चाचा जी की आत्मकथा

9. ख़िलाफ़त मूवमेंट और हिन्दू-मुस्लिम एकता · Part 3 of 3

विदेशी कपड़े की दुकानों पर ‘पिकेटिंग’


सन् 1930 में दिल्ली प्रांतीय (प्रॉविंशियल) कांग्रेस कमेटी द्वारा पिकेटिंग का आयोजन व संगठन किया गया और इस कार्यक्रम की प्रमुख सूत्रधारिणी व आलाकमान नेता थीं- बहन सत्यवती। श्रीमती मेमोबाई उनसे दूसरे दर्जे पर कमान पर थींजो कि थीं तो अनपढ़ पर थीं वह ज़ोरदार संयोजिका और संगठन कुशल धक्के की लीडर। इनके पीछे आती थीं तीन या चार महिला कार्यकर्त्ताएं-कार्यकत्रियाँ। इनके तहत लगभग एक सौ महिला वॉलंटियर/स्वयंसेविकाएँ होती थीं जिनको विभिन्न कटरों में जहाँ कि विदेशी कपड़ा बेचने की दुकानें थीं उनमें जगह-जगह लगा दिया गया था। हमारी महिला स्वयं सेविका विदेशी कपड़े की बिक्री को खुदरा-रिटेल के बिक्री स्थानों पर रुकवाती थीं।

परन्तु हमें थोक बिक्री स्थानों पर दुकानों पर उसके व्यापारियों में घोर रोष व नाराज़गी का सामना करना पड़ता था क्योंकि वे व्यापार व बिक्री नहीं कर पाते थे। न ही वे अपने विदेशी माल के बण्डलों को खुदरा विक्रेताओं को बेच सकते थे। और न ही दिल्ली से बाहर के नगरों में ही भेज सकते थे। यह तो बस एक प्रकार की लड़ाई होती थी जिसमें असहाय असमर्थ होकर वे चोरी छिपे ढंग से गुप्त सौदेबाज़ी करके अनुचित ढंग से कपड़े को रेलवे स्टेशन तक पहुँचाने की कोशिश करते जहाँ यह एक प्रकार से संघर्ष या एक ‘लड़ाई’ होती थी, जिसे छेड़ने की कोशिश वे अपनी तौर पर करते थे और वहाँ हमारी पूरी कोशिश उनके इरादों को नाकाम करने की होती थी। जब तब हम रेलवे स्टेशन पर विदेशी कपड़ों के माल के गट्ठे के गट्ठे (Bales) पकड़ लेते थे, और वहाँ से हम उन्हें वापस ले आते और काँग्रेस आफिस में जमा कर देते। ज़ब्त किया हुआ सामान उनके मालिकों को वापस दे तो दिया जाता था लेकिन तब ही जब वे ‘पंचायत’ द्वारा निर्धारित दण्ड-राशि का भुगतान कर देते थे क्योंकि उनके पास और कोई चारा भी तो न था। यह कहना सचाई न होगी कि व्यापारी लोग ख़ुशी से या स्वेच्छापूर्वक जुर्माने अदा कर देते थे। इस भाँति इकट्ठी की गई धनराशि दिल्ली प्रांतीय (प्रॉविंशियल) कांग्रेस कमेटी को चली जाती थी जो कि आर्थिक दृष्टि से कभी भी सुखद स्थिति में नहीं होती थी। कांग्रेस की नियमित आय के साधन दान और चन्दे के अतिरिक्त और कुछ तो थे ही नहीं। अधिकतर दान गुप्त ही होते थे। यदि किसी हमदर्द सहानुभूति वाले दानकर्ता को कुछ धनराशि देने की इच्छा होती भी तो वह उसे खुले तौर पर कभी नहीं दे सकता था। क्योंकि ब्रिटिश सरकार को तो यह पता लग जायेगा और तब वह उस बेचारे को सताती और उसका उत्पीड़न करने लग जाती। सो जब भी आवश्यकता पड़ती तो वरिष्ठ लीडर गुप्तदान व चन्दा इकट्ठा करके ले आते। मुझे एक या दो प्रमुख दानकर्त्ताओं का तो पता है जो दान लाया करते थे। एक तो थे लाला प्यारे लाल मोटर वाला जो प्यारेलाल एण्ड संस ’फ़र्म के मालिक थे। अन्य दूसरे थे लाला नारायण दत्त ठेकेदार जो कि प्रमुख आर्यसमाजी थे जो दूसरे ठेकेदारों से भी दान ले आने में समर्थ थे। लाला प्यारेलाल के पुत्र थे श्री रघुनन्दन सरन जो कि कांग्रेस के मेम्बर भी थे और स्वाधीनता संघर्ष में सक्रिय रूप से भाग ले रहे थे। वे पंडित जवाहरलाल नेहरू जी के उन दिनों में अच्छे मित्र बन गये थे। वह मेरे भी सहयोगी थे।

मैं ख़ूबी से काफ़ी काम किया करता था। पुराने व मौजूदा कांग्रेस मैम्बरों व सहानुभूति रखने वाले लोगों से सालाना चंदे व दान आदि इकट्ठा करता था और नये सदस्यों की भरती करके पंजीयन भी करता था जो पाँच या दस रुपये दिया करते थे। निस्संदेह तब कांग्रेस की सदस्यता तो सीमित ही थी। हम लोगों से जाकर प्रार्थना किया करते थे कि वे कांग्रेस के मेंम्बर बन जायें। और कई एक बार तो बहस भी हो जाती थी। हम उन्हें भरोसा देते, “आप डरते क्यों हैं? यह तो राष्ट्रीय गतिविधि है- प्रवृत्ति है। देश भर का आन्दोलन है। आपमें इतना साहस तो होना चाहिये- हिम्मत होनी ही चाहिये कि अपना नाम सदस्य के रूप में दर्ज करायें। कांग्रेस की सदस्यता लें।” इस प्रकार हम नये मेम्बर बनाने के लिये गंभीरता से कोशिश में लगे रहते। यह कोई आसान काम नहीं था कि लोग आगे आते और कांग्रेस के मेम्बर बनते।

सन् 1930 के दशक में कांग्रेस पार्टी बहुत करके समाज के मध्यम वर्ग (मिडिल क्लास) की ही संस्था थी सिवाय कुछ धनी व्यक्तियों को छोड़कर जैसे डाक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी। मज़दूर और कामगार पेशा के लोग तो अभी बहुत थोड़े से ही थे जो कांग्रेस से जुड़े हुए थे जैसे मोहम्मद क़दरीस, जो पेशे से दर्जी था। कांग्रेस मूवमेंट का - उसकी चेतना और गतिविधियों का प्रवेश अभी दिल्ली क्षेत्र के कारखानों व फैक्ट्रियों के कर्मचारियों व मज़दूरां में, किसानों-काश्तकारों या दिल्ली के छोटे-मोटे खुदरा दुकानदारों के भीतर अभी नहीं हुआ था और न ही उसकी जड़ें ही जमी थीं।

होली दिल्ली में विदेशी कपड़ों की

सन् 1929 के अक्टूबर मास में दिल्ली में यमुना नदी के तीर पर पंडित मोतीलाल नेहरू और पंडित मदन मोहन मालवीय जी की भव्य व दिव्य उपस्थिति में विदेशी कपड़ों की विशाल होली जलाई गयी। कितने ही लोगों ने अपने बेशक़ीमती विदेशी वस्त्र उसमें होम करने को क़ुर्बान कर दिये थे और निस्संदेह उस दिन की वह होली बहुत ही विशाल और स्मरणीय थी।

स्वदेशी का उद्भव

मेरा विवाह 1927 में हुआ था। उस अवसर पर मेरी पत्नी को उनके माता-पिता द्वारा विदेशी कपड़े दिये गये थे। उनमें भी विशेष करके थे बहुमूल्य मख़मल और सुनहली ज़री के दो अति सुन्दर सूट गोल्ड ब्रोके ड - सुनहली ज़री के सूटों को छोड़कर शेष सभी सामान विदेशी वस्त्रों की होली में दे दिया गया। जिनको भी वर्षों बाद में काबुल के शाह अमानुल्लाह और उनकी पत्नी को, उनके भारत निर्वासन के समय जब वे दिल्ली में आये थे- पेश करके नज़र कर दिया गया था। यह विशाल विदेशी कपड़ों की होली सदा अविस्मरणीय है और इससे दिल्ली के जन-जीवन में एक नई प्रेरणा और जागृति का संचार हुआ। लोगों में राष्ट्रीय चेतना का उदय हुआ और स्वदेशी वस्तुओं एवं खादी में रुचि जागने लगी।

कांग्रेस पार्टी तत्कालीन विदेशी सरकार के अत्याचारपूर्ण दमनकारी क़ायदे क़ानूनों की घोषणा और प्रचारण के विरोध में जन-आन्दोलन का सूत्र संचालन करने के लिये एक ‘डिक्टेटर’ की नियुक्ति करती थी। मुझे उन क़ायदे कानूनों की सटीक सुनिश्चित प्रकृति की जानकारी ज़हन में नहीं है परन्तु उनमें से कुछ का ज़िक्र मेरे 1930 के मुक़दमें के रिकॉर्ड में दर्ज है। जब ‘विदेशी कपड़ों के बॉयकॉट’ के मामले नें तूल पकड़ा तो दिल्ली पुलिस ने मेरे ख़िलाफ गिरफ़्तारी का वॉरन्ट निकाल दिया। मुझे याद है कि मेरे खिलाफ़ दो या तीन मामले चल गए थे, ‘ड्यूटी पर की पुलिस के काम में बाधा डालना’, ‘जनता के काम में रुकावट डालना’ और इसी प्रकार के और भी थे। ज्यूँ ही मुझे अपने ख़िलाफ जारी हुए वॉरन्टों की खबर मिली तुरंत मैं चाँदनी चौक से भाग निकला और एकदम अंडर ग्राउंड - भूमिगत हो गया।

सन् 1930 में पहले नम्बर का महत्त्वपूर्ण प्रोग्राम थाः कांग्रेस के पूर्ण स्वराज के प्रतिज्ञा-पत्र का दिल्ली के ख़ास-ख़ास स्थानों पर सार्वजनिक रूप से वाचन व पाठन। ब्रिटिश सरकार ने इस पर रोक लगा दी और इसे गैर कानूनी क़रार दे दिया। साथ ही अपने निरोधात्मक दमन-चक्र की कठोर कार्यवाही शुरू कर दी। यह पूर्ण स्वराज की प्रतिज्ञा लाहौर कांग्रेस के प्रस्ताव पर आधारित थी जो पंडित जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में 1929 में 26 जनवरी को पारित हुआ था। रावी नदी के तीर पर हुए उस ऐतिहासिक कांग्रेस अधिवेशन में मैं भी मौजूद था। उपस्थित था। - और उस अकल्पनीय विशाल जुलूस में भी था जो जनता व मानव-मुण्डों से खचाखच भरे लाहौर शहर के अनारकली बाज़ार और अन्य महत्वपूर्ण सड़कों और रास्तों से होकर निकाला गया था। वह हमारे देश की आज़ादी की मूवमेंट में -महान स्वाधीनता आंदोलन में ऐतिहासिक अवसर था जो प्रत्येक भारतीय के लिए प्रेरणादायी और दिल बढ़ाने और उत्साह से भर देने वाला क्षण था।