चाचा जी की आत्मकथा

9. ख़िलाफ़त मूवमेंट और हिन्दू-मुस्लिम एकता · Part 2 of 3

स्वामी श्रद्धानन्द की हत्या


सन् 1926 में स्वामी श्रद्धानन्द की नया बाजार (आज के श्रद्धानन्द बाजार) में हत्या कर दी गयी। उनको उनकी रोगशय्या में उस व्यक्ति द्वारा गोली मार दी गयी जिसने उनसे भेंट करने के लिये अनुमति भी ले ली थी। संभवतः यह हत्या पैग़म्बर पर लिखी गयी किसी लेखक की अनादरपूर्ण व्याख्या युक्त पुस्तक की प्रतिक्रिया में उभरी कट्टरतापूर्ण प्रकोप लहर का एक हिस्सा थी। इसके लेखक को कानूनी कार्यवाही के तहत तो बरी कर दिया गया था किन्तु किसी धर्मांध द्वारा लखनऊ में उसकी भी हत्या कर दी गयी।

जैसे कि मैंने पहले बताया कि तब मैं लाला दीवान चंद जी के पास जो कि आर्यसमाज के नेता थे, काम करता था। उन्हें दफ़्तर में अचानक संदेश मिला कि स्वामी जी की गोली मार कर हत्या कर दी गयी है। ज्यूँ ही उनको संदेश मिला तब मैं वहीं था सो मैं तो एकदम घटना-स्थल की ओर दौड़ पड़ा। मैं वहाँ लाला दीवान चंदजी से भी आगे पहुँच गया जो कि मोटर कार से आये थे। उस समय वहाँ घटनास्थल पर मुश्किल से तीन या चार ही व्यक्ति थे। स्वामी जी के हत्यारे को पकड़ लिया गया था और उसको बिना किसी मारपीट के या चोट पहुँचाए घोर संयम से बस थामे रखा गया था जो कि वहाँ पर इकट्ठे हुए आर्यसमाज के नेताओं की इच्छा का सम्मान करने में था। उसका नाम था अब्दुल रशीद। वह दुबला-पतला लम्बे कद का आदमी था जिसने धारीदार कपड़े पहने हुए थे। उसके चेहरे पर गुस्सा भरा हुआ था जिससे कट्टरपन झलक रहा था। स्वामी श्रद्धानन्द ख़ून के कुण्ड में पड़े थे और पुलिस ने उस स्थान की घेराबन्दी कर दी थी। मैं वहाँ लगभग चार-पाँच घंटे रहा। ऐसा लगता था कि स्वामी जी के शरीर में एक नहीं कितनी ही गोलियाँ दाग़ी गईं थीं। पुलिस वहाँ खाली कारतूसों को ढूँढ़ने में लगी थी। मुझे भी कोने में पड़े दो-तीन कारतूस मिले जिन्हें मैंने पुलिस के हवाले कर दिया। सो मेरा नाम भी ‘स्वामी श्रद्धानन्द हत्या केस’ में बतौर गवाह के लग गया और मुक़दमें के दौरान तीन या चार बार गवाही देने के लिये मुझे अदालत में पेशी के लिये बुलाया भी गया।

स्वामी जी की शवयात्रा का जुलूस फ़सील यानी शहर-दीवार के दायरे में बसे दिल्ली शहर के हर हिस्से में ले जाकर घुमाया गया। उन दिनों में फ़सील की हद के बाहर वास्तव में कोई शहर ही नहीं था- कोई आबादी नहीं थी। यह मेरे जीवन भर के देखे हुए सबसे अधिक विशाल जुलूसों में से एक था। स्वामी जी के शव को एक ट्रक पर ऊपर उठाकर ऊँचाई की स्थिति में रखा गया जिससे कि लोग अपने घरों की छतों पर से भी उन महात्मा के अन्तिम दर्शन कर सकें। मैंने देखा कि समूचा दिल्ली शहर स्वामी जी की हत्या से गहरे शोक में डूब गया था और उसमें क्रोध का कोई उफ़ान नहीं था। समूची शवयात्रा का भव्य जुलूस दिल्ली के गली, कूचों और बाज़ारों में से होकर शान्तिपूर्वक निकला बिना किसी नागवार घटना के घटे।

जुलूस मुस्लिम इलाक़ों के बीच से भी होकर गुज़रा जैसे लालकुआँ, सिरकीवालान आदि क्योंकि यदि कोई भी नया बाज़ार से आयें तो यही एक रास्ता बनता है। पुराना शहर तो सफ़ील नगर-प्राचीर के भीतर ही समाया था- चाँदनी चौक, चावड़ी बाजार, लालकुआँ और फ़तहपुरी। इन्हीं गलियों व मुहल्लों में हज़ारों की संख्या में मुस्लिम व हिन्दू लोग आपस में प्रेम और सद्भाव के साथ मिलजुल कर रहते थे। मैं भी तो एक मुस्लिम आबादी में ही निवास करता था- गली क़ासिम जान। मेरा अहसास तो यही था कि मुस्लिम लोगों के दिलों में स्वामीजी के खिलाफ़ कोई दुर्भावना नहीं थी। वे तो उनका बहुत ऊँचे भाव से सम्मान करते थे। यह तो काफी स्पष्ट ही नज़र आ रहा था जब कि उन्होंने स्वामीजी को जामा मस्जिद के पाक मिम्बर से प्रवचन देते सुना था जहाँ से कभी भी किसी भी अन्य धर्म के मानने वाले को बोलने की इजाज़त नहीं मिली थी। यह तो केवल धर्मांधता का कट्टरपन था जिसको स्वामीजी की हत्या का दायित्व जाता है।

साइमन कमीशन का बायकॉट: दिल्ली में

1928 में जब साइमन कमीशन दिल्ली में आया तो गाँधीजी के आह्नान के फल-स्वरूप उसका ‘बायकॉट’ किया गया। एक विशाल जुलूस निकाला गया और मैं उस जुलूस में कॅनॉट प्लेस में था जो कि एक महत्वपूर्ण क्षेत्र था।

‘साइमन कमीशन वापस जाओ।’

‘वापस जाओ, साइमन कमीशन।’

‘गो बैक साइमन कमीशन।’

‘साइमन कमीशन गो बैक।’

गगन भेदी के नारे थे जो लोगों द्वारा - जनता द्वारा बुलंदी से गुँजाये जा रहे थे जिसके द्वारा वे अपना रोष एवं नाराज़गी प्रकट कर रहे थे। यह तो जनता का सहज स्वतःस्फूर्त्त आन्दोलन था जो कि सारे राष्ट्र में विद्युत गति से फैला था और बहुत ही शक्तिशाली था। उन दिनो मैं तो एक साधारण दीन-हीन स्वयंसेवक ही था। हाँ मुझमें एक आग थी और मैं सुस्त नहीं बैठ सकता था। मैं शहर में अकेला ही रहता था और तब मेरी कोई ज़िम्मेदारियाँ भी नहीं थीं। जब भी राष्ट्रीय आन्दोलन से संबंधित कहीं कोई काम होता तो मैं वहाँ चला जाता और वॉलंटियर-स्वयंसेवक के नाते उसे निबटा आता।

विदेशी कपड़ों का बॉयकॉट - बहिष्कार

1930 से पहले ही महात्मा गाँधी जी ने विदेशी कपड़ों के बहिष्कार का बुलंदी से आह्नान किया था और हाथ के कते-बुने कपड़े- खादी के प्रयोग की पुकार-गुहार लगायी थी। समर्पित लोगों में से कुछ ने तो खादी पहनना शुरू भी कर दिया था। सन् 1930 में विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करने वाले प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक मैं भी था जिन्होंने दिल्ली में विदेशी कपड़ों का जमकर बॉयकॉट किया-करवाया। उन दिनों इसकी नेता थीं ‘बहन सत्यवती’ जिन्हें गाँधीजी ने उपनाम दिया था, ‘तूफ़ानी सत्यवती’। वह स्वामी श्रद्धानन्द जी की पोती थीं। उनके तूफ़ानी गति के तेज और वीरतापूर्वक नेतृत्व में यह प्रोग्राम चलता था। हम वॉलंटियरों का-स्वयंसेवकों का एक बड़ा समूह और शक्तिशाली संगठन था जो इस बात की पूरी निगरानी रखता था कि कपड़े के व्यापारी विदेशी कपड़ा बिल्कुल भी विक्रय न कर सकें - बेच न सकें।

हमनें विदेशी कपड़ों का बॉयकॉट समूचे चाँदनी चौक के सभी कटरों में कारगर ढंग से प्रभावी बनाकर प्रायोजित कर लिया था। यह ही विदेशी कपड़ों की थोक व परचून बिक्री का बाजार था। उस समय हम दुकानदारों को जाकर कहते थे कि “या तो आप अपना कपड़ा उठाकर अपने घर ले जाइयें नहीं तो हम स्वयं आप के सामान को सील कर देंगे।” तब हम उनको उनका विदेशी कपड़ों का माल दूसरे शहरों में भी बिक्री के लिये कहीं भी नहीं भेजने देते थे क्योंकि थोक बिक्री के लिये विशेषकर विदेशी कपड़ों की मण्डी तो दिल्ली ही थी। हम पूरे चौकस रहते थे और हमारा नियमित संस्थागत संगठन था जो पूरा नियंत्रण रखता था- रोकथाम रखता था और देखता था कि हमारे आदेशों व आर्डरों की हुकुमउदूली या अवज्ञा कोई न करे। हमारा अपना ख़ुफ़िया तंत्र भी होता था जिसके द्वारा हमें गुप्त सूचनायें प्राप्त होती रहती थींकि कब व्यापारियों ने कपड़ा निकाला और कब रेलवे स्टेशन भेजा और तभी हम मुस्तैदी से जाकर ज़ब्त/सील किये हुए माल को घेरकर कब्ज़ा कर लेते थे और अपनी सील/ मोहर लगा कर हमारे अपने गोदामों में कर देते थे।

हमारी अपनी कोर्ट एक नियमित किन्तु ग़ैर-सरकारी अदालत ‘पंचायत’ का भी संगठन कर लिया गया था जिसमें लाला नारायण दत्त ठेकेदार, श्री प्यारेलाल जिन्हें ‘मोटरवाला’ नाम से जाना जाता था और थोड़े से अन्य व्यक्ति भी थे जो इसके माननीय मैंम्बर थे। जो कोई भी हमारे क़ायदे-कानून तोड़ता था और विदेशी कपड़ों की बिक्री करता हम उसे गिरफ़्तार कर लेते और उसे ‘पंचायत’ के समक्ष पेश कर देते। जुर्माने की रकम नियम के अनुरूप घट-बढ़ कर विविधता लिये होती थी। यदि माल की मात्रा थोड़ी होती तो जुर्माना एक सौ से दौ सौ रुपये तक होता था। यदि किसी ने एक या दो ‘बेल’.गट्ठे बेच दिये तो उसके लिये जुर्माने की रकम एक हज़ार रुपये तक देनी पड़ती थी। सबसे भारी जुर्माना जो कभी भी किसी पर ठोंका गया वह किन्हीं श्री जयपुरिया महोदय पर था। इन पर दस हज़ार रुपये का दण्ड नियत किया गया था जिसे अदा करने से उन्होंने साफ़ इन्कार कर दिया। तब मैं तेरह महिला स्वयं सेविकाओं की टोली लेकर उनके बंगले पर पहुँच गया और उनसे जुरमाना भरने को कहा। साथ ही यह भी कहा कि ये महिलाएँ उनके बंगले पर धरने पर बैठ जायेंगी और फिर भूख-हड़ताल कर देंगी। तब जो भी इसके अंजाम होंगे परिणाम होंगे उसकी जिम्मेवारी उन्हीं की होगी। लाला जी ने मुझे दो बार धमकी दी कि वे हमें गोली से उड़ा देंगे। नहीं तो मुझे तो अवश्य ही गोली मार देंगे। मैंने कहा, “मुझे अपने जीवन की परवाह नहीं है। हमें तो पंचायत के फैसले के मुताबिक़ जुर्माने की रक़म उगाहनी ही उगाहनी है। इसलिये ही तो हम यहाँ आये हुये हैं।” प्रतिदिन मुझे वहाँ दो-तीन बार उन महिला स्वयं .सेविकाओं के सत्याग्रह का निरीक्षण करने को जाना पड़ता था। उन्होंने पुलिस में अपनी ‘पहुँच’ भी निकाली। परन्तु फिर उनकी समझ में आ गया कि इस प्रकार तो मामलात और भी नाज़ुक मोड़ ले लेंगे। आख़िरकार हमने उनके मकान का घेराव किया और चाहे हमारी महिला स्वयं .सेविकाओं को तेरह-चौदह दिन तक भी धरने पर क्यों न रहना पड़ा परन्तु लालाजी से पूरा दस हज़ार रुपए का जुर्माना वसूल किया गया।

इस भाँति हमने कुछेक लाख रुपया जुर्माने के तौर पर इकट्ठा किया था। सन् 1930 के आन्दोलन में यह गतिविधि लगभग छः महीने या कुछ अधिक समय तक सरगर्मी से चली।