चाचा जी की आत्मकथा
1

मैं, मेरी जन्मभूमि और मेरा ख़ानदान


जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो मैंने अपनी माँ से पूछा - ‘‘माँ मैं कौन हूँ और यहाँ कैसे आया?’’

माँ ने कहा - ‘‘पुत्तरा, तू मेरा बेटा है और मैंने तुझे जन्म दिया है।’’

मेरी समझ में कुछ नहीं आया। न मैं कुछ पूछ सका और न ही माँ मुझे कुछ समझा सकी।

मुझे आश्चर्य तो था ही फिर मैंने एक दिन माँ से पूछा - ‘‘मैं कहाँ पैदा हुआ?’’

माँ मेरा हाथ पकड़कर दालान के अन्दर एक छोटी-सी अँधेरी कोठरी में ले गई और बताने लगी कि - ‘‘बेटा तू इस कोठरी में पैदा हुआ था।’’

वह तो छोटी-सी अंधेरी कोठरी थी जिसमें मुश्किल से कोई लेट ही सके। उसमें किसी तरफ से न हवा आ सकती थी और न ही कहीं से रोशनी। यह कोठरी उस बड़े दालान के एक कोने में थी जिसमें सारा परिवार रहता और सोता था। 1947 में पाकिस्तान बनने तक जब-जब भी मुझे उधर जाने का अवसर मिलता मैं अपनी जन्म कोठरी को देखने के लिए अवश्य जाता गोया कि गंगोत्री या जमुनोत्री हो। यह कोठरी परिवार में सभी का जन्म स्थान थी। इसका और कोई उपयोग नहीं होता था।

प्रसूति के लिए धरती पर फटी पुरानी बोरियाँ और उनके ऊपर चिथड़े बिछा दिये जाते थे - ‘‘ज़च्चा को आराम देने और बिस्तर पर नर्म करने के लिए। बच्चा हो जाने के बाद उन चिथड़ों और बोरियों को फेंक दिया जाता था या जला दिया जाता था।

गाँव में सबको जन्म दिलाने वाली एक ही ‘‘भोली दाई’’ थी। चाहे हिन्दू या सिख का परिवार हो या मुसलमान का घर। मेरे दादा ने भी इसी दाई के हाथों जन्म लिया और मेरे बाप और चाचा-ताऊ ने भी। गाँव में उस ज़माने के सभी लोगों ने भोली दाई के हाथों ही जन्म लिया था।

मुझे अभी तक याद है, भोली दाई बहुत बूढ़ी किन्तु भव्य व्यक्तित्व की थी। ऊँचा क़द, गोरा रंग, चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ, और हर समय हँसती-मुस्कराती हुई। वह जब जी चाहे झूमती-झामती आती और दाँव लगाकर झट मुझे उठा ले जाती। मेरी माँ को मुझे हर बार साबुन से खूब अच्छी तरह नहला-धुलाकर मेरे कपड़े बदलने पड़ते थे और ऊपर से दो-चार बूँद ‘गंगाजल भी’ छिड़ककर मुझे ‘शुद्ध-पवित्र’ करना पड़ता था, क्योंकि भोली दाई अछूत थी - जात की भंगिन! मेरी माँ उस पर बहुत झल्लाती थी और उसको बुरा-भला भी कहती थी - परन्तु फिर भी वह मानती नहीं थी।

जब मैं बड़ा हुआ तो मैंने अपनी माँ से कई बार पूछा कि ‘‘माँ, मेरा जन्म किस दिन और किस तारीख को हुआ था?’’ माँ सदा यही जवाब देती कि, ‘‘पुत्तरा! दिन और तारीख तो पता नहीं। प्रभात की बेला थी - ठंडी-ठंडी मीठी हवा चल रही थी। नन्हीं-नन्हीं बूँदें पड़ रही थीं - तब तूने जन्म लिया।’’

गाँव में एक ही पुरोहित थे श्यामजी मिश्र। कहते हैं कि उन्होंने मेरी जन्म-पत्री बड़े प्रेम-उत्साह और लगन से बनायी। मिश्र जी बहुत पढ़े-लिखे तो नहीं थे फिर भी महीनों लगाकर उन्होंने बड़ी चमकती रोशनाई से विस्तारपूर्वक सुलेख में जन्म-पत्री बनायी जो तेरह फुट के लगभग लम्बी थी। यह जन्म-पत्री बहुत समय तक मेरे पास रही परन्तु इसमें से मैं तो कुछ जान न सका। इस जन्म-पत्री का फिर क्या हुआ यह मैं फिर कभी ठीक अवसर पर बताऊँगा।

जिस गाँव में मैंने जन्म लिया उसका नाम था वहाली। वह खेवड़ा-लवण पर्वत-माला (Khewra Salt Range) के बहुत अन्दर जाकर घने पर्वतों के बीच में स्थित था। तहसील - पिंड दादन खाँ, जिला - जेहलम, जो अब पश्चिमी पाकिस्तान में है।

वहाली गाँव एक ऐसे सुन्दर, रमणीक और सुहावने दृश्यों के वातावरण (Environs) से घिरा हुआ था जिसने मेरे मन और आत्मा को अभी तक मोह रखा है। गाँव की स्थिति और उसकी मूरत और चारों ओर के पर्वतों और पाँव के नीचे के पत्थरों की याद, जिन पर मैं फाँदता हुआ चला करता था, अभी तक मेरे मन की आँखों के सामने ताज़ा है जैसे कि मैं सिनेमा टेलीविज़न पर कोई दृश्यावलि देख रहा होऊँ।

यह वहाली गाँव एक पहाड़ी की छाती पर नगीने की तरह जड़ा हुआ था जो मानां उत्तर की ओर देख रहा हो और पूरब की पहाड़ी के पीछे से जब सूर्य उभरता तो अपनी किरणें सीधे हमारे गाँव पर बिखेरता और सारा दिन गाँव के ऊपर अपना प्रकाश डाले रखता।

गाँव के सामने नीचे चारों ओर पर्वतों से घिरी घाटी (Valley) थी। वर्षा-ऋतु में चारों ओर के पर्वतों से वर्षा का पानी उछलता हुआ नीचे वादी में उतरता था और फिर नदी के रूप में एक कोने से बाहर निकल जाता था। - और अपने बहाव में पहाड़ों से नयी मिट्टी लाकर घाटी में बिछा जाता था, और घाटी की धरती को हर साल नया और उपजाऊ बना जाता था।

इस घाटी में लगभग बारह रहट (कुएँ) स्थान-स्थान पर लगे हुए थे और मुझे याद है कि ये सारे कुएँ सारा साल चलते रहते थे। इन कुओं का पानी बड़ा कोमल, शीतल और स्वच्छ था, खुशबूदार और मीठा इतना जैसे उसमें हलकी चीनी घोल दी गयी हो।

घाटी की धरती ऐसी उपजाऊ थी कि हर फ़सल, सब्जियाँ और फल-फूलादि जो कुछ भी बोया जाता था वह कच्चा खाने में और भी मीठा और स्वादिष्ट होता था। गन्ना हमारे इस गाँव की धरती में एक विशेष प्रकार का ही होता था। अद्भुत मिठास और तीन इंच से चार इंच तक गोलाई में मोटा। ऐसा गन्ना आज तक मैंने अपने जीवन में और कहीं नहीं देखा। उसकी मिठास और सुगन्ध की हद नहीं थी।

दूर-दूर के गाँवों और शहरों से लोग गन्ने के मौसम में लगातार घोड़े, खच्चर, टट्टू और गधे लेकर आते थे। - और एक-एक गन्ने के तीन-तीन, चार-चार टुकड़े करके छट्टों में (जुड़वाँ थैलों में) ठसाठस भरकर अपने पशुओं पर लाद लेते थे और पीछे का बेकार हिस्सा वहीं फें क़ जाते थे। हम देख-देखकर प्रसन्न होते थे और हमें बहुत गर्व होता था।

इस धरती में गेहूँ - जिसे पंजाबी में ‘कनक’ कहते हैं, बड़ी चमकीली और सुनहरी होती थी और खाने में बेहद मीठी और स्वादिष्ट। यहाँ तक कि इस धरती में थोड़ी-सी कपास व मूँज भी बोई जाती थी जितनी कि अपने और आस-पास के गाँवों की आवश्यकताओं की पूर्त्ति कर दे।

हमारा गाँव दो हिस्सों में बँटा हुआ था। नीचे का गाँव जिसमें हम रहते थे उसे ‘तल्ली-वहल’ कहते थे और ऊपर वाले गाँव को जो कि दृष्टिगोचर तो था परन्तु काफ़ी दूर था ‘उत्ती-वहाल कहते थे। - और दोनों के बीच में और आगे-पीछे जहाँ -तहाँ ढोंकें (Outskirts) थीं। यानि घरों के छोटे-छोटे समूह थे। उसमें से एक में बकरियों के चरवाहे का परिवार रहता था। जिसमें बकरियों को घेरने के लिए एक विशाल बाड़ा था। वह दोनों गाँव की घर-घर की सैकड़ों बकरियों को जंगल में चारा-चुगाकर लाने का ज़िम्मेदार था। अगले घर में बढ़ई का परिवार, फिर आगे बुल्ले नाई और उसका परिवार, फिर आगे धोबी और उसका परिवार, फिर आगे मोची और उसका परिवार, फिर आगे भंगी और उसका परिवार, जुलाहा और उसका परिवार, मीरू भांड जो सारे इलाके का मनोरंजन करता था और उसका परिवार, फिर आगे लुहार और उसका परिवार - इस तरह गाँव के दोनों ओर दूर-दूर तक फैले हुए घरों में वे लोग रहते थे जिनसे गाँव के जीवन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती थी।

एक तरह छोटी सी ढोक (उपग्राम) में वे परिवार रहते थे जो माल इधर-उधर ढोने के लिए घोड़े और खच्चर रखते थे। - और उन लोगों को सवारी देते थे जिनको खेवड़ा रेलवे-स्टेशन पर जाना होता था - जो कि गाँव से लगभग बारह-तेरह मील की दूरी पर था - जहाँ से उन्हें रेल पकड़नी होती थी। जाने वालों में वे लोग होते थे जो फ़ौज में थे और जिनको दूर-दराज़ अपनी नौकरी पर जाना होता था। - और कुछ जवान लड़के दूर शहरों में पढ़ने जाते थे जहाँ कि हाई स्कूल होता था और थोड़े से लड़के जिनको आगे की ऊँची पढ़ाई के लिए लाहौर जाना होता था।

लाहौर उस ज़माने के सारे पंजाब के लिए शिक्षा का बड़ा केन्द्र था और जहाँ सभी धर्मों के बड़े-बड़े स्कूल और कॉलेज थे।

यही घोड़े खच्चरोंवाले ब्याह-शादियों में बारातों को एक गाँव से दूसरे गाँवों में ले जाते थे और वापिस लाते थे। इनका सबसे बड़ा काम जो लगातार चलता रहता था वह था लोगों को समय-समय पर उनके रिश्तेदारों के पास खुशी-ग़मी के मौक़ों पर ले जाना-लाना। बिलखती-बिछुड़ती रोती बहू-बेटियों की डोली-पालकियों में उनके मायके ससुराल पहुँचाना-लाना।

गाँव की परम्परा ऐसी थी कि लड़की की शादी के बाद जब विदाई होती थी, और जब-जब उसे ससुराल भेजा जाता था, तो सब रिश्तेदार, छोटे-बड़े स्त्रियाँ, पुरुष, बच्चे और गाँव वाले सभी लोग इकट्ठा होकर, चीख़-चीख़कर रोना शुरू कर देते थे।

काश्तकार लोग जो घाटी में खेती-बाड़ी करते, वादी में चारों तरफ़ अपने खेती के समीप ढोक बनाकर अपने-अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ रहते थे। ये ढोकें वादी में चारों ओर ऐसी लगती थीं जैसे हरे खेतों और पेड़ों की बिछी मखमल में नगीने जड़े हों। - और रात में लगता था जैसे तारों भरा आकाश नीचे उतर आया हो!...

हमारे गाँव के सामने की पहाड़ी जो दक्षिण में थी, बहुत दूर नहीं थी। बहुत ज़ोर से आवाज़ लगाने पर किसी को बुलाया भी जा सकता था, बात भी की जा सकती थी और संदेश भी भेजे जा सकते थे। उन दिनों के लोगों में जान थी, और आवाज़ में बुलन्दी।

एक दो काश्तकार, गाँव में ही रहते थे क्योंकि उनकी खेती घाटी में नीचे ही थी। वे लोग अपने घर से खेत में एक-दूसरे से ज़ोर की आवाज़ में बात कर लिया करते थे। बच्चे को अगर माँ को बुलाना है तो बुला लेते और माँ -बाप भी उसी तरह बच्चों को।

इस गाँव में रहने वाले काश्तकारों की मुसीबत यह थी कि सामने पहाड़ी पर के सुल्तानपुर गाँव से मेहमान जब तब आ धमकते थे:

‘‘वेख नी वेख

मोढे ते चमाड़ी ते

नित्त सलामा लेख’’

- देख री देख! इनका क्या है? कि कंधे पर पंजाल रखा और ‘सलाम-वाले-कुम’ करते हुए रोज़ ही हाज़िर हैं। अब करिये ख़ातिर-तवज्जो!

एक दिन जब कोई आ रहा था कि उन्होंने ठानी कि हम मियाँ-बीबी आपस में लड़ जायें। मियाँ ने कहा, ‘‘मैं रोटियों को दीवार पर जोर-जोर से मारकर तुम्हें झूठे से खूब पीटूँगा और झूठे से तुम खूब चीखना-चिल्लाना और मेहमान जो आ रहा है, सीढ़ियों पर चढ़ेगा और जब हमारी लड़ाई का शोर सुनेगा, तो अपने-आप वापिस चला जायेगा।’’

जब मेहमान सीढ़ियों पर चढ़ रहा था, मियाँ-बीबी ने अपना नाटक शुरू कर दिया। मेहमान जब सीढ़ियों के मोड़ पर पहुँचा तो झगड़े का शोर सुनकर सहम गया। वहाँ एक छोटी-सी कोठरी थी, सर्दी के दिन थे, वह अपना जुल्ला (रजाई) लेकर वहीं चुपचाप बैठ गया।

मियाँ-बीबी ने समझा कि मेहमान चला गया होगा और थोड़ी देर बाद अपना ड्रामा उन्होंने बन्द कर दिया।

फिर चैन और खुशी में उनका वार्तालाप यों शुरू हुआ:

मियाँ: ‘‘सुण नी मेरा साखाँ

कद्धी नाल वगाइयाँ टापाँ

मारेया मम्हीं नईं’’

‘‘सुन री मेरी प्यारी, मैं दीवार में रोटियाँ मारता रहा - परन्तु तुम्हें नहीं मारा।’’

बीबी: ‘‘मैं केई सयाणी

सुक्के सग्ग पई अड़ाणी

रुन्नी मम्हीं नईं’’

‘‘मैं कैसी होशियार हूँ - सूखे गले से ही चीखती-चिल्लाती रही - रोई मैं भी नहीं!’’

यह वार्तालाप मेहमान सुन रहा था। मेहमान झट बोला:

‘‘मेरा नाँ अब्दुल्ला

अन्दर लै वड़या साँ जुल्ला

गेया मम्हीं नईं’’

‘मेरा नाम अब्दुल्ला - रजाई लेकर मैं कोठरी के अन्दर घुस गया था। गया मैं भी नहीं!’

तुलसीदास की रामायण की तरह मैं भी अपने गाँव वहाली की स्तुति गाते थकता नहीं हूँ। गाँव के चारों ओर का चित्र अभी तक मेरी आँखों के सामने है और मैं इसको कभी भुला नहीं सकता।

गाँव के पूरब की पहाड़ी पर चढ़कर जाते थे तो थोड़ी दूर जाकर पहाड़ों पर फलों के बाग़ शुरू हो जाते थे और ये बाग़ एक गाँव के इर्द-गिर्द थे जिसका नाम था सलोई। इस गाँव में भी हमारे गाँव जैसे ही लोग रहते थे और वहाँ जो प्रसिद्ध सज्जन थे उनका नाम था राजा ग़जनफ़र अली खाँ जो समय पाकर भारतवर्ष में पाकिस्तान के राजदूत नियुक्त हुए।

दक्षिण की पहाड़ी जो काफ़ी समीप थी - उस पर जो छोटा-सा गाँव था उसका नाम था सुलतानपुर। इस गाँव में अंगूरों के ही बाग़ थे। - और मुझे बचपन की याद आती है कि जब जी चाहे भागते हुए वहाँ पहुँच जाते थे और इधर-उधर छिप-छिपाकर ख़ूब अंगूर खाकर आया करते थे। आख़िर वह कोई निर्यात (Export) का तो ज़माना था ही नहीं। किसी न किसी को तो अंगूर खाने ही हुआ करते थे और रहे-सहे अंगूर इधर-उधर के गाँवों में टोकरों में भरकर सिर पर उठाकर बिकने के लिए जाते थे।

सुलतानपुर गाँव के पीछे थोड़ी ही दूर पर एक और गाँव था जिसका नाम था संघोई। - और मुझे अब तक याद है कि इस गाँव में खटाखट लगी रहती थी - पीतल और भरत धातु के बर्तन बनाये जाते थे।

पश्चिम की पहाड़ी से उतरकर केवल डेढ़-दो मील नीचे जाकर बहुत लम्बी-चौड़ी वादी (घाटी) थी। यह वादी क्या थी - सारी की, सारी फलों और फूलों का एक विशाल बाग़ थी। केला, लोकाट और अंगूर इस बाग़ में बेइन्तहा और बेहिसाब होते थे - और थे भी बहुत ही मीठे, स्वादिष्ट।

इस वादी के पूरे बाग़ में जो अधिक और ख़ास चीज पैदा होती थी वह था गुलाब। ऐसा ख़ूबसूरत और खुशबूदार गुलाब शायद समूचे भारत में कहीं और नहीं था। यहाँ से गुलाब का गुलूकन्द बनकर दूर-दूर काबुल और ईरान तक जाता था जो कि यूनानी दवाइयों में ख़ास तौर पर इस्तेमाल होता था। गुलाब के अर्क़ की तो हद नहीं थी। इतना खुशबूदार, आँखों को तरावट देने वाला, बच्चों की सभी दवाइयों में काम आनेवाला और अमीरों के नहाने के पानी के कुछ बूँद ही डालकर पानी को खुशबूदार कर देनेवाला।

लम्बी-चौड़ी इस वादी में हिन्दुओं का एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान था कटासराज जो हमारे गाँव वहाली से केवल डेढ़-दो मील की दूरी पर था। इस तीर्थस्थान की गणना भारत के पाँच बड़े तीर्थस्थानों में की जाती थी जिनके नाम हैं - पुष्करराज, प्रयागराज, काशीराज, कैलाशराज और कटासराज।

वैदिक काल में यजुर्वेद में इस क्षेत्र को सारस्वत क्षेत्र और ब्रह्मावर्त क्षेत्र माना गया था क्योंकि इसके आसपास ब्राह्मणों की आबादी ज्यादा थी। कहा जाता है कि इस तीर्थस्थान को भारत का ही नहीं संसार का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता था। वैशाख की संक्रान्ति को इस पवित्र स्थान पर मेला लगता था और उस मेले में सारे भारत के महामण्डलेश्वर और शंकराचार्य, हज़ारों साधु-सन्त और महात्मा और लाखों लोग इकट्ठा होते थे। सबसे बड़ा आकर्षण इस मेले का यह होता था कि सैकड़ों नागा साधुओं का जुलूस जिनके आगे-आगे हाथी चलते थे।

यह भी कहा जाता है कि इस जगह में ही च्यवन ऋषि का आश्रम था और यहीं पर उन्होंने मनु महाराज की पौत्री सुकन्या से शादी करने के बाद अमरकुण्ड में डुबकी लगाकर अपना कायाकल्प किया था, जिसकी वजह से च्यवन ऋषि फिर नवजवान हो गये थे। यहीं पर देवर्षि नारद ने अपनी शिक्षा भी प्राप्त की थी।

कहा जाता है त्रेता युग में भगवान् श्रीराम, सीता और लक्ष्मण अपने वनवास के काल में यहाँ पधारे थे और अमरकुण्ड में स्नान भी किया था तथा इसी पवित्र भूमि पर ऋषि-मुनियों का एक महासम्मेलन यानी ‘महाकुं भ’ करके मानवजाति के कल्याण के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय भी लिए थे। इस तीर्थस्थान पर सीताकुण्ड और सीताजी की पुंजकुटीर के अतिरिक्त हनुमानगढ़ी, सतधनुष मन्दिर, कई अखाड़े, ऋषि आश्रम और संस्कृत विद्यालय आदि भी थे।

इसी तरह श्रीकृष्ण के द्वापर युग में महाभारत युद्ध से पहले पाण्डवों की कौरवों के साथ जुए में जब दूसरी बार हार हुई, तो शर्त के अनुसार 12 वर्ष के लिए उन्हें बनवास और 13वें साल में अज्ञातवास में यहीं बिताना पड़ा था।

यह जगह जगत्-स्रष्टा ब्रह्मा और भगवान् शिव की जन्मस्थली मानी जाती थीं। कहा जाता है कि सृष्टि रचते समय ब्रह्मा जी पुष्करराज में कमल के फू ल में पैदा हुए, तो भगवान् शंकर कटासराज की धरती को फाड़कर साक्षात् प्रकट हुए और उसी जगह से जलधारा का एक स्त्रोत उछल पड़़ा था, जो कि ‘अमरकुण्ड’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह सरोवर बहुत विशाल था जो पहाड़ों की गुफ़ाओं के अन्दर तक भरा हुआ था। इस स्थान पर बहुत बड़ा एक मन्दिर था और सरोवर के पार ऊँचे-ऊँचे मकान तीर्थ-यात्रियों के लिए थे। यह भी मुझे याद है कि यहीं तिमंजिले मकान की छत के ऊपर से हिम्मती लोग जल-कुण्ड में कूदा करते थे। पुराणों के अनुसार मनुष्य को इस तीर्थराज का स्नान किये बग़ैर किसी दूसरे तीर्थ की यात्रा का फल ही नहीं मिल सकता था।

कटासराज के सरोवर में साँप हज़ारों की संख्या में पाये जाते थे, मगर कभी किसी की मृत्यु साँप काटने से नहीं हुई। भगवान् शंकर की कृपा थी। इस वजह से भी इस क्षेत्र का नाम कटासराज था, क्योंकि यहाँ साँपों का राजा रहता था।

बचपन का कटासराज का देखा दृश्य मैं अभी तक नहीं भूल पा रहा हूँ।

इसी वादी में कटासराज तीर्थस्थान से आधा मील पर ही नज़दीक में मुसलमानों का भी पवित्र स्थान था। नाम था चोहा-सैदन-शाह। यहाँ सैदन शाह फ़क़ीर की दरगाह थी और इस पर मुसलमानों का एक बहुत बड़ा मेला लगता था।

इस स्थान की ख़ूबसूरती और कुदरत की आश्चर्यजनक बात यह थी कि पानी जमीन में से अपने-आप ही ऊपर निकलता था और एक सुन्दर धारा के रूप में ‘चोहा-सैदन-शाह’ के सारे क़स्बे में से होता हुआ जाता था। लोग अपने मकानों और दुकानों के सामने छोटे-छोटे पक्के कुण्ड बना लेते थे ताकि पानी उनमें भरकर ऊपर से निकले। और जब जी चाहे वे अपने-अपने कुण्ड में से पीने और नहाने-धोने के लिए पानी भर सकें। कुण्डों के ऊपर नहाने-धोने और किसी प्रकार से भी गन्दा करने की प्रथा नहीं थी। पानी स्वच्छ और निर्मल रहता था। यह पानी इतना मीठा था कि क्या कहें और इसी के कारण इतना सुन्दर और खुशबूदार गुलाब यहाँ पैदा होता था और बग़ीचों में मीठे फल।

और नीचे जाकर इसी पानी को नीचा गिराकर पनचक्कियाँ लगाई हुई थीं, जिनमें आटा पीसा जाता था।

हमारे गाँव के उत्तर में - पहाड़ के पीछे एक और ऊँचा पहाड़ था जिसका नाम था - ‘करंगल’। इस पहाड़ में से सोने की तरह एक गहरे काले रंग का पत्थर निकलता था जो कि बहुत ढूँढ़-ढाँढ़कर थोड़ी-सी ही मिक़दार में मुश्क़िल से मिल पाता था और जानकार लोग उसको भस्म करके और शुद्ध करके उसका ‘सुरमा’ बनाते थे। वह बहुत क़ीमती सुरमा दूर-दूर तक आँखों में डालने के काम आता था। - और कहते हैं कि यदि कोई चालीस दिन लगातार उस सुरमे को आँखों में डाल ले तो उसको दिन में भी तारे दिखाई देने लग जाते थे।

उत्ती-वहाली में एक ख़ासियत यह थी वहाँ एक बहुत बड़ी और प्रसिद्ध ‘बैंड’ की टोली (Party) थी। यह टोली गुलाबख़ाँ ने बनायी थी। गुलाबख़ाँ पहली लड़ाई में फ़ौज के बैंड में था। लड़ाई ख़त्म होने पर जब वह वापस घर आया तो भी उसमें बहुत आग थी। उसने गाँव के नौजवानों को इकट्ठा करके यह शानदार बैंड बनाया था। यह बैंड इतना मशहूर हो गया कि पंजाब में दूर-दूर तक इसकी माँग रहती थी।

हैरानगी की बात यह है कि बैंड की इस टोली में से एक नौजवान उतरकर मेरठ (यू0पी0) में आ बसा। उसका नाम था नादिरअली। धीरे-धीरे उन्नति करते-करते शायद दो फ़र्लांग लम्बी और दो-तीन मंज़िल ऊँची उसने बिल्डिंग बनवाई। इसमें हर प्रकार के बैंड-बाजों (Band Instruments) का एक बहुत बड़ा कारख़ाना लगाया जिसमें फ्रांस और जर्मनी के बैंड-बाजों (Band Instruments) के मुक़ाबले में हर तरह के बैंड-बाजे बनाये जाते हैं, देश के कोने-कोने में जिनकी माँग है।

मुझे इसलिए भी यह मालूम है कि हमारे श्रीअरविन्द आश्रम पांडिचेरी में बहुत ऊँचे दर्जे की बैंड की टोली (Party) है और मेरे दो पुत्र भी उस बैंड में सदा से हैं। मेरा छोटा पुत्र विक्टर प्रतिवर्ष इसी कारखाने से बैंड-बाजे ख़रीदने आता है और फ्रांस व जर्मनी के प्रसिद्ध बाजों की मरम्मत करवाने के लिए भी यहीं लाता है।

यहाँ इस उत्ती-वहाली में एक सज्जन थे ‘शेरख़ान’। ये भी पहली बड़ी लड़ाई (The First World War) में फ़ौज में थे और मेजर के पद तक पहुँच गये, जबकि उस ज़माने में कोई हिन्दुस्तानी इस पद पर नहीं पहुँचता था। ये पढ़े-लिखे भी नहीं थे। जब वह लड़ाई से वापस आये तो उनकी शान की हद नहीं थी। जब उनसे पूछा गया कि ‘आप फ़ौज में क्या किया करते थे?’ तो वे शान से कहा करते थे कि ‘‘मैं फ़ौज का ‘डिस्सप्लंग’ (Discipline) रखता था!’’

इस लड़ाई में भर्ती के लिए आदमियों की बहुत सख़्त ज़रूरत थी और शेरख़ाँ ने हमारे गाँव वहाली के बच्चे-बूढ़े और स्त्रियों को छोड़कर सब जवानों को फ़ौज में भर्ती करवा दिया था। पूरे गाँव में एक जवान भी ऐसा नहीं छू टा था जो फौज में भर्ती न हो गया हो। इस भर्ती कराने के सिलसिले में मलिक शेरख़ान को मेजर की पदवी मिली!

ऐसा सुना जाता है कि गोरे-अफ़सर किसी छावनी में आकर भर्त्ती के लिए बैठते थे तो अंग्रेज़ी में तीन ही सवाल पूछते थे। और भर्त्ती होने वालों को तो अंग्रेज़ी आती ही नहीं थी इसलिए तीनों सवालों के जवाब उन्हें रटा दिये जाते थे। वे सवाल-जवाब इस प्रकार थे:

Q. — What is your name?

A. — Sir, my name is Gul Mohammad.

Q. — What is your father’s name?

A. — Sir, Fatesh Mohammad.

Q. — What is your age?

A. — Sir, Twenty-one years.

Q. — What is your father’s age?

A. — Sir, Forty-two years.

Q. — Are you loyal to the Britis Government or your father?

A. — Both sir.

इसका हिन्दी रूपांतर इस प्रकार है:

प्र0 - तुम्हारा क्या नाम है?

उ0 - जनाब गुल मोहम्मद।

प्र0 - तुम्हारे बाप का नाम?

उ0 - जनाब फ़तह-मोहम्मद।

प्र0 - तुम्हारी उम्र क्या है?

उ0 - जनाब इक्कीस साल।

प्र0 - तुम्हारे बाप की क्या उम्र है?

उ0 - जनाब बयालीस साल।

प्र0 - तुम अंगरेज़ी हकूमत के वफ़ादार हो या अपने बाप के?

उ0 - जनाब दोनों के।

एक बार ऐसा हुआ कि मलिक शेरख़ाँ के सामने ही एक अंग्रेज़ भर्ती अफ़सर ने ग़लती से उलटा प्रश्न पूछ लिया:

Q. — What is your father’s age?

A. — Sir, Twenty-one years.

Q. — What is your age?

A. — Sir, Forty-two years.

At this the Recruiting officer was very much annoyed and said, the third question.

Q. — ‘Are you fool or your father?’

A. — ‘Both sir’.

इसका हिन्दी रूपांतर यह है:

प्र0 - तुम्हारे बाप की क्या उम्र है?

उ0 - ‘जनाब इक्कीस साल।’

प्र0 - ‘तुम्हारी क्या उम्र है?’

उ0 - ‘जनाब बयालीस साल।’

गोरे अफ़सर को बहुत गुस्सा आया और उसने झुं झलाकर पूछा:

प्र0 - ‘तुम बेवकू फ़ हो या तुम्हारा बाप?’

उ0 - ‘जनाब दोनों।’

लड़का अच्छा नौजवान था और फ़ौज में भर्त्ती लायक। इस उल्टे-सीधे जवाब के बावजूद उसको रिजैक्ट (Reject) अस्वीकृत नहीं किया गया और मलिक शेरख़ाँ की सिफ़ारिश पर उसको भर्ती कर लिया गया। हमारे गाँव की इज्ज़त भी रह गयी कि गाँव का एक भी नौजवान फ़ौज की भर्त्ती में असफल नहीं हुआ।

हमारे गाँव के पड़ोस के पहाड़ों में जो खनिज-पदार्थ निकलते थे उसमें सैंधा-नमक (Rock-Salt) तो था ही जो कि उस ज़माने के समूचे भारतवर्ष में एक ही स्थान से निकलता था जिसका नाम था (Khewra-Salt-Range) खेवड़ा-लवण-पर्वतमाला।

इसके अतिरिक्त यहाँ से निकलता था संगे-ख़ारा (Gypsum) जो बहुत ऊँचे दर्जे का होता था और जो सीमेंट बनाने में एक प्रमुख उपादान (Ingredient) है। अन्य खनिज पदार्थ जो निकलते थे वे थे - कोयला, रंग-बिरंगी मिट्टियाँ - काली-पीली-सफ़ेद, सीमेंट और चूना बनाने का पत्थर।

यह सब बतलाने का तात्पर्य यह है कि मेरा जन्म-स्थान, मेरा गाँव कितना अच्छा, कितना सुन्दर और कितना वैभवशाली था। मुझे इस पर कितनी प्रसन्नता और गर्व है!

मैं तो इस शरीर को कहते है परन्तु कब तक?

फिर भी तो मैं रहूँगा।

वह मैं तो कोई और ही है।

जाकर ही पता लगेगा।

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फिर इस मैं को पुकारने के लिए मेरा एक नाम रखा गया। कैसे रखा गया? - और किसने रखा? - और क्यों ऐसा नाम रखा गया? . . .यह मुझे मालूम नहीं हो सकता। हाँ, यह मुझे मालूम है कि मेरा नाम सिकन्दरलाल था। इसी नाम से मुझे पुकारते थे। इसी नाम से मैं बड़ा हुआ और इसी नाम से मैंने शिक्षा पाई और पंजाब यूनिवर्सिटी लाहौर से मैट्रिकुलेशन की डिग्री भी हासिल की।

परन्तु नाम सिकन्दर क्यों और फिर उसके साथ लाल भी? सिकन्दर ही इतना बड़ा नाम था। पर उसने भी आख़िर में कह दिया:

‘सिकन्दर के हाथ ख़ाली

दोनों कफ़न से निकले।

यही हाल मेरा भी होगा। सब कुछ यहीं छोड़कर ख़ाली हाथ जाना पड़ेगा। परन्तु हमारी प्रथा के अनुसार हाथ भी ख़ाली नहीं रहते। सारे शरीर की भस्म बना दी जाती है। जिस माटी में से बने थे, उसी में वापिस लौटा दिया जाता है।.....

लाल (आत्मा) तो फिर भी बाक़ी रह जायेगा।

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सिकन्दरलाल से सुरेन्द्रनाथ कैसे हो गया? ऐसा तो कभी होता नहीं। परन्तु यह एक राज़ की बात है जो मौक़ा आने पर बताऊँगा।

यह तो हुआ मेरा नाम। परन्तु मैं आया कैसे और किस ख़ानदान से? कहते हैं मेरे माता और पिता ने मुझे जन्म दिया। यह तो एक रहस्य (Mystery) है जिसको खोल पाना कठिन है। परन्तु मनुष्यमात्र का जन्म ही ऐसे होता है। इसमें है तो चिन्तन की बात, किन्तु खास बात नहीं है।

मेरे पिता जिस ख़ानदान की लड़ी की एक कड़ी थे उसी की आगे की कड़ी मैं हूँ। परन्तु मेरी माँ? वह तो कहीं और जगह से आयी। ख़ैर...इसका ज़िक्ऱ भी कभी कहीं आयेगा, अपने पिता का तो मुझे मालूम है परन्तु दादा का नहीं। क्योंकि देखा तो है नहीं, केवल सुना ही है। दादी के पास तो मैं बचपन में पला ही हूँ। ख़ानदान के और हालात जानने की बहुत कोशिश की और बहुत खोज भी की। आख़िर भारत सरकार के राष्ट्रीय-अभिलेख-विभाग (National Archives) में से एक ऐतिहासिक किताब में से कुछ जानकारी मिली जिसका नाम था - सर लेपल एच. ग्रिफ़िन के .सी.एस.आई. कृत ‘‘पंजाब चीफ्स’’ -भाग-2 ( The Punjab Chiefs, Vol.2, Sir Lepal H. Griffin KCSI) की लिखी हुई। उसमें लिखा था:

इस ख़ानदान के पूर्व-पुरुष श्री कर्णमल थे। कर्णमल मुग़ल-सम्राट शाहजहाँ के दरबार में दीवान थे और समय पाकर उनको औरंगजेब के नीचे आना पड़ा। औरंगजेब ने श्री कर्णमल को मुसलमान बनने के लिए मजबूर किया और बहुत यातनाएँ दीं। परन्तु श्री कर्णमल अपने धर्म पर डटे रहे और इस्लाम क़बूल करने से इन्कार कर दिया जिस पर उनको क़त्ल कर दिया गया।

इसके पश्चात् यह ख़ानदान सरदार भागसिंह के समय में प्रसिद्ध हो गया। सरदार भागसिंह मेरे दादा के पिता थे और मेरे दादा का नाम श्री जवाहरमल था। सरदार भागसिंह के और भी पुत्र थे।

सरदार भागसिंह को महाराजा रणजीतसिंह ने फ़ौज के एक दस्ते का कमाण्डर बनाकर जेहलम के इर्द-गिर्द के विद्रोह को दबाने के लिए भेजा। सरदार भागसिंह विद्रोह को दबाने में सफल हुए और कुशलतापूर्वक अपना कार्य सम्पन्न किया।

इसके सिलसिले में सरदार भागसिंह को खेवड़ा लवण-पर्वत-माला (Khewra- Salt-Range) के कुछ भाग का अध्यक्ष बना दिया गया। सरदार भागसिंह ने अपना मुख़्य केन्द्र (Headquarer) खेवड़ा के पीछे पहाड़ों के बहुत अन्दर जाकर बनाया और वहाँ एक गाँव बसाया जिसका नाम था ‘वहाली’।

यही था मेरा जन्मस्थान जिसकी कीर्ति-गाथा मैं पहले गा चुका हूँ।

लवण-पर्वतमाला की शासन व्यवस्था के लिये महाराजा रणजीतसिंह ने ये बेशक़ीमती नमक की खानें काश्मीर के महाराजा गुलाबसिंह के नाम (Transferred) कर दींऔर जब अंग्रेज़ी हुकूमत ने काश्मीर का इलाक़ा महाराजा गुलाबसिंह के नाम कर दिया तो सरदार भागसिंह के दूसरे पुत्र सरदार हाड़ासिंह महाराजा गुलाबसिंह के साथ उनके राज्य में चले गये।

सन् 1850 में जब ध्यानसिंह के पुत्र राजा मोतीसिंह को पुण्छ का इलाका मिला तो हाड़ासिंह पुण्छ रियासत के दरबार में उच्चाधिकारी नियुक्त किये गये और सलोत्तरी गाँव, तहसील हवेली, ज़िला रावलपिंडी उनको स्थायी जागीर के तौर पर दी गयी। सन् 1865 ईस्वी में सरदार हाड़ासिंह को पुण्छ रियासत का वज़ीर बना दिया गया और उनको सरदार का पुश्तैनी ख़िताब (Hereditory title of Sardar) दे दिया गया। उसके साथ एक गाँव कलहोटा (Kalhota) भी उनकी पहली जागीर के साथ मिला दिया गया जिसके लगान (Revenue) की आमदनी 900 रुपए सालाना थी। - और साथ में ही वहाली के ख़ानदान को ‘सरदार’ के पुश्तैनी ख़िताब से आभूषित किया गया।

सरदार हाड़ा सिंह 1869 में अपनी आख़िरी दम तक पुण्छ स्टेट के शानदार काम करने वाले वज़ीर रहे। जब उनका शरीर-पात हुआ तो उनके पुत्र सरदार करतार सिंह की आयु केवल दस वर्ष की थी। और चार ही वर्ष के बाद 1873 में चौदह वर्ष की आयु में सरदार करतार सिंह महाराजा के मशीरे-खास (Private Minister) बना दिये गये और मुंग-बजरी (Mung-Bajri) गाँव भी जो कि बाग़ (Bag) तहसील में था और जिसका सालाना लगान 352 रुपये था, उनको जागीर में दे दिया गया।

समय पाने पर सरदार करतार सिंह को मदार-उल माहम (Madar-ul- Maham) के उच्च पद पर नियुक्त कर दिया गया और उनको सरदार बहादुर का ख़िताब दिया गया।

1879 में अफ़गान युद्ध के समय सरदार करतार सिंह और उनके भाई सरदार हरिसिंह दोनों ने अपनी सेवायें सरकार को अर्पित कींऔर जिसके उपलक्ष्य में उनको मान-पत्र (सनद्) दिया गया और फिर 1887 में महारानी विक्टोरिया की स्वर्ण-जयन्ती (Golden Jubilee) के समय सरदार करतार सिंह को जो कि रियासतों के प्रान्तीय दरबारी थे, भारत के वायसराय ने कश्मीर और पुण्छ रियासतों में सार्वजनिक सेवाओं और सुचारु शासन संचालन के मान-स्वरूप सनद दी। सरदार करतार सिंह का सन् 1900 में निधन हो गया।

सरदार करतार सिंह का एक ही पुत्र था कृष्णदेव सिंह जो कि चीफ़्स कॉलेज, लाहौर (Chief’s College, Lahore) में शिक्षा प्राप्त कर रहा था। दुर्भाग्य से कृष्णदेव सिंह की भी 1918 की इन्फ़्लुएजा की महामारी में मृत्यु हो गयी।

अब सरदार हरिसिंह ही इस वंश के मुखिया रह गये। सरदार हरिसिंह ने कश्मीर व पुण्छ रियासत के साथ अपने ख़ानदानी-सम्बन्ध बनाये रखे और उनके पास पूरी रियासत के कर वसूल करने की ज़िम्मेदारी थी और ठेका था। कर-वसूली के संचालन का बहुत लम्बा-चौड़ा काम था। अब तक सरदार हरिसिंह की जायदाद समूचे पंजाब में इतनी फैल चुकी थी कि उन्हें रियासत की सेवा छोड़नी पड़ी। 1909 में समूचे पंजाब में इस ख़ानदान की जायदाद और जागीर सबसे अधिक थी जिसका विस्तार जेहलम, झं ग, गुजरांवाला, लायलपुर, शाहपुर, रावलपिंडी के ज़िलों में, चौदह हजार एकड़ में फैला हुआ था। - और उस ज़माने में उनको इस जागीर से 20,000 रुपये सालाना की लगान की आमदनी थी।

अकेले लायलपुर ज़िले के नहरी इलाके में इस ख़ानदान की 127 मुरब्बे ज़मीन थी और जेहलम रावलपिंडी और कोहमरी की छावनियों में बेशुमार कोठियाँ और जायदादें थीं। वे जेहलम और लायलपुर के छः गाँवों के लम्बरदार भी थे और उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों के नाम पर दूर-दूर चार गाँवों की स्थापना की थी।

अपनी विशाल सम्पत्ति के सुचारु संचालन के द्वारा सरदार हरिसिंह ने अपनी अद्वितीय कार्यकुशलता का परिचय दिया था। वह एक आदर्श भूमिपति माने जाने लगे और उनका वहाली का सम्पत्ति-संचालन, सचिवालय (Secretariat) अपनी पूर्ण प्रबन्ध दक्षता व कुशल संचालन के कारण कितने ही उच्च-पदाधिकारियों की प्रशंसा का पात्र बना।

सरदार हरिसिंह पढ़े-लिखे तो नहीं थे। केवल उर्दू की दो-तीन कक्षा तक ही पहुँचे थे तो भी वह इतनी बड़ी रियासत (Estate) को कुशलता व निपुणता से चलाते थे। अपने काम पर वे पूरी तरह से हावी थे। - और खूब लिखा-पढ़ी जानते थे। उनका उर्दू का लेख (खुशख़त) क़ातिब की तरह था जैसे कि छपा हो।

अपनी योग्यता के कारण वे पंजाब गवर्नर की कौंसिल (Council) के मैम्बर हो गये और जेहलम ज़िला बोर्ड (Distict Board) के भी मैम्बर हो गये और छावनी बोर्ड (Cantonment Board) के भी लगातार मैम्बर रहे। गवर्नमेंट की सभी योजनाओं में सक्रिय भाग लेते थे और मान पाते थे।

सार्वजनिक सेवा कार्यों में भी उनका बहुत योगदान था। कई शिवालय, धर्मशाले, गुरुद्वारे, मस्जिदें बनवाईं। स्कूल-कॉलिज और हस्पताल बनवाये। जगह-जगह पर जल-शालाएँ (प्याऊ) और तालाब बनवाये। दीन-दुःखी-अनाथ और विधवाओं के संरक्षक थे। इन सबके कारण भारत के वायसराय व गवर्नर-जनरल से उन्हें सनद (मानपत्र) मिली। पंजाब के गवर्नर से उन्हें सोने की घड़ी मिली थी साथ ही सरकार की ओर से कुर्सी-मशीन का दर्जा मिला। जहाँ भी कोई सभा-दरबार हो उनको उच्च स्थान पर (Among the dignitories) कुर्सी दी जाती थी। गवर्नमेण्ट के सभी विभागों के उच्चाधिकारियों (Govt. Officials of Various Departments) से उनको ऊँचे दर्जे के अनेक प्रशंसा-पत्र (Letters of Appreciation) मिले जिनमें उनकी उदारता, वफ़ादारी, व्यवहार व व्यापार-कुशलता और हर समय गवर्नमेंट की किसी भी योजना (Scheme) में उनकी मदद व जनता के सभी प्रकार के उन्नति व भलाई के कार्यों में उनकी तत्परता का उल्लेख था।

यह सब मैं क्यों लिख रहा हूँ और क्यों मैंने यह सब वर्णन किया और अभी काफ़ी आगे तक भी अच्छा वर्णन आयेगा . . . क्योंकि इन सबका मेरे जीवन में गुह्य सम्बन्ध और महत्व (Occult Significance & Relationship) है।