हमारे प्रिय चाचा जी
हमारे प्रिय चाचा जी
श्री सुरेन्द्रनाथ जी जौहर ‘फ़क़ीर’
13 अगस्त, 1903 को वहाली जिला जेहलम पंजाब (जो अब पाकिस्तान में है) में जन्म। माँ का नाम भायाँ देवी और पिता का नाम लाला काहनचन्द जो पंजाब के महकमा वन्दोवस्त में गिरदावर कानूनगो थे।
लाहौर के दयानन्द एंग्लो वैदिक हाई स्कूल में शिक्षा दीक्षा, इसके पश्चात् डी0ए0वी0 कॉलेज में प्रवेश। सन् 1920 में महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन के आवाहन पर कॉलेज की पढ़ाई का परित्याग किया और खाली हाथ दिल्ली आ गये।
दिल्ली आकर आर्य समाज व देश के स्वाधीनता संग्राम में जी जान से जुट गये तथा खिलाफत आन्दोलन, साइमन कमीशन का बहिष्कार, स्वदेशी आन्दोलन, विदेशी कपड़ों के बहिष्कार में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। सन् 1930 में लाहौर काँग्रेस के अधिवेशन में उन्होंने भाग लिया तथा देश की राजधानी दिल्ली में अपने अमित साहस, शौर्य, कौशल व सूझ-बूझ के बल पर चाँदनी चौक में घण्टाघर के पास 50000 विशाल जन-समूह के बीच पूर्ण स्वराज का प्रतिज्ञा पत्र पढ़ा और उपस्थित जन समुदाय से पढ़वाया। पकड़े जाने पर विभिन्न अभियोगों में इन्हें पाँच वर्ष तीन माह के सश्रम कारावास की सजा हुई। उन्हें मुलतान जेल में रखा गया, जहाँ पर दारुण यातनायें दी गईं। अन्त में गाँधी-इरविन समझौते के अंतर्गत इनकी रिहाई हुई।
दिल्ली चाचाजी की कर्मभूमि रही, जहाँ अपने जीवन अस्तित्व के लिये इन्हें बहुत कठिन संघर्ष करना पड़ा। इस जीवन संघर्ष में कितनी ही रातें उन्होंने फुटपाथों पर गुजारीं, दूसरों के घर झाडू लगायी, जूठे बर्तन धोये, टहल चाकरी की और दर-दर ठोकरें खाईं। लेकिन हिम्मत न हारी और निरन्तर प्रयासों में जुटे रहे। अन्त में अपने कठिन परिश्रम, साहस, धैर्य और पुरुषार्थ के बल पर एक-एक तिनका जोड़कर उन्होंने बसन्त पंचमी के अवसर पर सन् 1926 में एस0एन0 संडरसन एण्ड कंपनी की स्थापना की। कालान्तर में यह उद्योग संस्थान खूब फूला-फला और इसका जाल देश के कोने-कोने में फैल गया।
सन् 1926 में श्री जौहर साहब का विवाह दयावती जी के साथ हुआ और वे उनकी सहधर्मिणी बनीं। देश की आजादी की लड़ाई में दयावती जी भी पीछे नहीं रहीं। सविनय अवज्ञा आन्दोलन के तहत चाँदनी चौक में महिलाओं के एक जुलूस का नेतृत्व करती हुई वे 12 अक्टूबर, 1932 को गिरफ्तार हुईं और लाहौर के सेंट्रल जेल में छः माह रहीं।
भारत छोड़ो आन्दोलन में श्री सुरेन्द्रनाथ जी जौहर ने भूमिगत होकर हिस्सा लिया और अँग्रेजों की नींद हराम कर दी। पुलीस की एक भिड़त में इन्हें गोली मार देने का आदेश हुआ लेकिन वीर जौहर ने पिस्तौल सब इंस्पेक्टर के हाथ से छीन ली और एस0पी0 सहित उसे बन्दी बना लिया। इस पर षड़यंत्र रचकर उनके ऊपर हत्या के अनेक झूठे अभियोग लगाये गये, जेल में उन्हें अमानुषिक यंत्रणायें दी गईं लेकिन अन्त में वहाँ से भी वे निर्दोष मुक्त हुये।
दिसम्बर 1939 में भारत दर्शन यात्रा के दौरान नियति उन्हें पांडिचेरी ले गई। पांडिचेरी में उन्होंने श्रीमाताजी का दर्शन किया जहाँ उन्होंने ‘‘अपना हृदय खो दिया और अपने जीवन का सब कुछ पा लिया।’’
अब उनके जीवन का खेल निश्चित हो गया। वे भगवान् द्वारा चुन लिये गये और उनके सभी कार्य भगवान् द्वारा ही परिचालित होने लगे। उन्होंने अपनी आत्मा, धन-सम्पत्ति, घर-बार, परिवार, देश की सेवा और अपना सबकुछ श्रीमाँ और श्रीअरविन्द के चरणों में निछावर कर दिया और भगवान् को प्राप्त कर लिया।
श्रीमाताजी की अनुमति एवं आशीर्वाद से 12 फरवरी, 1956 को श्री चाचाजी के समर्पित गृह में श्रीअरविन्द आश्रम दिल्ली की विधिवत् स्थापना हुई और दिनाँक 23 अप्रैल, 1956 को मातृ अन्तर्राष्ट्रीय विद्यालय का उद्घाटन।
दिनाँक 5 दिसम्बर, 1956 को पहली बार यहाँ भारत के दिल दिल्ली में श्रीअरविन्द के पावन देहावशेष स्थापित हुये। इस अवसर पर श्रीमाताजी ने अपने आशीर्वाद-सन्देश में कहा कि ‘‘यह स्थान अपने नाम के अनुरूप बने तथा श्रीअरविन्द की शिक्षा व सन्देश की सच्ची भावना को विश्व के समक्ष अभिव्यक्त करे।’’
आश्रम और विद्यालय की स्थापना के पश्चात् चाचा जी ने इसके विकास के लिये रात-दिन एक कर दिया, सुबह 4 बजे से रात 10 बजे तक वे काम में बराबर जुटे रहते थे। वे अपने आपमें एक मजदूर, मिस्त्री और इंजीनियर सबकुछ थे। आश्रम के विस्तार के लिये दिल्ली जैसी घनी आबादी में उन्होंने 29 एकड़ भूमि की व्यवस्था की और आवश्यकतानुसार उसमें अनेक भवनों का निर्माण किया। आश्रम में उन्होंने शब्द, मीरा नर्सरी स्कूल, मातृ अन्तर्राष्ट्रीय विद्यालय, मातृ कलामन्दिर, मातृ प्रेस, मातृ डिपार्टमेण्ट स्टोर, हस्तशिल्प कागज और गौशाला आदि अनेक विभागों की स्थापना की। 15 अगस्त, 1959 को एक भव्य समारोह के बीच उन्होंने राष्ट्रपति भवन में श्रीअरविन्द के एक तैलचित्र की स्थापना कराई तथा आश्रम से जुड़ी हुई सड़क का नाम ‘श्रीअरविन्द मार्ग’ कराया।
अपने जीवन के आखिरी दो दशक उन्होंने नैनीताल में हिमालय की एक चोटी वननिवास में श्रीअरविन्द आश्रम के निर्माण में लगाये। यह बहुत ही टेढ़ी खीर का काम था लेकिन कुछ ही वर्षों में अपने दुर्दान्त परिश्रम और तप के बल पर उन्होंने वहाँ 200 लोगों के आवास की समुचित व्यवस्था कर दी साथ ही बड़े-बड़े शिविरों के लिये वहाँ भोजनालय, सभाकक्ष और ध्यानकक्ष आदि भी तैयार कर दिये।
‘बसन्त’, ‘अदिति’, ‘श्रीअरविन्द कर्मधारा’ और ‘काल बियांड’ नामक पत्रिकाओं के प्रकाशन से उन्होंने श्रीअरविन्द और श्रीमाँ की चेतना का विस्तार किया। उनकी ‘मेरी माँ’ नामक पुस्तक श्रीमाताजी के संस्मरणों का एक अमूल्य दस्तावेज है। इसी तरह अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनके ज्ञान का अनमोल खजाना भरा पड़ा है।
चाचाजी एक पारखी व्यक्ति थे। एक्सरे जैसी उनकी अंतरभेदी दृष्टि थी और व्यक्तित्व चुम्बकीय था। जो भी व्यक्ति उनके सम्पर्क में आया वह सदा के लिये उन्हीं का बनकर रह गया। हँसना और हँसाना उनके जीवन का एक अंग रहा है, अपनी खुशियाँ उन्होंने लोगों में बाँटी। अपनी साधना, त्याग और तप के बल पर उन्होंने अगणित लोगों को प्रेरणायें दीं और उनका मार्गदर्शन किया।
अपने जीवन के अंतिम दशकों में वे कई असाध्य बीमारियों से ग्रस्त रहे। लेकिन कोई भी कठिनाई उनके संकल्प को डिगा नहीं सकी और अपनी अंतिम श्वाँस तक वे बराबर भागवत कार्यों में लीन रहे। अंत में दिनाँक 2 सितम्बर, 1986 को उन्होंने अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया और उनकी चेतना सदा के लिये श्रीमाँ की चेतना में विलीन हो गयी।