चाचा जी की आत्मकथा
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अतिमानव


मैं आश्रम के वातावरण में सब लोगों से यह सुनता आ रहा था कि मनुष्य भगवान् की सृष्टि के विकास-क्रम में अन्तिम कड़ी नहीं है। सृष्टि के विकास-क्रम में एक नयी नस्ल आयेगी जो अतिमानव कहलायेगी। यह सब सुन-सुनकर मैं बहुत परेशान हो रहा था, दुविधा और उलझन में पड़ा हुआ था। इसलिए न तो मुझे कुछ समझ में आता था और न कुछ विश्वास होता था।

मैं बार-बार माताजी से पूछता था और माताजी थोड़ा-थोड़ा करके मुझे समझाने की कोशिश कर रही थीं। एक दिन माताजी ने मुझे काफ़ी लम्बे समय और देर तक समझाया कि यह नयी मनुष्य जाति धरती पर आयेगी। मैंने बेचैन होकर पूछा कि -‘‘यह नयी मनुष्य जाति कब तक आ जायेगी?’’

माताजी ने समझाया कि-‘‘अब तक तो सृष्टि का विकास प्रकृति कर रही थी और मनुष्य को यहाँ तक पहुँचाने में प्रकृति को लाखों साल लग गये हैं। परन्तु अब मनुष्यजाति को बुद्धि और मन दिया गया है यदि मनुष्य यह समझ जाए कि यह जाति पूर्ण नहीं है और इसकी पूर्ण होने की आवश्यकता है।-मनुष्यजाति में यह चेतना और तड़प आ जाए, इस आवश्यकता के लिए मनुष्यजाति सचेतन रूप से चिन्तन और सक्रिय प्रयास करे-नयी जाति को लाने में और भगवान् के साथ उस विकास-क्रम में पूरा प्रयास व सहयोग करे-तब तीस हज़ार साल में नयी जाति आ सकती है। परन्तु यदि मनुष्य बे-ध्यान, अनभिज्ञ और उदासीन बना रहे तब प्रकृति अपना क्रम और रास्ता लेगी। उस अवस्था में उसमें लाखों वर्ष लग सकते हैं और पिछड़ने का खतरा भी हो सकता है।

‘‘उस सूरत में उस दौरान दुःख व कष्ट कौन भोगेगा? केवल यह मनुष्य ही। आशा है तुम कुछ समझ गये होगे।’’