चाचा जी की आत्मकथा के विषय में
श्रीअरविन्द आश्रम दिल्ली के संस्थापक पूज्य चाचा जी श्री सुरेन्द्रनाथ जी जौहर जीवन भर कामों में इतना व्यस्त रहे कि उन्हें न तो कभी अपनी आत्मकथा लिखने का समय मिला और न उन्होंने इसे कभी महत्व ही दिया। क्योंकि उन्हें तो अपने नाम, यश, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि से सर्वथा दूर रहते हुये चुपचाप काम करना ही पसन्द था।
अब तक चाचा जी के जीवन के विषय में जो कुछ ज्ञात हुआ है उसके पीछे ‘श्रीअरविन्द कर्मधारा’ पत्रिका के सम्पादकों का प्रयास रहा है, क्योंकि उनके सामने एक विवशता थी, उनकी दृष्टि में चाचा जी की कथा-कहानियों और संस्मरणों के अभाव में ‘कर्मधारा’ पत्रिका निष्प्राण प्रतीत होती थी, इसलिये उनका अनुनय विनय व आग्रह का सिलसिला जारी हुआ और वे अन्ततः समय-समय पर चाचा जी से कुछ लिखवाने में सफल हो गये।
फिर भी चाचा जी इसके लिये सहमत तभी होते जबकि वे अपनी बीमारियों के कारण बाहरी कार्यों को करने में या तो असमर्थ होते अथवा चारपाई पर। बीमारी के इन क्षणों में भी उनकी व्यस्तता देखते ही बनती थी। एक ओर तो उनके कान में फोन है, फोन से बातें हो रही हैं, दूसरी और हाथ में कलम और कागज़, जिनसे लिखाई का काम चल रहा है और तीसरी ओर बैठे हुये लोगों से आवश्यक चर्चायें भी हो रही हैं।
अपनी इन सारी व्यस्तताओं के बावजूद जब चाचा जी ने श्रीमाता जी से भेंट विषयक अपने 108 संस्मरणों को पूरा किया तो इससे लोगों को बड़ी प्रसन्नता हुई और वातावरण में खुशी की एक लहर-सी आ गई। इससे लोगों का उत्साह बढ़ा और उनसे अपने जीवन विषयक अन्य संस्मरण लिखने का आग्रह किया गया। इस आग्रह पर चाचा जी ने ‘‘मैं, मेरी जन्मभूमि और मेरा ख़ानदान’ का एक अध्याय तो पूरा कराया लेकिन इसके बाद आगे बढ़ने से उन्होंने साफ इंकार कर दिया और कहा कि यह आत्मकथा तो हज़ारों पन्ने चलेगी, जिसके लिये उनके पास समय नहीं है।
बाद में, उनके जीवन के अन्तिम वर्षों में दिल्ली प्रशासन के अधिकारियों द्वारा चाचा जी से उनके स्वाधीनता संग्राम सम्बन्धी संस्मरण सुनाने का आग्रह किया गया और इस विषय में चाचा जी की वार्ता के कई कैसेट उन्होंने तैयार किये। चाचा जी के पार्थिव शरीर छोड़ने के उपरान्त मुश्किल से ये कैसेट उक्त विभाग द्वारा आश्रम को उपलब्ध हो सके। इन कैसेटों में चाचा जी की यह वार्ता इंगलिश में थी, जिसका हिन्दी रूपान्तरण देवी करुणामयी जी ने किया और इस तरह आत्मकथा के ये प्रसंग हिन्दी जगत् के समक्ष आ पाये।
इस तरह हम देखते हैं कि चाचा जी की आत्मकथा का कोई क्रम नहीं है, बल्कि उनके जीवन के विविध प्रसंग इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। आत्मकथा के इस संग्रह में इस बिखरी हुई विभिन्न सामग्री को पिरोने का प्रयास किया गया है और उन्हें पूज्य चाचा जी के जन्मशताब्दी के अवसर पर प्रकाशित किया जा रहा है। आशा है हमारे पाठकों को इससे उनके जीवन की एक झलक मिल सके गी।
चाचा जी का सम्पूर्ण जीवन उनके अमित पुरुषार्थ, त्याग, तपस्या, सेवा, शौर्य एवं समर्पण का जीवन रहा है। अपने इस जीवन्त उदाहरण से उन्होंने देश-विदेश के कितने ही लोगों को प्रभावित किया। उनका समस्त जीवन प्रेरणाओं से भरपूर है जिससे लोग युग-युग तक मार्गदर्शन प्राप्त करते रहेंगे। आशा है हमारे पाठकों को पूज्य चाचा जी की इस आत्मकथा से यथेष्ट मार्ग दर्शन प्राप्त होगा।