मेरा भाग्य
सारी आयु मेरे साथ क्या बीती, एक दिलचस्प कहानी है परन्तु दर्दनाक। इसको लिखने के लिए हज़ारों पन्ने चाहिये, परन्तु कर्मधारा के सम्पादक बड़े कठोर हैं। कहते है ‘आजकल’ एक ही कॉलम का होना चाहिये। तो उसमें ...... साँस भरके बतलाता हूँ।
मैंने बनाया एक कन्ट्रीहोम दिल्ली शहर से बहुत दूर एक गाँव के पास। बनाते समय राजा-महाराजाओं के महलों का ख्वाब देखता था। कभी एक दीवार बनाता तो दूसरे दिन गिरा देता। फिर हटाकर बनाता फिर गिरा देता। कोई नक़्शा नहीं। कोई आर्किटेक्ट नहीं, कोई इंजीनियर नहीं, कोई सलाहकार नहीं। पहले तो एक बहुत बड़ा दरबार-हॉल बनाया। उसमें गोल और चौरस खम्भे (Pillers) लगाये। दरबार-हॉल के एक पहलू में दीवान लगाया, कालीन बिछाये। सोचता रहता था कि एक ओर तो वे लोग बैठैंगे जो मेरे साथ बातचीत करते होंगे और दूसरे पख में इन्तज़ार करने वाले बैठे होंगे। एक तरफ तो निजी सचिव (Private Secratry) बैठै होंगे, चोबदार खड़े होंगे, घण्टियाँ लगी हुई होंगी। इस दरबार हॉल के अन्दर से ही तहखाने में जाने का रास्ता। वहाँ आराम करने के लिए पलंग और धन-दौलत हीरे-जवाहरात रखने के लिए तिजोरियाँ और ज़मीनदोज़ लोहे की सन्दूकें। फिर दरबार-हॉल के अन्दर से ही ऊपर जाने का रास्ता। दरबार-हॉल के चारों तरफ तरह-तरह के कमरे, बरामदे, बुखारचे। ऊपर की मंज़िलों में ऊँचे-नीचे, अन्दर-बाहर हर अलग-अलग मौसम में काम आने वाले कमरे, मेहमानों के लिए अलग व्यवस्था और बाहर से ज़ीना। रंग-बिरंगे तरह-तरह की डिज़ाइन के फर्श (Terrazo) ।
यह भावना और अभिप्राय महल (Country Home) का चित्र खींचना नहीं है, उसके लिए तो पूरी किताब चाहिये। तात्पर्य यह है कि कई साल मेहनत और तपस्या के बाद जब यह सब बन चुका तो भगवान् को पसन्द आ गया और ख़़ुद आकर अन्दर बैठ गये और कब्ज़ा कर लिया। मेरे जीवन के स्वप्न और ज़िन्दगी की उम्मीदें धरी-की-धरी रह गयीं। दीवारों में तिजोरियाँ और ज़मीन में लोहे की सन्दूकें गड़ी-की-गड़ी रह गयीं। कभी सोचता हूँ कि इनको तो खोद निकालूँ और बेच खाऊँ। भागते चोर की लंगोटी ही सही।
उन्होंने मुझसे कहा कि,‘तुम बाहर खड़े रहकर घण्टी बजाओ और गेट-कीपरी करो।’ और तब से वही कर रहा हँ। यदि इतवार न हो तो यहाँ आकर साक्षात् देख लें।
अब बतलाइये यह भी कोई बात हुई? यह कोई इन्साफ़ है? अगर मुझ से घण्टी ही बजवानी थी और गेट-कीपरी करवानी थी तो महल बनाने का बोझ मुझ पर क्यों लादा? वे ख़ुद बना लेते और बाद में मुझे चौकीदार रख लेते।
यह है मेरा भाग्य! परन्तु क्या इससे भी कोई और बड़ा भाग्य हो सकता है?