चाचा जी की आत्मकथा
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जीवन परीक्षा


जीवन परीक्षा पर है या जीवन की परीक्षा है। शायद दोनों एक ही बात हैं। जीवन का नाटक.....या जीवन-लीला।

अब मैं एक मास के क़रीब अस्पताल में था अर्थात् मैं बीमार था। बीमारी को हम ख़ुद ही बुलाते हैं।

अस्पताल बहुत नामी है ‘अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (All India Institute of Medical Science) भारत और साथ के देशों में बड़े-बड़े लोग जो बीमार होते हैं यहाँ दाख़िल होकर चिकित्सा कराते हैं। मेरे साथ के ही कमरे में हमारे माननीय भूतपूर्व-राष्ट्रपति श्री वी0वी0 गिरि थे।

दो-तीन साल से मेरे मित्र और डॉक्टर मुझे कह रहे थे कि ‘यह रोग तो प्रायः सत्तर वर्ष की आयु के पश्चात् सबको ही हो जाता है।’ यह भी कोई बात है? इसमें भी कोई तुक है? परन्तु यह हो तो रहा ही था। और परेशानी बढ़ रही थी।

मुझे मज़बूर होकर विशेषज्ञ डॉक्टरों को दिखाना पड़ा और सबने यही कहा कि इसका इलाज तुरन्त ऑपरेशन (Operation) है। परन्तु मैं टालता ही रहा।

मैं यह कहानी शरीर के सब क़ैदियों को चेतावनी देने के लिए लिख रहा हूँ। मई 1977 के शुरू में मुझे कहा गया कि मै फ़ौरन ऑपरेशन करवा लूँ परन्तु मैं फ़ौरन भाग खड़ा हुआ और नैनीताल पहुँच गया। वहाँ तीन महीने साधना और तपस्या में रहा। वहाँ एकाएक बीमारी बढ़ गई परन्तु मैं इसके आगे झुका नहीं।

जब मेरे शुभ-चिंतकों को पता लगा तो मेरी बेटी तारा एक तगड़े साथी को साथ लेकर नैनीताल पहुँच गयी और मुझे बन्दी बनाकर ले आयी। केवल हथकड़ियाँ नहीं लगायीं। दिल्ली लाकर सीधा ही अस्पताल में भर्ती कर दिया।

उस दिन शनिवार था। मैंने डॉक्टरों से कहा कि ‘‘आज और इतवार को तो कुछ जाँच-परीक्षा होगी नहीं, तो मुझे आश्रम जाने दें और मैं सोमवार प्रातः हाज़िर हो जाऊँगा।’’ न मालूम क्यों डॉक्टर आग-बग़ूला हो गये और कहने लगे - ‘‘अब आपको अस्पताल से जाने की इज़ाज़त नहीं दी जा सकती।’’

सोमवार और मंगवालवार को मैंने डॉक्टरों से फिर तर्क -वितर्क शुरू कर दिया ‘‘कि मुझे छोड़ दें वातानुकूलित (Air conditioned) ऑपरेशन-थियेटर (Operation Theatre) की ठंडक को मेरा शरीर बर्दाश्त नहीं कर सकता! मैं सर्दियों में नवम्बर के महीने में स्वयं आ जाऊँगा।’’ और मैं वहाँ से भाग निकला।

दूसरे दिन 13 अगस्त मेरा जन्मदिन था। मुझे इधर-उधर भनक पड़ी कि मेरे जन्मदिन पर खाने-पीने और उपहारों की तैयारियाँ की जा रही हैं। मैं बड़ा हैरान हुआ पचहत्तर वर्ष की आयु तक तो ऐसा भी हुआ नहीं था - अब क्यों?

प्रातः चार बजे जब मैं उठा और स्नानादि करके तैयार हो रहा था कि अचानक देवी करुणामयी मेरे कमरे में आ गयीं। मैंने घूरकर देखा। शायद वह डर गई और प्रणाम करके वापस चली गई। मुझे मौका मिल गया।

अब मैंने तैयार होकर बैग हाथ में लिया और बाहर को चला। आश्रम के मुख्य-द्वार सब बन्द थे। मुझे दीवार से कूदकर बाहर जाना पड़ा और सामने से टैक्सी में बैठा और पालम हवाई-अड्डे पर पहुँच गया और वहाँ से हवाई जहाज़ पकड़ा और मद्रास पहुँच गया।

इधर आश्रम में जब सब लोग उठे तो मैं ग़ायब! दौड़-भाग और ढूँढ़ शुरू हुई। पूछताछ करने पर टैक्सी-स्टैंड से पता लगा कि एक सरदार जी मेरे जैसे हुलिये के आदमी को अभी-अभी पालम हवाई अड्डे पर छोड़कर आये हैं।

पालम हवाई अड्डे पर टेलीफ़ोन करने पर निश्चय हो गया कि मेरा नाम जहाज़ के यात्रियों में है और मैं मद्रास पहुँच चुका हूँ।

अब मद्रास के मित्रों को टेलीफ़ोन पर खटखटाया गया और उनसे कहा गया कि मद्रास हवाई अड्डे पर पहुँचकर मुझे मिलकर ख़बर दें।

मुझे कोई जानता तो था ही नहीं। परन्तु ढूँढ़-ढाँढ़ कर मुझे खोज ही लिया और मुझे बड़ी-बड़ी फूलमालाओं से लाद दिया गया। मैं बड़ा हैरान हुआ। ऐसा तो मेरे साथ जिन्दगी में कभी हुआ ही नहीं था।

इतनी देर में मैं क्या देखता हूँ कि मेरा सबसे छोटा पुत्र विक्टर मुझे गले आ मिला। उसके साथ एक साल पहले से ही साँठ-गाँठ थी कि मैं कभी अचानक आऊँगा और किसी को ख़बर न मिले। परन्तु दिल्ली से पॉडिचेरी को भी टेलीफोनों पर खटखटाया गया और डगमगाया गया कि मैं यहाँ पहुँच रहा हूँ। साल भर पकाया हुआ षड़यंत्र नाक़ामयाब हो गया।

ख़ैर मैं रास्ते में अपनी पुत्री चित्रा के ‘‘कृषि-केन्द्र’’(Agricultural Farm) में उतर गया यह सोचकर कि जन्मदिन पर वहाँ ही एकान्त में रहूँगा।

विक्टर जब आश्रम पांडिचेरी पहुँचा तो घरवाले सब विक्टर से पूछने लगे कि कहाँ हूँ।

जब यह पता लगा कि मैं फ़ार्म पर ही छोड़ दिया गया हूँ तब वे सब लोग जीप में बैठकर फ़ार्म पर आ धमके और मुझे जबदस्ती उठाकर जीप में डाल दिया और आश्रम ले आये। खेल खतम हो गया। और मैं तीन सप्ताह आश्रम में ही रहा।

एक दिन आवाज़ आई कि मुझे फ़ौरन दिल्ली पहुँचना चाहिये जहाँ मेरे परम मित्र महाशय कृष्णचन्दजी मृत्यु-शय्या पर थे। मैं सीधा उनके कमरे में पहुँचा। उन्होंने मुश्किल से कमर उठाई और आँखों में आँसू भरकर मुझे गले लगाया और बोले - कि, ‘‘मैं आपका ही इंतजार कर रहा था।’’ और दूसरे दिन वे चल बसे। यह एक और खेल ख़त्म हो गया।

अब सितम्बर का महीना था! मैंने बेवक़ूफ़ी की कि मैं नवम्बर में भी अस्पताल नहीं पहुँचा। अभी भी मैं ऑपरेशन की टालमटोल कर रहा था।

तेरह दिसम्बर को एकाएक मेरी तकलीफ़ ने रुद्र रूप धारण कर लिया परन्तु डॉक्टर जिन्हें ऑपरेशन करना था - छुट्टी पर थे और उनको 1 जनवरी 1978 को वापिस आना था। मेरे लिए तकलीफ़ भोगने के बगैर और कोई चारा नहीं था।

अब मैं पहली जनवरी को अस्पताल में दाखिल हो गया। ऑपरेशन चार तारीख के लिए निश्चित हुआ था। इन दो-तीन दिनों में हर प्रकार के तमाम टैस्टों से मेरी ख़ूब गत बनाई गई। और चार फरवरी को मुझे ऑपरेशन के कपड़े पहनाकर ऑपरेशन-थियेटर की तरफ भेज दिया गया। अभी मैं दरवाजे तक नहीं पहुँचा था कि पीछे से आवाज़ आई कि ‘‘वापिस आ जायें, ऑपरेशन कैंसिल-स्थगित कर दिया गया है।’’ मुझे बताया गया कि डॉक्टर लोग जाँच-पड़ताल से संतुष्ट नहीं थे। भगवान् की इच्छा।

अब सात दिन तक रोजाना तरह-तरह की जाँच शुरू हो गयी। दिन में दो-तीन बार तो ख़ून ही लिया जाता और दिल की हरकत की जाँचें, गुरदों की जाँच खून का दवाब और न जाने क्या-क्या जाँचें की गयीं। अन्त में मुझे कहा गया कि मैं बाहर कहीं से आई.वी.पी. टैस्ट (I.V.P. Tests) करवाकर लाऊँ। यह तो नयी मुसीबत थी। तीन-चार घण्टे मुझे ऐक्स-रे मेज पर घुमाया गया। दस-ग्यारह फ़ोटो ली गयीं। खाना-पीना रात से ही बन्द कर रखा था।

अब ऑपरेशन की तारीख़ ग्यारह जनवरी निश्चित हुई और मुझे पहले नम्बर पर रखा गया। उससे पहले दिन अट्ठारह डॉक्टर एकदम मेरे कमरे में आ घुसे। हँसी-मजाक में बतलाने लगे कि ‘‘हम सब लोग अलग-अलग विशेषज्ञ हैं, फेफड़े, खून, नाड़ी-दबाव, दिल गुरदे, चीर-फाड़ और बेहाशी पर क़ाबू रखने वाले। हमारे साथ सीखने वाले विद्यार्थियों की एक परीक्षा भी होगी।’’

तो मैंने कहा - ‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है फिर मेरे लिए तो वहाँ जगह ही नहीं होगी।’’ तो एकदम सब लोग ठहाका लगाकर हँसने लगे और कहने लगे कि ‘‘जनाब आपके लिए तो मेज़ अलग से निर्धारित (Reserve) की हुई है। उस पर केवल आप ही लेटे होंगे। हम लोग तो इधर-उधर खड़े ही होंगे।’’

मैं सोचता ही रह गया कि यह सब भगवान् की विशेष कृपा मेरे ऊपर ही क्यों है? क्या कारण है - कि ये सब लोग इतना प्यार-मोहब्बत इतनी देखभाल व इतना लिहाज़ कर रहे हैं। बड़े डॉक्टर दिन में दो बार स्वयं मेरे पास आते और मुझे हर तरह की तसल्ली देते ताकि कोई त्रुटियाँ या जोखिम न रह जाये। यहाँ तक कि इतवार की छुट्टी वाले दिन भी यह सर्जन-डॉक्टर (Surgeon-Doctor) प्रोफ़ेसर सुरेन्द्र मानसिंह सीधे घर से मेरे पास आये और मुझे कहने लगे कि ‘‘मैं ख़ास तौर पर आया हूँ कि आप किसी प्रकार की चिन्ता न करें। हम पूरी तरह से जिम्मेदार हैं।’’

केवल इतना ही नहीं, न मालूम क्यों मेरे पुत्र-पुत्रियों को मेरे लिए इतना ख्याल हुआ कि ऑपरेशन के बाद दो ख़ास नर्सें (Nurses) दिन व रात के लिए अलग-अलग रखी जायें। उसी समय चमत्कार हो गया कि मेरी प्यारी बेटी चित्रा श्रीअरविन्द आश्रम पांडिचेरी से आ पहुँची और दोनों नर्सों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली।

चित्रा के आने की पहले से कोई ख़बर नहीं थी परन्तु दो मिनट पहले ही मैंने करुणा जी जो मेरी देखभाल कर रही थीं उनसे कहा कि ‘‘चित्रा आ रही है। लिफ़्ट में है या बाहर बरामदे में है।’’ उसी समय चित्रा अन्दर आ गई।

दो दिन के बाद एक डॉक्टर मेरे कमरे में आये और पूछने लगे कि ‘‘आपके लिये ख़ून कौन देगा? इस फ़ार्म में उसका नाम लिखना है।’’ चित्रा फ़ौरन बोल उठी -मेरा नाम लिखिये मैं इसीलिए तो आई हूँ।’’ और तुरन्त ही वह नीचे ब्लड-बैंक (Blood Bank) में चली गयी और बोतल भर ख़ून दे आयी। वहाँ भीड़ लगी थी लोग अपने रिश्तेदारों के लिए भी खून देने में डर रहे थे और चीख़ पुकार कर रहे थे। चित्रा को बहादुरी से ख़ून देते देखकर कई लोगों की खून देने के लिए हिम्मत बढ़ गई।

बुधवार का दिन था 11 जनवरी 1978। मुझे ऑपरेशन-टेबल पर लिटा दिया गया और मैं बेहोश हो गया। मुझे कुछ पता नहीं कि कब क्या हुआ जब तक मुझे झटके देकर डॉक्टरों ने ज़ोर से पुकारा नहीं कि -जौहर साहब उठें। ऑपरेशन हो गया है।’’ और थोड़ी ही देर बाद मुझे साथ के कमरे में भेज दिया गया। न मुझे कोई तकलीफ हुई, न कोई दर्द, न कोई बे-आरामी ऑपरेशन के कारण। ऐसा तो कभी किसी को हो ही नहीं सकता। यह तो चमत्कार था। परन्तु मुझे बुरी तरह हिचकी लग गई जिसने मुझे बहुत दिनों तक परेशान किया।

20 जनवरी को मुझे आवाज आई और मैंने प्रोफेसर सुरेन्द्र मानसिंह को छुट्टी के लिए मजबूर किया। उन्होंने खुशी से मान लिया और मुझे आश्रम आने की आज्ञा दे दी। अब मैं अपने स्थान में हूँ।

यह है कहानी भागवत कृपा की जिसने मुझे रोग से मुक्त कर दिया ताकि मैं माताजी की जन्म-शताब्दी ख़ुशी से मना सकूँ और माताजी के गुण गा सकूँ।