाद सवेरे-ही-सवेरे हम लोग वहाँ से विदा हो रहे थे तो मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे जीवन का खेल निश्चित हो गया हो। मैं जा तो रहा था परन्तु वापस आने के लिए। जैसे ही रेलगाड़ी दिल्ली की ओर ‘फक् -फक् ’ करती आहें और उसाँसें भरती सरकने लगी तो मेरा मन इस तरह भर आया कि जैसे मैं अपना घर छोड़कर जा रहा हूँ। इसके साथ आन्तरिक आनन्द भी कुछ कम नहीं था कि ऐसा “अनमोल मोती” मिल गया है जिसे पूरी ज़िन्दगी की मेहनत के बाद भी कोई नहीं पा सकता। और यही मेरे जीवन का सर्वोत्तम आविष्कार था -“पॉण्डिचेरी का चमत्कार” जहाँ मैंने अपना हृदय खो दिया और जीवन पा लिया!