मेरा जन्मदिन
जैसे सारा संसार उलझन और घोटाले में पड़ गया है ऐसे ही मेरा जन्मदिन भी। बचपन में मैंने अपनी माँ से पूछा कि मैं किस दिन पैदा हुआ था। मेरी माँ कहने लगी, ‘‘पुत्तरा (बेटा)! मुझे दिन-विन तो कुछ मालूम नहीं। न मैं पढ़ीलिखी हूँ। श्रावण का महीना था . . . . भोर की बेला थी, ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी, नन्हीं-नन्हीं बूँदें पड़ रही थीं - उस समय तुम्हारा जन्म हुआ था।’’
पर इससे तो कोई मतलब नहीं निकला।
दो-तीन साल में गाँव के पण्डितजी ने मेरी जन्म-पत्री बनाकर दी। लंबी तो बहुत थी परन्तु उससे भी कोई ठीक मतलब नहीं निकलता था। वह बेचारे भी बहुत पढ़ेलिखे नहीं थे। परन्तु कई महीने लग कर बनाई होगी - सुन्दर, चमकती हुई रोशनाई में और सुलेख में।
बहुत सालों बाद मैं पांडिचेरी आश्रम जा पहुँचा और भाग्यवश मैं माताजी से ज़िक्र कर बैठा। उन्होंने पूछा, ‘‘जन्मपत्री कहाँ है?’’ मैंने दिल्ली से मँगवाकर उनको दिखाई। अच्छी ख़ासी लंबी थी। माताजी बड़ी खुश हुईं और हँसने लगीं। मैंने समझा बात यहीं ख़त्म हुई। परन्तु झट वह कहने लगीं, ‘‘तुम जन्मपत्री को मेरे पास छोड़ जाओ।’’ मैंने सोचा मेरी जन्मपत्री सम्हल गयी है और मुझे कुछ न कुछ लाभ होगा।
दूसरे ही दिन माताजी के हाथ का लिखा हुआ एक सुन्दर कार्ड प्लास्टिक के लिफ़ाफ़े में सिला हुआ मेरे निवास-स्थान पर पहुँचा दिया गया। उस पर लिखा था - ‘‘तुम्हारा जन्मदिन 13 अगस्त, 1903 है’’ - (Your birthday is on 13th August 1903) ।