चाचा जी की आत्मकथा
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दिल्ली में पूर्ण स्वराज की ऐतिहासिक प्रतिज्ञा का सर्वाजनिक वाचन


दिल्ली में डिस्ट्रिक्ट कांग्रेस कमेटी के पदाधिकारियों व नेताओं की एक गुप्त सभा ‘सीक्रेट मीटिंग’ नई सड़क में हुई जिसमें कांग्रेस की पूर्ण स्वराज की प्राप्ति के लिए लाहौर में रावी नदी के किनारे 26 जनवरी 1929 ई0 को पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में पारित व पठित व जन-समूह द्वारा दुहराई व ली गई प्रतिज्ञा का ब्रिटिश साम्राज्य के गढ़ देश की राजधानी दिल्ली में पढ़े जाने की रूप रेखा की कार्य-प्रणाली तय करनी थी जिसके द्वारा राष्ट्रीय कांग्रेस नेताओं ने देश के जन-जन को राष्ट्र के प्रति उनके अपने दायित्व व कर्त्तव्य को लेकर ‘जागृति’ का भावोद्दीप्त व पुरजोर आह्नान किया था। मानों सोते सिंह को जागरण-संदेश से सुलगाया था।

इस मीटिंग के संयोजक अत्यधिक उत्सुक थे कि स्वयं की आत्म-प्रस्तुति लेकर कोई स्वयं-सेवक अंतः प्रेरणा से स्वेच्छ्या स्वतः आगे आये और देश की ऐतिहासिक स्वाधीनता-प्राप्ति के निमित्त कृत राष्ट्रीय संकल्प की परिणति-प्रतीक ‘प्रतिज्ञा’ को देश की आधार-शैल निर्णायक भूमि पर प्रस्थापित कर पढ़े। मानों इसी ध्वनि तरंग द्वारा स्वतंत्रता मंत्र का बीजारोपण हो जायेगा।

उस मीटिंग में मैं भी बैठा हुआ था। तब मेरी आयु लगभग पच्चीस वर्ष की थी। हाँ, शायद उस सारे समूह में मैं सबसे छोटा भी था। संभवतः उनको कोई व्यक्ति नहीं मिल पा रहा था जिसमें इस कठिन अग्नि-परीक्षा में से गुज़रने का साहस हो। जो जान पर खेलकर इस जोख़िम भरे काम को अंजाम दे सके। विश्व-शक्ति ब्रिटिश सरकार से टक्कर ले सके जिसके पास फ़ौज-पुलिस का तंत्र था तोप-बन्दूक आदि सभी प्रकार की शक्ति से लैस। वहाँ लाठी-गोली से लेकर सब प्रकार का बल-प्रयोग हो सकता था।

उपस्थित सब की ओर घूमती आँकती-तौलती भेदक दृष्टि-पारख़ी नज़र ठिठक कर रुक गई। ठहर गई। ज्यूँ ही....ज्यूँ ही लाला नारायण दत्त और मौलाना अब्दुल्ला ने सहसा मेरी ओर आशा और संभावना पूर्ण अपेक्षा भरी बेधक दृष्टि से देखा कि मुझमें एक अद्भुत उत्साह व उच्च प्रेरणा का विद्युत संचार होने लगा और मैंने एकदम-तत्क्षण स्वतः सहज स्वभाव चालित हो अपने को प्रस्तुत कर दिया ‘‘मैं इस पूर्ण स्वराज की प्रतिज्ञा को पढ़ूंगा।’’ सो जब मैंने उस जोख़िम भरी अग्नि-परीक्षा में कूद पड़ने को स्वयं की प्रस्तुति कर दी तो मुझको ‘प्रतिज्ञा-पत्र’ पढ़ने के संयोजन की ज़िम्मेदारी सौंप दी गई।

निश्चय हुआ कि दिल्ली की जनता को सारे शहर से-विभिन्न भागों से चलकर छोटी-छोटी टोलियों में -जत्थों के रूप में शुरू होकर ‘बड़ शाह बुल्ला’ जो चावड़ी बाज़ार, नई सड़क व जामा मस्जिद के बीच स्थान पर इकट्ठा होना था वहाँ से जुलूस की शक़्ल लेकर नई सड़क से होते हुए निकलना था- पार करना था।

मुझे इस जुलूस की अगुवाई करनी थी। इसका नेतृत्त्व करना था। और फिर मुझको ही पूर्ण स्वराज की प्रतिज्ञा का वाचन भी करना था और जनता से करवाना था।

उस समय भी मेरे ख़िलाफ़ पुलिस के दो या तीन वारन्ट पहले से ही निकले हुए थे। मैं तो अंडर-ग्राउंड था। अगर पुलिस की नज़र ज़रा भी मुझ पर पड़ जाती तो वे मुझे एकदम गिरफ़्तार कर लेते। इससे पहले दिल्ली कांग्रेस की हाई-कमांड ने मुझे कांग्रेस के असहयोग आंदोलन - ‘नॉन को ऑपरेशन मूवमेंट’ का ’सैवेन्थ डिक्टेटर’ सातवाँ निर्देशक भी नियुक्त किया हुआ था।

मैं एक कार में था जो न तो मेरी थी और न ही किसी कांग्रेसी या कांग्रेस के सहानुभूतिक या हमदर्द की ही थी। उस कार में मैं दो व्यक्तियों के साथ, उनके बीच में बैठा था। एक थे मेरे मामाजी और दूसरे थे मेरे एक व्यक्तिगत मित्र। एक बैठे मेरी दाईं ओर और दूसरे मेरी बाईं ओर आकर बैठ गए। मैंने एक बड़ा ओवर कोट पहना और सिर पर पगड़ी बांध ली। मेरे मामा जी (मेरी माताजी के भाई) ऊँचे ‘कुल्ले’ के साथ पगड़ी बांधा करते थे जिसमें कि बड़ा सा ‘शमला’ भी होता था जो ’मुशद्दी लुंगी’ नाम से जानी जाती थी। सो मैंने वह पूरी पोशाक पहन ली जलाकर हाथ में ’सिगरेट’ पकड़ लिया जो कि मेरी अपनी सिख धर्म की बुनियादी भूमिका, आर्य समाज के स्कूली जीवन से लेकर के अब तक के संस्कार और गांधी जी की त्याग तपस्या और पवित्रतावादी सत्य-अहिंसा की विचार धारा के चलते उनके प्रकाश में तो अभिशाप थी। कुफ़्र थी। उधर मेरे मामाजी के हाथ में एक बड़ा शानदार सिगार था। पुलिस वाले जो सारी दिल्ली में छाये हुए थे उन्हें हमको देख कर सपने में भी यह ख़याल तो क्या क़यास भी नहीं हो सकता था कि मैं कांग्रेस का वर्कर हूँ। मैं पूरे जुलूस का घूम-घूम कर मुआइना करता हुआ ज़ायज़ा लेता हुआ सतर्कता व सावधानी के साथ सूचनाएं व हिदायतें-निर्देश दे-देकर निर्दिष्ट/लक्ष्य की ओर आगे-आगे बढ़ा रहा था कि कोई भी जत्था छूट न जाये। घंटाघर पहुँचने में हमको लगभग 8 घंटों का समय लग गया। ज्यूँ ही हम घंटाघर पहुँचे पुलिस द्वारा सारे जुलूस की घेरा बन्दी कर ली गई। जुलूस के आगे बढ़ने पर रोक लगा दी गई। अब हमें और आगे नहीं बढ़ने दिया जा रहा था। मेरा ख़्याल है कि जुलूस में 50,000 से अधिक लोग रहे होंगे। यह तो एक देखने लायक नज़्ज़ारा था।

क्या ही दृश्य था। चारों ओर फैले विशाल जन समूह में, सारे वातावरण में सब घोर उत्सुकता, उत्साह, उत्तेजना व अनिश्चय भरी दुविधा की हवा थी। - ’सस्पेन्स’ था। देश की जनता माँ की पुकार पर पुलिस वालों की सख़्तियों का, धक्का-मुक्की रस्साकशी ठोकरों व गाली-गलौच का सामना करते हुए दिन भर के भूखे-प्यासे किसी तरह सब कुछ सहन करते हुए धक्के खाते-धकियाते बढ़ते-बढ़ते कैसे न कैसे ’घंटाघर’ तक पहुँच ही तो गए और उसके चारों ओर जाकर बैठ गए। वहीं घंटाघर पर एक छःफीट एक ऊँचा प्लैटफार्म मेरे लिये छिपाकर रखा हुआ था जिससे कि मैं उस पर चढ़कर और खड़े होकर मैं ’’पूर्ण-स्वराज’’ की ’’प्रतिज्ञा’’ सबको पढ़कर सुना सकूँ और सबसे बुलवा सकूँ।

करते कराते शाम के चार या पाँच बजे का समय हो गया था। मैं बड़ी मुश्किल से-मेहनत से विशाल भीड़ में से रास्ता काटता हुआ घंटाघर तक जा पहुँचा। इसमें मुझे आधा घंटे के क़रीब समय लग गया। ज्यूँ ही मैं वहाँ पहुँचा कि क्षण मात्र में भीड़ में छिपाया हुआ प्लैटफार्म सीधा करके खड़ा कर दिया गया। पलक झपकते ही मैंने सिगरेट फेंका और भारी ओवरकोट और मुशद्दी कुल्लेदार को खींचकर उतार दिया जिन्हें पास खड़े वालंटियर भाइयों ने झट संभाल लिया। अब मैं अपनी असली पोशाक शुद्ध खादी की शुभ्र सादी सफ़ेद अचकन, चूड़ीदार पायजामा और गांधी टोपी में था। झट से बिजली की तरह उछलकर मैं प्लैटफ़ार्म पर चढ़कर खड़ा हो गया। जेब से ’पूर्ण-स्वराज का प्रतिज्ञा-पत्र निकाला। चुनौती और उत्साह से पूरी शक्ति के साथ उच्च स्वर में ‘प्रतिज्ञा’ का पाठन शुरू कर दिया। वहाँ बेहद शोरोगुल था। वातावरण में घोर उत्तेजना छाई थी। क्योंकि यह तो बहुत लम्बी प्रतिज्ञा थी सो मुझे उसको पूरा पढ़ने में व दुहरवाने में समय लगा। .........उधर घेरा-बंदी करने वाली पुलिस को जब तक यह अहसास हुआ कि यहाँ क्या हो रहा है हम काफी काम तो कर ही चुके थे, यह जानते ही दिल्ली का कोतवाल मेरी ओर लपक कर बढ़ा तो वहाँ तो एक जन-समुद्र लहरा रहा था जिसको चीरते-धकियाते लाठियाँ चलाते जब तक पहुँचा तो ’प्रतिज्ञा-पत्र’ के वाचन का काम कामयाबी से पूरा हो चुका था।

दिल्ली के कोतवाल ने जिसका नाम अब्दुल वहाब था अपने पुलिस दस्ते के साथ झपटकर मुझे पकड़ा और घसीट कर नीचे खींच लिया और पुलिस गाड़ी में धकेल कर बन्द कर के क्षणों में कोतवाली में ले गए। वहाँ मैंने देखा कि सैकड़ों लोगों को ट्रकों और बसों में भर-भर कर जेल में लाया जा रहा है। शायद और भी सैकड़ों लोगों ने अपनी गिरफ़्तारी दी थी परन्तु पुलिस के पास इतने लोगों को लाने के लिए वाहनों की तादाद काफ़ी नहीं थी।

मुझे बताया गया कि मेरी गिरफ़्तारी के बाद उसी मंच पर श्रीमती चन्दोबीबी ने चढ़कर खूब गरमजोशी से भरकर जनता को भाषण देना शुरू कर दिया जो कि कांग्रेस की ज़ोरदार वर्कर थीं। उन्हें भी पकड़ा गया और जेल में लाया गया। रात होने तक गिरफ़्तार हुए लोगों में से सैकड़ों को छोड़ भी दिया गया। परन्तु फिर भी कुछ सौ लोग तो जेल में पूरी रात रहे ही।

अगले दिन सुबह जेल-अदालत में विचाराधीन -अंडर ट्रायल लोगों के मामले दर्ज किए गए और साथ ही साथ मुक़दमें चलाकर तुर्त्त-फुर्त्त वे निबटा भी दिये गए। जहाँ तक मुझे स्मरण है ये सारे मामले मुक़दमे ऑर्डिनेंस 17 (1) के तहत आते थे और कई सौ लोगों को छः महीने की सख़्त क़ैद का फैसला सुनाया गया था। परन्तु मेरा मुक़दमा तो कई हफ़्तों तक चलता रहा। मुझे उन मजिस्ट्रेट का नाम तो भूल रहा है जिन्होंने मेरे मुक़दमें को देखा- किया था। हाँ, था तो वह एक अंगरेज़ ही।

जब तक मेरा मुक़दमा चालू हुआ सरकार ने एक और नया ऑर्डिनेंस निकाल दिया। यह था शायद 17 (2) और इसके चलते तो दो वर्ष तक का कारावास हो सकता था और साथ में भारी जुरमाना भी। मजिस्ट्रेट ने मुझसे मुक़दमा शुरू करने से पहले पूछा: ’क्या मैं मुक़दमें में अपने बचाव में कुछ कहना चाहूँगा।’ मैंने जवाब दियाः ‘नहीं। बिल्कुल नहीं। मैं मुक़दमें में कभी बचाव नहीं करूंगा। उसमें बचाव के लिए कुछ है ही नहीं।’ परन्तु उसने कहा: ‘तुम्हारे ख़िलाफ़ और भी कई एक मुक़दमें हैं।’ मैंने उत्तर दिया: कोई बात नहीं ‘इससे कुछ नहीं होता।’ फिर उसने मुझसे पूछाः ‘तुम्हारी उम्र क्या है?’ मैंने कहा: ‘पच्चीस वर्ष।’ अब उसने पूछा: ‘क्या तुम विवाहित हो?’ मैंने कहा: ‘अभी पिछले साल मेरी शादी हुई है।‘

मुझे बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ कि शहर के कई एक प्रमुख वकील बिना मेरी किसी माँग या प्रार्थना के मुक़दमें में मेरे बचाव के लिए आगे आ गये क्योंकि उन्होंने स्वयं ही इस प्रकार के मुक़दमों के अभियुक्तों के बचाव करने का निर्णय ले लिया था। सो उन्होंने मेरे मुक़दमें में बचाव की कार्रवाही शुरू कर दी। पर वहाँ तो बचाने को कुछ था ही नहीं। मुझे थोड़ी बहुत तफ़सील याद है। मेरे पहले केस में मजिस्ट्रेट ने निर्णय दिया: ‘तुम्हें छः महीने की सख़्त जेल - यानी क़ैद-ए-बामशक्कत की सज़ा दी जाती है।’ मेरे दूसरे केस में उन्होंने कहा: ‘ मुझे बहुत दुख है मैं तुम्हारी मदद नहीं कर सकता क्योंकि इस अभियोग में सज़ा अब छः महीने से बढ़ाकर दो वर्ष की कर दी गई है।’ और उन्होंने अब दूसरा फ़ैसला दिया: ‘मैं तुम्हें नौ महीने की और सख़्त क़ैद की सज़ा देता हूँ।’ वहाँ एक तीसरा केस और आ गया। मजिस्ट्रेट उलझन में पड़ गया कि क्या करे। इसमें उसने मुझे पाँच सौ रुपये का जुरमाना या तीन महीने की सख़्त क़ैद की सज़ा सुनाई। परन्तु मैंने कहा: ‘मैं तो कोई जुरमाना नहीं दे सकता। ‘‘इस पर उन्होंने कहा: ‘ठीक है। ‘अब पुलिस अफ़सरों ने टोका: ‘सर, इनके ख़िलाफ़ तो और भी कई एक अभियोग हैं।’ इस पर मजिस्ट्रेट ने कहा: ‘क्या यह काफ़ी नहीं हो गया है? क्या तुम इन अभियोगों को अभी वापस नहीं ले सकते?’ इस पर पुलिस ने बाक़ी मुक़दमें वापस ले लिये।

मुझे अपने मुक़दमों के समय की एक बात का ज़िक्र करना ज़रूरी है। उन तीन-चार हफ़्तों के दौरान मेरी माँ - ‘बे बे’ पेशी के दिनों मेरा खाना बनाकर कचहरी में लाया करती थीं। तब जब-जब वे मुझे हथकड़ियों में देखतीं तो वे रोने लगतीं और पुलिस वालों पर ख़ूब चिल्लातीं और बदअसीसें और शाप देने लगतींकि: ‘अरे तुम बरबाद हो जाओ! तुम्हारा यह हो जाए। वह हो जाए। कोई नाम-लेवा न रहे।’ आदि-आदि। मैं उन्हें दिलासे देता ‘माँ आप इन लोगों को क्यों कोसती हो? ऐसा मत करें। इनका इसमें क्या दोष है? ये तो बेचारे ड्यूटी पर हैं।‘ पर वह तो बद्दुआएँ दिये बिना रह नहीं सकतीं थीं। बेचारी माँ।

मुलतान जेल का जीवन

हम सबको मुलतान जेल भेज दिया गया। हम लोग जिन्हें हथकड़ियाँ लगाकर दिल्ली से मुल्तान (पश्चिमी पंजाब-आजकल पाकिस्तान में) ले जाया गया उनमें से काफ़ी सारे लोग दिल्ली के ही थे। दफ़्तरी भाषा में आधिकारिक रूप से यह ‘‘नैशनल जेल’’ के नाम से जानी जाती थी। पर क्योंकि यह हाल ही में बनकर तैयार हुई थी तो यह ‘नई जेल‘ नाम से जानी जाती थी। इस जेल में बारह वार्ड थे जिनमें हज़ारों की संख्या में क़ैदी थे। परन्तु हमको तो अलग-अलग कोठड़ियों में रखा गया था और हमको किसी दूसरे वार्ड में जाने की इजाज़त भी नहीं थी। हम सबको छोटी-छोटी कोठड़ियाँ दे दी गई थींऔर हमारी खाटें/चारपाइयाँ सीमेंट की बनी थीं। उस पर एक गद्दा था जिसमें कि गेहूँ की बाल और भूसा भरा हुआ था। हमें जेल की वर्दी दे दी गई और हमारे शहरी जीवन के कपड़े रखवा लिए गए। हम जेल की वर्दी को पाकर बड़े ख़ुश हुए।