इन कहानियों के विषय में
बात सन् 1982 के फरवरी महीने की है जबकि हमारे पूज्य चाचा श्री सुरेन्द्रनाथ जी जौहर ‘फ़क़ीर’ अपनी मण्डली के साथ माँ मन्दिर में थे। इस मण्डली में कुल सात व्यक्ति थे। जिसमें ईरान के दो युवा नागरिक हमीद और सितारे भी थे। हमीद उन दिनों आई.आई.टी. दिल्ली में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे थे जबकि सितारे जी कैम्ब्रिज की स्नातक और उच्चकोटि की चित्रकार थीं। यह पूरी मण्डली आठ दस फीट की एक तंग कोठरी में मौज-मस्ती के साथ पूरे सात दिन रही और चाचा जी के सत्संग का आनन्द उठाती रही।
उसी बीच एक दिन चाचा जी को सुनने के लिये रीवा नगर के बहुत से संभ्रांत और बौद्धिक लोग आये हुये थे। उस दिन माँ मन्दिर का सत्संग कक्ष पूरी तरह भरा हुआ था, सत्संग का समय हो चुका था और बड़ी उत्सुकता के साथ चाचा जी के आने की प्रतीक्षा की जा रही थी। मैं जल्दी ही चाचा जी को बुलाने उनकी कोठरी में पहुँचा तो क्या देखता हूँ कि चाचा जी बड़ी तन्मयता के साथ हमीद और सितारे जी को कहानी सुना रहे हैं और मुझे देखते ही हँसते हुये बोल उठे - ‘‘मैं इन्हें एजुके ट कर रहा हूँ।’’
मैं यह सब सुनकर हैरान रह गया। कहाँ इतने पढ़े-लिखे ये लोग और कहाँ मैट्रिक पास चाचा जी! कैसा प्रशिक्षण! कमाल है।
लेकिन बाद में मेरी समझ में आया कि चाचा जी के इस हँसी मजाक में भी कितना बड़ा कटु सत्य समाया हुआ था। भले ही कोई विश्वविद्यालयों की ऊँची से ऊँची डिग्री क्यों न ले ले, लेकिन यह भी संभव है कि सच्चे ज्ञान और विवेक से उसका कोई सम्बन्ध ही न हो।
और इसी मायने में हमारे चाचा जी जीवन की सच्ची शिक्षा के सच्चे मास्टर थे। कहानियाँ और संस्मरण उनकी शिक्षा के माध्यम थे जिनके द्वारा वे लोगों में नैतिक, चारित्रिक तथा आध्यात्मिक भावनाओं का संचार करते थे और उनकी शिक्षा जीवन को मूल्य प्रदान करती थी।
सचमुच में हमारे चाचा जी एक चलते-फिरते विद्यालय थे। चाहे उनकी बैठक हो, स्कूल की एसेम्बली अथवा आश्रम का सत्संगकक्ष, सब कहीं उनकी मधुर कहानियों, संस्मरणों व हास्य विनोदों से ज्ञान की वर्षा होती रहती थी। और उनकी यह पाठशाला - चाहे बच्चे हों या युवा अथवा वृद्ध - सबके लिये समान रूप से खुली रहती थी। एक ‘काला अक्षर’ वाले अनपढ़ व्यक्ति से लेकर श्री निवास जी आयंगर और श्री डी0एस0 कोठारी जैसे धुरन्धर शिक्षाविद् व वैज्ञानिक उसमें समानरूप से रस लेते थे। अपनी इन कहानियों और संस्मरणों के माध्यम से चाचा जी ने अगणित लोगों का मार्गदर्शन किया और उन्हें सही रास्ता दिखाया।
चाचा जी के पास कहानियों का विपुल भण्डार था। चाचा जी की जन्मशताब्दी के शुभ अवसर पर इस पुस्तक में चाचा जी की ये शिक्षाप्रद कहानियाँ प्रकाशित की जा रही हैं। ये कहानियाँ पहले श्रीअरविन्द कर्मधारा में छपी थीं जिन्हें पाठकों की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुये इन्हें पुस्तकाकार रूप में छापा जा रहा है। आशा है पाठक इससे लाभान्वित होंगे और अपने जीवन के लिये उन्हें यथेष्ट मार्गदर्शन प्राप्त होगा।
- त्रियुगी नारायण