मेरी बुनियादी शिक्षा
हमारे गाँव में एक स्कूल था - प्राइमरी।
कमरा भी एक था और अध्यापक भी एक। चालीस के करीब छात्र थे, उसमें एक मैं भी। उमर छः साल की थी और पढ़ता था दूसरी कक्षा में। लड़कियाँ हमारे स्कूल में नहीं पढ़ती थीं। लड़कियों को तो उस जमाने में पढ़ाना अच्छा नहीं समझा जाता था। इन चालीस छात्रों में केवल दस ही हमारे गाँव के थे। बाँकी तो चार-चार, पाँच-पाँच, छः-छः मील दूर गाँवों से आते थे। और यह बताना तो भूल ही गया कि गाँव का नाम था वहाली जिला जेहलम, जो कि अब पाकिस्तान के चंगुल में है। हमारा गाँव एक पहाड़ी के ऊपर कई छोटे-छोटे गाँवों का झुण्ड था। चारों तरफ ऊँचे -ऊँचे पहाड़, नीचे एक सुन्दर लम्बी-चौड़ी तराई। अच्छा, गाँव की सुन्दरता की कहानी तो और कभी सुनाऊँगा। अभी जी चाहता है कि किसी तरह उड़कर अपने गाँव को देख आऊँ। खैर।
मैं अपनी दादी के पास रहता था। क्या जुल्म। मुझे प्रातः छः बजे उठा कर सीधी दोनों टाँगों में दबोचकर बकरी के नीचे ले जाती थी और उसके थन मेरे मुँह में डाल देती थी। एक हाथ से थन दबाती और दूसरे हाथ से मेरी गरदन पकड़ कर रखती कि मैं हिल-डुल न सकूँ। अब अन्दर दूध की धारें क्या जाती थीं - चोंटे लगती थीं। मैं ऐसा मजबूत जकड़ा हुआ होता था कि लाख कोशिश के बावजूद हिल-डुल नहीं सकता था। दूध तो अन्दर चला ही जाता था - ताजा, पवित्र, अस्पर्श (Untouched by hand) । मजे की बात यह थी कि मेमना और मैं दोनों एक साथ रोते-चिल्लाते थे।
रोते-चिल्लाते मैं स्कूल के लिये तैयार होता था। अपनी स्लेट- तख्ती बगल में और दवात -बस्ता हाथ में। मिट्टी की दवात और बीच में स्याही का कपड़ा। ढक्कन तो होता ही नहीं था। स्याही गिरने का हर समय खतरा। ये सब चीजें तो बायें हाथ में और छड़ी दायें हाथ में। झट ही मेरी दादी बकरी खोल देती थीं जिसको मील-डेढ़ मील एक दूसरी पहाड़ी पर बकरियों के चरवाहे के पास छोड़ने के लिये जाना पड़ता था।
बकरी को बाड़े में छोड़ने के बाद जंगल में शौच-क्रिया और फिर नीचे तराई में उतर कर रहट के कुएँ से बर्फ जैसे ठंडे बड़े जोर के झरने के नीचे स्नान करना, कमीज से शरीर पोंछना और पजामा - कमीज फिर पहन लेना और अपना सामान उठाकर सामने की दूसरी पहाड़ी पर स्कूल चला जाना। कमीज पहले तो गीली हो जाती थी पर स्कूल पहुँचते-पहुँचते रास्ते में हवा से सूख जाती थी। स्कूल में पहुँचना भी समय पर सात बजे प्रातः। जो जरा भी देर से आता था, उसकी तुरन्त पिटाई। कोई कारण नहीं पूछना और कोई सजा बकाया नहीं रखनी। तुरन्त हिसाब-किताब बराबर।
अब 11 बजे के लगभग मेरी दादी खाना लेकर पहुँच जाती थी और मुझे एक पेड़ के नीचे बिठाकर प्यार से खाना खिला देती थी और गुनगुनाती गाती वापस चली जाती थी।
शाम को पाँच बजे छुट्टी होते ही मुझे फिर बकरी घर वापस लाने के लिये भागकर जाना पड़ता था। मुझे बड़ा होशियार रहना पड़ता था कि कहीं मेरी दवात से स्याही छलक न जाये।
आमतौर पर बकरी मेरे आगे -आगे घर आ जाती थी लेकिन कभी-कभी धोखा देकर जंगल में भाग जाती थी और मैं पीछे-पीछे। अगर सामने से किसी आने जाने वाले की मदद मिल जाये तो मैं बकरी को घेर कर घर ले आता था: किन्तु कभी -कभी सारी रात ही उसके पीछे भागना पड़ता था। बकरी के बिना घर नहीं जा सकता था।
रात देर हुई तो मेरी दादी को चिन्ता होती। तब वह गाँव के दो -चार आदमी लेकर लालटेनों के साथ लेकर मुझे ढूँढ़ने को चल पड़ती। लेकिन जंगल में कोई सीधा रास्ता तो नहीं था। होता यह कि प्रभात में मैं और बकरी, मेरी दादी और वे लोग तकरीबन एक साथ ही घर वापस पहुँचते। थकावट की हद नहीं। स्कूल जाने से छुट्टी। दादी को फिर भी स्कूल में जाकर मुंशी जी से कहकर आना पड़ता था, ताकि दूसरे दिन पिटायी न हो। रात के समय टांगों में जकड़े हुए दूध पीने की मुसीबत नहीं होती थी। रात का दूध-दही, लस्सी-मक्खन के लिए इस्तेमाल किया जाता था। और रात को बकरी दूध भी दुगना-तिगुना देती थी। क्योंकि जंगल में खूब आनन्द से चर कर आती थी। वह भी क्या, प्राकृतिक जड़ी-बूटियाँ। तो फिर बीमारी नजदीक ही नहीं आती थी। और न ही स्कूल में छुट्टी के लिए कोई अर्जी ही भेजनी पड़ती थी।
स्कूल में साल के नौ महीने अच्छी तरह से गुजर जाते थे पढ़ाई-लिखाई में। टाट-पट्टियों में बैठते थे। खूब जोर-जोर से चिल्ला-चिल्ला कर अपना सबक याद करते थे। और फिर कभी तख्ती पर लिखते कभी स्लेट पर। गणित स्लेट पर और उर्दू तख्ती पर। सारा जोर तो इस बात पर रहता था कि सुन्दर कलात्मक लिखाई (खुशखत) हो। जिसकी लिखावट अच्छी नहीं होती, उसकी बार-बार पिटाई तो होती ही थी, परीक्षा में अंक (नंबर) भी कम मिलते थे। स्कूल की दिनचर्या में शारीरिक व्यायाम (Drill and physical exercise) का महत्व तो होता ही था और घंटा भी बहुत लंबा होता था। इसके तुरन्त बाद सब छात्रों को जंगल की ओर भागना पड़ता था - मुंशी जी के घर में खाना बनाने के लिए लकड़ियां, जंगल की सब्जियां और जंगली फल जो कई प्रकार के होते थे - प्राकृतिक फलों में बेर, शहतूत, पिलू, जितनी मर्जी जंगल से ले लो, परंतु कुछ परिश्रम से।
सारा साल तो मुंशी जी बड़े प्रेम से - प्यार से पढ़ाते थे आखिर के महीनों में न मालूम उन्हें क्या हो जाता था - एकदम कठोर, दृढ़ और क्रोधी। अपने लिए खाना पकाने की लकड़ियां, सब्जी और फल भी भूल जाते थे। एकदम सारी शक्ति पढ़ाने, सिखलाने में, याद कराने में लगा देते। डर के मारे सब कुछ याद करना पड़ता था नहीं तो बेंत से पिटाई। यह सब यूनिवर्सिटी परीक्षा के लिए नहीं, दूसरी-तीसरी कक्षा की वार्षिक परीक्षा के लिए। खूब याद भी करले तो भी किसी न किसी गलती पर तो पिटाई हो ही जाती थी - चाहे गणित की हो या वर्तनी (Spelling) की। चाहे भूगोल की हो या खराब लिखावट की।
गंदी बातों और दुष्टता के लिए पिटाई इतनी होती थी कि नानी याद आ जाए और कभी भूले नहीं। घोड़ा बनाकर और टांगों के नीचे से हाथ निकालकर कान पकड़वाया जाता और इससे भी अधिक सजा देने के लिए पीठ पर बीस-बीस सेर, मन-मन भर के पत्थर रख दिये जाते थे।
उन तीन महीनों में पढ़ाई दिन में स्कूल में ही खत्म नहीं हो जाती थी। घर से खाना खाकर मुंशी जी के चबूतरे पर जाना पड़ता था। वहाँ मेरी दादी लालटेन लेकर छोड़ जाती और बेचारी दस बजे वापस लेने आती थीं।
मुंशी के चबूतरे पर इन दो घंटों में जबानी हिसाब, भूगोल आदि के सवाल कराये जाते थे। हम सब बच्चे मुंशी जी के छोटे चबूतरे में अँधेरे में ही बैठे होते थे, केवल एक मिट्टी का दीया कोने में जल रहा होता था।
मुंशी जी तेजी से, धड़ाधड़ जोड़, घटाव, गुणा, भाग के सवाल पूछते चले जाते थे और हरेक को मुंशी जी की हथेली पर उँगली से लिखना पड़ता था। यदि जवाब ठीक हुआ तो मुंशी जी मीठी आवाज से कहते थे, शाबाश! यदि गलत हुआ तो एक थप्पड़!
मालूम है स्कूल की फीस क्या होती थी? अमीर बच्चे की एक रुपया, साधारण लोगों के लिए आठ आने, और गरीब बच्चों के लिए चार आने। यह भी मासिक नहीं, वार्षिक! वह फीस नहीं, मैं गलती से कह गया। वह मुंशी जी को नये क्लास में भेजने के लिए गुरु दक्षिणा दी जाती थी। अगर दक्षिणा नहीं मिले तो मुंशी जी अगली कक्षा में भेजते नहीं थे।
नई कक्षाओं में जाने के पश्चात एक बड़ी मजेदार और महत्वपूर्ण बात यह होती थी कि अब जिला निरीक्षक (District Inspector of School) के आने का इंतजार शुरू हो जाता था। कोई भरोसा नहीं कब आ जाँए कहीं गदहे-घोड़े लादने में देर हो जाये, या नदी पार करने में देर हो जाये। और विद्यार्थियों को इंतजार में शाम को देर-देर तक स्कूल में ही बैठा रहना पड़ता था। कभी-कभी तो रात के दस-दस ग्यारह बजे तक कि कभी भी उनके इन्सपेक्टर साहेब का कारवां आ जाए। मेरी दादी बड़ी अच्छी थीं। देर हो जाए तो भी खाना लाकर खिला देती थीं।
एक दिन किसी राहगीर ने मुंशी जी को बताया कि इन्सपेक्टर साहेब का कारवाँ कुछ दूरी पर आ रहा है और रात को किसी वक्त भी यहाँ पहुँच जायेगा।
हम लोग बड़े शौक और खुशी से इन्तजार में बैठ गये। स्कूल को कागजों की रंग-बिरंगी झण्डियों से ऐसा सजा रखा था कि इन्सपेक्टर साहेब आते ही खुश हो जायें। उधर गाँव की हवा से जब झण्डियाँ फड़फड़ातीं तो ऐसा लगता था कि मानो इन्सपेक्टर साहेब के स्वागत में एक मधुर संगीत गा रही हों।
इन्सपेक्टर के कारवां में उनके सहायक, नौकर-चाकर और सारा सामान तीन ऊँटों, दो घोड़ों और चार खच्चरों पर लदा और सबके साथ एक-एक हाँकने वाला मनुष्य। सब लोगों के लिए प्रीति भोज तैयार था। सब बच्चों के माँ-बाप अपने-अपने घर से कुछ-न-कुछ बनाकर ले आये थे और इतना कुछ स्वादिष्ट भोजन इक्ट्ठा हो गया और सबने आनन्द से खाया।
इसके बाद हमारी परीक्षा शुरू हुई जो प्रातः तक चलती रही। क्या आजकल भी कभी ऐसा होता है कि आधी रात के बाद परीक्षा हो। परन्तु इन्सपेक्टर साहेब को दूसरे ही दिन किसी अगले स्कूल में पहुँचना था और सब स्कूलों का दौरा बँधे समय के अन्दर खत्म करना था। सबने आनन्द से खाया।
हमसे तो सवाल पूछे ही गये। लेकिन यह पता नहीं लगा कि परीक्षा हमारी थी या मुंशी जी की? क्योंकि बेचारे मुंशी जी को एक सेकेण्ड चैन नहीं लेने दिया। यह रजिस्टर लाओ, वह हिसाब दिखाओ। सारे साल का टाइम-टेबुल दिखाओ, सब बच्चों के काम दिखाओ, उनकी हाजिरी बताओ इत्यादि-इत्यादि।
इन्सपेक्टर साहेब के कारवां को गीत गाकर विदा किया अगले पड़ाव के लिये। और भगवान की यह करुणा हुई कि उस दिन तो सारा दिन स्कूल से छुट्टी मिली। आनन्द आ गया। खूब खेले-कूदे और जंगल में जाकर पेड़ों पर चढ़कर शहतूत और खूब बेर खाये।