मेरी किश्ती
पहले तो यह क़िश्ती स्कूल के दरिया में चली। पहली दो कक्षायें गाँव के स्कूल में निकलीं जहाँ मैं अपनी दादी के पास रहा करता था। मैं यहाँ उसका पूरा विस्तार तो नहीं दे रहा हूँ क्योंकि विस्तार देने से क़िश्ती का रुख़ इधर-उधर भटक जायेगा इसलिये केवल पढ़ाई के सम्बन्ध में बतला रहा हूँ।
मेरे पिता जी महक़मा-बन्दोबस्त में गिरदावर-कानूनगो थे और मेरी प्राइमरी शिक्षा के दौरान उनकी नियुक्ति ज़िला शाहपुर पंजाब में थी जो अब पाकिस्तान में है। उस ज़माने में स्कूलों की पढ़ाई पेशावर से लेकर दिल्ली तक केवल उर्दू में हुआ करती थीं इसलिये मेरी पढ़ाई की नींव भी उर्दू में पड़ी।
परन्तु बन्दोबस्त एक चलता-फिरता महक़मा था। जहाँ दो चार गाँवों का बन्दोबस्त ख़त्म हुआ कि मेरे पिताजी को आगे किसी और गाँव में धकेल दिया जाता था। तो इस तरह उर्दू की प्राइमरी शिक्षा कक्षा पाँच पूरी करने के लिए मुझे कई स्कूल बदलने पड़े, इसके सिवाय और कोई दूसरा चारा ही नहीं था।