चाचा जी की आत्मकथा
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मेरे बच्चे


अब नया झगड़ा।

हर बार जब मैं आश्रम जाता तो चारों ओर से बच्चों की तरह-तरह की शिक़ायतें मुझे मिलतीं और मैं बड़ा परेशान होता। मेरे पास कोई चारा न था सिवाय माताजी के पास इन शिक़ायतों को रखने के।

प्रायः प्रतिदिन शिक़ायतों का बंडल लेकर पहुँचता। माताजी ध्यान से सुनतीं और सिर हिला-हिलाकर कहतीं-‘‘ओह! अब मुझे पता लगा। अब मुझे पता लगा। अच्छा मैं देखूँगी।’’

यह क़िस्सा शायद कुछ बरस चलता रहा। माताजी सुनतीं और वही जवाब देतीं-‘अच्छा मैं देखूँगी।’’ परन्तु करतीं कुछ भी नहीं। मेरी परेशानी और मुसीबत वैसी की वैसी रही, बल्कि बढ़ती ही गयी। ऐसा प्रतीत होता था कि माँ मुझे चकमा ही दे रही हैं। हो सकता है कि वे अपनी कोई गुह्य-शक्ति इस मामले को सुलझाने के लिए इस्तेमाल कर रही हों। परन्तु मुझे इसका क्या ज्ञान हो सकता था।

होनी! भावी!!

एक प्रातः आयी मेरी शामत। ज्यूँ ही मैं माताजी के पास पहुँचा और सदा की भाँति बच्चों की शिक़ायतें शुरू की ही थीं कि माताजी पीछे हटकर पाँवों के पंजों पर सीधी खड़ी हो गयीं। ऐसा लगता था जैसे कि मुझ पर वार करेंगी। मेरे तो प्राण खुश्क़ हो गये।

भूचाल की तरह से गरजकर बोलीं - ‘‘तुम कौन होते हो? सदा मेरे बच्चों की शिक़ायत करने वाले! हर समय बुराई! हर समय शिक़ायत! बच्चे मेरे हैं तुम्हारे नहीं! सुना? बच्चे मेरे हैं तुम्हारे नहीं! खबरदार अगर आगे से फिर कभी मेरे बच्चों के सम्बन्ध में कभी भी कुछ कहा या शिक़ायत की। मैं हरगिज़ नहीं सुनूँगी।’’

वह दिन और आज........

अब बच्चों का और मेरा रिश्ता दिन-प्रतिदिन बदलता ही चला गया। अब जब भी मैं आश्रम जाता, बच्चे जब जी चाहे या जब उनको फ़ुरसत मिलती मुझसे बारी-बारी से मिलने आते और कहते-

‘पिताजी आजकल हमारे ड्रामे का अभ्यास चल रहा है;’

‘पिताजी हम लोग पिकनिक पर जा रहे हैं;’

‘आज हम लोग पचास मील पैदल चलकर आयेंगे;’

‘आज हम सौ मील साइकिल पर चलकर आयेंगे;’

‘अब हमारे वार्षिक खेल-कूद (Athletics) का मौसम है;’

‘अब हमारा जिमनास्टिक (Gymnastic) का मौसम शुरू हो गया है;’

‘पिताजी आजकल हमारी तैराक़ी की प्रतियोगिता चल रही है;’

‘आज हम गहरे समुद्र में लम्बी तैराक़ी के लिए जा रहे हैं;’

‘पिताजी आजकल हम दर्शन-दिवस के प्रबन्ध की तैयारी कर रहे हैं;’

‘हमें ‘दर्शन’ के उपलक्ष्य में आये अतिथियों को भोजन-वितरण करना है;’

‘आजकल हम वार्षिक-उत्सव की तैयारी में लगे हुए हैं ;............’ इत्यादि-इत्यादि।

बच्चों के साथ मेरे विचित्र भाग्य की अनगिनित कहानियाँ हैं। मैं एक-दो उदाहरण के तौर पर लिख रहा हूँ।

मैं सड़क पर खड़ा था। मुझे आये पन्द्रह दिन हो गये थे। मेरा सबसे छोटा बेटा विक्टर तेज़ी से साइकिल पर दौड़ा जा रहा था। मुझे सड़क पर देखकर ब्रेक लगाकर साइकिल से उतरा और कहने लगा-‘‘पिताजी क्या आप अभी तक यहीं हैं?’

अभी दो-तीन साल हुए मैंने अपने सुपुत्र प्रॉमिस को अचानक एक चिट्ठी लिखी-

‘मेरे प्यारे बेटे,

‘मैं तुम्हें याद दिलाना चाहता हूँ कि मैं तुम्हारा बाप हूँ। तुमने मुझे कभी कोई चिट्ठी नहीं लिखी।’

प्रॉमिस ने मुझे जवाब दिया-

‘पिताजी यह तो मैं जानता हूँ कि आप मेरे पिता हैं। मैं भूला नहीं। परन्तु यह नहीं जानता था कि यदि मैं चिट्ठी लिखूँ तभी आप मेरे पिता हैं और यदि चिट्ठी न लिखूँ तो आप मेरे पिता नहीं हैं।

‘पिताजी, यदि कभी मैं चिट्ठी लिखना भी चाहूँ तो मेरी समझ में नहीं आता कि लिखूँ क्या? लिखने की कभी कोई बात तो होती नहीं है!’

इस प्रकार बच्चों से मेरा सम्बन्ध चल रहा है। परन्तु बहुत गहरा, बहुत प्यारा और बहुत सत्कार का।

अब बच्चे सब बड़े-बड़े हो गये हैं और जब कभी मैं उनसे कोई बात करता हूँ, किसी विषय पर चर्चा चलती है या तर्क -वितर्क होता है तो वे लोग आध्यात्मिक ऊँचाई से बात करते हैं, जैसे कि कोई जैट-वायुयान चन्द्रमा या शुक्र पर जा रहा हो।

जिसकी मुझे कुछ समझ नहीं आती।