माताजी ने मुझे लूट लिया
अभी मैं जवान हुआ ही था- बीस-इक्कीस वर्ष की आयु होगी। मैंने व्यापार में पाँव रखा। बगैर एक पैसा की पूँजी के। प्रतिदिन घर-घर जाकर बीस-पच्चीस रुपये उधार माँग लाता उससे व्यापार करता और फिर वायदे के मुताबिक उधार देने वालों को उनका रुपया लौटा आता। यह एक चक्र सा बन गया था।
धीरे-धीरे व्यापार में प्रगति हुई और एक दिन किसी सौदे के लिए एकदम मुझे सौ रुपये की जरूरत पड़ गई। परन्तु इतनी बड़ी राशि मुझे देता कौन? और कैसे ऐतबार करता? दुविधा हो गई। बहुत अच्छा सौदा हाथ से जाता दिखाई देने लगा।
हारकर निराश होकर जब मैं रात को सोने लगा तो भगवान् से प्रार्थना की - ‘‘हे भगवान्! मेरी दशा पर दया करें कि कहीं पर मुझे सौ रुपये पड़े मिल जायें क्योंकि इतनी बड़ी रकम मुझे उधार तो कौन देगा! मैं आपके नाम पर दस रुपये का प्रसाद चढ़ाऊँगा।’’ यह प्रार्थना करते-करते मैं बेहोश होकर सो गया।
प्रातः अंधेरा ही था तो मैं उठकर अपनी रिहायश के सामने के बाग में एक कोने से दूसरे कोने तक एक प्रकार से उसकी छानबीन करने लगा।
उस जमाने में ऐसे बाग प्रायः नहीं हुआ करते थे। और शहर के बहुत से रईस व अमीर लोग गर्मी के दिनों में हवा खाने के लिए इस बाग में हवाखोरी को आया करते थे। ठंडी घास पर बैठते थे और लोट लगाया करते थे।
वाह रे भगवान्!
क्या तेरी लीला है! एक बटुवा वहाँ पड़ा मिल गया। किसी की जेब से निकल गया होगा। मैंने उसको झपटकर उठाया और उसको बेसब्री से एकदम खोला तो उसमें सचमुच काफी रुपये थे। मुझे सौ रुपये का पूरा यकीन था। परन्तु जब गिने तो नब्बे ही निकले। मैंने कहा-‘‘भगवान्! तुम बहुत कृपालु तो हो परन्तु होशियार भी बहुत हो। अपना कमीशन पहले ही रख लिया कि कहीं मैं मुकर न जाऊँ। लालच में आकर प्रसाद ही न चढाऊँ और नब्बे की बजाए सौ रुपये ही बिज़नैस में लगा दूँ।’’
तब से धीरे-धीरे मेरा व्यापार जमने लगा और मैं भगवान् को विश्वास दिलाने लगा कि मैं तुम्हारे साथ कभी धोखा नहीं करूँगा। सदा तुम्हारा कृतज्ञ और आभारी रहूँगा। भगवान् की कृपा चलती रही, बढ़ती रही और मुझे लोग सौ-सौ, दो-दो सौ और धीरे-धीरे पाँच-पाँच सौ का भी उधार देने लगे। उसके बहुत बाद तक भी मेरा सम्पर्क आश्रम से नहीं था और न कभी मैंने आश्रम या श्रीअरविन्द और माताजी का नाम ही सुना था।
आश्रम में प्रवेश के कुछ समय पश्चात् मैंने अपने व्यापार का सारा किस्सा हँसी-हँसी में माताजी को सुनाया और बतलाया कि ’’मेरे पास पूँजी होती नहीं और आदत मेरी ऐसी है कि अपनी हैसियत और शक्ति से बाहर ही हर समय व्यापार करता रहता हूँ और इसका परिणाम यह होता है कि मैं हर समय ही कर्ज व चिन्ता में दबा रहता हूँ और व्यापार के लिए धन की आगे से आगे जरूरत बनी ही रहती है।’’
माताजी ने सहज स्वभाव में कहा - ’’अब मैं तुम्हारे साथ हूँ तुम्हारी आवश्यकताएँ हमेशा पूर्ण होती रहेंगी और तुम्हें कोई चिन्ता नहीं रहेगी। तथास्तु।’’
परन्तु मुझे क्या मालूम था कि इसमें भी भगवान् की कोई चाल है! धीरे-धीरे माताजी ने मेरे ऊपर काबू पा लिया और हिस्सेदार बन गयीं। तब भी मैंने सबर किया कि जाने दो। परन्तु हुआ क्या कि मेरे ऊपर हर प्रकार से पूरा कब्जा कर लिया। यहाँ तक कि मेरी बीबी-बच्चों को भी छीन लिया और मुझे पूरी तरह से लूट लिया।
मेरे पास कुछ भी नहीं छोड़ा और मुझे अपना गुलाम बना लिया।
और
मुझे मुक्त करके सब कुछ दे दिया।